Tuesday, December 29, 2015

उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय - डाॅ॰ रवीश कुमार

कुछ दिन पूर्व इलाहाबाद  उच्च न्यायालय ने काॅन्वेण्ट और मिशनरी विद्यालयों के सम्बन्ध में एक ऐतिहासिक और राष्ट्रवादी निर्णय दिया है। उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार समस्त शासकीय कर्मचारी (राजपत्रित एवं अराजप़ित्रत), सांसद, विधायक, न्यायाधीश  तथा ऐसे व्यक्ति जिन्हें राजकोष से वेतन स्वरूप धनराशि प्राप्त होती है, वे अपने बच्चों की शिक्षण व्यवस्था किसी भी काॅन्वेण्ट  या मिशनरी के विद्यालय में नहीं करा सकते हैं। यदि उपरोक्त व्यक्ति अपने बच्चों का प्रवेश किसी काॅन्वेण्ट या मिशनरी के विद्यालय  में कराते हैं तो उन्हें उक्त विद्यालय के मासिक शुल्क के समानान्तर धनराशि शासन में भी जमा करनी होगी।
उच्च न्यायालय के इस निर्णय की भूरि-भूरि प्रशंसा की जानी चाहिये, क्योंकि  यह राष्ट्रहित में देश के भविष्य को घ्यान में रखते हुए एक दूरगामी निर्णय है।
ईसाई मिशनरीज लगभग तीन सौ वर्षों से भारत के ईसाईकरण का प्रयास कर रही हैं। उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों (नागालैण्ड, मिजोरम, मेघालय) को छोड़कर पूरे देश में कहीं भी उन्हें आशातीत सफलता नहीं प्राप्त हुई है।
यह शत-प्रतिशत सत्य है कि ईसाई मिशनरीज भारतीय जतना की मानसिकता परिवर्तित करने में सफल रही हैं, और इस कार्य को काॅन्वेण्ट एवं मिशनरी विद्यालय पूर्ण मनोयोग से सम्पन्न कर रहे हैं। अतः इस प्रकार के विद्यालयों की देश में कोई आवश्यकता नही है, क्योंकि लगभग 200 वर्षों से शिक्षा प्रदान कर रहे काॅन्वेण्ट एवं मिशनरी विद्यालय देश को एक भी -
1. डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. राधाकृष्ष्णन्, सरदार पटेल, डा. अम्बेडकर, गुलजारी लाल नन्दा, लाल बहादुर शास्त्री अथवा लोक नायक जय प्रकाश नारायण नहीं दे पाये हैं।
2. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्र शेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू नहीं दे पाये हैं।
3. स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द घोष, महर्षि महेश योगी या स्वामी रामदेव नहीं दे पाये हैं।
4. डा॰ जगदीश चन्द्र बोस, डा॰ होमी जहाॅगीर भाभा, डा॰ विक्रम साराभाई और डा॰ ए. पी. जे. अब्दुल कलाम नहीं दे पाये हैं।
5. शेक्सपियर, मैथ्यू आॅरनाल्ड, राॅबिन्सन क्रूसो, थामस हाॅर्डी नहीं दे पाये हैं। अर्थात् काॅन्वेण्ट एवं मिशनरी विद्यालय ज्ञान-विज्ञान, कला, साहित्य, राष्ट्रवाद अथवा किसी भी क्षेत्र में देश को एक भी महापुरूष दे पाने में पूर्णतया असफल रहे हैं। अतएव, राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुये इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को और भी कठोर रूप प्रदान कर देश के सर्वोच्च न्यायालय को भी इसी प्रकार का राष्ट्रवादी निर्णय देना चाहिये।
सम्पर्क - लोक प्रशासन विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ।