Tuesday, December 29, 2015

गोमती आरती - दयानन्द जड़िया ‘अबोध’

आरती जय गोमा महरानी।
हर्षित करहु तुमहि सब प्रानी।।
आरती जय गोमा .................।।

तुमही आदि गंगा कहलाई।
चारिहु जुग तव कीरति छाई।।
सौम्य स्वच्छ सलिला सुखरासी।
आगत जन कै हरहु उदासी।।
मंजुल मंगल मोद सुदानी।
आरती जय गोमा .................।।1।।

तव गुन गान ग्रन्थ सब गावैं।
संत सुजन सुर सीस नवावै।।
मोक्षदायिनी कै पद पावा।
गोमा सुजस चर्तुदिसि छावा।।
करहु सुखी सारे जन प्रानी।
आरती जय गोमा .................।।2।।

तट पै नैमिष तीर्थ सुहावा।
आश्रम गद्दी ब्यास बनावा।।
भारी तप कर मनु सतरूपा।
पाइन्ह सुत हरि रूप अनूपा।।
बने ‘दधीच’ अस्थि तन दानी।
आरती जय गोमा .................।।3।।
सारे तट थल तीर्थ कहाये।
तुमरेइ जल महँ भरत नहाये।।
लंका जीति राम जब आये।
सादर तब धो पाप अन्हाये।।
ऋषि कौण्डल्य सुभग सरि जानी।
आरती जय गोमा .................।।4।।

लखन कूल पै नगर बसावा।
कालान्तर लखनऊ कहावा।।
मन्दिर मातु चन्द्रिका पावन।
तहॅंहि सुधन्वा ताल सुहावन।।
सुन्दर स्वास्थ्य सान्ति सुख दानी।
आरती जय गोमा .................।।5।।

गौतम-साप-ताप नसिजाये।
तट रेणुक-सिव सक्र बनाये।।
मातु! अबोध आरती गाई।
सब बिधि लेहु ताहि अपनाई।।
पढ़हिं जे आरति बनैं सुग्यानी।
आरती जय गोमा .................।।6।। ु