Tuesday, December 29, 2015

दो शब्द - विश्वनाथ खेमका

भारत का पुरूषार्थ है, तन, मन और प्राण से सनातन संस्कृति को अपनी जीवन-कलाओं में चरित्रार्थ करना, जो यहाँ के कला, विज्ञान तथा दर्शन में परिलक्षित होता है। भारत आदि काल से आज तक वाह्य परिस्थितियों से वशीभूत होकर अपनी इस सनातन अन्तर्दृष्टि को कभी नहीं खोया तथा कभी नहीं भूला। यही कारण है जिससे वह जीवन में प्राकृतिक नियमों एवं शक्तियों के प्रति निरन्तर जागरूक था, है और रहेगा।
परन्तु, भारतीय युवा के समक्ष आज के वैश्विक परिपे्रक्ष्य में बड़ी चुनौती है, जहाँ जीवन के विभिन्न क्षेत्र के आदर्शों, जीवन मूल्यों में मिलावट एवं स्खलन से उसे दो-चार होना पड़ता है। ऐसे विभ्रम भरे वातावरण में जब चारों ओर प्रेरणा पूर्ण जीवन का अभाव दिखाई पड़ता हो, ऐसे ऐतिहासिक क्षणों में वह भारतीय सनातन कसौटी पर अपनी अन्तः दृष्टि व प्रेरणा से खरा उतरेगा यह ईश्वरीय विधान भी है।
भारतीय युवा को वर्तमान विश्व बाजारबाद के इस विपरीत युग में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उद्घोष करना है। क्योंकि बाजारवाद अपने स्वार्थ-हित पर टिका होता जहाँ उसकी सदैव दृष्टि दूसरे की जेब पर रहती है, जहाँ से कुछ लेना ही उसका अभीष्ट है। जबकि परिवार का मूल सिद्धान्त त्याग पर टिका है, जिसमें सदैव दूसरे को कुछ देने की प्रवृŸिा ही महत्व रखती है।
परिवार भाव के मूल आधार - सहनशीलता, सहअस्तित्व, पे्रम, दूसरे के विचारों का सम्मान एवं दूसरों के दुख में सेवा भाव की तत्परता जैसे मुख्य गुण व्यक्ति के जीवन में स्वाभाविक रूप से प्रकट होते हैं, होने चाहिए। इसके साथ ही युवा शक्ति को सदैव यह भी स्मरण रखना होगा कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ जैसा उदात्त विचार उसकी स्वाभिमानी एवं सामथ्र्यपूर्ण जीवनी शक्ति पर टिका है। अतः उसे अपने आप को विश्व मंच पर सनातन राष्ट्रीयता के गौरव के साथ समग्रता में अग्रणी सिद्ध करना होगा, तभी भारत गौरवशाली बनेगा। क्योंकि विश्व की समस्त समस्याओं का समाधान भारत ही दे सकता है, जिसका भविष्य युवाओं के हाथ में है और विश्व उसकी ओर निहार रहा है।