देश के वर्तमान जनसंख्यात्मक आंकड़े बताते हैं कि इस समय एक अरब और इक्कीस करोड़ की कुल आबादी में 50 फीसदी 25 वर्ष से कम आयु की आबादी है। आॅकड़ों का संकेत है कि यहाँ 65 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। इस तरह 14 से 35 आयु वर्ग समूह की औसतन कुल जनसंख्या लगभग 52-53 करोड़ से भी अघिक है। ऐसा अनुमान है कि आने वाले दशक में देश में युवाओं की कुल संख्या 60 करोड़ तक पहुँच जाएगी। विश्व स्तर पर जनसंख्या के आंकड़े संकेत देते हैं कि संसार के विकसित देशों में जन्म दर लगभग शून्य होकर वहाँ वरिष्ठजनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर विकसित देशों की तुलना में भारत की जनसंख्या लगातार युवा होने के संकेत दे रही है। वैश्विक आंकड़े साक्षी हैं कि आने वाले एक दशक में जहाँ चीन की आयु 37 वर्ष, अमेरिका की औसत आयु 45 वर्ष तथा पश्चिमी यूरोप और जापान की आयु 48 वर्ष होगी। वहीं दूसरी तरफ भारत में युवा औसत आयु 29 वर्ष होगी। इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि आगामी कुछ वर्षों में भारत दुनिया के उन शीर्ष देशों में शामिल हो जायेगा जिसके पास सबसे बड़ी युवाओं की कार्यशील शक्ति होगी। लिहाजा इन सभी के लिए कम से कम दस करोड़ रोजगार पैदा करने होगें। परन्तु जैसी रोजगार से जुड़ी रिपार्ट आ रहीं हैं उनसे देश में रोजगार के ढ़ाॅचे को और मजबूत बनाने और युवाओं में कौशल विकास बढ़ाने की तस्वीर लगातार धुंधलाती होती चली जा रही है।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की बेरोजगारी से जुड़ी रपट साफ संकेत देती है कि जून 2010 से जून 2012 के बीच बेरोजगारी में वृद्धि हुुयी है। पिछले दो साल के दौरान देश में बेरोजगारी 10.2 फीसदी की दर से बढ़ी है। आॅकड़ों का यह भी संकेत हे कि भारत में हर वर्ष नौकरियों की तुलना में दोगुने से भी अधिक बिना कौशल के स्नातक तैयार होते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि आधे से भी अधिक स्नातक बेरोजगारों की श्रेणी में शामिल होते जा रहे हैं। तथ्य बतातें है कि भारत में कुल नौकरियों का 85 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र से तथा मात्र 15 फीसदी हिस्सा ही संगठित क्षेत्र से जुड़ा है। रोजगार से जुड़े असंगठित क्षेत्र की कार्य दशायें अच्छी नहीं है। सूचना एवं तकनीक जैसे संगठित क्षेत्र की दशायें अगर बेहतर हैं भी तो वहाँ रोजगार के अवसर बहुत सीमित संख्या में हैं। हाॅलाकि भारत के बढ़ते मैन्युफैकचरिंग क्षेत्र में सबसे अधिक रोजगार के मौके हो सकते थे। परन्तु यहाँ के उद्योगों की कार्य दशायें एशियाई देशों के मुकाबले बहुत खराब होने के कारण यह सेक्टर भी युवा बेरोजगारों के दर्द को कम नहीं कर पा रहा है। रोजगार से जुड़े आॅकड़े बताते हैं कि उद्योगों से जुड़े कुछ कानून तो देश की आजादी से भी पहले के हैं जिनसे कम्पनियों को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। जरा गौर करें कि आज भारत में अनेक बड़ी कम्पनियों में काम करने वाले मजदूरों का औसतन वेतन 5-6 अमेरिकी डाॅलर रोजाना है, जबकि चीन में न्यूनतम मजदूरी 10-11 डाॅलर निर्धारित है।
कुछ दिन पहले राष्ट्पति प्रणव मुखर्जी देश की उच्च शिक्षा पर गहरी चिन्ता व्यक्त कर चुके हैं। टाइम्स हायर एजूकेशन संस्था से जुड़ी रिपोर्ट भी बताती है कि दुनिया के सबसे अच्छे 200 विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। सही बात यह भी है कि इस सब का परिणाम हमारे युवाओं को ही भुगतना पड़ रहा है। जरा रोजगार की योग्यता परखने वाली संस्था एस्पाइरिंग माइन्डस से जुड़ी एक ताजा रिपोर्ट पर गौर करें जो साठ हजार छात्रों का परीक्षण करके तैयार की गयी है। रिपोर्ट से यह बात साफ हो जाती है कि अधिकांश छात्र अंग्रेजी में संवाद कौशल, कंप्यूटर ज्ञान, विश्लेषण एवं संज्ञानात्मक कौशल और बुनियादी साँचे में उन शर्तों को पूरा नहीं करते जिनके आधार पर उन्हें ऊँचे पदों वाली नौकरियाँ मिल सकती हैं। इस संस्था के टेस्ट में मात्र दो फीसदी छात्र ही कार्पोरेट कम्यूनिकेशन और कंटेंट डेवलपमेंट की नौकरी के ही योग्य पाये गये। केवल दो फीसदी में एकाउटिंग और तीन फीसदी में विश्लेषक की नौकरी पाने की ही योग्यता दिखायी दी। दूसरी ओर 36 फीसदी छात्र मात्र क्लर्क बनने योग्य पाये गये। गौर करने लायक बात यह है कि जिस युग में साइंस और एकाउंटस में योग्य कर्मियों की सर्वाधिक माँग है ऐसे समय में हमारे कालेजों से सबसे कम योग्य छात्र निकल रहे हैं। यू0जी0सी0 ने भी अपने 2011-12 की उच्च शिक्षा से जुड़े आॅकड़ों को अपडेट करते हुए साफ किया है कि देश में इस समय 86 फीसदी छात्र ग्रेजुएट तथा मात्र 12 फीसदी पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षा से जुड़े हैं। बाकी दो फीसदी में से एक फीसदी रिसर्च से और मात्र एक ही फीसदी ने खुद को डिप्लोमा और सर्टीफिकेट कोर्स से ही जोड़े रखा।
सही बात यह है कि आज शिक्षित युवाओं में कुण्ठा निरन्तर बढ़ती ही जा रही है। परन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि युवा केवल विध्वंस, आतंक, आक्रमण और हत्या में विश्वास करते हैं। सच्चाई यह है कि वर्तमान में जिस प्रकार की राजनीति और राजनीतिज्ञों के निर्णय पक्षपाती हो रहे हैं उससे युवा शक्ति का मोह लगातार भंग होता जा रहा है। तभी आज उनका आक्रोश व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है। निःसंदेह अमेरिका और चीन के बाद आज भारत को तीसरी शक्ति के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। इसमें हमारे युवाओं की रचनात्मक प्रज्ञा का बहुत बड़ा योगदान है। परन्तु आई0टी0 सेक्टर में यह संख्या आम बेरोजगार शिक्षित युवाओं के मुकाबले बहुत कम है। वैश्विक स्तर पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 2020 तक कई देशों में जब पेशेवरों की भारी कमी होगी तब भारत की कुशल श्रमशक्ति ही ऐसे देशों की अर्थव्यवस्था को सहारा देगी। यह सच है कि उदारीकरण के कारण ही देश के युवाओं ने अपनी पेशेवरी गैर परम्परागत क्षेत्रों में भी दर्ज करायी है। परन्तु यह भी सच है कि पूर्व की तुलना में नौकरियों का प्रोफाइल भी बदला है। आज का युवा सिविल सर्विस, इन्जीनियरिंग और चिकित्सा क्षेत्र में जाने की बजाय अब वह सूचना तकनीक, कम्प्यूटर, बिजनेस मैनेजमेंट और मीडिया में अपना कैरियर बनाने को लालायित है। सर्वेक्षण बताते हैं कि पहले देश में कारोबार शुरू करने की जो उम्र 40 वर्ष के आस-पास थी, वह अब घटकर 25 वर्ष के आस-पास पहुँच गयी है। ‘बिजनेस वीक‘ की एक रिपोर्ट बताती है कि देश के करीब 4 करोड़ शहरी युवा ही उदारीकरण से प्राप्त इन अवसरों का लाभ उठा पाए हैं। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्र में बसने वाले 14-15 करोड़ युवा अभी भी बेरोजगारी और तंगहाली में जीवन यापन करने को मजबूर है।
नए सर्वेक्षण बताते हैं कि पूरी दुनिया में तकनीकी ज्ञान व कौशल विकास की आँधी चलने के बाद भारतीय युवा भी थोड़ा असुरक्षित सा हुआ है। वैश्विक दौर की नाॅलेज इकाॅनामी के इस काल खण्ड में देश इस समय तकनीकी ज्ञान के साथ में युवाओं में कौशल विकास और पेशेवरी की माँग भी कर रहा है। परन्तु देखने में आ रहा है कि देश के हर आम चुनाव में राजनेताओं द्वारा नये रोजगार पैदा करने के वादे तो किये जाते हैं, परन्तु उनको अमली जामा नहीं पहनाया जाता। कौशल विकास की बात छोड़, रोजगार के अवसर भी रोजाना कम होते जा रहें हैं। पिछले दिनों अन्ना व रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन तथा दिल्ली में एक युवती के साथ गैंगरेप के विरोध में यदि युवाओं ने देश की खुली सड़कों पर आकर हिस्सा लिया तो यह उनके युवा आक्रोश की बानगी भर थी। वह इसलिए क्योंकि उन्हें देश की आजादी के बाद खासकर जे0पी0 मूवमेन्ट के बाद देश के निजाम पर खुलकर बोलने और व्यवस्था के खिलाफ अपना आक्रोश व्यक्त करनेे का पहला मौका मिला। ध्यान रहे सम्पूर्ण युवा जगत इस समय ज्ञानात्मक विकास के संक्रमण काल से गुजर रहा है। दूसरी ओर पिछले चार-पाँच सालों में अर्थव्यवस्था का सूचकांक लगातार नीचे खिसका है। युवाओं के ज्ञानात्मक विकास और पिछली सरकार की रोजगार नीतियों के बीच का फासला लगातार बढ़ है। एनडीए की सरकार के गठन के बाद युवाओं के लिए भी अच्छे दिनों की शुरुआत हो। इसलिए समय रहते नई सरकार को नौकरियों के सृजन के साथ में युवाओं में कम से कम सामान्य कौशल विकास प्रशिक्षण प्रदान करने के उपायों पर भी अमल करना होगा । शायद यही वह सुगम रास्ता है जिस पर चलकर हम युवाओं में बढ़ते आक्रोश को कम करते हुए आर्थिक विकास को नई ऊँचाई दे सकते हैं।
- एसोसिऐट प्रोफेसर, समाज शास्त्र,
महाराजा हरिश्चन्द्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मुरादाबाद।





