ऋतु चक्र जिससे हो प्रभावित, अब गया है गड़बड़ा।।
बे मौसमी बरसात से जलमग्न ‘चेन्नइ’ हो गया।
और जनमानस ग्रसित कितना सदा को सो गया।।
हो प्रभावित प्रकृति ने ज्यों प्रलय-दृष्य दिखा दिया।
जलपान, निद्रा, वास सब कुछ छीन मानव से लिया।।
हैं आज ‘ग्लोबल वार्मिंग’ से विश्व-वैज्ञानिक दुखी।
पर्यावरण दूषित हुआ, छूटा न कोई भी सुखी।।
‘मास्क’ धारण कर सड़क पर जायँ वैज्ञानिक कहें।
सूक्ष्म कण दूषित हमारे वायु- मण्डल में बहें।।
रक्त को रासायनिक ‘मेटल्स’ कण दूषित करे।
स्वास्थ्य हित जो हानि कारक व्याधियों से हैं भरे।।
उपरोक्त का कारण धरा से, वृक्ष जो हैं कट गये।
है नष्ट हरियाली हुई तालाब सारे पट गये।।
अब सूखने नदियाँ लगीं, भू जल चला पाताल को।
ये आपदायें प्राकृतिक लेतीं बुला भूचाल को।।
भूतल हरितिमा से सजें दोहन प्रकृति का रोकिये।
ये धूम्र त्यागी गाडि़याँ कम ही चलें यह सोचिये।।
ले नाम ‘डेवलपमेन्ट’ का अब प्रकृति नष्ट न कीजिये।
देकर निमंत्रण प्रलय को, अपयश अबोध न लीजिये।।
- दयानन्द जडि़या ‘अबोध’
चन्द्रा-मण्डप, 370/27, हाता नूरबेग, संगमलाल बीथिका, सआदतगंज, लखनऊ - 226003





