भारत को उठना होगा, शिक्षा का विस्तार करना होगा, स्वहित की बुराइयों को ऐसा धक्का देना होगा कि वह टकराती हुई अटलांटिक सागर में जा गिरे। ब्राह्मण हो या सन्यासी, किसी की भी बुराई को क्षमा नहीं मिलनी चाहिए। अत्याचारों का नामोनिशान न रहे, सभी को अन्न सुलभ हो। ये व्यवस्था धीरे-धीरे लानी होगी। अपने धर्म पर अधिक जोर देकर और समाज को स्वाधीनता देकर यह करना होगा। रामानुज ने सबको समान समझकर मुक्ति में सबका समान अधिकार घोषित किया था, वैसा ही समाज को पुनः गठित करने की कोशिश करो। उत्साह से हृदय भर लो और सब जहग फैल जाओ।
मैं चाहता हूँ कि हम में किसी प्रकार की कपटता, कोई दुरंगी चाल न रहे, कोई दुष्टता न रहे। मैं सदैव प्रभु पर निर्भर रहा हूँ, सत्य पर निर्भर रहा हूँ, जो कि दिन के प्रकाश की तरह उज्ज्वल है। मरते समय मेरी विवेक बुद्धि पर ये धब्बा न रहे कि मैने नाम या यश पाने के लिए कार्य किया। दुराचार की गन्ध या बदनियती का नाम भी न रहने पाए। किसी प्रकार का टालमटोल या छिपे तौर पर बदमाशी या गुप्त शब्द हममें न रहें। यहांँ तक हममे कोई गुरूर भी न रहे।
साहसी युवको, आगे बढ़ो! चाहे धन आए या न आए, आदमी मिलें या न मिलें, तुम्हारे पास प्रेम है। क्या तुम्हें ईश्वर पर भरोसा है? बस आगे बढ़ो, तुम्हें कोई नहीं रोक सकेगा। सतर्क रहो। जो कुछ असत्य है, उसे पास न फटकने दो। सत्य पर दृढ़ रहो तभी हम सफल होंगे। शायद थोड़ा अधिक समय लगे, पर हम सफल होंगे। इस तरह काम करते जाओं कि मानों मैं कभी था ही नहीं। इस तरह काम करो कि तुम पर ही सारा काम निर्भर है। भविष्य की सदी तुम्हारी ओर देख रही है। भारत का भविष्य तुम पर निर्भर है।





