कहना न होगा कि अभी तक लोग जिन रोबोटों को विज्ञान की कथाओं, नाटकों व फिल्मों में देखते और सुनते आयें हैं, वे अब इस मशीनी दुनिया की कड़वी सच्चाई बन कर सामने आ रहे हैं। दरअसल यह रोबोट कम्प्यूटराइज्ड प्रोग्रामिंग के जरिये काम करता है। यह एक मशीनी गतिविधि है जिसमें टाइमिंग के आधार पर उसका समय, क्रिया और एक निश्चित व्यवहार तय है। उसका एक निश्चित साॅफ्टवेयर है जिसके आधार पर ही उस मशीन का संचालन होता है। आज दुनिया की हजारों कम्पनियाँ अपने उत्पादन में अधिक से अधिक रोबोट का इस्तेमाल कर रहीं हैं। गुडगाँ व और फरीदाबाद में होंडा, यामहा, मारुति, एस्काॅट्र्स व शोवा इण्डिया जैसी ड़ेढ सौ से अधिक कम्पनियों में जोखिम भरा अधिकतर काम इन्हीं रोबोट से लिया जा रहा है। कम्पनियाँ मानतीं हैं कि रोबोट के जरिये किया जाने वाला काम मानव से अच्छा और त्रुटिविहीन होता है। साथ ही इनके काम करने से औद्योगिक दुर्घटनायें भी कम होतीं हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि रोबोट न तो थकता है और न ही काम को अधूरा छोड़ता है। इसके काम की गुणवत्ता भी अच्छी होती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन रोबोट का न तो कोई लंच होता है और न ही इनसे पीएफ अथवा हड़ताल का खतरा होता है। पचास लाख से लेकर ड़ेढ़ करोड़ तक की कीमत के ये रोबोट आज शिक्षा, चिकित्सा, खेल, अंतरिक्ष व रक्षा क्षेत्र के अलावा कार उत्पादन, पैकेजिंग व वैल्डिगं जैसी अनेक कम्पनियों में कई हजार रोबोट काम कर रहे हैं। आॅकड़े बताते हैं कि चीन, कोरिया, जापान, जर्मनी और अमेरिका के अकेले कार निर्माण उद्योग में प्रति दस हजार लोगों पर 30 से लेकर 500 रोबोट तक काम कर रहे हैं।
आँकड़े यह भी बताते हैं कि आज रोबोट साइंस में जापान सबसे आगे है। अकेले चीन में रोबोट से जुड़े साॅफ्टवेयर इंजीनियरिंग और इसके कलपुर्जों का बाजार 30 अरब डालर के करीब का है। कहना न होगा कि विगत वर्ष चीन में यह बाजार तकरीबन दस अरब डालर का रहा और पचपन हजार से अधिक रोबोट की वहाँ बिक्री रही। भारत में भी रोबोट से जुड़ा बाजार पिछलें चार-पाँच सालों में चार गुना से भी अधिक बढ़ गया। वर्तमान में रोबोटिक विज्ञान का तेजी से विस्तार होने से अब विश्व स्तर पर तमाम ऐसे रोबोट काम कर रहे हैं जो लोगों की मेजबानी करने के साथ-साथ नाचना, गाना, गेंद को किक मारना, देखभाल करना, किचन में काम करना,अनेक भाषाओं को जानना और समझना तथा तरह-तरह की शोधों में सहायता करना जैसे कामों को अंजाम दे रहे हैं।
सच यह है कि आज दुनियाँ में मानवीय श्रम को हिकारत की नजर से देखा जा रहा है। दूसरे बढ़ती मजदूरी, बढ़े वेतन की माँग और हड़ताल जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए रोबोट इसका स्थानापन्न बन रहे हैं। रोबोट केवल मानवीय श्रम को ही दरकिनार नहीं कर रहे, बल्कि कृत्रिम बुद्धि के रुप में संचालित होने वाले रोबोट मानवीय मस्तिष्क से भी आगे जाने की तैयारी में हैं। आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक स्टुअर्ट आर्म स्ट्रोंग का साफ कहना है कि भविष्य में रोबोट मनुष्यों से ज्यादा तेज और चालाक ही नहीं होगें, बल्कि वे देशों का शासन चलाने औेर मानव का सफाया करने में भी सक्षम होगें। उनका यह भी कहना है कि यदि इस कृत्रिम बुद्धि के क्षेत्र में हो रहे शोध में यदि सावधानियाँ नहीं बरती गयीं तो मानव जाति को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। शायद इस कृत्रिम बुद्धि के विकास से जुड़े खतरों को भाॅपते हुए गूगल ने तो इस पर चल रहे शोध पर निगाह रखने के लिए एक नैतिक बोर्ड का गठन भी कर दिया है। गूगल ने हाल ही में कुछ ऐसी कम्पनियाँ भी खरीदी हैं जो कम्प्यूटर्स के लिए कृत्रिम बुद्धि से युक्त साॅफ्टवेयर का विकास कर रहीं हैं। उनको उम्मीद है कि इस साफ्टवेयर से ये कम्प्यूटर मानव की तरह ही सोचने ओर विचारने लगेगें।
अभी तक रोबोटिक विज्ञान और उसके विस्तार का जो जिक्र किया गया है वह इस बहस का एक उजला पक्ष है। इसके नकारात्मक पक्ष की ओर ध्यान दिलाते हुए मशहूर भौतिक विज्ञानी, स्टीफन हाॅकिंग ने साफ-साफ कहा है कि रोबोट धरती से मानव जीवन के समाप्त होने की प्रक्रिया की शुरुआत करेंगें। उनकी यह चिन्ता इसलिए वाजिब लगती है क्योंकि मानव का आज का यह धीमा जैविक विकास अभी के इन रोबोट के तीव्र और कृत्रिम बुद्धि के विकास के सामने ठहर नहीं पा रहा है। निश्चित ही मनुष्य जाति के लिए यह एक खतरे की घंटी है। आज की यह तकनीक जिस तरह वर्तमान की चुनौतियों के अनुसार खुद को ढ़ालना सीख रही है उससे मानव जाति के सामने एक अनिश्चित भविष्य की लकींरे जरूर खिच रहीं हैं।
रोबोट की मशीनी सक्रियता से जो घटनायें सामने आ रहीं हैं उससे देश में चिंता की लकीरें खिंचना लाजमी है। वह इसलिए क्योंकि कृत्रिम बुद्धि का क्रमिक विकास इन रोबोट को अत्याधुनिक बनाने का काम कर रहा है। कड़वा सच यह है कि इस समय आईएस व अन्य आतंकवादी संगठन देश में अपना जाल फैलाने और खुद को नई तकनीक से युक्त बनाने को आतुर हैं। इस समय देश में यह चिन्ता भी है कि अगर ये संगठन रोबोट से जुड़े साफ्टवेयर का उपयोग अपने लक्ष्यों को हासिल करने में करने लगे तो देश में मानवता सिहर उठेगी। दुनिया के साथ-साथ देश के राष्ट्राध्यक्षों को भी इस ओर बिना देरी के ध्यान देने की महती आवश्यकता है। इतिहास गवाह है कि आज तक वैज्ञानिकों के द्वारा देश व समाज के कल्याण के लिए जो सृृर्जनात्मक शोध हुए हैं उनसे मानव के विकास के साथ-साथ विनाश के साधन भी तैयार हुए हैं। वह चाहे परमाणु ऊर्जा की खोज हो या तमाम प्रकार के रासायनिक तत्वों अथवा प्लास्टिक का निर्माण अथवा वह चाहे तरह-तरह की कारों का निर्माण ही क्यों न हो, इन सभी से देश के लोगों की सुविधाओं के साथ में आतंक और प्रदूषण के रूप में काफी क्षति पहुँचाई है। यही आशंकायें एक बार फिर रोबोट के अत्याधिक प्रयोग को लेकर उठ रहीं हैं। जरा गौर करें कि अमेरिका में टेक्सला कार के जनक और प्रसिद्ध वैज्ञानिक, इलोन मस्क ने एक समय में रोबोट से जुड़े कृत्रिम बुद्धि को बढ़ाबा देने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। परन्तु अब इसके प्रखर आलोचक बन गये हैं। आज उनका कहना है कि रोबोट के निर्माण का मतलब सीधे-सीधे दानवों को निमंत्रण देना है।
रोबोट से जुड़े हादसे सही मायनों में मानव और मशीन के संघर्ष की ओर इशारा करते हैं। यह बिल्कुल सच है कि मानव निर्मित मशीन चाहे जितनी तरक्की कर ले, परन्तु वह हमेशा मानवीय विवेक और संवेदनाओं से दूर ही रहेगी। निश्चित ही रोबोट की कल्पना मानवीय श्रम के विभिन्न रूपों का ही एक विकल्प है। परन्तु ये रोबोट धीरे-धीरे अब टर्मिनेटर बन रहे हैं। 21वीं सदी के इस वैश्विक दौर में मशीनीकरण के विस्तार को रोकना नामुमकिन है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी खुद भी इन तमाम वजहों से ही मशीनीकरण के अतिरेकी प्रयोग के खिलाफ थे। परन्तु अब समय आ गया है जब मानव के विकास और उसके अस्तित्व के संरक्षण के लिए रोबोट जैसी मशीन की सीमाओं को तय करना पड़ेगा। अन्यथा भविष्य में मानव निर्मित अधिक चतुराई वाले ये रोबोट मानव को विस्थापित ही नहीं करेगें, बल्कि देश और दुनिया से बेदखल करने में भी ये खासी भूमिका निभायेंगें।
- डाॅ॰ विशेष गुप्ता
एसोसिऐट प्रोफेसर, समाजशास्त्र, महाराजा हरिश्चन्द्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय,मुरादाबाद।





