भारत ही नहीं, अपितु विश्व के किसी भी देश में सर्वाधिक निर्माण भी युवकों द्वारा हुआ और विध्वंस भी। युवावस्था शारीरिक बल, मेधा तथा संघटनात्मक क्षमता की दृष्टि से अपरिमित सामथ्र्य का पुंज होती है। युवा शब्द के अनेक अर्थ हैं। जिनमें से कुछ हैं-ं बाँधने वाला, मिलाने वाला, बलिष्ठ, श्रेष्ठ, सम्मिलित आदि। अर्थात् युवा अपने श्रम तथा बुद्धि से समाज को बाँधता है, जोड़ता है, बाल्यावस्था तथा वृद्धावस्था के मध्य स्थित होता हुआ सृजन के द्वारा जैविक और सांस्कृतिक परम्पराओं को मिलाता है, सदाचरण तथा युक्ताहार-विहार द्वारा शारीरिक और आत्मिक बल को अर्जित करता है। इस प्रकार श्रेष्ठता का पर्याय बन कर जब समाज में सम्मिलित होता है तब वह ‘‘सभेय’’ या सभ्य कहलाता है। श्रेष्ठ सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले भारत के ऋषियों ने एक ऐसे ही राष्ट्र की संकल्पना की थी जहाॅँ ‘सभेय’ अर्थात् सभ्य युवक हों। सभ्य का सीधा अर्थ है सभा-समाज में प्रतिष्ठा के योग्य। कहना न होगा कि बल, बुद्धि, सामथ्र्य और उच्च नैतिक, भौतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों वाले युवा ही वह प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे युवक-युवतियों को सन्तान के रूप में पाकर माता-पिता अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं क्योंकि भारतीय मनीषियों ने सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ आर्य बनाने का उद्घोष किया है।
इतिहास के पृष्ठों पर दृष्टिपात किया जाये तो भारत माता की कोख ऐसी सन्तानों से हरी-भरी रही है जिन्होंने यौवन की चैखट पर पैर रखने से पूर्व ही अपनी अपार आध्यात्मिक, शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक, चारित्रिक तथा संघटनात्मक शक्तियों से जनमानस को चमत्कृत किया था। भारतवर्ष में सांस्कृतिक एैक्य का बिगुल बजाने वाला युवक, जिसने आसेतु हिमाचल बिखरते हुये धार्मिक मूल्यों को एक सूत्र में पिरोकर अद्वैत की प्रतिष्ठा की, वे जगद्गुरु शंकराचार्य थे। अधिक पूर्व क्यों जायें, डेढ़ दो शताब्दियों पूर्व भारतवर्ष के राजनीतिक इतिहास को बदलने वाले शिवा जी, विश्व में वैदिक संस्कृति का पुनरुद्घोष करने वाले स्वामी दयानन्द, समस्त विश्व को हिन्दू दर्शन का तत्त्वार्थ समझा कर राष्ट्र को प्रतिष्ठा के शिखर पर आरूढ करने वाले स्वामी विवेकानन्द, स्वतन्त्रता के महासंग्राम में अॅँग्रेज़ों के छक्के छुड़ा देने वाले मंगल पाण्डे, बिस्मिल, भगतसिंह , आज़ाद, वीरता की प्रतिमूर्ति लक्ष्मी बाई और न जाने कितने ज्ञात अज्ञात युवकों ने भारत का इतिहास बदल दिया। किन्तु इन युवाओं के अदम्य साहस, कुछ विलक्षण करने की इच्छाशक्ति, राष्ट्र के प्रति अखण्ड श्रद्धा तथा सामाजिक परिवर्तन के दायित्वबोध के मूल में जो शिक्षा, संस्कार, चरित्र तथा सकारात्मक दृष्टिकोण था, वही उसका प्राणतत्त्व कहा जा सकता है। उपर्युक्त दृष्टान्तों में प्रत्येक के मस्तिष्क में निश्चित लक्ष्य तथा हृदय में धधकती ज्वाला थी जो उन्हें प्रतिपल प्रेरित करती थी पथ पर बढ़ने को।
दूसरी ओर आज के भारत का चित्र है जहाॅँ की युवा शक्ति बिना किसी निश्चित लक्ष्य के बिखर कर सामथ्र्यहीन सी दिख रही है। यद्यपि हमारे युवकों में न तो प्रतिभा का अभाव है और न साहस अथवा इच्छाशक्ति का, किन्तु सबसे अधिक अभाव है संस्कार तथा निर्देशन का। आज भी जनसंख्या अनुपात की दृष्टि से भारत अन्य राष्ट्रों की तुलना में अधिक युवाओं का राष्ट्र है। 2013 के आंकड़ों के अनुसार भी भारत विश्व का सबसे युवा राष्ट्र है जहाँ 18 से 35 वर्ष की आयुवर्ग के लोग युवक माने जाते हैं। यहाँ युवकों की संख्या 50 करोड़ है जो सम्पूर्ण जनसंख्या का पचास प्रतिशत है। अनुमान है कि 2020 में भारत की औसत आयु 29 वर्ष होगी जबकि चीन की 37, अमेरिका की 45 तथा जापान की औसत आयु 48 वर्ष होगी। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत युवा शक्ति की दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा तथा समृद्ध राष्ट्र है। तथापि भारत विकास के मार्ग में उस गति से नहीं चल पा रहा है जितना चाहिए।
आज भारत विसंगतियों तथा विषमताओं का राष्ट्र बन गया है जहाँ युवाओं को तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है। प्रथम वे जो आज भी शिक्षा के द्वार तक नहीं पहुँचे हैं। सर्व शिक्षा अभियान तथा साक्षरता मिशन के लिये प्रयास किये जाने पर भी युवकों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो शिक्षा के नाम पर शून्य है। या तो वे विद्यालय गये ही नहीं, और यदि गये भी तो माध्यमिक कक्षाओं तक नहीं पहुँचे। इनके लिये जीविकोपार्जन का साधन कौशलहीन श्रम होता है। दैनिक मजदूरी, कृषि, बिजली, प्लम्बर, मिस्त्री, दुग्ध उद्योग, शाकसब्जी उत्पादन आदि में लगे अधिकांश युवक केवल एक दूसरे से सीख कर ही काम करते हैं। रिक्शा चालक ट्रक, टेम्पो, वैन आदि वाहनों के चालक और इसी प्रकार के कार्यों में लगे कितने ही युवक व्यावसायिक प्रशिक्षण नहीं प्राप्त कर पाते। बचे हुये युवकों में से कितने ही निरुद्देश्य दुव्र्यसनों में समय नष्ट करते हैं।
युवकों का दूसरा वर्ग वह है जो आधुनिक विकास की महत्वाकांक्षाओं में जन्मा बचपन से ही प्रचुर धन, यश तथा प्रतिष्ठा अर्जित करने का स्वप्न पूरा करने के लिये शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में अथवा विदेशों में अपनी प्रतिभा का उपयोग कर अपने जीवन का स्वर्णकाल व्यतीत करता है। ये युवक भले ही धनार्जन की दौड़ में आगे रहते हों किन्तु माता-पिता तथा परिवार के लिये इनके पास समय नहीं होता।
तीसरा वर्ग उन शिक्षित युवकांे का है जो विभिन्न सरकारी, अर्द्धसरकारी तथा निजी क्षेत्रों में कार्यरत हैं। चतुर्थ श्रेणी से प्रथम श्रेणी तक इन युवकों पर भ्रष्टाचार का भूत चढ़ा है। लोक हित तथा राष्ट्र हित की चिन्ता किये बिना येन-केन-प्रकारेण जो जहाँ है, वहाँं न्यूनाधिक रूप से आर्थिक कदाचार में संलिप्त है। इसके अतिरिक्त एक बड़ा वर्ग बेरोजगारी के दंश से व्याकुल हो कर सामाजिक अपराधों की दिशा पकड़ता है। शिक्षित बेरोजगार व्यवस्थातन्त्र से क्षुब्ध होकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये चोरी, डकैती, लूट, ठगी आदि आर्थिक अपराधों में लगे हैं। पिछले दो दशकों में तस्करी, हत्याओं, बलात्कारों तथा अन्य प्रकार के उत्पीड़नों एवं अपराधों की संख्या जितनी बढ़ी है, उतनी इससे पूर्व नहीं थी। आश्चर्य की बात यह है कि इन अपराधों में लिप्त होने वाले अधिकांश अपराधी 18 से 30 वर्ष के नवयुवक हैं। कुछ तो 18 से भी कम आयु के हैं। यह चिन्ता और चिन्तन का विषय है कि भारत जैसेे अध्यात्म प्रधान तथा शान्तिप्रिय राष्ट्र में अचानक अपराधों की संख्या क्यों बढ़ी।
वास्तव में गत दो-तीन दशकों से हमारे देश की जीवनशैली तथा विचारधारा में जो परिवर्तन आया है वह इसका बहुत बड़ा कारण है। वैश्वीकरण की आड़ में अर्थप्रधान दृष्टिकोण वाले देशों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का प्रसार कर भारत की मूल धर्मप्र्रधान जीवनशैली में जिस प्रकार घुसपैठ की, उसने भारत की सामाजिक संरचना में उथल-पुथल मचा दी है। जीवनस्तर का पर्याय आज अर्थ, ‘‘खाओ-पियो और मौज करो’’ का जीवनदर्शन तथा पारिवारिक अलगाववाद बन गया है। आज धन और यौवन के मद में चूर युवक कल की चिन्ता नहीं करता। परिवार टूट रहे हैं। आज परिवार का अर्थ पति-पत्नी और सन्तान मात्र रह गये हैैं। माता-पिता युवकों की दृष्टि में दूसरा परिवार हैं। यही नहीं, आज युवकों में विवाह विच्छेद की प्रवृत्ति भी तीव्रता से बढ़ रही है। इसके अतिरिक्त अविवाहित एकल जीवन व्यतीत करने, विवाहित दम्पतियों में सन्तान न उत्पन्न करने, विवाह रहित दाम्पत्य में रहने, विवाहेतर यौनसम्बन्धो, समलैंगिक सम्बन्धो,ं इस प्रकार स्वच्छन्द जीवन जीने की प्रवृत्ति बढ़ रही है जो भारत जैसे सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले राष्ट्र मे घातक है। ये प्रवृत्तियाँ युवा वर्ग को न केवल परिवारों से अलग-थलग कर रही हैं अपितु युवकों की आयु को कम कर रही हैं। इस स्वच्छन्दता का कारण अनियन्त्रित महत्त्वाकांक्षा, भोग की प्रवृत्ति तथा भौतिक जीवनशैली में रुचि का विस्तार है। यदि शीघ्र ही इस ओर ध्यान न दिया गया, तो आने वाला समय राष्ट्र के सांस्कृतिक अस्तित्व के लिये संकटमय हो सकता है।
वैयक्तिक सोच ने आज के युवा वर्ग को इतना स्वार्थी बना दिया है कि वह अपने आस-पास के लोगों की समस्याओं से कोई प्रयोजन नहीं रखता। नागरिक कर्तव्यों तथा मानवीय संवेदनाओं के प्रति वह इतना उदासीन हो गया है कि छोटे-छोटे विषयों में अव्यवस्था और अन्याय का विरोध केवल अपने स्वार्थ के लिये करता है। सक्षम होते हुये भी लोक कार्यों में युवकों की भागीदारी नगण्यप्राय रहती है। यद्यपि ऐसा नहीं है कि रचनात्मक कार्य करने वाले समाज के उपकार में तन-मन धन समर्पित करने वाले तथा अपने चरित्र से माता-पिता का सिर गर्व से उन्नत करने वाले युवकों की कमी है, किन्तु 60 करोड़ की संख्या में ऐसे युवकों का प्रतिशत अधिक नहीं है। संक्षेप में कहा जाये तो आज भारत के युवकों में सर्वाधिक ह्रास नैतिक चरित्र का हुआ है। इसके दुष्परिणाम के रूप में युवकों में स्वाभिमान, स्वावलम्बन, संकल्पशीलता, रचनात्मकता, सकारात्मक दृष्टिकोण तथा कौशल में अप्रत्याशित कमी आयी है।
विचार करें, क्या इस स्थिति का दोषी वह युवक है जिसके रूप में बाल्यावस्था से ही अभिभावकों ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का भावी स्वप्न देखा। क्या इसका दोषी वह युवक है जिसे समाज सदा तुलनाओं के तराजू पर तोलता रहा। क्या इसका दोषी वह युवक है जो चारों ओर से भ्रान्ति और असमंजस के मकड़जाल में फंँसकर अपने लिये सही दिशा का चयन नहीं कर पाया।
बाहरी चकाचैंध में रम जाना मन का स्वभाव है किन्तु उसे दिशा देना बुद्धि का कार्य है। युवा यदि समाज का मन है तो माता-पिता, आचार्य और नेतृवर्ग बुद्धि। जैसे संकल्पात्मक मन अनन्त शक्तियों का पुंज तो होता है किन्तु वह बुद्धि द्वारा नियमित होकर ही शिवसंकल्प बनता है उसी प्रकार युवा वर्ग को उचित दिशा निर्देश करना समाज के उक्त ‘‘बुद्धि तत्व’’ का दायित्व है। तात्कालिक रूप से इस दृष्टि से कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक है।
आज के युवक बीते हुये कल के बालक हैं तथा आज के बालक आने वाले कल के युवक। अतः भावी युवकों के निर्माण में लगे माता-पिता, आचार्यों तथा समाज के बौद्धिक वर्ग को मिल कर येन-केन प्रकारेण यह प्रयास करना चाहिये कि बालक बालिकाओं में नैतिक तथा राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करने वाली शिक्षा की व्यवस्था की जाये। भारतीय जीवनमूल्यों को मनोवैज्ञानिक रूप से कथा-वार्ताओं, पाठ्यक्रम तथा स्वयं अपने आचरण में परिवर्तन द्वारा उनमें संक्रमित किया जाये। इस दृष्टि से एकल परिवारों के स्थान पर सम्म्लिित परिवारों की योजना पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
सबसे अधिक समस्या उन युवाओं की है जिनके ऊपर आज के समाज का दायित्व है अथवा आगामी 5 वर्षों में युवा की श्रेणी में पदार्पण करने वाले हैं। इन्हें दिशा निर्देश करना अत्यावश्यक है। इसके लिये विद्यालयों में राष्टीय चरित्र का ज्ञान कराने वाला पाठ्यक्रम सम्मिलित किया जाना चाहिये। युवक जीवनस्तर और जीवनदर्शन में सन्तुलन का सामथ्र्य विकसित कर सकें, इसके लिये उन्हें परिवार तथा समाज के विचारशील लोगों की ओर से निरन्तर विशेष कार्ययोजनाओं का सम्पादन किया जाना चाहिए।
हमारा जो युवा वर्ग किन्हीं कारणों से साक्षर नहीं हो सका है तथा परम्परागत व्यवसायों अथवा लघु तकनीकी कार्यों में लगा है, उसके लिये यद्यपि अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं, किन्तु जितने लोग इसका लाभ उठा पा रहे हैं वह अपर्याप्त है। ऐसे युवकों को कौशलप्रशिक्षण की आवश्यकता अधिक है। व्यावहारिक रूप से बढ़ई, लोहार, बिजली मेकेनिक, राजमिस्त्री, प्लम्बर आदि कार्यों में लगे युवकों में कार्य सम्बन्धी समझ और बुद्धि का अभाव नहीं होता, किन्तु यदि उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जा सके तो उनमें आशातीत कौशल विकसित किया जा सकता है। यद्यपि यह अत्यन्त कठिन है क्योंकि धनार्जन में रत युवकों को प्रशिक्षण का महत्त्व बुद्धिगत नहीं होता। किन्तु मनोवैज्ञानिक उद्बोधन तथा प्रशिक्षु वृत्ति का लाभ देकर उन्हें इसके लिये तैयार किया जा सकता है। इस प्रकार उन्हें न केवल सामूहिक रूप से सम्बन्धित कार्यों में नियुक्त किया जा सकता है अपितु भारतीय परिप्रेक्ष्य में उनके जीवनस्तर में भी सुधार सम्भव है। वर्तमान प्रधानमन्त्री के ‘‘मेक इन इण्डिया’’ के अभियान में इस रूप में बड़े स्तर पर युवा शक्ति का उपयोग किया जा सकता है।
कारपोरेट जगत् में कार्य करने वाले युवकों को नगर से महानगर तथा महानगर से विदेश पलायन की प्रवृत्ति से रोकना होगा। इसके लिये दो उपाय महत्त्वपूर्ण हैं। प्रथम, उन्हें अपनी महत्त्वाकांक्षाओं तथा सांस्कृतिक मूल्यों में सामंजस्य स्थापित करने की दिशा निर्दिष्ट की जाये तथा द्वितीय, रोजगार के अवसरों का पर्याप्त विकास किया जाये। वास्तव में रोजगार की सम्भावनायें कम नहीं हैं किन्तु उनके प्रबन्धन तथा नियोजन मे सुधार की आवश्यकता है। सबसे अधिक आवश्यक है युवकों में स्वाभिमान, स्वावलम्बन, रचनात्मक दृष्टिकोण, सत्साहस, संकल्पशीलता तथा राष्ट्रीय चरित्र का पुनरुज्जागरण। जिस दिन ये गुण 60 करोड़ में से 30 करोड़ युवाओं में भी विकसित हो जायेंगे वह दिन भारत के स्वर्णिम इतिहास रचने का दिन होगा। शक्ति का संचय और उचित प्रयोग दोनों आवश्यक हैं। आइये, हम सब मिल कर अपनी सम्पूर्ण सर्वविध युवाशक्ति का उपयोग एक चिरयुवा भारत के निर्माणहेतु करें।





