Monday, December 28, 2015

गोमती व सभी जल स्रोतों को स्वच्छ रखना हमारा दायित्व

शहरीकरण व औद्योगीकरण के अन्धाधुन्ध बढ़ोत्तरी, जनसंख्या वृद्धि, विस्थापन से वर्तमान में न केवल जल प्रदूषण वरन वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। इसी कारण इस पर अनेक शोध भी हो रहे हैं।
धनन्जय कुमार व अन्य द्वारा लखनऊ में गोमती नदी के 12 स्थानों के नमूने एकत्र कर उनका परीक्षण किया गया, जिनसे जल में विषैले रसायनों की पुष्टि हुई- जैसे आयरन, कैडियम, काॅपर और आरसैनिक आदि जो न केवल फसल को नुकसान पहुँचाते हैं अपितु भूमि की उर्वरा शक्ति को भी घटाते हैं। इसके अतिरिक्त मछलियों व जल जन्तुओं को हानि पहुँचाते हैं, वहीं स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। इस शोध पत्र का यह भी निष्कर्ष है कि - गोमती नदी का प्रदूषण घरेलू अपशिष्ट व कारखानों से निकलने वाले जहरीले पदार्थों  के नदी में बहाये जाने से हो रहा है।
इसी प्रकार के तथ्य रिचा खरे द्वारा किए गये शोध में आये हैं। अतः यदि समय पर सचेत नहीं हुए तो वह दिन दूर नहीं जब गोमती पूर्णतः जहरीली नदी बन जायेगी और यह घटना मानवता के लिए अभिषाप साबित होगी। इसीलिए यह आवश्यक हे कि निम्न कदम शीघ्र उठाये जायें -
1. सर्वप्रथम समाज में जागरूकता व चेतना लाई जाये कि सभी जीवनदायी जल स्रोत- तालाब, कुएँ व नदियों की शुद्धता को बनाये रखने हेतु उन्हें प्रदूषण मुक्त रखा जाये। घरेलू कूड़े-कचरे का उचित प्रकार से प्रबन्ध हो। जैव निम्ननी, अजैव निम्ननी के कचरे को अलग-अलग करके उचित प्रकार से निस्तारण किया जाये।
2. नदियों की ओर बहने वाले नालों व मल एवं अपशिष्ट के प्रशोधन हेतु ट्रीटमेन्ट प्लान्ट लगाकर उन्हें स्वच्छ किया जाना चाहिए तथा उपचार के बाद ही उसके स्वच्छ पानी को ही छोड़ा जाये। यदि सम्भव हो तो उसको अन्य उपयोग में भी लिया जा सकता है।
3. सभी कारखानों को कानूनी तौर पर बाध्य करना चाहिए कि वे जहरीले पदार्थों का उपचार करके ही नदियों में उसका स्वच्छ जल छोड़ें। इस हेतु उन्हें अपने लाभ का एक अंश कारपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के तौर पर देना चाहिए। इसके बदले कारखानों को टैक्स में छूट दी जा सकती है। ऐसा न करने वालों को कठोर सजा का भी प्रावधान होना चाहिए।
4. घर व स्कूलों में बचपन से ही पर्यावरण के प्रति प्रेम, जागरूकता तथा आदर का भाव उत्पन्न करना चाहिए। युवाओं को भी न केवल छैैए छब्ब् बल्कि सामूहिक तौर पर इस अभियान से जोड़ना चाहिए।
5. गोमती नदी के तटों पर सघन वृक्षारोपण हो। 
6. गोमती में विसर्जन घाटों को चिन्हित करके  सभी धर्म गुरुओं को विकल्प ढ़ूढ़ना चाहिए। जैसे बड़ी मूर्तियाँ न बनाई जायें, रसायनिक रंगों का प्रयोग न होे, निर्माण में जहर मुक्त घुलनशील पदार्थों का ही प्रयोग हो तथा विसर्जन कुण्ड बनाये जायें।
7. पूजन सामग्री को भी उचित प्रकार से अलग कुण्ड बनाकर उसमें प्रवाहित करें तथा फल-फूलों को अलग गढ़ा बना कर उसमें खाद बनाई जा सकती है।
8. जो शमशान शहर के बीच में आ गये हें उन्हें स्थानान्तरित किया जाये।
9. नदी के प्रति भावात्मक जुड़ाव पैदा करने के लिए सूर्योदय व सूर्यास्त देखने तट पर ऐसे स्थानों का विकास करना चाहिए जहाँ बैठ कर लोग ध्यान, योग व गोमती की आरती भी कर सकें।
10. जिस प्रकार गंगा के 200 मीटर तक निर्माण गतिविधियाँ प्रतिबन्धित हैं, गोमती व अन्य नदियों पर भी लागू किया जाये।
- डाॅ॰ अंजली  चैहान
असिस्टेन्ट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, मानव शास्त्र विभाग,
श्री जयनारायण स्नात्कोत्तर, महाविद्यालय, लखनऊ।