Tuesday, December 29, 2015

संकल्प ही स्वामित्व का अधिकारी - श्रीकान्त ‘कान्त’

‘स्वयमेव मृगेन्द्रता’ के बल पर सिंह जंगल का राजा कहलाता है और अपने अजेय पौरुष एवं संकल्प के बल पर ही बाज पक्षीराज बनता है। उसके जीवन की कहानी भी अत्यन्त रोचक है।
कहते हैं, बाज की आयु 70 साल होती है लेकिन 40 साल के बाद उसकी शक्ति के महत्वपूर्ण तीन अंग अनुपयोगी होने लगते हैं।
पहला - उसकी मजबूत पकड़ वाले पंजे ढ़ीले पड़ जाते हैं जिससे उसको शिकार पकड़ना कठिन हो जाता है।
दूसरा - इस आयु तक उसकी चोंच भी मुड़ जाती है जिससे शिकार को पकडने में कठिनाई होने लगती है।
तीसरा - उसकी शक्ति का महत्वपूर्ण आधार अचानक तेज गति की उड़ान का साधन पंख इतने बोझिल हो जाते हैं, कि उड़ते समय उनका पूरा खुलना ही मुश्किल हो जाता है जिससे उसकी गति धीमी पड़ जाती है और तब तक शिकार सजग हो कर भाग जाता है। अब उसके पास जीवन जीने के तीन विकल्प बचते है।
नियतिवाद - अर्थात् यह तो प्रकृति की नियति है, प्रत्येक जीव के अंग एक आयु में शिथिल हो जाते हैं। अतः नियति जैसे, जब तक, जिस स्थिति में जीवित रखना चाहेगी तव तक जीवित रहूंँगा।
परिस्थितिवाद - अर्थात् परिस्थितियों से समझौता कर जीवन यापन करने हेतु अगर स्वभाव में परिवर्तन आवश्यक है, तो करना। पहले स्वयं के बल पर शिकार करके आहर लेना उसका स्वभाव था, अब परिस्थितियों के वशीभूत शिकार करना संभव नहीं, तो गिद्ध आदि जीवों की तरह मृत-पशुओं के आहार पर जीवन यापन स्वीकार करना।
संकल्पवाद - न नियति के भरोसे जीना, न परिस्थिति से समझौता करना, अपितु अपने को पुर्नस्थापित करने का संकल्प लेना और उसके लिए कठिन तपस्या करके लक्ष्य को प्राप्त करना।
बाज इस तीसरे विकल्प का प्राणी है। वह अपने आप को पुर्नस्थापित करने हेतु सबसे पहले किसी पहाड़ी पर एकान्त में अपना घोसला बनाता है, जहांँ वह पुर्नस्थापन की निर्विघ्न तपस्या कर सके। उसके बाद अपने पंजों को पत्थर पर तब तक मारता है, जब तक कमजोर पंजे टूट न जायें और फिर उसके बाद उनके उगने की प्रतीक्षा करता है। जब वह उग आते हैं, तब दूसरा कदम उठाता है और अपनी चोंच को पत्थरों से  मार-मार कर तोड़ देता है और फिर उसके उगने की प्रतीक्षा करता है। जब चोंच पुनः उग आती है तव वह अपनी चोच से अपने बोझिल पंखों को एक-एक कर उखाडने का कार्य करता है और फिर से उनके उगने की प्रतीक्षा करता है। यह सब कष्टप्रद कार्य 150 दिन में पूरा होता है और परिणाम स्वरूप वह फिर से तेज उड़ान के लिए उपयुक्त पंख, शिकार को पकड़ने के लिए मजबूत पकड़ बाले पंजे और शिकार को फाड़ ड़ालने में सक्षम तेज, नुकीली चोंच सहित अपनी सामथ्र्य का पुनः स्वामी बन जाता है। इसीलिए तो वह पक्षीराज है और भगवान विष्णु ने भी ऐसे संकल्पवान को ही अपना वाहन बनाया।
संकल्पवान कभी पराजित नहीं होता, कभी निराश्रित नहीं होता, वह तो सदैव स्वाभिमानपूर्ण जीवन का स्वामी रहता है। ु