भाषा सबको जोड़ती है पर यदि उसका अविवेकपूर्ण प्रयोग हो तो उससे न केवल द्वेष फैलता है, बल्कि उसका उपयोग करने वाले की बौद्धिक क्षमता और सर्जना-शक्ति भी कुंठित हो जाती है। आज हिन्दी भारत के अनेक क्षेत्रों में सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त है, परन्तु सहायक! राजभाषा अंग्रेजी का ओहदा अभी भी वही है जो अंग्रेजी राज में था। हिन्दी को राजभाषा बनाने का प्रश्न हाशिये पर चला गया। शायद देश के भाषा आधारित बंटवारे के पीछे यह भाव था कि सभी भाषाएं फले-फूलें। पर स्थिति ने विकृत रूप ले लिया। अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ता गया और भारतीय भाषाएं दुर्बल होती गई। कुछ भाषा वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पूरा भारत एक भाषिक क्षेत्र है। ऐसा सोचने का आधार यह अद्भुत तथ्य है कि भारोपीय परिवार की कई भारतीय भाषाएं अपने परिवार की भाषाओं से तो भिन्न हैं पर यहीं की अन्य भाषा-परिवारों की कुछ भाषाओं के निकट है। उदाहरण के लिए ‘हिन्दी’, ‘तमिल’ और ‘मुंडा’ भाषाओं की आन्तरिक समानता विलक्षण है। यह बात कहीं गहरी सामाजिक-सांस्कृतिक एकात्मकता को ही द्योतित करती है। इन भाषाओं में घ्वनि, शब्द, वाक्य तथा लिपि इन सब दृृष्टियों से समानता दिखती है। भारतीय आर्य भाषा और द्रविड़ परिवार की भाषाओं का वर्णमाला क्रम एक ही तरह का है। ऐसे ही हिन्दी की वाक्य रचना में कर्ता-कर्म-क्रिया की व्यवस्था मिलती है जो आर्य, द्रविड़ और मुंडा इन सभी भारतीय भाषाओं में दृृष्टिगत होती है।
हिन्दी का शब्द-भण्डार मुख्यतः भारतीय आर्यभाषा का शब्द भण्डार है। इनमें तद्भव और देशज दोनों ही तरह के शब्द शामिल हैं। हिन्दी का शब्द जगत अनेक भाषाओं के शब्दों से समृद्ध है। इसमें जहाँ अरबी मूल का ‘असर’, ‘किताब’ और ‘मालूम’ है तो फारसी का ‘चश्मा’, ‘औरत’ और ‘कालीन’ भी है और तुर्की का ‘चाकू’, ‘दरोगा’ और ‘चोगा’ भी है। अंग्रेजी का स्टेशन, रेल, कोट, क्लर्क आदि भी हिन्दी में सम्मिलित है। यह भी गौरतलब है कि भारतीय भाषाओं में कश्मीरी, सिंधी और उर्दू को छोड़, जो फारसी लिपि पर आधारित हैं, कुल नौ लिपियाँ प्रयोग में दिखती हैं। ये सब की सब मूलतः ब्राह्मी लिपि से उद्भूत हैं। इसका एक परिणाम यह है कि इनमें सम्मिलित वर्णों में समानता है हिन्दी, मराठी तथा संस्कृत की लिपि देवनागरी है। तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़, गुजराती, पंजाबी और बंगला की अपनी अलग-अलग लिपियाँ हैं। भाषाओं में निजता और वैयक्तिकता तो है पर इनमें समानता का भी व्यापक आधार है। अनेक क्षेत्रों और मतावलम्बी साधु-सन्तों ने हिन्दी को दिल से अपनाया। इसकी व्यापकता का विस्तार नाथ पंथ के गोरखनाथ, महाराष्ट्र के नामदेव, बाहर से आए अमीर खुसरो और रसखान, गुजरात के दयाराम, बंगाल में कुतबन जिन्होंने ‘मृगावती’ की रचना की, ने किया। ब्रजबुली में राधाकृष्ण का लीला-वर्णन, आसाम के शंकर देव, पंजाब के गुरुनानक और दक्खिनी हिन्दी की रचनाएं सब में दिखता है। आज अंग्रेजी घर कर गई है और नौकरशाही उसका धड़ल्ले से उपयोग कर रही है। अपने लिखित रूप में अंग्रेजी विशेष महत्वशाली है। हमारे अधिकांश दस्तावेजों के मूल रूप, यहाँ तक कि हमारे ‘भारतीय संविधान’ का प्रामाणिक रूप भी इसी भाषा में है। उसे ही ‘मूल’ माना गया है। पर आम जनता की बोलचाल की भाषा अंग्रेजी नहीं है इसमे कोई संदेह नहीं है। अंग्रेजी भाषा 90 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय नहीं समझते। पर गम्भीर विचार-विमर्श के लिए अंग्रेजी को ही प्रमुखता मिली हुई है। यह विडम्बना ही है कि उन अंग्रेजों को हिन्दी में दक्षता हासिल करनी होती थी जो इंग्लैण्ड से भारत में नौकरी करने आते थे पर भारतीयों को भारत में शासकीय सेवा में हिन्दी न आए, कोई बात नहीं अंग्रेजी की क्षमता जरूरी है। अंग्रेजी के पक्षकार मानते है कि अंग्रेजी आर्थिक विकास की वाहिका है और उससे भारतीय समाज का सशक्तीकरण होगा। पर कटुु सत्य यह है कि अंग्रेजी की बाध्यता का मनोभाव न केवल देश के आर्थिक विकास को क्षति पहुँचा रहा है, बल्कि गुणवत्ता वाली शिक्षा के लक्ष्य को पाने में बाधक बनकर खड़ा है।
भारत जैसे देश में जहाँ ज्यादातर लोग अंग्रेजी नहीं बोलते हैं, हर भारतीय को अंग्रेजी बोलना सिखाना या सभी को अंग्रेजी शिक्षा मुहैया करा पाना एक असम्भव सा लक्ष्य है। दूसरी ओर उपेक्षा के कारण बहुसंख्यक भारतीय जो अपनी मातृ भाषा का उपयोग करते है आधुनिक विचार और विमर्श से कटे होते है। भारतीय भाषाओं में बौद्धिक विमर्श का अभाव उनके विकास और उपयोग को कम कर देता है। उन भाषाओं में तकनीकी और स्तरीय शैक्षिक सामग्री का अभाव है। इसका परिणाम यह है कि भारतीय की गैर अंग्रेजी-भाषा भाषियों चीनी, जापानी, फ्रेंच या जर्मनी लोगोें की तुलना में ज्ञान तक पहुँच कम हो जाती है। मातृ भाषा में शिक्षा न पाने के कारण कुशिक्षितों की जनसंख्या ही बढ़ी है। शैक्षिक उपलब्धि के मामले में ऐसे बच्चे बहुत पीछे होते है। विदेशी भाषा द्वारा सीखना बच्चे के सीखने की प्रगति को धीमा कर देता है। दिमाग को अनुवाद करने में कुछ समय लगता है। ज्ञानार्जन और एक दूसरी भाषा जैसे अंग्रेजी को सीखना तभी अच्छा हो सकता है, जब बच्चे के पास एक मूल भाषा की दक्षता मौैजूद हो।
एक खराब ढ़ंग से शिक्षित समाज अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं हो सकता। लाखों लोगों को एक नई भाषा द्वारा सफेदपोश नौकरी का मनोभाव सिखाना कुण्ठा और संघर्ष को ही जन्म देगा। यह गम्भीरता से सोचने की जरूरत है कि कितने ऐसे काम है जिनके लिए अंग्रेजी का ज्ञान अनिवार्य है? थोड़े से ही काम ऐसे हैं जिनके लिए अंग्रेजी जरूरी होगी। यह भी समझना और महसूस करना जरूरी है कि आर्थिक और राजनीतिक विकास अंग्रेजी से नहीं, बल्कि स्थानीय भाषा के उपयोग के आधार पर ही हो सकेगा। ऐसा करने से वह मानसिक बाधा दूर हो सकेगी के ‘अंग्रेजी ही सफलता की कुँजी है’। हमें युवकों को ऐसे कौशल और ज्ञान से सुसज्जित करना होगा जो देश के भीतर ही सफलता दिला सकें। यह उनकी अपनी भाषा द्वारा ही सम्भव हो सकता है।
- (लेखक महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति हैं)





