Saturday, December 26, 2015

संस्कृत तथा विज्ञान

यह समस्त जगत् अनुप्रविष्ट जड़ तथा चेतन का विभव विस्तार है। दूसरे शब्दों में जड़ तथा चेतन का योग ही विश्व है। सृष्टि के आरम्भ से ही मानव अपनी सूक्ष्मेक्षिका दृष्टि से वह सर्वस्व देखने जानने तथा वाणी द्वारा व्यक्त करने का प्रयास करता रहा है, जो सत्तावान है। यही कारण है कि वेदव्यास जैसे सर्वविद् ऋषि ने दृढतापूर्वक यह उद्घोष किया- ‘‘ नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।’ समग्र सत्ता को ऋषियों ने ऋत तथा सत्य के रूप में सृष्टि का प्रथम तŸव बतलाया जो आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा उल्लिखित स्थिति तथा गति प्रत्ययों का मूल है। उक्त जड़चेतनात्मक जगत् को वैदिक ऋषियों ने अग्नीषोमात्मक कह कर अग्नि को विविध रूपों में उद्भूत चैतन्य के स्रोत के रूप में तथा सोम को समस्त भौतिक वस्तुजात का स्रोत माना। आधुनिक विज्ञान ऊर्जा तथा पदार्थ के रूप में जिस जगत् की व्याख्या करता है, वह मूलतः अग्नि तथा सोम ही है। जड़ तथा चेतन, अग्नि तथा सोम, ऋत तथा सत्य, स्थिति तथा गति, ऊर्जा तथा पदार्थ एक ही सत्ता या सत् के द्वन्द्व हैं। सत् का एक और द्वन्द्वरूप है दिक तथा काल, जिसे प्रत्यक्ष अनुभव किया जाता है तथा जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय संरचना एवं उसके संसरण-सञ्चरण का सूत्रधार है। इसी दिक् तथा काल में समस्त दैशिक तथा कालिक विश्वव्यवहार होता है।
अस्तु। ज्ञान मनुष्य का स्वभाव तथा अनुसन्धान उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। विज्ञान तथा तन्त्र (ज्मबीदवसवहल) के वर्तमान युग में ज्ञान-विज्ञान के नवीन आयामों, मान्यताओं तथा अनुसन्धानों को जिस सर्वथा नवीन पद्धति, पारिभाषिक शब्दावली और लोकोपयोगी सन्दर्भाें में विश्लेषित कर अभूतपूर्व ज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, उसकी परम्परा का पर्यवसान कहाँ है, यह विचार तब तक सिद्धार्थ नहीं होता, जब तक ज्ञान के मूल स्रोत एवं परम्परा का समग्र चिन्तन न किया जाये। जैसा कि संकेत किया गया कि ज्ञान मनुष्य का स्वभाव है। स्पष्ट है कि प्रत्येक काल में परिवेश का निरीक्षण, मनन, चिन्तन, उद्बोधन तथा प्रतिपादन होता रहा है। दुःख की बात यह है कि विश्व को ज्ञान-विज्ञान का प्रथम सन्देश देने वाले जगद्गुरु भारत की बौद्धिक सम्पदा का हरण कर उसे प्रभाहीन सिद्ध करने का षड्यन्त्र करने वाले पाश्चात्य ऐन्द्रजालिकों ने बार-बार भारतीयों को हीनताग्रन्थि से ग्रसित होकर यह स्वीकार करने को विवश किया कि विज्ञान पाश्चात्य जगत् की देन है तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा का इसमें कोई दाय (भागीदारी) नहीं है। उक्त सन्दर्भ में विचारणीय है कि भारत ही नहीं, अपितु विश्व की प्रथम भाषा संस्कृत तथा उसके अक्षय वाङ्मय भाण्डागार को कालबाह्य कह कर उसकी उपेक्षा के दो प्रमुख कारण रहे। प्रथम, संस्कृत भाषा से अपरिचय के कारण उसमें निहित साहित्य के तात्पर्य का ज्ञान न होना। तथा द्वितीय, उस अज्ञानजन्य हीनताग्रन्थि के उद्रेकवशात् सामूहिक आत्मविश्वास का ह्रास और भारतीय विज्ञान में अविश्वास तथा अश्रद्धा।
ईश्वरेच्छा अथवा हम भारतीयों के आत्मसम्मान के पुनरुज्जागरण के कारण आज पुनः उस तŸवानुसन्धान का उपक्रम किया जा रहा है। उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के कुछ तŸवान्वेषी विद्वानों के अथक प्रयास से आज संस्कृत भाषा के महत्व तथा उसके अपार साहित्य में निहित विज्ञान के प्रति लोगों का विश्वास, आस्था तथा रुचि बढ़ी है, किन्तु केवल गुणगान करने का समय अब व्यतीत हो चुका है। अब आधुनिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में संस्कृत वा्ङमय के पुनरीक्षण तथा पुरातन विज्ञानधारा को वर्तमान से तार्किक रूप से सम्बद्ध कर प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। यह इसलिये नहीं, कि हम हठात् बलात् अपने पूर्वजों की अन्तर्दृष्टि को विश्वपटल पर आरोपित करना चाहते हैं, अपितु इसलिये कि किसी भी देशकाल में समग्रता के बिना कोई भी ज्ञान पूर्ण नहीं होता। वर्तमान में जीने तथा भविष्य की परिकल्पना के लिये अतीत की परम्परा को समझना एवं उसका मूल्याङ्कन बहुत महŸवपूर्ण होता है। इस दृष्टि से अनद्यतन ज्ञान अद्यतन ज्ञान का आधारसेतु होता है, इसमें सन्देह नहीं, क्योंकि पूर्व में प्राप्त निष्कर्षों में से लोकोपयोगार्थ तथा सर्वाङ्गीण विकास हेतु उपादेय का ग्रहण तथा हेय का त्याग करने के साथ ही देशकालानुसार अपेक्षित परिवर्तन-परिवर्द्धन एवं परिष्कार विश्वकल्याण की दिशा प्रवर्तित करता है।
इस निबन्ध का साक्षात् प्रतिपाद्य संस्कृत में उपलब्ध आधुनिक विज्ञान के सूत्रों की चर्चा करना है। इस दृष्टि से आधुनिक विज्ञान को स्थूल विज्ञान तथा प्राचीन विज्ञान को अपेक्षाकृत सूक्ष्म विज्ञान कहा जा सकता है। अथवा यह कह लिया जाये, कि आधुनिक विज्ञान व्यवहारमूलक है, जबकि प्राचीन विज्ञान सिद्धान्तमूलक। अथ च, जो ज्ञान असन्दिग्ध, निर्दाेष, यथार्थ, प्रामाणिक तथा त्रिकालाबाधित अर्थात् सत्य हो, उसे विज्ञान कहा जाना चाहिए। आश्चर्य का विषय है कि आज से सहस्रों-सहस्रों वर्षों पूर्व वैदिक ऋषियों ने इस मर्म को स्वीकार कर सत्य का अनुसन्धान करने की दृष्टि प्राप्त करने हेतु पूषा से प्रार्थना की थी, जो ‘तत्त्व पूषन्नपावष्णु सत्यधर्माय दृष्टये’ इस ईशावास्योपनिषद् के वचन से ज्ञात होता है। ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ तथा ‘विज्ञानं ब्रह्म’ कह कर उपनिषदों नें भी विज्ञानविषयक उक्त अवधारणा को व्यक्त किया गया है।
प्रायः विज्ञान के दो रूप स्वीकार किये जाते हैं- शुद्ध तथा अनुप्रयुक्त। शुद्ध विज्ञान विश्वब्रह्माण्ड के संरचनात्मक स्वरूप तथा उसके दैशिक व कालिक विस्तार का अध्ययन करता है। अनुप्रयुक्त विज्ञान का सम्बन्ध ब्रह्माण्ड में उपलब्ध तथा ग्राह्य समग्र ऊर्जा एवं पदार्थ के व्यवहारोपयोगी पक्ष व तद्गत सम्भावनाओं की व्याख्या से है। विज्ञान की इन दो मूलभूत शाखाओं की उपशाखाओं प्रशाखाओं का विस्तार-प्रसार वटवृक्ष की भाँति फैला हुआ है। भौतिकी, रसायन, जीवविज्ञान, नृविज्ञान, शरीरविज्ञान, पर्यावरण विज्ञान, वैद्युतिकी, धातुविज्ञान, कृषिविज्ञान, वास्तुविज्ञान, यन्त्र-तन्त्रविज्ञान आदि कितनी ही शाखाओं में प्रतिदिन नवीन अध्ययन-अनुसन्धान हो रहे हैं। संस्कृत शास्त्रकारों, विशेषतः वैदिक ऋषियों (प्राच्य वैज्ञानिकों) ने परा तथा अपरा विद्याओं के रूप में जिस ब्रह्मविद्या तथा वेदविद्या का व्यापक व्याख्यान किया है, वह शुद्ध तथा अनुप्रयुक्त विज्ञानरूप ही है। विशेष तथ्य यह है कि वैदिक संहिताओं से लेकर ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषदों में ब्रह्माण्ड के रहस्यों को स्थूल से सूक्ष्म के क्रम में जिस प्रकार समाहृत तथा एकीकृत रूप में प्रस्तुत किया गया, उसे वेदाङ्गों, उपाङ्गों दर्शनों, तन्त्रागमों, पुराणों इतिहासकाव्यों, प्रकरण ग्रन्थों, लक्षणग्रन्थों तथा अन्य असङ्ख्य शास्त्रीय ग्रन्थों में विषयशः एवं क्षेत्रशः व्यापक रूप में प्रस्तुत किया गया। कहना न होगा कि प्रकृति के बाह्य उपादानों के निरीक्षण अवेक्षण से जिस आर्ष चिन्तन का आरम्भ हुआ, वह आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन पद्धति का प्रवेशद्वार है।
पहले पदार्थ था या ऊर्जा, अन्धकार था या प्रकाश, काल था या दिक्, सृष्टि कैसे तथा किस क्रम से हुई इत्यादि मूलभूत प्रश्न विज्ञान के लिये आज भी अन्तिम समाधान तक नहीं पहुँचे हैं। इस सन्दर्भ में विश्व के प्रथम उपलब्ध वाचिक प्रमाण, ऋग्वेद की प्रथम ऋचा में अग्नि का जो वर्णन प्राप्त होता है वह विचारणीय है- 
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।
होतारं रत्नधातमम्।।
इस ऋचा के सामान्य अर्थ पर विचार किया जाये तो ऋषि ने कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का संकेत किया है- अग्नि पुरोहित अर्थात प्रथम व्यक्त अथवा रूपवान् तत्व है। वह यज्ञ का देव है। यज्ञ का अभिप्राय कर्म है तथा देव का अर्थ प्रकाशित करने वाला है। इस प्रकार अग्नि, जिसे सभी प्रकार की मूल तथा व्यवहार्य ऊर्जारूप में समझना चाहिये, कर्म का, गति का, चैतन्य का हेतु है। वह ऋत्विक् है। वह होता अर्थात् सृष्टियज्ञ का सम्पादयिता भी है। वह रत्नरूप है तथा विश्व को सर्वथा धारण करने वाला है। ऊर्जा के सर्वविध स्वरूपों तथा कार्योें का अध्ययन करने वाले आधुनिक वैज्ञानिकों को अग्नि के उक्त गुणों को स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए। हिरण्यगर्भ सूक्त में सृष्टि के कारणभूत जिस हिरण्याण्ड का उल्लेख किया गया है, उसके महाविस्फोट तथा द्यावापृथिवी सहित ब्रह्माण्डसृष्टि का उल्लेख उपनिषदों में प्राप्त होता है। आधुनिक बिगबैंग सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में यह अध्ययन का विषय है। यही नहीं, सृष्टि के पूर्व क्या था? सत्, असत् या सदसत्, इस विषय पर गम्भीर चिन्तन कर असत् से सत् की अभिव्यक्ति के क्रम तथा स्वरूप का अनुमानपूर्वक विश्लेषण संहिताओं तथा दर्शनादि शास्त्रों में स्फुट रूप में किया गया है। उन सभी विचारक्रमों पर न केवल वैदिक संहिताओं अपितु परवर्ती शास्त्रीय संस्कृत ग्रन्थों में भी पर्याप्त चिन्तन प्राप्त होता है। आधुनिक वैज्ञानिक ‘ध्वान्त’ की व्याख्या जिस रूप में करते हैं, उसके मूल में सृष्टि की उस प्रथम अवस्था का विवेचन करने वाला वह वैदिक मन्त्र महत्वपूर्ण प्रतीत होता है, जिसमें कहा गया है ‘‘न वहाँ सत् था न असत्। अपितु उनके मध्य एक गहन गम्भीर ‘तमस्’ था।’’ यह केवल एक उदाहरण है।
साङ्ख्य दर्शन में अव्यक्त से व्यक्त की उत्पत्ति तथा उसके त्रिगुणात्मक स्वरूप की व्याख्या करते हुये सत्व रजस् तमः के गुणों तथा उनके यौगिक आनन्त्य का अध्ययन आधुनिक परमाणु संरचना एवं पदार्थों के रासायनिक योगों के परिप्रेक्ष्य में किया जाये तो ज्ञात होगा कि विश्व के समस्त जड़ चेतन पदार्थों में वैयक्तिक भेद का कारण इन त्रिगुणों का यौगिक अनुपात है। जैव विविधता का कारण भी यही है। वैशेषिक दर्शन उस वैविध्य को सिद्धान्ततः पदार्थों के साधम्र्य तथा वैधम्र्य की व्याख्या के रूप में प्रस्तुत करता है तो न्याय दर्शन प्रमाणों द्वारा पदार्थों के यथार्थ ज्ञान का उपाय बतलाता है। वेदान्त दर्शन, विशेषतः अद्वैत वेदान्त समस्त स्थूल-सूक्ष्म, मूर्त-अमूर्त विषयों में जिस तात्विक तादात्म्य तथा अद्वैत की सिद्धि करता है वह विलक्षण है।
आधुनिक स्थूल विज्ञान जिन मूल तत्वों के वैविध्यपूर्ण सङ्घटन के कारण पदार्थाें नानात्व की कल्पना करता है, उनकी सङ्ख्या के विषय में आज भी अनुसन्धान चल रहा है जबकि वेदान्तोपनिषदों में आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी इन पञ्च महाभूतों के तन्मात्रों को ही मूलतत्त्व स्वीकार किया जिनके पञ्चीकरण से नाना प्रपञ्च का विस्तार हुआ। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि शुद्ध विज्ञान की आधुनिक शाखाओं के अध्ययन में भारतीय दार्शनिक चिन्तन की महती भूमिका रही है। अपितु, दर्शन और विज्ञान एक ही सिक्के के दो पटल कहे जा सकते हैं।
गुरुत्वाकर्षण तथा सापेक्षता का सिद्धान्त आधुनिक विज्ञान की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। ये दोनों ही सिद्धान्त सूत्र रूप में वैदिक संहिताओं में प्राप्त होते हैं, जिनका विशेष तथा विस्तृत विवेचन ज्यौतिष वेदाङ्गविषयक ग्रन्थों एवं परवर्ती जैन दर्शन में प्राप्त होता है। सूर्यसिद्धान्त में अन्तरिक्ष में पृथिवी के निराधार विचक्रमण, दिक् तथा काल का स्वरूप, पृथिवी से ग्रहों की दूरी एवं दिशा जानने की विधि, प्रकाशरूप अग्नि, अन्य ग्रहों तथा भौतिक घटनाओं के अन्तःसम्बन्धों की व्याख्या इत्यादि सप्रमाण तार्किक रीति से की गई है। जैनदर्शन के प्रमुख सिद्धान्त स्याद्वाद का विवेचन करने वाले ग्रन्थ स्यद्वादमञ्जरी में लौकिक उदाहरणों द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि विश्व में प्रत्येक पदार्थ तथा ज्ञान सापेक्ष है। इसी कारण भ्रम तथा अज्ञान की प्रवत्ति होती है। अङ्कगणित तथा बीजगणित के सिद्धान्तों का रोचक प्रतिपादन करने वाले ग्रन्थ महासिद्धान्त तथा भास्कराचार्य कृत लीलावती, रेखागणित के आधारभूत वेदाङ्गग्रन्थ शुल्बसूत्र इत्यादि की लम्बी सूची है जिनमें विज्ञान की विविध शाखाओं के सूत्र प्राप्त होते हैं।
अनुप्रयुक्त विज्ञान, जिसका सम्बन्ध लोकव्यवहार तथा मानवजीवन की दैनन्दिन आवश्यकताओं से है, वर्तमान समय में चिकित्साविज्ञान, वास्तुविज्ञान, यन्त्रविज्ञान, तन्त्रविज्ञान, मानविकी, मनोविज्ञान, मानवविज्ञान, पर्यावरण विज्ञान, जीव विज्ञान, वनस्पतिविज्ञान, अनुप्रयुक्त भौतिकी तथा रसायन विज्ञान, भूगर्भविज्ञान, कृषि विज्ञान, प्रबन्धन विज्ञान आदि अध्ययन तथा व्यवहार के विषय हैं। इस सन्दर्भ में वक्तव्य है कि संस्कृत भाषा में लिखित प्रचुर साहित्य में इन विषयों पर पर्याप्त चिन्तन किया गया है। उदाहरणार्थ मयमतम् एक विशाल ग्रन्थ है जिसमें वास्तुविज्ञान का विस्तृत विवेचन है। इसके अतिरिक्त अग्निपुराण, बृहत्संहिता, तन्त्रसमुच्चय, विश्वकर्माप्रकाश आदि ग्रन्थों में भवननिर्माणकला का वैज्ञानिक विवेचन किया गया है। भूगर्भविज्ञान की दृष्टि से तैतरीय संहिता, सिद्धान्तदर्पण, बृहत्संहिता, पौराणिक साहित्य आदि ग्रन्थ उल्लेखनीय हैं।
पुराण वास्तव में अनेक वैज्ञानिक विचारधाराओं के स्रोत हैं, जिनमें सृष्टिविज्ञान विषयक चिन्तन के अन्तर्गत पृथिवी की भौगोलिक संरचना के क्रमिक विकास, जीवों की क्रमिक उत्पत्ति, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक विकासक्रम, जैविक पर्यावरण तथा उसके संरक्षण, वृक्षारोपण तथा कृषिपद्धति आदि की व्यापक चर्चा की गई है। पद्मपुराण, ब्रह्मपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण तथा अग्निपुराण इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
इसी प्रकार ऋतुविज्ञान तथा वृष्टिविज्ञान का जैसा विधिवत् उल्लेख बृहत्संहिता में प्राप्त होता है, वह आधुनिक वनस्पतिविदों तथा मौसमवैज्ञानिकों के लिये अवश्य अध्येय है। कृषि का वृृष्टि तथा ऋतुचक्र का घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस दृृष्टि से कृषि, वृष्टि तथा सांवत्सरिक ऋतुचक्र का सूक्ष्म सम्बन्ध एवं पूर्वलक्षणों का ज्ञान कराने वाला विलक्षण ग्रन्थ कृषिपाराशर, कृषिपद्धति का समग्र विवेचन (जिसमें कृष्यभूमिपरीक्षण, वृृक्ष पादप लतावितान तथा सस्य योग्य भूमि का चयन, कृष्य अन्न के प्रकार, बीजसंस्कार, जुताई, बुआई, सिंचाई, फसल के अनुसार सस्यों का अवेक्षण, कटाई-मड़ाई आदि) करने वाला ग्रन्थ काश्यपीय कृषि सूक्ति, पादपविज्ञान, विशेषतः पादपरोगनिदान सम्बन्धी अप्रतिम ग्रन्थ वृक्षायुर्वेद, उद्यानशास्त्र का बृहद् विवेचन करने वाला ग्रन्थ उपवनविनोद आदि न केवल भारतीय विज्ञान के स्वर्णपटल के उद्भासक हैं अपितु वन्ध्या होती धरती की उर्वरा शक्ति को पुनरुज्जीवित करने तथा जैविक कृषि का मार्ग प्रशस्त करने वाले हैं। पर्यावरणप्रदूषण की समस्या से मुक्ति के लिये इन ग्रन्थों का अनुसन्धानात्मक अध्ययन तथा अनुपालन नितान्त उपयोगी है। गर्गसंहिता तथा काश्यपीय संहिता भी उल्लेखनीय हैं।
चिकित्साविज्ञान में चरक तथा सुश्रुत का नाम कौन नहीं जानता? कायचिकित्सा के लिये चरक संहिता तथा शल्य- शालाक्य के लिये सुश्रुतसंहिता, निदान के लिये माधवनिदान, औषधीय गुण-वीर्य के लक्षणों के ज्ञान हेतु द्रव्यगुणविज्ञानम्, मनश्चिकित्सा के लिये चरकसंहिता का शारीरस्थान, मनश्चिकित्सा के लिये चरक तथा सुश्रुत संहिताओं के विमानस्थान आज भी आयुर्वेद के अध्येताओं तथा आधुनिक चिकित्सा पद्धति के चिकित्सकों के लिये भी उपयोगी हैं। अज्ञानजन्य प्रमाद तथा आधुनिकता के मिथ्या दम्भ के कारण आधुनिक चिकित्साविद् आयुर्वेद का तिरस्कार करते हैं, जिसका परिणाम औषधों के दुष्परिणामों के रूप में दिखायी देता है।
प्रसूति तथा प्रजनन विज्ञान चिकित्साशास्त्र की महत्वपूर्ण शाखा है। चरक तथा सुश्रुत ने तो इस शाखा का व्यापक विवेचन किया ही है, उनसे पूर्व वैदिक वाङ्मय में प्रश्नोपनिषद् तथा गर्भोपनिषद् में योनिज जीवोपत्ति तथा गर्भ के क्रमिक विकास का स्पष्ट वर्णन प्राप्त होता है। यही नहीं, जीवात्मा के वैज्ञानिक स्वरूप जिस प्रकार विश्लेषित किया गया है उसे देख कर शास्त्रकारों के ज्ञान पर आश्चर्य होता है। किस प्रकार आकाश में सूक्ष्म रूप से व्याप्त अनन्त जीवाणु अपने अदृष्टवशाद् वृष्टि के साथ भूमि में प्रविष्ट होकर अन्न के साथ पुरुष के शरीर में शुक्र रूप में जाते हैं तथा अनुकूल परिस्थिति पाकर माता के रज के साथ मिल कर क्रमशः बढ़ते हुये भ्रूण से शिशुरूप में जन्म लेते हैं, यह विवेचन ऋषियों की तत्ववान्वेषी दृष्टि तथा बुद्धि पर विचार करने को विवश करता है। जीवविज्ञान की अत्याधुनिक शाखा सुजनन विज्ञान के बीज भारतीय संस्कारपद्धति के ज्ञापक गृह्यसूत्रों में सहज ही प्राप्त होते हैं। उल्लेखनीय है कि संस्कारों का विधान इस तथ्य का प्रमाण है कि श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति तथा उसके जैविक व्यक्तित्व का निर्माण माता पिता के अधीन है।
महर्षि भरद्वाज का यन्त्रसर्वस्व धातुविज्ञान तथा अभियन्त्रण का प्रतिष्ठित ग्रन्थ है। वैमानिकरहस्य इस ग्रन्थ का सर्वोत्कृष्ट अंश है जिसमें विमाननिर्माण तथा सञ्चालन का विधिवत् विवेचन है। इन ग्रन्थों के अतिरिक्त संस्कृत के असङ्ख्य प्राचीन तथा अर्वाचीन ग्रन्थों में वैज्ञानिक सिद्धान्तों का साक्षात् अथवा परोक्ष उल्लेख प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ कौटिल्य के अर्थशास्त्र में विविध रसायनों से विविध पदार्थों के शोधन का पृथक् पृथक् उल्लेख है। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, शुक्रनीति आदि कितने ही ग्रन्थों में अस्फुट रूप में विज्ञान के सूत्र मिलते हैं।
वास्तव में समग्र संस्कृत साहित्य में जीवनोपयोगी विज्ञान भरा पड़ा है। ज्ञान अनन्त है। देशकाल की आवश्यकताओं के अनुसार प्रबुद्ध जन अनुसन्धान कर उसे विज्ञान की दृष्टि से देखते हैं। भाषा, विश्लेषणपद्धति तथा उपयोग में भले ही अन्तर हो किन्तु तथ्य तथा घटनायें  किञ्चित् न्यूनाधिक्य के साथ वही रहती हैं। महाकवि कालिदास का कथन है कि न तो प्राचीन ही सर्वश्रेष्ठ होता है और न नवीन सर्वथा श्लाघ्य। अतः नवीन के संस्कार के लिये पुरातन का अन्वीक्षण एवं पुरातन की परम्परा में नवीन का अनुसन्धान कल्याणकारी है। इस दृष्टि से संस्कृत वाङ्मय में निहित विज्ञान तथा वैज्ञानिक रहस्यों को अप्रमाण भाव से धैर्य एवं श्रद्धापूर्वक अध्ययन की अपरिहार्य आवश्यकता है। और वह तभी सम्भव है जब संस्कृत भाषा को अल्प वय से जनज न को सिखाया जाये। वर्तमान परिस्थिति में यह कार्य कठिन अवश्य है पर असम्भव नहीं। हाँ, आरम्भ तो करना ही होगा।
- डाॅ॰ नवलता
एसोसिऐट प्रोफेसर तथा अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, वी॰एस॰एस॰डी॰ काॅलेज, कानपुर।