Tuesday, December 29, 2015

आसन, प्राणायाम एवं ध्यान - डाॅ॰ अंजलि सिंह

जीवन लीला सांस लेने की क्रिया से प्रारम्भ होकर सांस छोड़ने के बीच का खेल है। यह पढ़ते हुए जरा अपना ध्यान अपनी सांसों पर ले जाईये, क्या इससे पहले कभी आपनेे अपनी सांसों पर ध्यान दिया है? यदि  दिया होगा तो आप जानते होंगे कि किसी भी कृत्य को करते समय यदि सभी ज्ञानेन्द्रियों को एकाग्र कर दिया जाये तो वही कार्य ध्यान के समान है। यदि सांस लेने के लिए, खाना खाने या सोने जितना भी प्रयास लगता तो उसे भी मनुष्य कर्म के समान समझते। अब चूँकि सांस लेने के लिए कोई प्रयास तो करना नहीं होता तो अधिकतर मनुष्य अपनी सांसों के प्रति उदासीन रहते हैं।  अर्थात श्वांस के महत्व को समझते हुए ही कोई भी व्यक्ति आसन, प्राणायाम एवं ध्यान का सर्वोत्तम लाभ प्राप्त कर सकता है।
महर्षि पतंजलि ने कहा है ‘स्थिरं सुखम आसनं’  योग मुद्रा स्थापित करने में जल्दबाजी से योग का फल घटा देता है। व्यक्ति को स्थिर मन के साथ उतना ही आसन मेें जाना चाहिए जितना करने से शरीर में तनाव न पैदा हो।
योग मुद्रा में सही प्रकार से सांस लेने का महत्व: योग मुद्रा में बैठते समय, शरीर को आसन की दिशा में ले जाते समय सांस अन्दर लेते है, कुछ क्षण आसन में रहते हुए तीन-चार गहरी सांस लेते है, फिर आसन से बाहर आते हुए धीरे-धीरे सांस छोड़ते है। प्रत्येक अन्दर आती सांस तथा बाहर जाती पर अपना ध्यान रखते है, ऐसा करने से आसन के अधिक से अधिक लाभ पाए जा सकते है।
योग मुद्रा बनाते समय: योग मुद्रा बनाते समय सही और संतुलित क्रियाएँ करंे। यदि मुद्रा का आरम्भ सही होगा तभी उसका वांछित परिणाम मिल सकता है। मुद्रा बनाते समय पूर्ण जागरुकता रखें शरीर मोड़ते समय जल्दबाजी करने से नसों में खिंचाव हो सकता है।
योग मुद्रा को स्थापित रखना: पतंजलि योगसूत्र के अनुसार, योग मुद्रा बनाने का प्रयास करने के बाद, छोड़ दो व विश्राम करो। सौ प्रतिशत सही योग मुद्रा बनाने के लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए, अपितु सामथ्र्यानुसार मुद्रा बनाते-बनाते सही मुद्रा बनने लगती है। मुद्रा स्थापित करने के साथ ही सांसों के माध्यम से विश्राम करने से योग क्रिया का सर्वाधिक लाभ मिलता है।
योग मुद्रा से बाहर आना: मुद्रा बनाना जितना महत्वपूर्ण होता है मुद्रा से बाहर आना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। प्रत्येक विधि के साथ शारीरिक संतुलन व सांसों का समन्वय रखें एवं धीरे-धीरे शरीर को विश्राम में लायें। मुद्रा स्थापित करते समय जो क्रम लेना है उसी अनुसार मुद्रा से बाहर आते है। जिस प्रकार योग प्रारम्भ करने से पहले शरीर को थोड़ा गरम (वार्मअप) किया जाता है उसी प्रकार योग सम्पन्न करने के बाद शवासन में लेट जाऐं अथवा योग निद्रा करें।
योग निद्रा: योग निद्रा, योग क्रिया के उपरान्त विश्राम की क्रिया है। इस मुद्रा हेतु समतल स्थान पर शवासन में लेट कर शरीर के प्रत्येक अंग पर अपना ध्यान ले जाया जाता है। ऐसा करने से योग क्रिया का प्रभाव शरीर में पूरी तरह से समाहित हो जाता है।
योग करने के लिए ये सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है कि जब एक बार आप आरामदायक योगाभ्यास करने लगेंगे तब धीरे-धीरे योग मुद्राओं में सधार आने लगेगा।