गर्मियों में नीम की निवौली एकत्र करने और उन्हें बेच कर प्राइमरी की पढ़ाई करने वाले युवक को आगे बढ़ने से कोई बाधा कभी रोक न पाई। जब उन्होने स्नातक करने के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, तो रहने के लिए छात्रावास मिल गया, पर उनके पास विश्वविद्यालय की फीस, कापी किताबों के लिए कोई पैसा नहीं था। अंधेरे में भी प्रकाश की किरण खोज लेने वाले इस युवक ने एक दिन देखा कि प्रातः 5 बजे के अंधेरे में ही छात्रावास के कई कमरों में 12-13 साल का एक बालक अखबार डालता हुआ जिस तेजी से आया उसी तेजी से साइकिल पर सवार होकर दूसरे ग्राहकों के यहाँ अखबार पहुँचाने निकल गया।
इस युवक को भी रोशनी मिल गई और उसी दिन से इसने भी रेलवे स्टेशन पर अखबार बेचना प्रारम्भ कर दिया और पढ़ाई जारी रखी। स्टेशन पर इसने देखा कि उसके जैसे अन्य कई युवक भी अखबार बेचने का कार्य करते हैं। उनसे इसकी दोस्ती हो गई, तो पता चला कि वह भी पढ़ाई के लिए यह कार्य कर रहे हैं।
पढ़ाई पूरी हुई तो जीवन यापन के लिए, नौकरी की तलाश थी। कोई अच्छी नौकरी मिलती, इसकी प्रतीक्षा में जो भी छोटी नौकरी मिली उसमें काम करने लगे। समय के सदुपयोग व सेवा का स्वभाव बचपन से था। अतः नौकरी करते समय खाली समय में झुग्गी झोपड़ियों के बच्चों को पढ़ाने लगे।
कहते हैं, सेवा का फल मीठा होता है। इस युवक को भी सेवा के फल के रूप में उड़ीसा के एक केन्द्रीय विद्यालय में नौकरी मिल गई और यह वहाँ चले गये। एक दिन झुग्गी झोपड़ी के छात्रों का पत्र मिला और उसने इनके जीवन की दिशा में एक नया मोड़ ला दिया। पत्र में बच्चों ने लिखा था ‘‘गुरु जी आप हमको छोड़ कर चले गये, अब हमको कौन पढ़ायेगा।’’ भावुक पर दृढ निश्चयी इस युवक पर बच्चों के इस पत्र का गहरा प्रभाव पड़ा और इसने जीवन की पहली दहलीज पर पाई हुई केन्द्रीय विद्यालय की नौकरी छोड़ देने का निश्चय कर, लखनऊ लौट आया।
इस बीच उसके विवाह के सम्बन्ध भी आने लगे। पर इसका निश्चय था कि विवाह उस कन्या के साथ करूँगा, जो जीवन में हमारे साथ हमारे विचारों का भी साथ निभायेगी। सौभाग्य से एक सुशील योग्य कन्या से इनका विवाह हो गया, जो इस समय एक महाविद्यालय में शिक्षिका हैं और एक बेटा व बेटी की माँ के साथ परिवार की पोषक एवं इनके मिशन की प्रेरणा व साधिका भी हैं।
युवा से प्रौढ़ता की ओर बढ़ रहे जीवन में झुग्गी झोपड़ी के बच्चों की पढ़ाई के साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए भी विविध कार्य करने में संलग्न रहते हुए, पेड़ लगाना तो मानो उनका जीवन लक्ष्य बन गया है। एक लाख वृ़क्ष लगाने का संकल्प लेकर अहर्निश प्रयत्नशीलता के प्रतीक बनकर उभरे इस प्रेरणा पुरुष को साइकिल से मोटर साइकिल और अब पोधों से लदी मारूती वैन के साथ वृक्ष भण्डारा करते हुए जगह-जगह ‘प्रज्वलित दीप’ की तरह देखा जा सकता है।
एक दिन इन्हें देख कर, इनके सामने एक संभ्रान्त नागरिक ने आकर अपनी कार रोकी और चिल्लाकर बोले ‘‘मैं हूँ श्रीकान्त! तुम्हारे साथ स्टेशन पर अखबार बेचन वाला मित्र। दोनो गले मिले और उस पुराने मित्र श्रीकान्त ने बताया, अब हमारे पास अपनी कोठी है, कार है और अच्छे व्यवसाय के रूप में ‘सेटेलाइट एडवरटाइजिंग एजेन्सी’ महानगर में है। ऐसे ही संकल्पवान युवकों के अनेक उदाहरण अपने आस-पास आप को मिल जायेंगें, जिन्होने कभी किसी कार्य को हीन नहीं माना, संघर्ष से कभी घबराये नहीं, सरकारी नौकरी को ही जीवन का अन्तिम अवलम्ब नहीं माना और आज अपनी कठिन साधना के बल पर समाज में स्थान बनाये हुए हैं।
यह कहानी हमारे मित्र चन्द्रभूषण तिवारी के संकल्प की है जो अनेकों के लिए आज प्ररेणा बने हुए हैं। आज ऐसे ही संकल्पवान हजारों युवकों के प्रज्जवलित दीप मालिका की भारत को प्रतीक्षा है।





