स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारतवर्ष में अनेक घोष वाक्यों ने एक निश्चित समय तक अपनी पहचान और प्रभाव को बनाया। कभी हिन्दी-चीनी भाई-भाई, कभी इन्क्लाब जिन्दाबाद, कभी औद्योगिक क्रान्ति, कभी इक्कीसवीं सदी का सपना तो कभी उदारवाद या वैश्वीकरण का। इन घोष वचनों के हम इतने दीवाने हैं कि इसे अपने द्वारा किए गये सभी कृत्यों को तर्कांकित करने हेतु इसे एक कवच के रूप में प्रयोग करते हैं। दुर्भाग्य से इनमें से अधिकांश घोष वचनों के मूल में हम विदेश की ओर ही देखते हैं। जिस उदारवाद को हम विदेश में जन्मा हुआ और भारतवर्ष के उपहार के रूप में देखते हैं वह वस्तुतः भारतवर्ष के उद्यान का ही एक पुष्प है। आज जिस उदारवाद से विश्व को एक छत के नीचे लाने की बात की जा रही है वस्तुतः उसकी पृष्ठभूमि भारतीय है, परन्तु उसका स्वरूप बदला हुआ-सा है। क्योंकि दृष्टि के भेद से रूप समान रहते हुए भी स्वरूप बदल जाता है।
भारतीय संस्कृति में सर्वदा व्यापकता पर चिन्तन हुआ है। ‘एकोहं बहुस्याम्’ के घोष ने व्यापकता और विस्तार को आधार प्रदान किया, ‘वहीं ‘भवेत विश्वमेकनीयम्’ ने इसे दृढ़ता प्रदान की। परन्तु दुर्भाग्य से आज वैश्वीकरण के नाम पर जिस प्रकार सुखाभास प्रदातृ वातावरण बनाकर मनुष्य, परिवार और समाज को बाजार के एक इकाई के रूप में देखा जा रहा है। जहाँ व्यक्ति क्रेता और विक्रेता के स्वरूप में ही अपना अस्तित्व रखने को विवश हो रहे हैं। तथाकथित विकास के नाम पर मनुष्य को एक बाजार के घटक मात्र बनाने की सुनियोजित योजना चलाई जा रही है। जहाँ न ही कोई मनुष्य है न मनुष्यता है न ही कोई आदर्श हे न ही कोई मूल्य है न कोई पाप-पुण्य का भय है और न ही कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार है। जहाँ प्रत्येक वस्तु मुनाफे के लिए है। इस आर्थिक दोहन के लिए अपनी चैन, नींद, अपनी शान्ति सबकुछ गलाकर स्पर्धा में दाँव पर लगाने को आतुर व मजबूर ये मानव समुदाय है।
यहाँ पर ध्यातव्य है कि भारतीय संस्कृति ने कभी दारिद्रय में जीवन जीने को ही विवश कर भोग का निषेध नहीं किया है अपितु त्यागपूर्वक भोगने की सीख दी है-
‘‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यांम जगत्।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा ग्रधःकस्यस्विधनम्।।
आर्थिक भोग साधनों की उपलब्धता एवं संलिप्तता में जिस वैश्वीकरण ने विकसित और अविकसित का मापदण्ड निर्धारित करने का प्रयास किया है वह विकास का एक पक्ष तो हो सकता है परन्तु जिस अभ्युदय की बात भारतीय मनीषियों ने की थी वह समेकित भी था और धारणीय तथा पोषणीय भी। केवल अधिभौतिक ऊँचाई को नकारते हुए ही उपनिषद कहता है -
‘न वित्तेंन तर्पणीयो मनुषयः।’
अतः उस अधिभौतिक के साथ-साथ अधिदैविक और आध्यात्मिक विकास का मणिकांचन संयोग ही उसे सत्यं शिवं सुन्दरम की वह फलाकृति प्रदान करता है जिसमें न आहें हैं न कराहें हैं केवल और केवल है तो बस आनन्द, परमानन्द और सच्चिदानन्द।
नहीं पहुँच पाया -
‘यावत् भ्रियेत जठरं तावत् सत्वं हि देहिनाम्।’
वैश्वीकरण की इस ज्वारभाटा ने न केवल पर्यावरण असुंतलित किया है अपितु सूचना प्राप्ति और अद्यतन सामान्य ज्ञानी बनाने के नाम पर एक विनाश प्रदान सांस्कृतिक प्रदूषण का सूत्रपात किया है। जहाँ भारतीय संस्कृति अपनी अक्षुण अस्मिता के लिए प्राणापन्न युद्ध लड़ रही है। सब कुछ पाकर भी सुखानुभूति न मिलने के पीछे मनुष्यता का न होना है अतः वेद कहता है - ‘मनुर्भव’ अर्थात् निष्कर्षतः वैश्वीकरण के नाम पर हम अपनी सभी परम्पराओं, प्रतीकों और अधिष्ठानों को भुलाने की जगह उसका विमर्श करें। हम उन परम्पराओं को केवल इसलिए न स्वीकार करें कि वे हमारी हैं अपितु उसे युगानुकूल और देशानुकूल बनाकर ग्रहण करें। हम वैश्वीकरण की दौड़ का अन्धानुकरण भी न करें उसमें भी जो हमारे प्रकृति, संस्कृति और विकृति से दूर रखने वाली तत्वों के अनुकूल हो उसे ग्रहण करें साथ ही हम अपने पृथक अस्तित्व में रहकर भी एक विशिष्ट आदर्शों के प्रति मूल्यों के प्रति कृतसंकल्पित हैं तभी मनुष्य बचेगा उसका मनुष्यत्व भी बचेगा, परिवार बचेगा, समाज बचेगा, देश बचेगा और विश्व बचेगा। व्यष्टि से समष्टि की यात्रा निरन्तर निर्बाध गति से चले इस हेतु आवश्यक है कि विश्व का एक-एक देश यह समझे कि -
‘अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्’’
उदार चंरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
यहाँ उल्लेख्य है कि वसुधैव कुटुम्बकम् की आधार भित्ति प्रेम, स्नेह, दया, करूणा और सहिष्णुता है। परन्तु इसके विपरीत वैश्वीकरण की मूल अवधारणा लाभ, वंचना, छल और क्रू्ररता पर आधारित है जहाँ सब कुछ उपभोग और उपभोक्ता तथा बाजार के नजरिये से देखा जाता है। यहाँ कुटुम्ब और तद्जन्य सम्बन्धों के लिए कोई स्थान नहीं होता।
यह भारतीय एवं भारतीयता के चिन्तन और उसके अनुसार जीवन जीने का संक्रमण काल है, जिसमें हमारी और हमारे समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है।
- डाॅ॰ विजय कुमार कर्ण
एसोसिएट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, विद्यान्त हिन्दू महाविद्यालय, लखनऊ।





