मित्रो, मै आपको वर्ष 2011 के एक अद्भुत अनुभव को सुनाना चाहता हूँ। मैं जून 7, 2011 को मदुराई मीनाक्षी मिशन हास्पिटल की बाल अन्कोलोजी कैंसर इकाई का उदघाटन करने गया। वहाँ मैने हैदरावाद के मेरे डी. आर. डी. एल. समय के दौरान रहे ड्राइवर को देखा। उसका नाम वी. काथिरेसन था और उसमें मेरे साथ दिनरात लगभग नौ वर्षों तक कार्य किया था। उस समय मैं उसे खाली समय में कुछ महत्वपूर्ण किताबे, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ बहुत कुशलता से पढ़ते देखा करता था।
उसके इस समर्पण से प्रभावित हो, मैने उससे एक प्रश्न पूछा। फुर्सत के क्षणों में तुम किताबें क्यों पढ़ते हो? उसने उŸार दिया, उसके पुत्र और पुत्री उससे ढ़ेर सारे प्रश्न पूछते हैं और उसी चीज ने उसे अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। उसकी इस सीखने की भावना ने मुझे आर्षित किया और मैने उससे दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम के मध्यम से औपचारिक शिक्षा पाने को कहा, उसे ऐसे पाठ्यक्रम में शामिल होने हेतु समय दिया। उसे पहले 10वीं, 12वीं और फिर उच्च शिक्षा हेतु आवेदन करने को कहा। उसने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और अध्ययन में लग गया। उसने अपने संकल्प और कठिन परिश्रम के बल पर पहले इतिहास में बी.ए. और फिर एम.ए. किया। फिर राजनीति विज्ञान में एम.ए. व बी.एड. करके एम.एड. पूरा किया। इस प्रकार उसने पड़ाई करते हुए मेरे साथ 1992 तक कर्य किया।
फिर उसने मनोन्मेनियम सुन्दरनार विश्वविद्यालय में पी.एच.डी. हेतु पंजीकरण कराया और 2011 में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की। उसके वाद तामिलनाडू सरकार के शिक्षा विभाग में 10 साल तक नौकरी की और अब 2010 में वह मदुरई से निकल कर मेलूर के शासकीय कला महाविद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत है। प्रविद्धता और समर्पण ने उसके जीवन को उन्नत बनाने में मदद की, जो हर कोई पा सकता है।





