फिल्म पी के को लेकर देश में पर्याप्त उपद्रव हुआ। फिल्म के पक्ष और विपक्ष में मीडिया अपनी तरह से बहस में उलझा रहा। एक आरोप यह था कि हिन्दू प्रतीकों को केन्द्र में रखकर फिल्म में उनका उपहास किया गया है, ऐसा ही बार-बार क्यों होता है? दूसरे धर्मों के पाखण्ड पर चर्चा क्यों नहीं होती? किन्तु इस प्रकार के प्रतिक्रियावादी तर्कों से मूल प्रश्न का कोई समाधान संभव नहीं है। दिक्कत यह है कि हमारा सामाजिक विमर्श इतने घटिया स्तर का हो चुका है कि हम तुरंत ‘सीधी कार्यवाही’ पर उतर आते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि प्रकरण को व्यापक फलक पर देखने की चेष्टा की जाए। यह किसी एक फिल्म का प्रश्न नहीं है, ये सब चीजें समाज में आयी-गयी हो जाती हैं; वास्तविकता यह है कि इस प्रकार के प्रयास समाज के प्रत्येक फोरम से लगातार होते रहते हैं, ताकि, जहाँ तक हो सके, आम लोगों की सामान्य समझ या नासमझ का फायदा उठाते हुए धर्म और परम्परा की दृष्टि के विरुद्ध उन्हें बरगलाया जा सके। मीडिया, राजनीति, रंगमंच, कला, साहित्य, समाज-विज्ञान- सभी की दृष्टि इस अर्थ में समान है। यह इस क्लान्त-श्रान्त प्राचीन देश को अ-राष्ट्रीय करने के दीर्घकालिक प्रकल्प की स्वाभाविक गति है।
सम्प्रति, इस फिल्म में एक एलियन, जिसे न परिधान-बोध है, न भाषा-बोध, सभ्यता के सुदीर्घ इतिहास की जीवनीशक्ति अर्थात् धर्म को आक्रामक रूप से निःसार घोषित करने की मांग करता है। यह जाॅन राॅल्स के ‘वील आॅफ इग्नोरेंस’ की असंभाव्य अवस्था की अभिव्यक्ति जैसी योजना है। मनुष्य की प्रतीक-जीविता का वह उपहास करता है। उसे अपनी स्थूल दृष्टि पर इतना अहंकार है कि वह प्रज्ञा के सनातन प्रवाह को ही खण्डित कर देना चाहता है। वह यह सब-कुछ एक पाखण्डी को केन्द्र में रखकर करता है तथा धर्म और पाखण्ड को समानार्थी सिद्ध करने पर तुला हुआ है। यह किसी एक धर्म-विशेष नहीं, वरन् धर्म-सामान्य के समूल उन्मूलन का प्रयास है। वह जीवन के सभी प्रश्नों का सामान्य-जन-बुद्धि से समाधान करने का आह्वान करता है। वस्तुतः,यह बाल-बुद्धि है; जीवन इतना बहुआयामी, बहुस्तरीय, बहुसन्दर्भीय और जटिल है कि इसके प्रश्नों का समाधान इस जन-बुद्धि या बाल-बुद्धि से संभव नहीं है।
यह विचारणीय है कि यदि फिल्म के अनुसार धर्माचरण का अनुशासन-विन्यास पाखण्ड है तो राजसत्ता के स्तर पर किए जाने वाले औपचारिक आयोजन और उनसे सम्बद्ध विधान क्या हैं? गणतन्त्र-दिवस की परेड क्या है? तोपों की सलामी क्या है? ध्वजारोहण क्या है? सलामीगारद का निरीक्षण क्या है? पासिंग-आउट परेड क्या है? फ्लैग-मार्च क्या है? प्रोटोकाॅल क्या है? शपथ क्या है? विशेषाधिकार क्या है? दीक्षान्त समारोह क्या है? और, सैन्य तथा पुलिस बलों के ड्रेस-कोड, उनके अलंकरण, उनके प्रतीक-चिह्न और उनके उद्घोष-वाक्य क्या हैं? क्या इन सबको भी पाखण्ड ही कहा जाएगा? क्या ये सभी राजसत्ता के ऐश्वर्य-सूचक अनुशासन-विन्यास नहीं हैं? क्या धर्म अथवा राजसत्ता बिना किसी अनुशासन-विन्यास के चल सकते हैं?
विचारणीय यह भी है कि यदि धर्म के अन्दर पाखण्ड पनप रहा है तो क्या ऐसा धर्म के अनुमोदन से हो रहा है? अथवा, यह शीघ्रातिशीघ्र और येन-केन-प्रकारेण अधिकाधिक लाभ और भोग-प्राप्त करने की शैतानी इच्छा से पे्ररित आधुनिक समाज की प्रवृत्ति का स्वाभाविक प्रतिफल है? दूसरे, कोई भी पाखण्ड जिस व्यवस्था के परिक्षेत्र का होता है, उसका प्रभावी प्रतिकार भी उसके अन्दर से ही होता है। सजग धर्माचार्य इसका प्रतिकार कर भी रहे हैं; उनके लिए और धर्मशील समाज के लिए यह व्यथा और क्षोभ की स्थिति है; जबकि इसके विपरीत एलियन से प्रभावित दूसरे पक्ष के लिए यह प्रसन्नता और हास-परिहास का अवसर है। और यदि पाखण्ड के प्रति इतना ही आक्रोश इनके मन में है तो फिर पाखण्ड तो सत्तर वर्षों की स्वातं़त्र्योत्तर भारत की राजनीति में खण्ड-खण्ड व्याप्त है, राजनीतिक दलों के संकल्पों, विचारों और सरकारी योजनाओं में व्याप्त है, समूची आधुनिक शिक्षा में व्याप्त है, मीडिया में व्याप्त है, स्वयं सिनेमा में नखशिख व्याप्त हैै, और अब तो विज्ञान और तकनीक के पाखण्ड के ऊपर अतिशय विश्वास करने का परिणाम भी अपने अस्तित्व के ही संकट के रूप में स्पष्ट दिखाई देने लगा है। तो भी क्या कोई इन सभी व्यवस्थाओं को समूल समाप्त करने का आह्वान कर सकता है? प्रयास तो यही होते हैं कि जहाँ तक हो सके इस घनीभूत पाखण्ड के बीच से भी व्यवस्थाओं के स्वरूप-निदर्शन तथा संचालन का कोई सम्यक मार्ग खोजा जाए। सभी व्यवस्थाओं में उपस्थित स्वाभाविक विकार को दूर करने के लिए उनके आन्तरिक परिमार्जन की अनवरत चेष्टा की जाती है, तो फिर धर्म के साथ ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है? उसे जन्मजात विकार क्यों मान लिया जाता है, जिसका शमन धर्म को समूल नष्ट करके ही किया जा सकता है?
जीवन की आपाधापी में लोग इतनी ज़ल्दी यह कैसे भूल जाते हैं कि आदमी को मनुष्य बनाने में धर्म की असाधारण, आधारभूत और निर्णायक भूमिका रही है। सभ्यताओ के इतिहास में दृश्यमान सभी लौकिक-अलौकिक साधनाएं, विद्याएं और कलाएं धर्म के आवरण में ही विकसित और सिद्ध हुई हैं। संसार के नैसर्गिक वैविध्य को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग धर्माें-सम्प्रदायों ने संसार के लोगों को उनके शारीरिक और मानसिक सन्निकर्षों अर्थात् चिति के अनुरूप न केवल स्वायत्त और सर्वांगपूर्ण जीवन-विधान प्रस्तुत किया है वरन् स्वायत्त और सर्वांगपूर्ण विश्व-दृष्टियों की भी सर्जना की है। धर्म ने अपना स्वाभाविक संगठनात्मक स्वरूप भी बनाए रखा है और मनुष्य को उसके सर्वतोमुखी अभ्युदय की अनन्त संभावनाएं भी प्रदान की हैं। यह धर्म की ही विशाल और उदार दृष्टि का उन्मीलन है जिसके कारण मनुष्य को आत्मदीपोभव का आत्मविश्वास भी प्राप्त हुआ है और परिवार, समाज, सम्प्रदाय तथा राष्ट्र जैसी संस्थाओं का सम्बल भी, जो उसका उत्तरोत्तर पथ-प्रदर्शन करती रही हैं। विवाह सहित इन सभी संस्थाओं का तात्त्विक आधार है, न कि भावनात्मक-मात्र, जैसाकि फिल्म में दिखाने की चेष्टा की गई है।
यूरोपीय पुनर्जागरण की मानस-संतति भारतीय पुनर्जागरण को श्री अरविन्द ने आधुनिकता का एशियाई संस्करण कहा है। भावी भारतवर्ष की भावभूमि के निर्माण में इसकी महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका रही है। इसने सत्-असत्, सम्यक-विकृत, स्मरण-विस्मरण, गौरव-ग्लानि के द्वन्द्व में रहना हमारी नियति बना रखा है। स्वाभाविक ही मनुष्य का नकारात्मकता की ओर सहज झुकाव होता है। पीके जैसे अभियान चलाने वाली शक्तियाँ मनुष्य की इस सहज नकारात्मक प्रवृत्ति का परिणाम हैं; हमें इनके प्रवाह में बहने से सावधान रहना चाहिए। फिल्म में अश्लीलता के भरपूर समावेश का मन्तव्य भी इसी दृष्टि से समझा जाना चाहिए। यह सब हमारे विवेक, हमारे संस्कार, हमारी जीवनी-शक्ति और हमारे ऋषि-ऋण-बोधकी अग्नि-परीक्षा तो है ही, यह वस्तुतः हमारे लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। यह हमारे अस्तित्व के औचित्य से जुडा़ प्रश्न है; किसी ध्वंसात्मक-भावनात्मक प्रवाह में हमें अविचलित बने रहने का साहस दिखाना चाहिए। अपने धर्म, अपनी सनातन परम्परा के अध्ययन, मनन, अनुगमन से ही ऐसा संभव हो सकता है। ऐसे नकारात्मक अभियानों से बचे रहने का यही एकमात्र रास्ता है। दुर्भाग्य से देश में सकारात्मक प्रतिष्ठानों का सत्व धूमिल पड़ा हुआ है और सकारात्मक शक्तियाँ अपना आत्मविश्वास जुटा नहीं पा रही हैं। ऐसे में ‘सीधी कार्यवाही’ के अतिरिक्त नौजवानों को कोई और विकल्प दिखाई नहीं देता।
एसोशिएट प्रोफेसर, राजनीति शास्त्र, विद्यान्त महाविद्यालय, लखनऊ।





