सम्राट चित्रकेतु साधु प्रवृत्ति के थे, प्रतापी-पराक्रमी भी थे। उन्हें कोई सन्तान न थी, इसी कारण उन्हें राज्य की चिन्ता थी। राजा की चिन्ता देखकर अंगिरा ने चित्रकेतु को पुत्रेष्टि यज्ञ का परामर्श दिया। महर्षि ने स्वंय यज्ञ कराया एवं राज महिषी कृतद्युति को यज्ञावशिष्ठ का सेवन कराया। रानी ने यथा समय पुत्र को जन्म दिया, उत्तराधिकारी की चिन्ता मिट गई। अब पुत्रवती बड़ी रानी पर राजा का अनुराग और बढ़ गया, परिणामतः अन्य रानियों में द्वैष पनपने लगा, उनके मन में आया कि राजा कृतद्युति पर स्नेह इसलिए रखते हैं क्योंकि उसने सन्तान को जन्म दिया है। ‘षड्यन्त्र’ नामक पुत्र जन्म के चार वर्ष के बाद के बाद ही विषपान द्वारा मृत्यु को प्राप्त हो गया। मात्र चार वर्ष के बालक की मृत्यु से सम्राट पर तो मानो वज्रपात हो गया। अंगिरा ऋषि ने उन्हें बहुत समझाया, पर सम्राट बार-बार चरण पकड़ कर प्रार्थना करने लगे कि उनके प्राण लेकर उसे प्राण दे दिया जायँ।
जब समझाने पर भी राजा नहीं माने तो अपने तपोबल से ऋषि ने शिशु की आत्मा को आमन्त्रित कर उसे जीवित कर दिया। जब राज व रानी उसे छाती से लगाने लगे तो बालक बोला - ‘‘कौन पुत्र? कैसा पुत्र? किसका पुत्र? मैं तो शाश्वत अमर जीवात्मा हूँ। सारे सम्बन्ध शरीर के होते हैं। शरीर से सम्बन्ध छूटते ही सब सम्बन्ध टूट गए, मेरा मात्र चार वर्ष का समय आपके साथ था, वह बीत गया।’’ इतना कहकर बालक फिर मृत हो गया। ऋषि के परामर्श से पुत्र का अन्तिम संस्कार करके राजा लौटे, तो देवर्षि नारद मार्ग में मिले और बोले - ‘‘किसी के लिए भी आसक्ति न रख कर्तव्य कर्मों को भली भाँति पूरा करना ही संसार में जीवन जीने का सर्वोत्तम साधन है।’’ वास्तव में मनुष्य पूरे जीवन भर भौतिक विनाशपरक संसाधन आदि को एकत्र करने में लगा रहता है, परन्तु यह सब मात्र भौतिक जीवन जगत तक ही सीमित है, अतः मनुष्य अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए सार्थक जीवन जी सकता है।
डाॅ॰ सुरचना त्रिवेदी





