हीं अघाता। निस्संदेह पृथ्वी पर इसका भूगोल है। एक सुनिश्चित इतिहास है। राष्ट्र राज्य के रूप में इसकी एक सीमा भी है लेकिन भारत नाम की यह धरती विश्व का आश्चर्यजनक भूखण्ड है। इस भूमि की अपनी दिव्य गंध है। भरत भूमि न्यारी है। पौराणिक कवि यह बात जानते थे। इसीलिए लिख गए हैं कि देवता भी यहाँ जन्म लेने के लिए व्याकुल रहते हैं। मन में प्रश्न उठता है। स्वर्ग में सभी कामनाएं पूरी होती हैं। फिर देवता भारत भूमि में आने के इच्छुक क्यों रहते हैं? संभवतः अपने होने का सर्वोत्तम प्राप्त करने के लिए। स्वर्ग में सब कुछ है लेकिन जीवन का सर्वोत्तम तो कर्म तप में ही खिलता है। विष्णु पुराण के कवि के अनुसार स्वर्ग में बैठे देवता भी गाते हैं कि “भारत भूमि पर जन्म लेने वाले धन्य हैं।” स्वर्ग होता है या नहीं? देवता भी होते हैं या नहीं? ऐसे प्रश्न सदा से हैं, स्वाभाविक भी हैं लेकिन श्रद्धा का क्या करें? देवता सत्य और श्रद्धा का ही मिलन हैं। पुराणकार की अपनी अनुभूति पक्की है कि भारत में जन्म लेना और भारतीय होना परम सौभाग्य है। भारतीय होना एक विशेष आनंदित और दार्शनिक यात्रा में गतिशील होना है। अस्तित्व के प्रति आस्तिक होना है। अस्तित्व से प्रश्न पूछते जाना है।
सतत् श्रद्धा और सतत् प्रश्नाकुल चित्तवृत्ति का नाम है भारत। भारत का सामान्य शब्दार्थ है - प्रकाश संलग्न। भा प्रकाश है। रत संलग्नता। भारत अस्तित्व का प्रीतिपूर्ण छन्द है। विश्व प्रेम का गीत। भारत के अन्तस् में प्रकृति के सभी रूपों से प्रेम है। अस्तित्व के प्रति अद्वय अनुभूति है। दर्शन और विज्ञान की नाव पर संसार सागर में जलविहार के आनंद का नाम है भारत। रामायण और महाभारत इस देश के दो विश्वविख्यात महाकाव्य हैं। हम भारतवासी रामायण और महाभारत से जुड़कर आनंदित होते हैं। महाभारत भारत का ही आख्यान है। धृतराष्ट्र को महाभारत युद्ध का आँखों देखा हाल सुनाने वाले संजय कहते हैं, “अत्र ते वर्णयिष्यामि वर्षम् भारत भारतम् - हे भारत! अब मैं भारत का वर्णन करता हूं।” महाभारतकार का शब्द संयोजन अनूठा है। यहाँ ‘भारत भारतम्’ ध्यान देने योग्य है। गीता में श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन को कई बार ‘हे भारत’ कहा है। उपनिषद् के ऋषि ब्रह्म को जानने योग्य बताते हैं। स्थापना है कि ब्रह्म के जानकार ब्रह्म हो जाते हैं। भारत भी जानने योग्य है और जो भारत को जान जाते हैं वे भारत हो जाते हैं।
भारत सरल तरल सुबोध छन्द है। हृदय से उगता है और हृदय में समा जाता है। भारत भाव अपनत्व के गाढ़े घनत्व में उगता है। समूचे विश्व के कल्याण की भावना में व्याप्त होता है। सही भी है। भारत के लिए सारी धरती, आकाश और अंतरिक्ष ज्ञात और अज्ञात सब अपने। आकाश की भी यहाँ सीमा नहीं। स्काई इज नाट दि लिमिट हियर। आकाश यहाँ पिता है संरक्षक है और पृथ्वी माता। हम सब पुत्र। मेरा मन भारत प्रीति में स्तोता हो जाता है “हे भारत आप अजन्मा हैं। सृष्टि की प्रथम मुहूर्त के साथ उगे आप। हमारे पितर आपके पालन पोषण संरक्षण में विश्व प्रतिष्ठ हुए। हे भारत! आपने ही सारी दुनिया को “एक ही सत्य का बोध कराया। अस्तित्व के कण-कण और अणु परमाणु को परस्पर आत्मीय बताया। प्रकृति के सभी रूपों में एक साथ उपस्थित एक ही सत्ता का दर्शन भी कराया। आपकी भूमि सत्य के स्तवन, नीराजन, आराधन और दर्शन की तपस्थली है और विश्व के तत्वचिन्तकों का आकर्षण भी।
हे भारत! इसी आपकी पुण्यभूमि मंे जन्मे अनेक तत्वज्ञानियों ने दुनिया के तमाम क्षेत्रों में ज्योतिज्र्ञान का प्रकाश फैलाया। भारत! आप केवल भूमि, जन और संवैधानिक व्यवस्था का योग नहीं हैं। हम सबको यह भूमि प्रिय है, माता है हमारी। सभी भरतजन प्रिय हैं। वे हमारे परिजन हैं। पूर्वजों, अग्रजों, मार्गदर्शक वरिष्ठों व तत्वदर्शक ऋषियों द्वारा विकसित आपकी संस्कृति और भी प्रिय है। संविधान प्रिय है। मर्यादा प्रिय है। आपका अंग अंग रंग रंग प्रिय और श्रद्धेय है। हे भारत! विष्णु पुराण के कवि ने ठीक ही आपकी कीर्ति गाई है - “आप महासागर के उत्तर में हैं, आप हिमालय के दक्षिण में हैं। आप भारत हैं। हम आपकी संतति भारती हैं - तद् भारतं नाम भारतीय यत्र संततिः।” आपके अन्तस् नद का प्रवाह तमाम नदियों में प्रकट हुआ है। आकाश छूने को लालायित पर्वत शिखर, शिखरों पर उगे ऊँचे आकाश में खड़े होने को तत्पर वृक्ष आप ही हैं। जानता हूँ कि आपकी स्तुति में काव्य रचना आसान नहीं। स्तोता होना और भी कठिन। कैसे करूँ आपका स्तवन? हे भारत आपको नमस्कार है।
ऋग्वेद का काव्य सत्य और श्रद्धा की मधुमयता से भरापूरा आपका ही स्तवन है। ऋग्वेद (9.113.10-11) के ऋषि ने असाधारण कामना की है “जहाँ सारी कामनाएं पूरी होती हों, तृप्तिदायक अन्न हो आप हमें वहाँ स्थान दें- यत्र कामा निकामश्र्च।” कामनापूर्ति ही पर्याप्त नहीं। इसलिए आगे कहते हैं “यत्रान्दाश्च, मोदाश्च, मुद प्रमोद आसते - जहाँ आनन्द, मुद मोद प्रमोद है, आप वहाँ मुझे स्थायित्व दें।” इस भावप्रवण कविता में बार बार ‘जहाँ’ शब्द की आवृत्ति है। प्रश्न उठता है कि ऐसा कहाँ सम्भव है? कामनाओं की पूर्ति, तृप्तिदायक अन्न देने वाली धरती है कहाँ? फिर आनन्द, मुद, मोद और प्रमोद जैसी आनन्ददायी सभी परिस्थितियों व वातावरण वाला क्षेत्र खोजना और भी मुश्किल है। ऋषि स्वयं प्रश्न का उत्तर बताते हैं “जहाँ विवस्वान का पुत्र राजा है, जहाँ विशाल सदानीरा नदियाँ अविरल बहती हैं, जहाँ आनन्द का द्वार है आप हमें वहीं स्थायित्व दें।” ‘जहाँ’ का उत्तर इसी मंत्र से मिल जाता है। यह और कोई भूमि नहीं हे भारत यह आप ही है। हे भारत! आनंदगोत्री मंत्र द्रष्टा ऋषियों और पृथ्वी को माँ जानने वाली इस पुण्य भूमि के पुत्र हम भारतीय आपको बारंबार नमस्कार करते हैं।
हे भारत! आप प्राचीन राष्ट्र हैं। विश्व के अन्य देशों में राष्ट्र जैसी कल्पना भी 11वीं सदी के पहले नहीं मिलती। आपका राष्ट्र रूप हजारों बरस पुराना है। विश्व का प्राचीनतम ज्ञान संकलन ऋग्वेद जैसा छन्दस्, प्रीतिपूर्ण, ज्ञानपूरित ज्ञान विज्ञान अचानक नहीं उग सकता। इसके पहले सौन्दर्यबोध की एक सुदीर्घ परम्परा रही होगी। निश्चित ही एक विशेष प्रकार की संस्कृति भी रही होगी। तर्क आधारित वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला दर्शन भी रहा होगा। ऋग्वेद में ज्ञान, विज्ञान है, अप्रतिम सौन्दर्यबोध है, इतिहासबोध है - पूर्वज परम्परा के प्रति आदरभाव है। प्रकृति के प्रति प्रीति है और प्रकृति रहस्यों के प्रति ज्ञान अभीप्सु दृृृष्टि भी। जल माताएँ हैं, नदियाँ माताएँ हैं, पृथ्वी माता है, आकाश पिता है। परिवार हैं, परिवारों और कुलो से बने ढेर सारे गण हैं, गणों से बड़े समूह जन हैं। ‘वैदिक एज’ (पृष्ठ 250) में पुसाल्कर ने बताया है “ऋग्वेद में उल्लिखित जन उत्तर पश्चिम में गांधारि, पक्थ, अलिन, भलानस और विषाणिन हैं। सिंध और पंजाब में शिव, पर्शु कैकेय, वृचीवन्त्, यदु, अनु, तुर्वस, द्रुह्यु थे। पूरब में मध्यदेश की ओर तृत्सु, भरत, पुरू अैर श्रृृंजय थे।” ऐसे सभी जनों, नदियों और बड़े भूभाग में रहने वाले पूर्वजों की एक संवेदनशील संस्कृति भी थी। सो हे भारत आप सनातन राष्ट्र हैं।
- हृदयनारायण दीक्षित





