Tuesday, December 29, 2015

घाघ की नीति परक कहावतें - डाॅ॰ रमेश प्रताप सिंह

पत्रिका के पिछले अँक में घाघ-भड्डरी के वर्षा सम्बन्धी कहावतों को संकलित करने का प्रयास किया था। यह अँक युवकों पर आधारित है। इस लिए कुछ कहावतें नीति सम्बन्धी देना उपयुक्त होगा। आज समाज में युवकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे समय पर यदि नीतिगत तरीके से कार्य नहीं किया गया तो भी देश का निर्माण सम्भव नहीं होगा -
खेती, पाती, बीनती, औ घोड़े की तंग।
अपने हाथ सवारियें, लाख लोग होय संग।
खेती, पत्र लेखन, प्रार्थना, घोड़े की जीन कसना, इन सब कार्यों को स्वयं करना चाहिए, चाहे जितना विश्वासी व्यक्ति आपके साथ हो, लेकिन इन कार्यों के लिए उन पर निर्भर न हो।
कहै घाघ घाघिन से रोय,
बहु संतान दरिद्री होय।
अर्थात् घाघ कहते हैं कि यदि संतान अधिक होगी तो उसका भरण-पोषण उतना ही कष्ट कर होगा। आज यदि कम संतान होगी तो समाज भी समृद्ध होगा और परिवार भी।
चाकर चोर राज बेपीर,
कहै घाघ का धारी धीर।
अर्थात् यदि नौकर चोर हो और राजा निर्दयी हो तो दोनो स्थितियों में धीरज रखना कठिन हो जाता है।
बढै़ पूत पिता के घर में,
खेती उपजै अपने कर्मे।
घाघ का मानना है कि पुत्र पिता के धर्म से फलता-फूलता है और खेती अपने कर्म से अच्छी होती है।