महाराष्ट्र राज्य में कर्नाटक के सीमावर्ती जिला कोल्हापुर में स्थित कनेरी मठ प्राचीन काल से देश के आध्यात्मिक क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखता है। मठ के प्रबन्धन की जिम्मेदारी पू॰ अदृश्य काणिसिद्धेश्वर महाराज के पास आई तो उन्होंने तय किया गाँव व गाँव की व्यवस्था का आधार गाय के लिए कार्य करना मठ की प्राथमिकता होगी। इस हेतु कोल्हापुर एवं महाराष्ट्र व कर्नाटक के निकटवर्ती जिलों में लम्बे समय से व्यापक अभियान चलाया जा रहा है।
इस अभियान का एक प्रमुख कार्य 72 परिवार व 400 जनसंख्या के शेल्केबाड़ी गाँव में हुआ अद्भुत परिवर्तन है। जिससे यह देश के सभी गाँवों के लिए एक अनुकरणीय माडल बना है।
इस परिवर्तन का प्रारम्भ हुआ 2005 की विरदेव यात्रा से जिसके अवसर पर प्रतिवर्ष गाँव के हर घर में औसतन 4-5 बकरों की बलि दी जाती थी। महाराज जी ने ग्रामवासियों से आह्वान किया ‘यह कैसा अध्यात्म जिसमें अपनी सुख समृद्धि की कामना कि लिए दूसरे जीव की हत्या हो।’ आह्वान का गाँव पर असर हुआ बलि प्रथा बंद हुई व गाँव पूर्ण शाकाहरी होने का संकल्प लिया।
इस संकल्प के बाद पू॰ महाराज जी व ग्रामवासियों के मन में विश्वास जगा परिवर्तन का एवं गाँव की बड़ी बैठक बुलाई गई।
- बैठक में गाँव ने सम्पूर्ण नशामुक्ति का संकल्प लिया कुछ वर्ष के प्रयास के बाद गाँव में पूर्ण नशा मुक्ति हुई गाँव में न कोई नशा करता है और न नशीली चीजें बेचता है। गुटखा तक गाँव में नहीं मिलता।
- बैठक में तय हुआ गाँव में कोई पेड़ नहीं काटेगा व पेड़ लगाकर गाँव वालों ने उन्हें गोद लिया परिणाम आज गाँव पूरा हरा-भरा है।
- गाँव का विवाद गाँव में ही निपटाने हेतु टंटा मुक्ति समिति बनी गाँव में लम्बे समय से कोई मुकदमा नहीं है।
- गाँवों के लोगों ने साप्ताहिक सामूहिक स्वच्छता कार्यक्रम प्रारम्भ किया व गाँव का डेªनेज सिस्टम (जल निकासी हेतु नाली व्यवस्था) बनाई गई व नाली में मच्छर का लार्वा खाने वाली गप्पी मछली डाली गई। परिणामतः, स्वच्छ एवं बीमारी मुक्त गाँव बना।
- गाँव के हर मकान की पुताई गुलाबी रंग से की गई व हर घर पर पहले गृहणी बाद में बाकी सब के नाम का बोर्ड लगाया। हर घर की रजिस्ट्री महिला के नाम पर की गई।
- महिलाओं के 6 स्वयं सहायता समूह बनाए गए जिनके द्वारा घरेलू चीजों का निर्माण व प्रशिक्षण गाँव में ही प्रारम्भ हुआ व कृषि कार्य भी इन्हीं समूहों द्वारा होता है बाहर से श्रमिक नहीं आते।
- गाँव के थोड़ी दूर बहने वाली नदी से सिंचाई हेतु नाला बनाया गया उससे पाइप डालकर गाँव में सामूहिक सिंचाई व्यवस्था बनाई गई।
- गाँव के सभी लोगोें ने धन एकत्रित कर खुद के पैसे से पंचायत भवन बनवाया है।
- महाराज जी ने गाँव के सभी लोगों से शौचालय व बायोगैस बनवाने का आह्वान किया तो धनाभाव आड़े आया तब बैंक आॅफ इण्डिया ने पहल की व गाँव वालों को फसल के बाद वापसी की शर्त पर ऋण उपलब्ध कराया।
आज गाँव के 80 प्रतिशत घरों में देशी गाय है व घर में औसतन 2-4 जानवर हैं सबका गोबर व मूत्र गोबर गैस में जाता है।
गाँव के हर घर में शौचालय है व शौचालय का पाइप भी गोबर गैस में जाता है।
गोबर व मानव मल, मूत्र के गोबर गैस में निस्तारण के बाद स्लरी (अवशेष) खेत में खाद के रूप में काम आता है व गैस से घर का पूरा खाना बनता है। गाँव में एल॰पी॰जी॰ के सिलेण्डर की आवश्यकता नहीं पड़ती एल॰पी॰जी॰ मुक्त गोबर गैस युक्त गाँव।
- गाँव के लोगो ने यह गोबर गैस, शौचालय व गाँव की सड़क अतिक्रमण तोड़कर खुद के श्रम से बनाई, फसल आने पर बैंक का पूरा कर्ज लौटाया, आज पूर्ण ऋण मुक्त गाँव ।
- गाँव में पूर्ण स्वच्छता रहती है हर घर में शौचालय है गप्पी मछली के कारण मच्छर पैदा नहीं होता व पेयजल की स्वच्छता का भी ध्यान रखा जाता है इसीलिए बीमारी भी काफी कम है।





