वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य और अनुभवसिद्ध तमाम शोध उस बात की पुष्टि करते हैं कि लोकतंत्र किसी भी समाज को सुशासन देने के लिए एक बेहतर विकल्प है। यह किसी भी अन्य प्रणाली की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली है। एक लम्बे अर्से से लोकतंत्र ने चिभिन्न क्षेत्रों में अच्छी चीजंे दी हैं। यही लोकतंत्र का वरदान है। लोकतंत्र विचार-विमर्श का अवसर मुहैया कराता है। इसमें असहमति की आवाज के साथ-साथ अन्य विकल्प भी होते हैं, जिसमें सभी समुदायों के व्यापक हित में होता है। हालांकि कभी-कभी आम सहमति पर पहुँचने के लोकतांत्रिक तौर-तरीके अथवा उपाय विलम्ब का कारण बनते है और अक्सर ये तौर-तरीके संकीर्ण सोच तथा स्वार्थ को आगे बढ़ाते है। जब भी ऐसा होता है तो लोकतंत्र एक अभिशाप में बदल जाता है। आजाद भारत की प्रथम पीढ़ी के नेताओं की बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, त्याग और उनके साहस को श्रेय देना होगा कि उन्होंने लोकतंत्र (संसदीय) का कराया और शासन संचालन के लिए मताधिकार को आधार बनाया गया।
आजाद भारत की यात्रा में तमाम उथल-पुथल के बावजूद लोकतंत्र न केवल बचा रहा, बल्कि फलता-फूलता रहा। प्रत्येक लोकतंत्र में दिशा और गति दमने वाले राजनेताओं और राजनीतिज्ञों की तरह हमारे यहाँ भी राष्ट्रहित-चिन्तक लोग हैं। राजनीतिक विज्ञान में राजनेता उसे कहा गया है जो सिद्धान्तों विचारों के लिए कार्य करता है, जबकि आज का राजनीतिज्ञ वह होता है जो अपने निहित स्वार्थों की पूर्ती में अधिकाधिक लगा रहता है। आजाद भारत में जो तमाम वादे किए गए उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था देश के लाखों लोगों को आर्थिक तौर पर सशक्त करना। दुर्भाग्य से इस दिशा में प्रगति अपर्याप्त और निराशाजनक रही। आज का युवा भारत इस मामले में बहुत अधीर है, वह बहुत इंतजार करने को तैयार नहीं है। अप्रत्यक्ष तौर पर कहा जाए तो और इंतजार अब स्वीकार्य नहीं है। इसे पिछले वर्ष मई माह में आए चुनाव के परिणामों से भी समझ सकते हैं। नई सरकार का चुनाव ही इस जनादेश के साथ किया गया है कि वो समृद्धि लाने वाले उपायों पर काम करेगी, गरीबी और दरिद्रता का उन्मूलन करेगी। हालांकि इसमें समय लगेगा और पटरी से उतरी हुई अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने के लिए बहुत सारे प्रयास करने होंगे। यह एक चुनौती पूर्ण कार्य है। इसलिए और भी क्योंकि मौजूदा समय अर्थव्यवस्था वृहद आर्थिक अस्थिरता, राजकोषीय फिजूलखर्जी और सरकारी घाटे के बोझ तले दबी हुई है।
राजनीतिक कर्ता-धर्ता भले ही बहुत तेजी से स्थितियों को न बदल सके, लेकिन उन्हें मतदाताओं को अपनी ईमानदारी के प्रति भरोसा दिलाना होगा और टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए समग्रतावादी नजरिया अपनाना होगा। हमारे नीति-नियंताओं को अपने विचारों को बेहतर तरीके से जनता के बीच रखना होगा और उन्हें बताना होगा कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए क्या-क्या जरूरी है। हालांकि राज्यों और भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में समग्रतावादी नजरिएं का परिणाम आने में समय लगेगा। इस बीच सरकार की ईमानदारी और उसकी योग्यता-नीयत को लेकर किसी तरह का संदेह नहीं होना चाहिए। इसके लिए सरकार कई मोर्चों पर काम कर रही है तथा उसके कार्यान्वयन के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं जिसमें कई ऐसे विधेयक प्रस्तावित हैं जिससे देश में व्यवसाय के प्रति माहौल बना है और प्रक्रियाएं सरलीकृत हुई हैं। संसद के पिछले सत्र में केन्द्र सरकार ने अधीर भारत की बेचैनी को दूर करने के लिए अध्यादेशों के माध्यम से आर्थिक सुधारोें की गति को तेजी देने की कोशिश की ताकि स्थिति में बदलाव हो सके। इसके लिए सरकार ने भूमि अधिग्रहण विधेयक को पेश किया, कोयला, खदानों और खनिजों जैसी राष्ट्रीय सम्पदा की पारदर्शी बिक्री को सुनिश्चित किया और बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा में वृद्धि को अनुमति देने का काम किया।
कार्यपालिका के पास लोकहित में अध्यादेशों को जारी करने की शक्ति संविधान में मिली हुई है। इन अध्यादेशोें को संसद में पारित करा पाना सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक परीक्षा है। दुर्भाग्य से इस मुद्दे पर राजनीतिज्ञ अपने-अपने हितों के लिहाज से राजनीति कर रहे हैं और अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के कारण इसे विफल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि एक वर्ग अप्रत्यक्ष तौर पर इसे सहारा भी दे रहा है। सच्चाई यही है कि यह राजनीतिज्ञों की राजनीति है, न कि राजनेताओं की। इन लोगों ने ही आर्थिक विकास की गति को धीमा किया है और इस समय भी इसे विफल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि यह भी सच है कि भारत के पास आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक बेहतर अवसर है। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में जब गिरावट का दौर है तो भारत उम्मीद की एक नई ऊँचाई पर है। वैश्विक पूँजी बाजार को भारत में बेहतर लाभ मिलने की अपेक्षा है। कुछ सुधारों के साथ भारत अपनी नीतियों में बदलाव की घोषाणाएं करके व्यावसायिक सुशासन को दिशा दे सकता है। विशेषकर कर ढ़ाचे में सुधार और अनुपयुक्त नीतियों का त्याग करके। यह कदम वित्तीय पूँजी के लिहाज से आवश्यक है। वर्तमान में निजि क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्रों की बैंकिंग स्थिति खराब है और यह भारी एनपीए यानी गैर-निष्पादन सम्पत्ति के बोझ तले दबी हुई है। वास्तविकता यही है कि भारत का राजकोषीय संसाधन वृहद तौर पर कमजोर बुनियादी ढ़ाचे को इस रूप में सहारा देने के लिए अपर्याप्त है जिससे उच्च जीडीपी विकास दर का लक्ष्य हासिल किया जा सके और विशाल युवा आबादी के लिए देश को समृद्धि-सम्पन्नता की भूमि में बदला जा सके। इस क्रम मेें देश का नया मतदाता वर्ग क्षेत्रवाद अथवा सामाजिक इंजीनियरिंग से बहुत कम प्रभावित है। आज का आकांक्षी भारत इन बातों को अच्छे से समझता है कि नियंत्रित अर्थव्यवस्था उसके लिए बेहतर नहीं है।
उदारीकरण, वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण के माध्यम से दुनिया में आर्थिक बेहतरी की खबरों को मीडिया ने बखूबी पेश किया है। देश का युवा चाहता है कि हमारी जीडीपी का विकास इस स्तर पर हो कि उसकी आर्थिक सम्भावनाओं में इजाफा हो और लोगों की जीवन दशा अच्छी हो। यह भी सच्चाई है कि सामाजिक असंतोष और असमानता के कारण देश में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का विस्तार हुआ है। राजनीतिक व्यवस्था की प्रासंगिकता का परीक्षण समाज की मौजूदा आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उसकी दृढ़ता से ही हो सकेगा। क्रियान्वन में देरी राजनीतिक व्यवस्था को भी प्रभावित करेगी। मौजूदा समय में भारत बदलाव के दौर में है। प्रार्थना करें और उम्मीद रखें कि समावेशी आर्थिक विकास में विफलता और सामाजिक असंतोष की आग हमारे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरा नं बने।
- (लेखक सेबी और एलआइसी के पूर्व अध्यक्ष है।)





