सत्य महत्वपूर्ण है लेकिन सत्य को शिव भी होना चाहिए। सत्य और शिव एकात्म सुंदर होता है। शिव अखिल ब्रह्म की ऊर्जा हैं। लेकिन यह ऊर्जा सहज प्राप्य नहीं है। शिव प्राप्ति के प्रयास जरूरी हैं। पार्वती को भी शिव प्राप्ति के लिए महातप करना पड़ा था। कालिदास के ‘कुमार संभव’ में तपस्यारत पार्वती को एक ब्रह्मचारी ने बहुत भड़काया “पार्वती! आप भी किस प्रेम में फंस गई। आपका सुन्दर हाथ साँप लिपटे शंकर को कैसे छुएगा। कहाँ हंस छपी चूनर ओढ़े आप? और कहाँ खाल ओढ़े शंकर?” शिव शंकर के रूप-कुरूप पर उसने बहुत कुछ कहा। पार्वती ने कहा “संसार के सारे रूप शिव के ही हैं - विश्वकूर्तेखाधार्यते वपु।” शिव ही सभी रूपों में प्रकट होकर रूप प्रतिरूप हैं। कालिदास के कथानक में जब शिव ने अपना रूप प्रकट कर दिया। शिव बोले “अब मैं तुम्हारा दास हूँ, पार्वती - तवस्मि दासः।” मन करता है कि प्रश्न पूँछू शिव से - महादेव! इतना कठोर तप क्यों कराते हैं? लेकिन अपना प्रश्न वापस भी लेता हूँ। शिव तप का पुरस्कार भी तो देते हैं। तप प्रभाव में वे स्वयं भक्त के भी भक्त बन जाते हैं। मैं कर्मकाण्डी हूँ नहीं। योग, तप से परिचित नहीं लेकिन भारत के मन के साथ मन मिलाते हुए ऐसे देवों के देव महादेव को नमस्कार करता हूँ।
सावन शिवार्चन और नीराजन आराधन का मास है। तब मेघ भी उतर आते हैं - शिव आराधक होकर। सुनता आया हूँ कि शिव सोम प्रेमी हैं। सोम प्रकृति की सृजन शक्ति है। सृजन की यही शक्ति शिव ललाट की दीप्ति है। शिव के माथे पर सोम चन्द्र हैं। ऋग्वेद के ऋषियों के दुलारे सोम वनस्पतियों के राजा हैं। सावन वनस्पतियों के युवा हो जाने का काल हैं। झमाझम वर्षा का महीना। हवा भी शिव संकल्प सूक्त गुनगुनाते हुए बहती है और रुकती है उमस सहित तो शिव का रूद्राभिषेक करने के लिए। सोम प्रसन्न होते हैं, वनस्पतियाँ औषधियाँ उगती हैं, खिलती हैं, खिलखिलाती हैं। भारतीय सप्ताह में एक दिन सोम का। पहला दिन रविवार रवि का तो दूसरा दिन सोमवार सोम का। सोमवार को शिव आराधन की मुहूर्त जाना गया है। ठीक भी है। हमारे समाज में भी प्रतिष्ठित लोग सप्ताह में एक दिन खुलकर मिलते हैं, बाकी दिन व्यस्त रहते हैं। शिवभक्तों को सोमवार प्रीतिकर है। शिव भी सोमवार का दिन भक्तों के लिए ही खाली रखते होंगे। नहीं जानता सच। रूद्राभिषेक कभी किया नहीं? काशी बहुत जाता हूँ लेकिन मंदिर दर्शन बहुत पहले एक बार ही हुआ। कई अवसर आए जब सावन का अंतिम सोमवार था, मैंने समूची वाराणसी को सोम शिव पाया। बम भोले और हर-हर महादेव की गूंज व लोक आह्लाद का आनंद लिया लेकिन उपासन तो भी नहीं हो पाया।
कालिदास ने शिव बारात का मनोरम शब्द चित्र खींचा है। बताया है कि शिव बारात नगर पहुँची। स्त्रियाँ अपना कामधाम छोड़कर छतों की ओर भागी। एक की जूड़े की माला टूट गई। एक ने दाँयी आँख में ही काजल लगाया था, वह बाई आँख का काजल लगाना छोड़ भाग चली। एक के वस्त्र खुल गए। वह वस्त्र पकड़े हुए ही खिड़की की ओर दौड़ी। पार्वती शिव जगत् के माता पिता हैं। विवाह के बाद सभी देवों ने शुभकामनाएं दीं। कालिदास की अनुभूति में भारत का मन-दर्पण था। सूरदास भी श्रीकृष्ण की बरात में गाना चाहते थे- सूरदास होई कुटिल बराती गीत सुमंगल गइहौं। अजब अंतर्विरोध, सुमंगल गीत लेकिन कुटिल बराती। हम शिव भक्त कांवड़ियों को दूर से ही देखते आए हैं। हम सोमवारों के शिवार्चन उत्सवों में कुटिल आस्तिक की ही तरह दूर से सम्मिलित होते रहे हैं। हमारी अपनी प्रिय बचपने से ही हमारे मन को वात्सल्य रस देने वाली सई नदी गांव के पास ही शिव सीढ़ी का जलाभिषेक करती है। जलराशि निरंतर घटी है पर भाव राशि का क्या कहना? यहाँ भवरेश्वर शिव मंदिर में सावन के सोमवार लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। लोकमन हर हर महादेव हो जाता है।
मनुष्य सुगंध प्रिय है। ऋग्वेद वाले रूद्र शिव ‘सुगंधिं पुष्टिवर्द्धनं’ हैं। देवों को पुष्पार्चन किया जाता है लेकिन शिव को बेलपत्र और धतूरे का फल। शिव मस्त मस्त बिंदास देवता हैं। परम योगी। चरमोत्कर्ष वाले नृत्यकत्र्ता। श्रीकृष्ण के पास बांसुरी तो शिव के पास डमरू। बांसुरी की धुन पर तीनों लोक मोहित हुए थे तो डमरू की धुन पर तीनों लोक अस्तित्व में रहते हैं। शिव जब चाहते हैं, रूद्र हो जाते हैं। प्रलयंकर हो जाते हैं लेकिन यही रूद्र शिव हैं। ऋग्वेद में “जो रूद्र है, वही शिव भी है।” त्रिशूल उनका हथियार। सोंचता हूँ कि ये तीन शूल क्या हैं? ये दैविक, दैहिक और भौतिक कष्ट तो नहीं हैं? या भौतिक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक वेदनाएं हैं। शिव दुख हारी हैं - त्रिशूल धारक जो हैं। लेकिन सोंचने से मन नहीं भरता। मन यहाँ, वहाँ, जहाँ, तहाँ भागता ही है। राजनीति में हूँ सो मंच, माला, माइक का त्रिशूल भीतर बहुत गहरे तक धंसा हुआ है। कह सकता हूँ कि मैं भी त्रिशूलधारी हूँ। सोम सामने है, भीतर ओम है। सोम ओम की यारी पुरानी है। लेकिन सोम से वंचित हूँ। ओम् की अनुभूति नहीं। ऋग्वेद के ऋषि वशिष्ठ ने आर्तभाव से पुकारा था न्न्यम्बक रूद्र को - हमें पकी ककड़ी की तरह मृत्यु बंधन से मुक्त करो। मैं भी डंठल से चिपका हुआ पका फल हूँ। शिव निर्णय लें कि ‘उवरिक्मिव मृत्योरमोक्षीय’ करना है या नहीं?
भारतीय साहित्य शिव-पार्वती के सम्वाद से भरापूरा है। पार्वती प्रश्नाकुल हैं और शिव समाधानकत्र्ता। तुलसीदास के रामचरित मानस में पार्वती ने सीधे राम के अस्तित्व पर ही प्रश्न पूँछा। शिव ने ब्रह्म तत्व समझाया लेकिन पार्वती ने स्वयं परीक्षा ली। यह भी उचित था। अनुभव करना सुनने से ज्यादा श्रेष्ठ है। लेकिन शिव सब जानते थे। वे प्रतिपल यत्र तत्र सर्वत्र उपस्थित हैं। उनके कण्ठ में विष है। वे नीलकंठ हैं। गले में सांप भी हैं लेकिन चन्द्रमा शिव का प्रिय आभूषण है। शरद् चन्द्र की पूनो शिव रस सोम की ही वर्षा करती है। सोम और चन्द्र पर्यायवाची हैं। शिव ने सनत कुमारों को बताया कि उनके तीन नेत्र हैं। सूर्य दाँया नेत्र है और बाँया चन्द्रमा। अग्नि मध्य नेत्र हैं। सूर्य की अपनी प्रिय राशि सिंह है। चन्द्र की कर्क है। सूर्य इस यात्रा में कर्क से सिंह क्षेत्र में पहुँचते हैं। तब बड़ी शुभ मुहुर्त बनती है। ऐसी संक्रान्ति सावन मास में पड़ती है। सो शिव को सावन प्रिय है। सावन है भी मनभावन। श्रीकृष्ण को बसंत ऋतु प्रिय है और मार्गशीर्ष - अगहन का मास। लेकिन शिव की बात निराली है। ऋतुराज बसंत में पृथ्वी और वायु का चरम आनंद है। सावन में पाँचो महाभूत - क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर भी मधुरसा हो जाते हैं। आकाश में मेघ गर्भ धारण करते हैं। धरती हरीतिमा के परिधान धारण करती है और प्रियतमा हो जाती है। धरती माता और आकाश पिता की प्रीति परवान चढ़ती है। आकाश मेघ भेजते हैं, धरती लहालोट होती है। वायु सोम तरंग लेकर बहती है। आकाश इन्द्रधनुष रचता है। लोक लहक उठता है।
संसार अक्षर से क्षर की यात्रा है। भौतिक से भौतिक की ओर लेकिन जीवन में भौतिक के साथ चेतन भी है। अन्तर्यात्रा भौतिक से चेतन की यात्रा है। स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा है यहाँ। पत्ती, पुष्प से पेड़ और पेड़ से जड़ की यात्रा सुगम है। जड़ें देखते ही बीज का ध्यान आता है। फूल का पकना ही बीज है। बीज के भीतर अनन्त सम्भावनाएं हैं। फिर पेड़, शाखा, पत्तियाँ और फूल। फिर-फिर बीज। ओम् बीज के भीतर की प्राण शक्ति है और सोम इसी बीज का पल्लवन पुष्पन। ऋग्वेद के सोम कम लोगों को याद हैं लेकिन सोमवार हर सातवें दिन उन्हीं की स्मृति दिलाता है। सोम से ओम् की यात्रा शिव है। परम चरम आनंद है। यहाँ कोई भौगोलिक दूरी नहीं। सोम और ओम् साथ-साथ हैं। सोम शिव के ललाट पर हैं ही। शिव रूपक का सोम प्रतीक बड़ा प्यारा है। ऋग्वेद में सोम को पृथ्वी का निवासी बताया गया है। सोम असाधारण देवता हैं। वे जलों के पुत्र हैं और आनंददाता हैं। शिव भोले शंकर हैं, औघड़दानी हैं। गण समूहों के मित्र हैं। गणों के साथ स्वयं भी नृत्य करते हैं। गण देवता गणेश स्वाभाविक ही उनके पुत्र हैं। वे रूद्र शिव एशिया के बड़े भूभाग में प्राचीन काल से ही उपासित हैं।





