Tuesday, December 29, 2015
परोपकारी युवक की कहानी - "दुख बांटना"
दोपहर, विद्यालय के विश्राम का समय। एक दुबला-पतला सुंदर-सा युवक विद्यालय के बाहर निकलकर खाना खाने के लिए अपने घर जा रहा था। रास्ते में उसने देखा, दो लड़के आपस में झगड़ रहे हैं। उनमें एक बलवान था और दूसरा कमजोर। बलवान लड़का कमजोर लड़के को पीट रहा था। उसके हाथ में लकड़ी थी।
रास्ते चलने वाले लड़के को जोश आ गया। वह तुरंत बलवान लड़के के पास चला गया। उसके भारी शरीर को देख लड़के का साहस उसे टोकने का न हुआ। कुछ क्षण सोचकर उसने बलवान लड़के से पूछा, ‘‘क्यों भाई, तुम इसको कितने बेंत लगाना चाहते हो?’’
किसी अपरिचित लड़के को बीच में पड़ते देख बलवान लड़के का क्रोध तेज हो गया। उसने कठोर दृष्टि से देखते हुए कहा, ‘‘क्यों, तुम्हें क्या मतलब?’’
‘‘मुझे इससे मतलब है’’ राह चलते लड़के ने कहा।
‘‘तुम क्या कर लोगे?’’ बलवान लड़के ने चेतावनी दी।
‘‘भाई, मैं तुमसे अधिक बलवान तो नहीं हूँ, जो इस कमजोर को बचाने के लिए तुमसे लड़ सकूँ। लेकिन इतना जरूर चाहता हूँ कि इसकी पिटाई में मैं भी भागीदार बन जाऊँ।’’ दर्शक लड़के ने कहा।
‘‘तुम्हारा मतलब क्या है?’’ पीटने वाला लड़का इस पहेली का अर्थ न समझ सका।
‘‘तुम इस कमजोर लड़के के शरीर पर कुल जितने भी बेंत मारना चाहते हो, उसके आधे मेरे पीठ पर लगा दो। इस तरह इसका आधा कष्ट मैं बाँट लूँगा।’’ दर्शक लड़के ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा।
बलवान लड़का आश्चर्य से देखता रहा और कुछ क्षण बाद उसने चुपचाप अपने हाथ की लड़की तोड़कर फेंक दी और मन में पश्चाताप करता अपने रास्ते चला गया। पिटने वाले लड़के की मुसीबत टल गई। वह बीच का लड़का जीवन भर इसी तरह सूझ-बूझ से कार्य करता रहा तथा बड़ा होकर अँगरेजी का प्रसिद्ध कवि लार्ड बायरन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
रास्ते चलने वाले लड़के को जोश आ गया। वह तुरंत बलवान लड़के के पास चला गया। उसके भारी शरीर को देख लड़के का साहस उसे टोकने का न हुआ। कुछ क्षण सोचकर उसने बलवान लड़के से पूछा, ‘‘क्यों भाई, तुम इसको कितने बेंत लगाना चाहते हो?’’
किसी अपरिचित लड़के को बीच में पड़ते देख बलवान लड़के का क्रोध तेज हो गया। उसने कठोर दृष्टि से देखते हुए कहा, ‘‘क्यों, तुम्हें क्या मतलब?’’
‘‘मुझे इससे मतलब है’’ राह चलते लड़के ने कहा।
‘‘तुम क्या कर लोगे?’’ बलवान लड़के ने चेतावनी दी।
‘‘भाई, मैं तुमसे अधिक बलवान तो नहीं हूँ, जो इस कमजोर को बचाने के लिए तुमसे लड़ सकूँ। लेकिन इतना जरूर चाहता हूँ कि इसकी पिटाई में मैं भी भागीदार बन जाऊँ।’’ दर्शक लड़के ने कहा।
‘‘तुम्हारा मतलब क्या है?’’ पीटने वाला लड़का इस पहेली का अर्थ न समझ सका।
‘‘तुम इस कमजोर लड़के के शरीर पर कुल जितने भी बेंत मारना चाहते हो, उसके आधे मेरे पीठ पर लगा दो। इस तरह इसका आधा कष्ट मैं बाँट लूँगा।’’ दर्शक लड़के ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा।
बलवान लड़का आश्चर्य से देखता रहा और कुछ क्षण बाद उसने चुपचाप अपने हाथ की लड़की तोड़कर फेंक दी और मन में पश्चाताप करता अपने रास्ते चला गया। पिटने वाले लड़के की मुसीबत टल गई। वह बीच का लड़का जीवन भर इसी तरह सूझ-बूझ से कार्य करता रहा तथा बड़ा होकर अँगरेजी का प्रसिद्ध कवि लार्ड बायरन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
सामाजिक सेवा को समर्पित राष्ट्रीय संगठन- लोक भारती के कार्य की दिशायें - .अशोक सिंह
लोक भारती सामाजिक सहयोग से अनेक क्षेत्रों में प्रभावी कार्य कर रही है,
जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-
1. गौ आधारित खेती - सामान्यतः इस पद्धति को शून्य लागत प्राकृतिक खेती के नाम से जानते हैं। पिछले दो वर्ष से कई संस्थाओं के सहयोग से 13 स्थानों पर प्रशिक्षण वर्गों के आयोजन किए, जिनमें उŸार प्रदेश, उत्तराखण्ड, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश, बिहार सहित कई अन्य प्रान्तों के लगभग 6000 प्रयोगधर्मी किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्र्ताओं, गन्ना उद्योगों एवं कृषि विभाग के अधिकारियों ने भाग लिया।
बजाज ग्रुप (गन्ना मिल) के बाद अब उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान, शाहजहाँपुर द्वारा इस पद्धति के पांँच माॅडल केन्द्रों पर अध्ययन कार्य प्रारम्भ हुआ है, वहीं कृषि विभाग, उ॰प्र॰ से सम्बन्धित ‘आत्मा’ द्वारा प्रदेश के सभी विकास खण्ड से चयनित 1000 किसानों के प्रशिक्षण की तैयारी चल रही है। लोकभारती की मुख्य भूमिका (1) प्रशिक्षण (2) अनुवर्ती कार्य (3) समन्वय (4) माॅडल केन्द्र व (5) प्रशिक्षक तैयार करना है।
2. ‘सरिता समग्र’ अभियान - लोक भारती द्वारा 22, 23 जनवरी, 2011 को लखनऊ में माँ गंगा समग्र चिन्तन गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें एक दिशा व दृष्टि बनी कि - ‘‘गंगा मांँ को अपने पावन स्वरूप में अविरल, निर्मल बनाये रखने के लिए उससे मिलने वाली सभी नदियों पर कार्य करना होगा।’’ इस गोष्ठी में एक दर्जन नदियों, जल व पर्यावरण पर कार्य करने वाले 250 प्रतिनिधियों के साथं गंगा व अन्य नदियों सम्बन्धी योजना बनी कि- (1) विभिन्न नदियों, जल व पर्यावरण पर कार्य करने वाली संस्थाओं, व्यक्तियों एवं वैज्ञानिकों के मध्य समन्वय। (2) गंगा सम्बन्धी कार्य में सहभागिता (3) गोमती नदी पर स्वयं कार्य करना।
3. गोमती संरक्षण अभियान - सर्वप्रथम लखनऊ में गोमती तटों पर स्वच्छता कार्यक्रम, वृक्षारोपण एवं जागरुकता कार्यक्रम प्रारम्भ हुए। तत्पश्चात् 28 मार्च से 4 अपै्रल, 2011 को गोमती उद्गम माधौटाण्डा, पीलीभीत से गोमती-गंगा संगम स्थल, कैथी घाट (मारकण्डे आश्रम) वाराणसी तक 7 दिवसीय गोमती यात्रा का आयोजन, 33 स्थानों पर गोमती मित्र मण्डलों का गठन, नैमिषारण्य के चैरासी कोसी परिक्रमा पथ पर एक माह की यात्रा, 88 हजार ऋषियों की स्मृति में व्यापक वृक्षारोपण तथा 2020 तक गोमती को प्रदूषण मुक्त, सुजला करने का संकल्प महत्वपूर्ण कार्य हैं।
4. वृक्षारोपण व हरियाली पखवारा -गोमती संरक्षण अभियान के क्रम में नैमिषारण्य में सघन व व्यापक वृक्षारोपण अभियान के बाद धरती माँ के 33 प्रतिशत अपेक्षित वृक्षादन की दिशा में ‘हरियाली चादर विकास’ का कार्य प्रारम्भ हुआ। जिसके अन्र्तगत जुलाई माह के गुरुपूर्णिमा से हरियाली तीज तक 18 दिवसीय ‘हरियाली पखवारा’ में वृक्षारोपण का कार्य चल रहा है। इसमें पंचवटी, नक्षत्र वाटिका, हरिशंकरी (पीपल, बरगद, पाकड़ एक थाले में लगाना) वृक्ष धर्मशाला, वृक्ष भण्डारा एवं हरियाली चूनर आदि मुख्य कार्य हैं।
5. तीर्थ व घाट सुव्यवस्था - चन्द्रिकादेवी लखनऊ के पालीथीन मुक्त, हरियाली से युक्त तीर्थ के सफल अभियान के बाद, नैमिष तीर्थ सीतापुर, प्राकृतिक वन एवं जल स्रोत स्थल धोबिया घाट, हरदोई, वृन्दावन, मथुरा में हरित पट्टी हेतु वृक्षारोपण तथा सौलानी देवी प्राकृति जल स्रोत, लखनऊ पर सघन वृक्षारोपण महत्वपूर्ण कार्य हैं। यह कार्य अन्य तीर्थों पर भी प्रारम्भ करने की योजना है।
6. मेरा गाँव, मेरा तीर्थ - वर्ष 2011 स्वामी विवेकानन्द की सार्धशती से समग्र ग्राम विकास र्में नई दिशा के दो भाग कार्ययोजना में हैं- (1) नगरों में निवास कर रहे बन्धुओं द्वारा अपने गाँव के विकास के लिए कार्य करना। (2) नगरों में हम जहांँ निवास कर रहे हैं, उस कालोनी में ग्राम संस्कृति के विकास सम्बन्धी आयोजन, जिसका अर्थ है - परिवारिक भाव, एक दूसरे को जानना, सुख-दुख में सहभागी होना, सहयोग एवं सहकार।
7. आर्दश गाँव सहभागिता - जहाँ हमारा सम्पर्क है, सामाजिक सहकार के कार्य करना, जैसे गौ आधारित खेती, जल संरक्षण, वृक्षारोपण, विद्यालय, सहकार, व्यक्तित्व विकास, सम्मेलन एवं स्वच्छता आदि।
8. स्वच्छता अभियान, 9. युवा कौशल विकास, 10.रसोई वाटिका, 11. लोक सम्मान, 12. ई-समाचार बुलेटिन, 13.औषधीय कृषि एवं 14. पर्यावरणीय परिसर विकास आदि।
आसन, प्राणायाम एवं ध्यान - डाॅ॰ अंजलि सिंह
जीवन लीला सांस लेने की क्रिया से प्रारम्भ होकर सांस छोड़ने के बीच का खेल है। यह पढ़ते हुए जरा अपना ध्यान अपनी सांसों पर ले जाईये, क्या इससे पहले कभी आपनेे अपनी सांसों पर ध्यान दिया है? यदि दिया होगा तो आप जानते होंगे कि किसी भी कृत्य को करते समय यदि सभी ज्ञानेन्द्रियों को एकाग्र कर दिया जाये तो वही कार्य ध्यान के समान है। यदि सांस लेने के लिए, खाना खाने या सोने जितना भी प्रयास लगता तो उसे भी मनुष्य कर्म के समान समझते। अब चूँकि सांस लेने के लिए कोई प्रयास तो करना नहीं होता तो अधिकतर मनुष्य अपनी सांसों के प्रति उदासीन रहते हैं। अर्थात श्वांस के महत्व को समझते हुए ही कोई भी व्यक्ति आसन, प्राणायाम एवं ध्यान का सर्वोत्तम लाभ प्राप्त कर सकता है।
महर्षि पतंजलि ने कहा है ‘स्थिरं सुखम आसनं’ योग मुद्रा स्थापित करने में जल्दबाजी से योग का फल घटा देता है। व्यक्ति को स्थिर मन के साथ उतना ही आसन मेें जाना चाहिए जितना करने से शरीर में तनाव न पैदा हो।
योग मुद्रा में सही प्रकार से सांस लेने का महत्व: योग मुद्रा में बैठते समय, शरीर को आसन की दिशा में ले जाते समय सांस अन्दर लेते है, कुछ क्षण आसन में रहते हुए तीन-चार गहरी सांस लेते है, फिर आसन से बाहर आते हुए धीरे-धीरे सांस छोड़ते है। प्रत्येक अन्दर आती सांस तथा बाहर जाती पर अपना ध्यान रखते है, ऐसा करने से आसन के अधिक से अधिक लाभ पाए जा सकते है।
योग मुद्रा बनाते समय: योग मुद्रा बनाते समय सही और संतुलित क्रियाएँ करंे। यदि मुद्रा का आरम्भ सही होगा तभी उसका वांछित परिणाम मिल सकता है। मुद्रा बनाते समय पूर्ण जागरुकता रखें शरीर मोड़ते समय जल्दबाजी करने से नसों में खिंचाव हो सकता है।
योग मुद्रा को स्थापित रखना: पतंजलि योगसूत्र के अनुसार, योग मुद्रा बनाने का प्रयास करने के बाद, छोड़ दो व विश्राम करो। सौ प्रतिशत सही योग मुद्रा बनाने के लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए, अपितु सामथ्र्यानुसार मुद्रा बनाते-बनाते सही मुद्रा बनने लगती है। मुद्रा स्थापित करने के साथ ही सांसों के माध्यम से विश्राम करने से योग क्रिया का सर्वाधिक लाभ मिलता है।
योग मुद्रा से बाहर आना: मुद्रा बनाना जितना महत्वपूर्ण होता है मुद्रा से बाहर आना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। प्रत्येक विधि के साथ शारीरिक संतुलन व सांसों का समन्वय रखें एवं धीरे-धीरे शरीर को विश्राम में लायें। मुद्रा स्थापित करते समय जो क्रम लेना है उसी अनुसार मुद्रा से बाहर आते है। जिस प्रकार योग प्रारम्भ करने से पहले शरीर को थोड़ा गरम (वार्मअप) किया जाता है उसी प्रकार योग सम्पन्न करने के बाद शवासन में लेट जाऐं अथवा योग निद्रा करें।
योग निद्रा: योग निद्रा, योग क्रिया के उपरान्त विश्राम की क्रिया है। इस मुद्रा हेतु समतल स्थान पर शवासन में लेट कर शरीर के प्रत्येक अंग पर अपना ध्यान ले जाया जाता है। ऐसा करने से योग क्रिया का प्रभाव शरीर में पूरी तरह से समाहित हो जाता है।
योग करने के लिए ये सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है कि जब एक बार आप आरामदायक योगाभ्यास करने लगेंगे तब धीरे-धीरे योग मुद्राओं में सधार आने लगेगा।
सह-अस्तित्व विकास की सबसे बड़ी पूँजी - एन॰ रघुरामन
नाॅलेज सीरीज के व्याख्यानों के बाद जब मैं मंुबई में अपने दोस्त के घर पहुँचा तो उनका 6 वर्ष का वेटा अंशुमान अपने आयातित खिलौने के साथ खेल रहा था, जिसमें सब कुछ था - एक अच्छे भवन की अलग-अलग प्रकार की दीवारें, फर्श, छत, गार्डन के लिए कई प्रकार के पेड़, कार पार्किंग, बच्चों के खेलने का क्षेत्र, किचेन, कई प्रकार के फर्नीचर, गिलहरी, कुŸो, बिल्ली जैसे पालतू जानवर तथा और भी ऐसी बहुत सी चीजें जो समान्यतः समृद्ध परिवारों में दिखाई देती हैं। वेशक यह बहुत बुद्धिमानी से बनाया गया खिलौने का सेट था जिसमें बच्चे को अपने सपने का घर बनाने की सुविधा थी। कल्पनाशीलता से भरे हुए बच्चों के लिए इससे बढ़िया खिलौना नहीं हो सकता।
वह बच्चा जब भी कोई उस खिलौने से डिजायिन बनाता और अपने माता-पिता को दिखाता तो वह उसमें कोई न कोई कमी और कारण बताते। वे कहते, घर के पीछे कार क्यों खड़ी की, हमे आफिस जाना होगा तो कार लेने के लिए पीछे जाना पड़ेगा। माँ कहती फ्रिज खेल के मैदान के पास क्यों रखा है, मुझे रसोई के सामान के लिए बार-बार चलकर जाना पड़ेगा आदि उनके पास बताने को अनेक कारण होते, और वे उसे रिजेक्ट कर देते। बच्चा फिर उत्साह से नया डिजायिन बनाने लगता।
हाॅलाकि बच्चा डिनर पर आये मेहमान को अपने डिजायिन किए मकान से प्रभावित करना चाहता था, लेकिन माता-पिता द्वारा बार-बार डिजायिन खारिज किए जाने के कारण थोड़ा चकराया हुआ था। उसके सवालों से बचने के लिए दोनो ने कहा यदि अंकल कहेंगे डिजायिन अच्छा है तो हम भी मंजूरी दे देंगे।
वह बच्चा कोई सिविल इन्जीनियर तो था नहीं। उसकी अपनी एक समझ थी और वह उसके अनुसार उस घर में सब चीजों को रख कर देख रहा था, जो अपनी दुनियाँ और अपने मित्रों के लिए चाहता था। जब उसने मुझसे अपने घर के बारे में पूंछा तो मैने तत्काल कहा, ‘डिजायिन तो बहुत अच्छी है, पर जरा मुझे बताओ कि गुलमोहर का यह विशाल वृक्ष कार पार्किंग के बीचो-बीच में क्यों है?’ अपनी छोटी उंगली उठाते हुए उसने तपाक से जवाब दिया, ‘फिर स्नो (उसके पालतु कुत्ते का नाम) सू-सू कहा करेगा?’ जब उससे पूछा कि किचन का एक कवर्ड रेफ्रिजरेटर उसके कमरे के साथ घर के पीछे क्यो है तो उसने कहा ‘उसी में तो गिलहरी, बिल्ली और कुत्ते के लिए खाने की चीजे रखी होती हंै और मेरे लिए उन्हे देना आसान होगा।’ उसका कहना बिल्कुल वाजिब था।
डिजायिन को लेकर उसके मन में कोई भ्रम नहीं था। मैने उस बाल इन्जीनियर (मेरी नजर में वह पी॰जी॰ था) के डिजाईन को उसके दृष्टिकोण से देखना शुरू किया, क्योंकि उसका कहना एकदम तर्क संगत था। उसने एक ऐसा मकान बनाया था, जो छः वर्षीय बच्चे के दोस्तों व बिल्ली, कुत्ते व गिलहरी आदि के लिए था। वह चाहता था अपनी सहूलियत से डिजाइन। वह चाहता था कि माँ के किचन और पिता कि मर्सडीज़ कार के ऊपर उसके दोस्तों को तरजीह दी जाए।
हम सब एक ऐसी पीढ़ी के हैं, जो इस सिद्धान्त के साथ बढ़े हैं जिसमें कहा गया है कि आप की विकास के लिए जो भी चीज़ नुकसान दायक नजर आए उसे नष्ट कर दो। शिक्षा के लिए हमने बच्चों की मासूमियत को खत्म किया, सड़क बनाने के लिए पेड़ नष्ट किए और बाँध बनाने के लिए पहाड़ियाँ ध्वस्त कर दी। ये तो कुछ उदाहरण ही है।
बच्चे के रूप में ईश्वर ने हमें सह-अस्तित्व का सिद्धान्त सिखाया है। अपने बच्चों को इसी सिद्धान्त के अनुसार उन्हें उनकी दुनियाँ बनाने दो। हमने कुछ ही दशकों में जो विनाश किया है, वह उससे कहीं ज्यादा है जो पूरी नस्ल सदियों में नष्ट कर पाती है। आईये एक और चीज नष्ट करें - संघर्ष का सिद्धान्त, ताकि हमारी नई पीढ़ी सह-अस्तित्व के सिद्धान्त के साथ अपने आसपास के वातावरण से सामंजस्य के साथ जी सके।
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा भविष्य में विकास के मूलभूत 17 लक्ष्य -
इस वर्ष 25 और 26 सितम्बर, 2015 को सम्पन्न संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में भविष्य में आगामी 15 वर्षों (2030 तक) के विकास के लिए 17 लक्ष्य तय किए हैं, जो इस प्रकार हैं -
1. गरीबी का अन्त।
2. भुखमरी से पूर्ण मुक्ति।
3. एडस, टीबी, मलेरिया व छुआछूत की सभी बीमारियों से निजात।
4. समावेशी व संतुलित शिक्षा।
5. पानी व सफाई का प्रबन्ध।
6. सतत व नवीन उर्जा स्रोतों का सुनिश्चितता।
7. आथिक विकास की बढ़ोŸारी।
8. सभी के लिए रोजगार की उपलब्धता।
9. विषमता उन्मूलन।
10. पर्यावरण सुरक्षा।
11. शान्ति की स्थापना।
12. दो हजार पच्चीस तक बाल मजदूरी समाप्त करना।
13. दो हजार तीस तक सभी लड़कों और लड़कियों को गुणवत्तापूर्ण मुफत प्राथमिक व उच्च माध्यमिक शिक्षा हासिल कराना।
14. साल 2025 तक पांच वर्ष के सभी बच्चों को कुपोषण और भूख से छुटकारा दिलाना।
15. बाल विवाह की समाप्ति।
16. बच्चों के प्रति हो रहीं हिंसा की समाप्ति।
17. सतत विकास लक्ष्यों में आधुनिक दासता और दुव्यवहार के सभी प्रकारों का तत्काल उन्मूलन
करना।
अनूठा गाँव शेल्केबाड़ी, संत ने दिखाई दुनिया को राह ........गोपाल मोहन उपाध्याय
महाराष्ट्र राज्य में कर्नाटक के सीमावर्ती जिला कोल्हापुर में स्थित कनेरी मठ प्राचीन काल से देश के आध्यात्मिक क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखता है। मठ के प्रबन्धन की जिम्मेदारी पू॰ अदृश्य काणिसिद्धेश्वर महाराज के पास आई तो उन्होंने तय किया गाँव व गाँव की व्यवस्था का आधार गाय के लिए कार्य करना मठ की प्राथमिकता होगी। इस हेतु कोल्हापुर एवं महाराष्ट्र व कर्नाटक के निकटवर्ती जिलों में लम्बे समय से व्यापक अभियान चलाया जा रहा है।
इस अभियान का एक प्रमुख कार्य 72 परिवार व 400 जनसंख्या के शेल्केबाड़ी गाँव में हुआ अद्भुत परिवर्तन है। जिससे यह देश के सभी गाँवों के लिए एक अनुकरणीय माडल बना है।
इस परिवर्तन का प्रारम्भ हुआ 2005 की विरदेव यात्रा से जिसके अवसर पर प्रतिवर्ष गाँव के हर घर में औसतन 4-5 बकरों की बलि दी जाती थी। महाराज जी ने ग्रामवासियों से आह्वान किया ‘यह कैसा अध्यात्म जिसमें अपनी सुख समृद्धि की कामना कि लिए दूसरे जीव की हत्या हो।’ आह्वान का गाँव पर असर हुआ बलि प्रथा बंद हुई व गाँव पूर्ण शाकाहरी होने का संकल्प लिया।
इस संकल्प के बाद पू॰ महाराज जी व ग्रामवासियों के मन में विश्वास जगा परिवर्तन का एवं गाँव की बड़ी बैठक बुलाई गई।
- बैठक में गाँव ने सम्पूर्ण नशामुक्ति का संकल्प लिया कुछ वर्ष के प्रयास के बाद गाँव में पूर्ण नशा मुक्ति हुई गाँव में न कोई नशा करता है और न नशीली चीजें बेचता है। गुटखा तक गाँव में नहीं मिलता।
- बैठक में तय हुआ गाँव में कोई पेड़ नहीं काटेगा व पेड़ लगाकर गाँव वालों ने उन्हें गोद लिया परिणाम आज गाँव पूरा हरा-भरा है।
- गाँव का विवाद गाँव में ही निपटाने हेतु टंटा मुक्ति समिति बनी गाँव में लम्बे समय से कोई मुकदमा नहीं है।
- गाँवों के लोगों ने साप्ताहिक सामूहिक स्वच्छता कार्यक्रम प्रारम्भ किया व गाँव का डेªनेज सिस्टम (जल निकासी हेतु नाली व्यवस्था) बनाई गई व नाली में मच्छर का लार्वा खाने वाली गप्पी मछली डाली गई। परिणामतः, स्वच्छ एवं बीमारी मुक्त गाँव बना।
- गाँव के हर मकान की पुताई गुलाबी रंग से की गई व हर घर पर पहले गृहणी बाद में बाकी सब के नाम का बोर्ड लगाया। हर घर की रजिस्ट्री महिला के नाम पर की गई।
- महिलाओं के 6 स्वयं सहायता समूह बनाए गए जिनके द्वारा घरेलू चीजों का निर्माण व प्रशिक्षण गाँव में ही प्रारम्भ हुआ व कृषि कार्य भी इन्हीं समूहों द्वारा होता है बाहर से श्रमिक नहीं आते।
- गाँव के थोड़ी दूर बहने वाली नदी से सिंचाई हेतु नाला बनाया गया उससे पाइप डालकर गाँव में सामूहिक सिंचाई व्यवस्था बनाई गई।
- गाँव के सभी लोगोें ने धन एकत्रित कर खुद के पैसे से पंचायत भवन बनवाया है।
- महाराज जी ने गाँव के सभी लोगों से शौचालय व बायोगैस बनवाने का आह्वान किया तो धनाभाव आड़े आया तब बैंक आॅफ इण्डिया ने पहल की व गाँव वालों को फसल के बाद वापसी की शर्त पर ऋण उपलब्ध कराया।
आज गाँव के 80 प्रतिशत घरों में देशी गाय है व घर में औसतन 2-4 जानवर हैं सबका गोबर व मूत्र गोबर गैस में जाता है।
गाँव के हर घर में शौचालय है व शौचालय का पाइप भी गोबर गैस में जाता है।
गोबर व मानव मल, मूत्र के गोबर गैस में निस्तारण के बाद स्लरी (अवशेष) खेत में खाद के रूप में काम आता है व गैस से घर का पूरा खाना बनता है। गाँव में एल॰पी॰जी॰ के सिलेण्डर की आवश्यकता नहीं पड़ती एल॰पी॰जी॰ मुक्त गोबर गैस युक्त गाँव।
- गाँव के लोगो ने यह गोबर गैस, शौचालय व गाँव की सड़क अतिक्रमण तोड़कर खुद के श्रम से बनाई, फसल आने पर बैंक का पूरा कर्ज लौटाया, आज पूर्ण ऋण मुक्त गाँव ।
- गाँव में पूर्ण स्वच्छता रहती है हर घर में शौचालय है गप्पी मछली के कारण मच्छर पैदा नहीं होता व पेयजल की स्वच्छता का भी ध्यान रखा जाता है इसीलिए बीमारी भी काफी कम है।
कर्मयोगी के अनमोल वचन|
‘‘सपने सच हों इसलिए सपने देखना जरूरी है।’’ ऐसा उद्घोष करने वाले कर्मयोगी और भविष्य दृष्टा डा॰ अब्दुल कलाम, जिनके पैर जमीन पर लेकिन सपने आसमान से ऊँचे थे। उन्होंने भारत की सोच को ‘अग्नि की उड़ान’ दी, बच्चों और युवाओं के तेजस्वी मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा भरा। विजन 20-20 से लेकर शहरी सुविधाओं को गावों तक पहुँचाने के उनके दर्शन ने भारतीय सŸाा प्रतिष्ठान को नई दृष्टि प्रदान की। उनका एक-एक शब्द, एक-एक कथन प्रेरक है जिसके कुछ अंश यहांँ प्रस्तुत हैं, जो हमारी युवा शक्ति के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं।
- ‘‘सपने वह नहीं जो सोते हुए देखे जायें, सपने वो हैं जो सोने न दें।’’
- ‘‘अगर आप सूरज की तरह चमकना चाहते हो, तो सूरज की तरह जलना होगा।’’
- ‘‘इन्तजार करने वाले को उतना ही मिलता है, जितना कि कोशिश करने वाले छोड़ देते हैं।’’
- ‘‘आत्मविश्वास और कड़ी मेहनत, असफलता को मिटाने के सर्वोत्म माध्यम हैं।’’
- ‘‘हम हमारा भविष्य नहीं बदल सकते, अलबत्ता अपनी आदतें जरूर बदल सकते हैं और वही बदली हुई आदतें भविष्य सुधार सकती हैं।’’
- ‘‘लक्ष्य प्राप्ति के लिए एकतरफा लगन और एकाग्रता जरूरी है।’’
- ‘‘कठिनाइयाँ जीवन को बिगाड़ती नहीं, बल्कि वे मददगार होती हैं, हमारी भीतरी ताकत उजागर करने में।’’
- ‘‘जीवन और समय दोनो सर्वोत्तम शिक्षक हैं, जीवन समय की कीमत सिखाता है और समय जीवन की कीमत।’’
- ‘‘जीवन एक जटिल खेल है, इन्सान बने रहकर ही इसे जीत सकते हैं।’’
सुबह उठकर स्वयं से कहें -
ऽ मैं सर्वश्रेष्ठ हँू। ऽ मै यह कर सकता हूँ।
ऽ भगवान मेरे साथ सदा है। ऽ आज का दिन मेरा दिन है। ऽ मैं विजेता हूँ। ु
- डा॰ अब्दुल कलाम
सिर्फ अक्षर ज्ञान से नहीं सधेगा टिकाऊ विकास - अरूण तिवारी
वर्ष 2011 की जनगणना मुताबिक 74.04 प्रतिशत भारतीयों को अक्षरज्ञानी कहा जा सकता है। वर्गीकरण करें, तो 82.14 प्रतिशत पुरुष और 65.46 महिलाओं को आप इस श्रेणी में रख सकते हैं। आप कह सकते हैं कि आगे बढने और जिंदगी की रेस में टिकने के लिए अक्षर ज्ञान जरूरी है। इस संदर्भ मंे उनके इस विश्वास से शायद ही किसी को इंकार हो कि इसमें साक्षरता की भूमिका, मुख्य संचालक की हो सकती है। किंतु क्या साक्षरता का मतलब सिर्फ वर्णमाला के अक्षरों और मात्राओं को जोङ़कर शब्द तथा वाक्य रूप में पढ़ लेना मात्र है ? क्या मात्र अक्षर ज्ञान हो जाने से हम हर चीज के बारे में बुनियादी तौर पर ज्ञानी हो सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा ’साक्षरता और टिकाऊ समाज’ को इस वर्ष के अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस का मुख्य विचार बिंदु तय किया गया है। गौर कीजिए कि यह बिंदु, हमारे उत्तर का समर्थन करता है। टिकाऊ विकास के स्वास्थ्य और कृषि जैसे क्षेत्रों में सक्षमता हासिल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के विचारकों ने भी सिर्फ साक्षरता को नहीं, बल्कि सीखने का वातावरण को न्यूनतम आवश्यकता के रूप में महत्व दिया है। ’सीखने का वातावरण’ - हम भारतीयों को इसके मंतव्य पर खास ध्यान देने की जरूरत है। वे कहते हैं कि टिकाऊ समाज के निर्माण के लिए व्यापक ज्ञान, कौशल, व्यवहार और मूल्यों की आवश्कता है। यह सच है कि ये सभी आवश्यकतायें हमें टिकाऊ विकास की भी बुनियादी आवश्यकतायें हैं। इसी के मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र ने खास निवेदन किया है कि टिकाऊ विकास के भावी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हमें यह वर्ष साक्षरता और टिकाऊ विकास का जुङाव व सहयोग सुनिश्चित करने हेतु समर्पित करना चाहिए।
अक्षर ज्ञान से कितना आगे राष्ट्रीय साक्षरता मिशन?
आप संतुष्ट हो सकते हैं कि यह बात भारत के राष्ट्रीय साक्षरता मिशन द्वारा बहुत पहले समझ ली गई थी; इसीलिए साक्षरता मिशन के कार्यक्रम, आज अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं हैं; इसीलिए मिशन के संपूर्ण साक्षरता अभियान और उत्तर साक्षरता अभियान की संकल्पना की। इन अभियानों को नवसाक्षर को खासतौर पर आसपास के परिवेश और जरूरी कौशल के बारे में साक्षर और सक्षम बनाने के उद्देश्य से डिजायन किया गया है।
प्रकृति प्रेमी इस बात से संतुष्ट हो सकते हैं कि भारत सरकार के साक्षरता मिशन ने अन्य विषयों के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को विशेष उद्देश्य के रूप में चिहिन्त किया है।किंतु यह बात आप असंतुष्ट भी हो सकते हंै कि राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के कार्यक्र्रम इस दिशा में रस्म अदायगी से बहुत आगे नहीं बढ़ सके हैं। कहने को आज भारत के 424 एवम् 176 जिले क्रमशः संपूर्ण साक्षरता और उत्तर साक्षरता अभियानों की पहुंच में है। किंतु भारत मंे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण मंे सामाजिक पहल की सुस्त दर बताती है कि जरूरत रस्म अदायगी से कहीं आगे बढ़ने की है। बगैर औपचारिक-पंजीकृत संगठन बनाये ऐसी पहल के उदाहरण तो और भी कम हैं।
कितने निरक्षर हम?
दरअसल, हमें साक्षरता की आवश्यकता हवा, पानी, नमी, जंगल, पठार, पहाङ से लेकर अनगिनत जीवों और वनस्पतियों आदि सभी की बाबत् है। क्या यह सच नहीं कि अक्षर ज्ञान रखने वाले ही नहीं, उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में भी आज प्रकृति और प्राकृतिक संरक्षण के मसलों को लेकर अज्ञान अथवा भ्रम कायम हैं। नदियों को जोड़ना ठीक है या गलत ? कोई कहता है कि ’रन आॅफ रिवर डैम’ से कोई नुकसान नहीं; कोई इसे भी नदी के लिए नुकसानदेह मानता है। कोई नदी को खोदकर गहरा कर देने को नदी पुनर्जीवन का काम मानता है; कोई इसे नदी को नाला बना देने का कार्य कहता है। किसी के लिए नदी, नाला और नहर में भिन्नता भी साक्षर होने का एक विषय है। कोई गाद और रेत के फर्क और महत्व को ही नहीं समझता। कोई है, जो गाद और रेत निकासी को सब जगह अनुमति देने के पक्ष में नहीं है। कोई मानता है कि जितने ज्यादा गहरे बोर से पानी लाया जायेगा, वह उतना अच्छा होगा। किसी की समझ इससे भिन्न है।
पानी-पर्यावरण साक्षरता के विषय कई
ज्यादातर लोग आज मानते हैं कि ’आर ओ’ प्रक्रिया से प्राप्त पानी को आपूर्ति किए जा रहे पानी तथा भूजल से बेहतर हैं; जबकि कई विशेषज्ञ ’आर ओ’ प्रक्रिया से गुजरे पानी को सामान्य अशुद्धि जल से ज्यादा खतरनाक मानते हैं। वे कहते हैं कि ’आर ओ वाटर’ बाॅयलर और बैटरी के लिए मुफीद है, जीवों के पीने के लिए नहीं। उनका तर्क है कि ’आर ओ’ प्रक्रिया मंे प्रयोग होने वाली झिल्ली सिर्फ खनिजों को ही वहीं नहीं रोक लेती, बल्कि ऐसे जीवाणुओं का भी वहीं खात्मा कर देती हैं, जो हमारे भोजन को पचाने के लिए सहयोगी हैं; जिन्हे प्रकृति ने हमें असल पानी के साथ मुफ्त दिया है। लिहाजा, ’आर ओ वाटर’ इसी तरह ’मिनरल वाटर’ के नाम पर मिल रहे बोतलबंद पानी को लेकर भी मत भिन्नता है। ’आर ओ वाटर’ और ’मिनरल वाटर’ नहीं, तो शुद्ध पानी प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ विकल्प क्या ? पानी को ठंडा करने के लिए मिट्टी का मटका, रेफ्रिजरेटर से बेहतर विकल्प क्यों है ? मिट्टी का मटका पानी को शीतल ही नहीं करता, नाइट्रेट जैसी अशुद्धि से मुक्त करने का काम भी करता है। क्या यह हमारे साक्षर होने का विषय नहीं।
क्या सच नहीं कि हमें ऐसे कितने मसलों पर साक्षर होने की जरूरत है ? इन मसलों पर एक राय न होना ही जल के मामले में हमारे निरक्षर होने का पुख्ता सबूत है। तकनीकी डिग्री-डिप्लोमा प्राप्त कितने ही लोग ऐसे हैं, संचयन ढंाचे बनाने के लिए जिन्हे न विविध भूगोल के अनुकूल स्थान का चयन करना आता है और न ही ढांचे का डिजायन बनाना। यदि हमारे सरकारी ढांचें में यह निरक्षरता न होती, तो मनरेगा के ज्यादातर ढांचें बेपानी न होते। भारत की कष्षि को भूजल पर निर्भर बनाना अच्छा है या नहरी जल अथवा अन्य सतही ढांचों के जल पर ? क्या इसका उत्तर, पूरे भारत के लिए एक हो सकता है ? यदि हम अनुकूल माध्यम के बारे में साक्षर होते, तो ’स्वजल’ परियोजना के तहत् उत्तराखण्ड के ऊंचे पहाङी इलाकों में इंडिया मार्का हैण्डपम्प लगाने की बजाय, चाल-खाल बनाते।
अन्य प्राकृतिक संसाधनों को लेकर हमारी साक्षरता पर गौर कीजिए। कोई प्राकृतिक जंगल को सर्वश्रेष्ठ मानता है, तो किसी को इमारती जंगल बेहतर लगता है। किसी को गिद्ध, गौरैया, गाय, कौआ, बाघ, भालू, घङियाल, डाॅलफिन से लेकर अनेकानेक प्रजातियों की संख्या घटने से कोई फर्क नहीं पङता; अनेक हैं, जिन्हे फर्क पङता है।अभी दिल्ली के एक अस्थमा पीङित व्यक्ति नेे तीन ऐसे पौधों की खोज की, जिन्हे लगाकर हम अपने आसपास की हवा को साफ कर सकते हैं। किंतु हम में से ज्यादातर लोग यह नहीं जानते।
कहना न होगा कि पानी-हवा समेत कई ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं, जिनके दैनिक उपयोग और संरक्षण को लेकर भारतीय समाज के हर वर्ग को साक्षर होने की जरूरत है; नेता, अफसर, इंजीनियर, ठेकेदार, किसान से लेकर शिक्षक, वकील और डाॅक्टर तक। यदि हम इनके उपयोग और संरक्षण को लेकर साक्षर हो जायें, तो न मालूम अपना और अपने देश का कितने आर्थिक, प्राकृतिक और मानव संसाधनों को सेहतमंद बनाये रखने में सहायक हो जायें !
सद्ज्ञान से स्वावलंबन
हमारी दैनिक समस्याओं को लेकर आज हमारे समक्ष पेश ज्यादातर विकल्प, खरीद-बिक्री की रणनीति पर आधारित हैं। बाजार, कभी किसी ग्राहक को स्वावलंबी नहीं बनाता। अतः सच यही है कि इन विषयों की साक्षरता और स्वयं करने का कौशल ही हमें इन मामलों में स्वावलंबी बनायेंगे।अतः हमें सिर्फ पानी-पर्यावरण ही नहीं, बल्कि विकास को टिकाये और बेहतरी की दिशा में गतिमान बनाये रखने के हर पहलू के प्रति साक्षर होने के प्रयास तेज कर देने चाहिए। रास्ते और रणनीति क्या हों ? इस पर सभी को अपने-अपने स्तर पर विमर्श और ज़मीनी काम शुरु कर देने चाहिए। इस अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर इस बाबत् हम स्वयं चेतें और राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के लोक चेतना केन्द्रों को भी चेतायें।
मददगार तकनीक, साझे से समग्रता
यूनेस्को के महानिदेशक ने इस बाबत् अपने सभी सहभागी देशों से निवेदन किया है कि सम्ण्पूर्ण साक्षरता लक्ष्य हासिल करने हेतु वे मोबाइल फोन समेत उपलब्ध आधुनिक तकनीक को एक ताजा अवसर के तौर पर लें। उम्मीद है कि भारत में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, जल संसाधन, कृषि, पर्यावरण, संचार और सूचना से संबद्ध मंत्रालय इस दिशा में कुछ सोचेंगे और संयुक्त रूप से कुछ करेंगे।
- 146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली-92
माँ की चिन्ता
"एक दिन वृद्धाश्रम से सूचना आई, तुम्हारी माँ बहुत बीमार हैं, आकर एक बार देख जाओ। बेटा सूचना मिलते ही, माँ को देखने वृद्धाआश्रम पहुँच गया। माँ ने बड़े प्यार से कापते हाथों अपने बेटे का हाथ पकड़ कर अपने पोते का हाल-चाल पूछा और फिर धीरे से कहा, ‘‘बेटा यहाँ एक पंखा लगवा दो, बहुत गरमी रहती है।’’ बेटे ने कहा ‘‘माँ! अब आप तो दो-चार दिन की मेहमान हैं, इतने दिन बिना पंखे के कट गये तो यह दिन भी कट जायेंगे।’’ माँ ने कहा, ‘‘बेटा! मुझे अपनी नहीं, तुम्हारी चिन्ता है, क्योंकि पोता अब बड़ा हो रहा है।’’
संकल्प ही स्वामित्व का अधिकारी - श्रीकान्त ‘कान्त’
‘स्वयमेव मृगेन्द्रता’ के बल पर सिंह जंगल का राजा कहलाता है और अपने अजेय पौरुष एवं संकल्प के बल पर ही बाज पक्षीराज बनता है। उसके जीवन की कहानी भी अत्यन्त रोचक है।
कहते हैं, बाज की आयु 70 साल होती है लेकिन 40 साल के बाद उसकी शक्ति के महत्वपूर्ण तीन अंग अनुपयोगी होने लगते हैं।
पहला - उसकी मजबूत पकड़ वाले पंजे ढ़ीले पड़ जाते हैं जिससे उसको शिकार पकड़ना कठिन हो जाता है।
दूसरा - इस आयु तक उसकी चोंच भी मुड़ जाती है जिससे शिकार को पकडने में कठिनाई होने लगती है।
तीसरा - उसकी शक्ति का महत्वपूर्ण आधार अचानक तेज गति की उड़ान का साधन पंख इतने बोझिल हो जाते हैं, कि उड़ते समय उनका पूरा खुलना ही मुश्किल हो जाता है जिससे उसकी गति धीमी पड़ जाती है और तब तक शिकार सजग हो कर भाग जाता है। अब उसके पास जीवन जीने के तीन विकल्प बचते है।
नियतिवाद - अर्थात् यह तो प्रकृति की नियति है, प्रत्येक जीव के अंग एक आयु में शिथिल हो जाते हैं। अतः नियति जैसे, जब तक, जिस स्थिति में जीवित रखना चाहेगी तव तक जीवित रहूंँगा।
परिस्थितिवाद - अर्थात् परिस्थितियों से समझौता कर जीवन यापन करने हेतु अगर स्वभाव में परिवर्तन आवश्यक है, तो करना। पहले स्वयं के बल पर शिकार करके आहर लेना उसका स्वभाव था, अब परिस्थितियों के वशीभूत शिकार करना संभव नहीं, तो गिद्ध आदि जीवों की तरह मृत-पशुओं के आहार पर जीवन यापन स्वीकार करना।
संकल्पवाद - न नियति के भरोसे जीना, न परिस्थिति से समझौता करना, अपितु अपने को पुर्नस्थापित करने का संकल्प लेना और उसके लिए कठिन तपस्या करके लक्ष्य को प्राप्त करना।
बाज इस तीसरे विकल्प का प्राणी है। वह अपने आप को पुर्नस्थापित करने हेतु सबसे पहले किसी पहाड़ी पर एकान्त में अपना घोसला बनाता है, जहांँ वह पुर्नस्थापन की निर्विघ्न तपस्या कर सके। उसके बाद अपने पंजों को पत्थर पर तब तक मारता है, जब तक कमजोर पंजे टूट न जायें और फिर उसके बाद उनके उगने की प्रतीक्षा करता है। जब वह उग आते हैं, तब दूसरा कदम उठाता है और अपनी चोंच को पत्थरों से मार-मार कर तोड़ देता है और फिर उसके उगने की प्रतीक्षा करता है। जब चोंच पुनः उग आती है तव वह अपनी चोच से अपने बोझिल पंखों को एक-एक कर उखाडने का कार्य करता है और फिर से उनके उगने की प्रतीक्षा करता है। यह सब कष्टप्रद कार्य 150 दिन में पूरा होता है और परिणाम स्वरूप वह फिर से तेज उड़ान के लिए उपयुक्त पंख, शिकार को पकड़ने के लिए मजबूत पकड़ बाले पंजे और शिकार को फाड़ ड़ालने में सक्षम तेज, नुकीली चोंच सहित अपनी सामथ्र्य का पुनः स्वामी बन जाता है। इसीलिए तो वह पक्षीराज है और भगवान विष्णु ने भी ऐसे संकल्पवान को ही अपना वाहन बनाया।
संकल्पवान कभी पराजित नहीं होता, कभी निराश्रित नहीं होता, वह तो सदैव स्वाभिमानपूर्ण जीवन का स्वामी रहता है। ु
आप सामथ्र्यवान हैं, संकल्प चाहिए....डा॰ अब्दुल कलाम
मित्रो, मै आपको वर्ष 2011 के एक अद्भुत अनुभव को सुनाना चाहता हूँ। मैं जून 7, 2011 को मदुराई मीनाक्षी मिशन हास्पिटल की बाल अन्कोलोजी कैंसर इकाई का उदघाटन करने गया। वहाँ मैने हैदरावाद के मेरे डी. आर. डी. एल. समय के दौरान रहे ड्राइवर को देखा। उसका नाम वी. काथिरेसन था और उसमें मेरे साथ दिनरात लगभग नौ वर्षों तक कार्य किया था। उस समय मैं उसे खाली समय में कुछ महत्वपूर्ण किताबे, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ बहुत कुशलता से पढ़ते देखा करता था।
उसके इस समर्पण से प्रभावित हो, मैने उससे एक प्रश्न पूछा। फुर्सत के क्षणों में तुम किताबें क्यों पढ़ते हो? उसने उŸार दिया, उसके पुत्र और पुत्री उससे ढ़ेर सारे प्रश्न पूछते हैं और उसी चीज ने उसे अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। उसकी इस सीखने की भावना ने मुझे आर्षित किया और मैने उससे दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम के मध्यम से औपचारिक शिक्षा पाने को कहा, उसे ऐसे पाठ्यक्रम में शामिल होने हेतु समय दिया। उसे पहले 10वीं, 12वीं और फिर उच्च शिक्षा हेतु आवेदन करने को कहा। उसने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और अध्ययन में लग गया। उसने अपने संकल्प और कठिन परिश्रम के बल पर पहले इतिहास में बी.ए. और फिर एम.ए. किया। फिर राजनीति विज्ञान में एम.ए. व बी.एड. करके एम.एड. पूरा किया। इस प्रकार उसने पड़ाई करते हुए मेरे साथ 1992 तक कर्य किया।
फिर उसने मनोन्मेनियम सुन्दरनार विश्वविद्यालय में पी.एच.डी. हेतु पंजीकरण कराया और 2011 में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की। उसके वाद तामिलनाडू सरकार के शिक्षा विभाग में 10 साल तक नौकरी की और अब 2010 में वह मदुरई से निकल कर मेलूर के शासकीय कला महाविद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत है। प्रविद्धता और समर्पण ने उसके जीवन को उन्नत बनाने में मदद की, जो हर कोई पा सकता है।
पानी से बदलती कहानी - पूजा सिंह
अपना तालाब अभियान के पहल पर - ‘‘इत सूखत जल सोत सब, बूँद चली पाताल।
पानी मोले आबरू, उठो बुन्देली लाल’’
यह नारा लगाते हुए लगभग 4 हजार लोग फावड़ों और कुदालों के साथ खुद ही तालाब की सफाई के लिये कूद पड़े। लोगों ने महज दो घंटे में ही तालाब की अच्छी खासी खुदाई कर डाली। पूरे 46 दिन तक काम चला और 21 हजार लोगों ने मिलकर सैकड़ों एकड़ में फैले जय सागर तालाब को नया जीवन दे दिया। खर्च आया महज 35 हजार रुपए। सरकारी आकलन से पता चला कि लोगों ने करीब 80 लाख रुपए का काम कर डाला था। अच्छे-अच्छे काम करते जाना। राजा ने कूड़न किसान से कहा था। कूड़न अपने भाइयों के साथ रोज खेतों पर काम करने जाता दोपहर को कूड़न की बेटी आती, खाना लेकर। एक दिन घर वापस जाते समय एक नुकीले पत्थर से उसे ठोकर लग गई। मारे गुस्से के उसने दरांती से पत्थर उखाड़ने की कोशिश की। लेकिन यह क्या? उसकी दरांती तो सोने में बदल गई। पत्थर उठाकर वह भागी-भागी खेत पर आती है और एक साँस में पूरी बात बताती है। एक पल को उनकी आँखे चमक उठती हैं, बेटी के हाथ पारस पत्थर लगा है। लेकिन चमक ज्यादा देर नहीं टिक पाती। लगता है देर-सबेर कोई-न-कोई राजा को बता ही देगा। तो क्यों न खुद राजा के पास चला जाए। राजा न पारस लेता है न सोना। बस कहता है, ‘इससे अच्छे-अच्छे काम करते जाना। तालाब बनाते जाना।’
अनुपम मिश्र की पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ का यह शुरुआती हिस्सा दरअसल समाज को मिले उस पारस पत्थर की कहानी है जिसे हम तालाब कहते हैं। मध्य प्रदेश के देवास जिले के तालाब रूपी पारस पत्थर का स्पर्श इन दिनों उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के किसानों की जमीन को सोना बना रहा है।
महोबा जिला मुख्यालय से महज 12 किलोमीटर दूर चरखारी विकास खण्ड में एक गाँव है सूपा। इस गाँव के किसान जगमोहन बताते हैं कि शुरू में अपने बच्चों को शहर रोजी-रोटी के लिये जाने से रोक नहीं सकता था। इसकी वजह थी पानी की समस्या। जो खेती के लिये बड़ा संकट था। लेकिन यह मायूसी लम्बी नहीं रही। आस-पास के किसानों को खेत में तालाब बनाकर लाभ कमाते देख जगमोहन ने भी हिम्मत जुटाई और अपने खेत में तालाब तैयार किया। अब जगमोहन के परिवार में शायद किसी को अपने पुरखों की जमीन छोड़कर महानगरों की खाक छाननी पड़े। उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड इलाके का महोबा जिला क्षेत्र के किसानों के विकास की नई तस्वीर बन कर उभर रहा है। विकास के इस पौधे को पानी मिल रहा है, जल संरक्षण के देवास मॉडल से।
बुन्देलखण्ड में पानी की दिक्कत आज से नहीं है। ब्रिटिश शासकों ने बहुत पहले ही इस इलाके की आबादी को दूसरी जगह स्थानान्तरित करने का सुझाव दिया था। पर आज महोबा जिले में करीब 600 किसानों ने खुद का तालाब बना लिया है। इन तालाबों से इलाके के लोगों की उपज 8 से 10 गुना तक बढ़ी है। इससे भूजल स्तर भी बढ़ा है। यही नहीं हजार नए तालाबों के बनाए जाने की योजना भी बनी है। इन किसानों की कामयाबी ने इलाके के दूसरे किसानों को भी तालाब खुदवाने के लिये प्रेरित किया है। यह सब कुछ हुआ बारिश जल संरक्षण के देवास मॉडल से।
साल 1990 के दशक में देवास पानी की कमी से जूझ रहा था। बुन्देलखण्ड की तरह वहाँ भी लोग पानी की समस्या से परेशान थे। देवास में पानी का संकट सरकार की साल 1960 के दशक में खेती के लिये नलकूप और पम्प लगाने के कर्ज ने पैदा किया था। नतीजतन खेती और औद्योगिक गतिविधियों में भूजल का खूब दोहन हुआ। हालात यहाँ तक पहुँच गया कि जल स्तर हद से ज्यादा गिर गया। अब आलम यह हो गया कि 7 इंच के बोरवेल से बमुश्किल आधा एक इंच की जलधारा निकल पाती। औद्योगिक इकाइयाँ ठप हो गईं। खेती सूखे के चलते जवाब दे गई। जल स्तर 500-700 फीट नीचे जा चुका था। हालात बदतर हो गए कि साल 1990 में इन्दौर से ट्रेन की मदद से 50 टैंकर पानी देवास भेजा गया जिससे लोगों को पीने का पानी नसीब हो सके। साल 2006 में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी उमाकान्त उमराव की तैनाती देवास के कलेक्टर पद पर हुई। पानी की विकराल समस्या ने उनका ध्यान खींचा। उमराव कहते हैं, ‘तमाम ग्रामीण मेरे पास मुलाकात के लिये आते और उन सबके पास कहने को एक ही बात होती। पानी का कुछ कीजिए’।
उमराव ने इलाके में पानी के कमी की वजह तलाशने की कोशिश की। इसमें नलकूपों के जरिए अधिकांश भूजल का दोहन होने की बात पता चली। पर इसके बाद इलाके में पूरी मानसूनी बारिश होने के बावजूद भी भूजल रिचार्ज नहीं हो पा रहा है। उमराव ने फैसला किया कि इलाके के किसानों को पानी के लिये अपने खेतों के दसवें हिस्से में तालाब खोदने की बात सुझाई। जिससे बारिश का जल बचाया जा सके। उमराव अधिकारियों के साथ गाँव जाते और किसानों से बात करते। निपानिया गाँव के किसान पोप सिंह राजपूत को उमराव ने अपनी गारंटी पर 14 लाख रुपए का बैंक कर्ज दिलवाया। इससे राजपूत ने 10 बीघे का विशालकाय तालाब बनवाया। नतीजतन पहले सिर्फ सोयाबीन की फसल लेने वाले राजपूत अब साल में दो फसल लेने लगे। बाद में राजपूत ने बैंक का कर्ज चुका दिया और कुछ साल बाद दस बीघा खेत भी खरीद लिया।
उमाकान्त उमराव की ख्याति बहुत तेजी से फैल रही थी। मध्य प्रदेश के वाटरमैन वह बन चुके थे। इस बीच देवास के किसानों की पानी की कहानी उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के सामाजिक कार्यकर्ताओं तक पहुँची। महोबा में हालात इतने बुरे थे कि साल 2008 में एक महिला ने पीने के पानी के बदले अपनी अस्मत का सौदा करने की खबर सामने आ चुकी थी। ‘आबरू के मोल बिकने लगा पानी’ नाम से इस खबर ने लोगों को झकझोर दिया था। पानी के संकट से इलाके की बड़ी आबादी पलायन को मजबूर थी। इस खबर ने सामाजिक कार्यकर्ता पुष्पेंद्र भाई और उनके 21 युवा साथियों ने इलाके में मर चुके पुराने तालाबों को नए सिरे से जीवित करना शुरू किया। इस काम में उनकी मदद की देवास मॉडल ने।
अपना तालाब अभियान के संयोजक पुष्पेंद्र भाई की पहल पर ‘इत सूखत जल सोत सब, बूँद चली पाताल। पानी मोले आबरू, उठो बुन्देली लाल’ का नारा लगाते हुए लगभग 4 हजार लोग फावड़ों और कुदालों के साथ खुद ही तालाब की सफाई के लिये कूद पड़े। लोगों ने महज दो घंटे में ही तालाब की अच्छी खासी खुदाई कर डाली। पूरे 46 दिन तक काम चला और 21 हजार लोगों ने मिलकर सैकड़ों एकड़ में फैले जय सागर तालाब को नया जीवन दे दिया। खर्च आया महज 35 हजार रुपए। सरकारी आकलन से पता चला कि लोगों ने करीब 80 लाख रुपए का काम कर डाला था।
उत्तर प्रदेश के जल संकट ग्रस्त बुन्देलखण्ड इलाके में पानी की कमी दूर करने की नई राह नजर आई है। देवास का यह प्रयोग देश में पानी की कमी से जूझ रहे अन्य क्षेत्रों के लिये नजीर है।
साल 2013 में पुष्पेंद्र भाई इंडिया वाटर पोर्टल के सम्पादक केसर सिंह के सम्पर्क में आए। केसर ने पुष्पेंद्र को मध्य प्रदेश के देवास जिले में पानी के संरक्षण की जानकारी दी। पुष्पेंद्र भाई ने महोबा के तत्कालीन कलेक्टर अनुज कुमार झा से इस बारे में बात की। युवा कलेक्टर ने इस योजना में भरपूर रुचि दिखाई। देवास दौरे के लिये 15 अप्रैल 2013 को एक पत्र जारी किया 22 अप्रैल 2013 को एक दल देवास गया। महोबा के तत्कालीन उप कृषि निदेशक जीसी कटियार के अगुवाई में इस दल में उपसम्भागीय कृषि प्रसार अधिकारी वी.के. सचान, सहायक अभियन्ता लघु सिंचाई अखिलेश कुमार, खण्ड विकास अधिकारी पनवाड़ी दीनदयाल समेत दूसरे अधिकारी और किसान सहित स्वयंसेवी संगठन के अरविंद खरे, पंकज बागवान और पुष्पेंद्र भाई भी शामिल थे।
देवास में दल ने बदलाव की कहानी देखी। देवास में गाँव के तालाबों के क्रमबद्ध बनाए जाने और तालाब निर्माण की खुद की पहल देखकर दल की उम्मीदें जगीं। दल ने उन ग्राम पंचायतों को भी देखा जहाँ हर किसान परिवार का अपना तालाब था। इनमें से तीन ग्राम पंचायतों को जल संरक्षण और भूगर्भ जल पुनर्भरण कार्य के लिये भारत के राष्ट्रपति ने सम्मानित भी किया है। क्षेत्रीय किसानों की समृद्धि, संसाधन और फसलों को देखकर आश्चर्य हुआ। फसल की पैदावार का असर परिवार के घर, गांव सहित दूसरे क्षेत्रों में भी दिखा। भोपाल में उमाकान्त उमराव से मुलाकात के बाद यह तय था कि बदलाव की बयार अब महोबा में भी बहेगी। जल संकट दूर होगा।
महोबा वापसी के बाद तालाब खुदवाना प्रारम्भ हुआ। इस समय महोबा में निजी करीब 600 से ज्यादा तालाब हैं। करीब हजार से ज्यादा तालाबों की सूची तैयार है। जहाँ काम हो रहा है। इस बीच जिला प्रशासन ने भी राज्य सरकार को 500 तालाब बनाने का एक प्रस्ताव भेजा जिसमें बाकायदा देवास मॉडल को अपनाने का जिक्र भी था। किसी वजह राज्य सरकार इस दिशा में आगे नहीं बढ़ी तो जिलाधिकारी ने अपने स्तर पर राह निकाली। मसलन स्थानीय भूमि संरक्षण विभाग के पास मेढ़ बनाने के लिये जो पैसा आता था उसकी मदद से तालाब बनाए गए। तालाब से निकली मिट्टी से मेढ़ बना दी गई। इससे दोनों काम पूरे हो गए। अपना तालाब अभियान समिति महोबा एवं क्षेत्रीय किसानों ने महोबा के मुख्य विकास अधिकारी को प्रस्ताव भेजा कि कृषि विभाग को क्षेत्र में 24 चेकडैम बनाने की 3.60 करोड़ रुपए की राशि भी तालाब के लिये दे दी जाए। इसमें फायदे को समझाया गया कि 24 चेकडैमों के निर्माण से जहाँ लाख-सवा लाख घन मीटर वर्षाजल से करीब 150 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई की जा सकेगी। वहीं इतनी ही धन राशि से 500-600 किसानों के खेतों पर तालाब बनाकर 7 से 8 लाख घनमीटर वर्षा जल एकत्रित कर एक हजार हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि की सिंचाई हो सकती है।
अधिकारियों के सामने चरखारी विकासखण्ड के किरतपुरा- काकुन गाँव का उदाहरण दिया गया जहाँ 26 तालाबों से किसानों ने सूखे के दौरान साल में भी पिछले सालों की तुलना में पाँच गुना तक अधिक अन्न उपजाया। काकुन 80 तालाबों के साथ अब भूगर्भ जल का इस्तेमाल नहीं करने वाला गाँव बनने वाला है। इलाके के गाँवों में तालाब बनाने में जिलाधिकारी अनुज कुमार झा ने भी श्रमदान किया। इसे लेकर गाँव वालों में अनुज झा के लिये सम्मान भी है। इसका अन्दाजा दो बार से रुक रहे अनुज झा के तबादले से भी पता चलता है। फिलहाल अनुज कुमार झा कन्नौज के जिलाधिकारी हैं लेकिन देवास मॉडल को आधार बनाकर उन्होंने महोबा में जिस जल यज्ञ की शुरुआत की थी वह उम्मीदों के मुताबिक प्रगति कर रहा है।
सफलता का प्रतीक गोरवा गाँव - पानी से किस्मत बदलने का नाम है देवास जिले के टोंक खुर्द तहसील का गोरवा गाँव। करीब 1500 की आबादी वाले इस गाँव में साल 2006 तक पानी का संकट बहुत बड़ा था। उस वक्त गाँव के 1-2 सम्पन्न किसानों के पास ट्रैक्टर थे। पर गाँव के लोगों की खेती से उपज इतनी ही थी जिससे कि बमुश्किल पेट पाला जा सके। लेकिन उमाकान्त उमराव से मुलाकात ने गोरवा वालों की तकदीर बदल दी। आज गाँव के करीब हर किसान का तालाब है। तालाब भी ऐसे नहीं कि बस यूँ ही खोद लिया हो बाकायदा वैज्ञानिक मॉडल से बना हुआ। गाँव की ऊँची-नीची जमीन में खुदे तालाब ऐसे खोदे गए हैं कि एक तालाब भरने के बाद पानी खुद अगले तालाब का रुख कर ले। यह उमराव कि सिविल इंजीनियरिंग का नतीजा था। गाँव के पूर्व सरपंच राजा राम पटेल बताते हैं कि आज गोरवा गाँव में करीब 150 ट्रैक्टर हैं। यह खेती और तालाब खोदने में मदद करते हैं। आस-पास के गाँवों की भी हम तालाब खोदने में मदद करते हैं। राजाराम बताते हैं कि उमाकान्त उमराव को हर नए तालाब खोदने पर लोग याद करते हैं और वह आते भी हैं। दूसरे आईएएस अधिकारियों से उलट उमराव खुद आगे आकर खेतों में कुदाल चलाते हैं और हमारा हाल भी फोन से पूछते हैं। ऐसे में वह किसानों को प्रेरणा देते हैं। गोरवा के दो किसानों को जल संसाधन मंत्रालय की ओर से भूमि जल सम्वर्धन पुरस्कार भी मिला है।
क्या है देवास मॉडल - सामान्य तौर पर देवास मॉडल में कुछ भी खास नहीं है। तालाब किसानों ने खुद ही अपने खेतों में बनाए हैं। सवाल सीधा है हमारा भूजल बरकरार नहीं रहेगा तो फिर हमारे सामने पानी का दूसरा विकल्प क्या है? दूसरा सवाल यह भी है कि पूरी बारिश के बावजूद हमारा भूजल स्तर बरकरार क्यों नहीं रह पाता। इसके लिये गाँव में खोदे गए देवास के तालाब भूजल रिचार्ज का अहम जरिया बने। बारिश की भारी कमी वाले कुछ क्षेत्रों को छोड़ दें तो पूरे देश में वर्षाजल हमारी सिंचाई की जरूरतों को पूरा करने के लिये काफी है। हर 100 लीटर वर्षाजल में महज 10 से 15 लीटर पानी ही नदियों और बाँधों में जा पाता है। अगर हम इन 100 लीटर में से 20 से 30 लीटर पानी को नदी और भूजल तक पहुँचा सके तो यह भूजल स्तर के लिये कारगर होगा। इजराइल जैसे देश में यह स्तर प्रति 100 लीटर में 62 लीटर है। उमराव ने इसके लिये कई मॉडलों का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि पानी की खपत तीन तरीके से होती है। एक दैनिक उपयोग, दूसरा औद्योगिक और तीसरा खेतों में सिंचाई। सबसे ज्यादा करीब 90 फीसद तक पानी का सिंचाई में इस्तेमाल होता है। उमराव बताते हैं कि मुझे ऐसे वर्षाजल प्रबन्धन का मॉडल की तलाश थी जिससे किसानों की इच्छा पूरी हो सके। इसका सीधा फायदा किसानों को मिले। इससे पहले सरकारी नारे ‘जल ही जीवन है’ से अलग हट हमने इसे ‘जल बचाइए, लाभ कमाइए’ में बदला। इसकी वजह थी की फायदे की बात जल्दी समझ में आती है। नतीजा दिख रहा है। आज देवास और आस-पास के मालवा क्षेत्र में 12 हजार से ज्यादा तालाब खुद चुके हैं। प्रदेश सरकार तालाबों की सफलता को देखते हुए 2007 में बलराम तालाब योजना शुरू की। इसके तहत किसानों को 80 हजार से 1 लाख तक की आर्थिक मदद दी जाती है।
तालाब ने भर दी झोली - देवास जिले के कई इलाके में करीब 80 फीसद लोगों के खुद के तालाब हैं। इन तालाबों से न केवल पैदावार में इजाफा हुआ है बल्कि किसान मछली पालन भी कर रहे हैं। इससे इन्हें अतिरिक्त आय का जरिया भी मिला है। हिरण इन तालाबों से पानी पीते हैं। प्रवासी पक्षी यहाँ आ रहे हैं। इनके लिये किसानों ने तालाबों के बीच-बीच में टापू बना दिये हैं। जिससे इनकी संख्या बढ़ सके। तालाबों से किसानों की पैदावार भी बढ़ी है उपजाऊ मिट्टी अब बहकर तालाब में जाती है। किसान वापस इसका खाद के रूप में इस्तेमाल करते हैं। पानी की मौजूदगी से कई नगदी सब्जियों की बुआई हो रही है। किसान इन तालाबों से खुश है। उम्मीद है कि नए तालाब बनते रहेंगे।
गोमती आरती - दयानन्द जड़िया ‘अबोध’
आरती जय गोमा महरानी।
हर्षित करहु तुमहि सब प्रानी।।
आरती जय गोमा .................।।
तुमही आदि गंगा कहलाई।
चारिहु जुग तव कीरति छाई।।
सौम्य स्वच्छ सलिला सुखरासी।
आगत जन कै हरहु उदासी।।
मंजुल मंगल मोद सुदानी।
आरती जय गोमा .................।।1।।
तव गुन गान ग्रन्थ सब गावैं।
संत सुजन सुर सीस नवावै।।
मोक्षदायिनी कै पद पावा।
गोमा सुजस चर्तुदिसि छावा।।
करहु सुखी सारे जन प्रानी।
आरती जय गोमा .................।।2।।
तट पै नैमिष तीर्थ सुहावा।
आश्रम गद्दी ब्यास बनावा।।
भारी तप कर मनु सतरूपा।
पाइन्ह सुत हरि रूप अनूपा।।
बने ‘दधीच’ अस्थि तन दानी।
आरती जय गोमा .................।।3।।
सारे तट थल तीर्थ कहाये।
तुमरेइ जल महँ भरत नहाये।।
लंका जीति राम जब आये।
सादर तब धो पाप अन्हाये।।
ऋषि कौण्डल्य सुभग सरि जानी।
आरती जय गोमा .................।।4।।
लखन कूल पै नगर बसावा।
कालान्तर लखनऊ कहावा।।
मन्दिर मातु चन्द्रिका पावन।
तहॅंहि सुधन्वा ताल सुहावन।।
सुन्दर स्वास्थ्य सान्ति सुख दानी।
आरती जय गोमा .................।।5।।
गौतम-साप-ताप नसिजाये।
तट रेणुक-सिव सक्र बनाये।।
मातु! अबोध आरती गाई।
सब बिधि लेहु ताहि अपनाई।।
पढ़हिं जे आरति बनैं सुग्यानी।
आरती जय गोमा .................।।6।। ु
हर्षित करहु तुमहि सब प्रानी।।
आरती जय गोमा .................।।
तुमही आदि गंगा कहलाई।
चारिहु जुग तव कीरति छाई।।
सौम्य स्वच्छ सलिला सुखरासी।
आगत जन कै हरहु उदासी।।
मंजुल मंगल मोद सुदानी।
आरती जय गोमा .................।।1।।
तव गुन गान ग्रन्थ सब गावैं।
संत सुजन सुर सीस नवावै।।
मोक्षदायिनी कै पद पावा।
गोमा सुजस चर्तुदिसि छावा।।
करहु सुखी सारे जन प्रानी।
आरती जय गोमा .................।।2।।
तट पै नैमिष तीर्थ सुहावा।
आश्रम गद्दी ब्यास बनावा।।
भारी तप कर मनु सतरूपा।
पाइन्ह सुत हरि रूप अनूपा।।
बने ‘दधीच’ अस्थि तन दानी।
आरती जय गोमा .................।।3।।
सारे तट थल तीर्थ कहाये।
तुमरेइ जल महँ भरत नहाये।।
लंका जीति राम जब आये।
सादर तब धो पाप अन्हाये।।
ऋषि कौण्डल्य सुभग सरि जानी।
आरती जय गोमा .................।।4।।
लखन कूल पै नगर बसावा।
कालान्तर लखनऊ कहावा।।
मन्दिर मातु चन्द्रिका पावन।
तहॅंहि सुधन्वा ताल सुहावन।।
सुन्दर स्वास्थ्य सान्ति सुख दानी।
आरती जय गोमा .................।।5।।
गौतम-साप-ताप नसिजाये।
तट रेणुक-सिव सक्र बनाये।।
मातु! अबोध आरती गाई।
सब बिधि लेहु ताहि अपनाई।।
पढ़हिं जे आरति बनैं सुग्यानी।
आरती जय गोमा .................।।6।। ु
परिस्थितियों पर विजय का संकल्प - सुधाकर सिंह
गर्मियों में नीम की निवौली एकत्र करने और उन्हें बेच कर प्राइमरी की पढ़ाई करने वाले युवक को आगे बढ़ने से कोई बाधा कभी रोक न पाई। जब उन्होने स्नातक करने के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, तो रहने के लिए छात्रावास मिल गया, पर उनके पास विश्वविद्यालय की फीस, कापी किताबों के लिए कोई पैसा नहीं था। अंधेरे में भी प्रकाश की किरण खोज लेने वाले इस युवक ने एक दिन देखा कि प्रातः 5 बजे के अंधेरे में ही छात्रावास के कई कमरों में 12-13 साल का एक बालक अखबार डालता हुआ जिस तेजी से आया उसी तेजी से साइकिल पर सवार होकर दूसरे ग्राहकों के यहाँ अखबार पहुँचाने निकल गया।
इस युवक को भी रोशनी मिल गई और उसी दिन से इसने भी रेलवे स्टेशन पर अखबार बेचना प्रारम्भ कर दिया और पढ़ाई जारी रखी। स्टेशन पर इसने देखा कि उसके जैसे अन्य कई युवक भी अखबार बेचने का कार्य करते हैं। उनसे इसकी दोस्ती हो गई, तो पता चला कि वह भी पढ़ाई के लिए यह कार्य कर रहे हैं।
पढ़ाई पूरी हुई तो जीवन यापन के लिए, नौकरी की तलाश थी। कोई अच्छी नौकरी मिलती, इसकी प्रतीक्षा में जो भी छोटी नौकरी मिली उसमें काम करने लगे। समय के सदुपयोग व सेवा का स्वभाव बचपन से था। अतः नौकरी करते समय खाली समय में झुग्गी झोपड़ियों के बच्चों को पढ़ाने लगे।
कहते हैं, सेवा का फल मीठा होता है। इस युवक को भी सेवा के फल के रूप में उड़ीसा के एक केन्द्रीय विद्यालय में नौकरी मिल गई और यह वहाँ चले गये। एक दिन झुग्गी झोपड़ी के छात्रों का पत्र मिला और उसने इनके जीवन की दिशा में एक नया मोड़ ला दिया। पत्र में बच्चों ने लिखा था ‘‘गुरु जी आप हमको छोड़ कर चले गये, अब हमको कौन पढ़ायेगा।’’ भावुक पर दृढ निश्चयी इस युवक पर बच्चों के इस पत्र का गहरा प्रभाव पड़ा और इसने जीवन की पहली दहलीज पर पाई हुई केन्द्रीय विद्यालय की नौकरी छोड़ देने का निश्चय कर, लखनऊ लौट आया।
इस बीच उसके विवाह के सम्बन्ध भी आने लगे। पर इसका निश्चय था कि विवाह उस कन्या के साथ करूँगा, जो जीवन में हमारे साथ हमारे विचारों का भी साथ निभायेगी। सौभाग्य से एक सुशील योग्य कन्या से इनका विवाह हो गया, जो इस समय एक महाविद्यालय में शिक्षिका हैं और एक बेटा व बेटी की माँ के साथ परिवार की पोषक एवं इनके मिशन की प्रेरणा व साधिका भी हैं।
युवा से प्रौढ़ता की ओर बढ़ रहे जीवन में झुग्गी झोपड़ी के बच्चों की पढ़ाई के साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए भी विविध कार्य करने में संलग्न रहते हुए, पेड़ लगाना तो मानो उनका जीवन लक्ष्य बन गया है। एक लाख वृ़क्ष लगाने का संकल्प लेकर अहर्निश प्रयत्नशीलता के प्रतीक बनकर उभरे इस प्रेरणा पुरुष को साइकिल से मोटर साइकिल और अब पोधों से लदी मारूती वैन के साथ वृक्ष भण्डारा करते हुए जगह-जगह ‘प्रज्वलित दीप’ की तरह देखा जा सकता है।
एक दिन इन्हें देख कर, इनके सामने एक संभ्रान्त नागरिक ने आकर अपनी कार रोकी और चिल्लाकर बोले ‘‘मैं हूँ श्रीकान्त! तुम्हारे साथ स्टेशन पर अखबार बेचन वाला मित्र। दोनो गले मिले और उस पुराने मित्र श्रीकान्त ने बताया, अब हमारे पास अपनी कोठी है, कार है और अच्छे व्यवसाय के रूप में ‘सेटेलाइट एडवरटाइजिंग एजेन्सी’ महानगर में है। ऐसे ही संकल्पवान युवकों के अनेक उदाहरण अपने आस-पास आप को मिल जायेंगें, जिन्होने कभी किसी कार्य को हीन नहीं माना, संघर्ष से कभी घबराये नहीं, सरकारी नौकरी को ही जीवन का अन्तिम अवलम्ब नहीं माना और आज अपनी कठिन साधना के बल पर समाज में स्थान बनाये हुए हैं।
यह कहानी हमारे मित्र चन्द्रभूषण तिवारी के संकल्प की है जो अनेकों के लिए आज प्ररेणा बने हुए हैं। आज ऐसे ही संकल्पवान हजारों युवकों के प्रज्जवलित दीप मालिका की भारत को प्रतीक्षा है।
भारत को उठना होगा! - प्रस्तुति अरूण लाल
भारत को उठना होगा, शिक्षा का विस्तार करना होगा, स्वहित की बुराइयों को ऐसा धक्का देना होगा कि वह टकराती हुई अटलांटिक सागर में जा गिरे। ब्राह्मण हो या सन्यासी, किसी की भी बुराई को क्षमा नहीं मिलनी चाहिए। अत्याचारों का नामोनिशान न रहे, सभी को अन्न सुलभ हो। ये व्यवस्था धीरे-धीरे लानी होगी। अपने धर्म पर अधिक जोर देकर और समाज को स्वाधीनता देकर यह करना होगा। रामानुज ने सबको समान समझकर मुक्ति में सबका समान अधिकार घोषित किया था, वैसा ही समाज को पुनः गठित करने की कोशिश करो। उत्साह से हृदय भर लो और सब जहग फैल जाओ।
मैं चाहता हूँ कि हम में किसी प्रकार की कपटता, कोई दुरंगी चाल न रहे, कोई दुष्टता न रहे। मैं सदैव प्रभु पर निर्भर रहा हूँ, सत्य पर निर्भर रहा हूँ, जो कि दिन के प्रकाश की तरह उज्ज्वल है। मरते समय मेरी विवेक बुद्धि पर ये धब्बा न रहे कि मैने नाम या यश पाने के लिए कार्य किया। दुराचार की गन्ध या बदनियती का नाम भी न रहने पाए। किसी प्रकार का टालमटोल या छिपे तौर पर बदमाशी या गुप्त शब्द हममें न रहें। यहांँ तक हममे कोई गुरूर भी न रहे।
साहसी युवको, आगे बढ़ो! चाहे धन आए या न आए, आदमी मिलें या न मिलें, तुम्हारे पास प्रेम है। क्या तुम्हें ईश्वर पर भरोसा है? बस आगे बढ़ो, तुम्हें कोई नहीं रोक सकेगा। सतर्क रहो। जो कुछ असत्य है, उसे पास न फटकने दो। सत्य पर दृढ़ रहो तभी हम सफल होंगे। शायद थोड़ा अधिक समय लगे, पर हम सफल होंगे। इस तरह काम करते जाओं कि मानों मैं कभी था ही नहीं। इस तरह काम करो कि तुम पर ही सारा काम निर्भर है। भविष्य की सदी तुम्हारी ओर देख रही है। भारत का भविष्य तुम पर निर्भर है।
अंगे्रजी ही सफलता की कुँजी नहीं - प्रो॰ गिरीश्वर मिश्र
भाषा सबको जोड़ती है पर यदि उसका अविवेकपूर्ण प्रयोग हो तो उससे न केवल द्वेष फैलता है, बल्कि उसका उपयोग करने वाले की बौद्धिक क्षमता और सर्जना-शक्ति भी कुंठित हो जाती है। आज हिन्दी भारत के अनेक क्षेत्रों में सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त है, परन्तु सहायक! राजभाषा अंग्रेजी का ओहदा अभी भी वही है जो अंग्रेजी राज में था। हिन्दी को राजभाषा बनाने का प्रश्न हाशिये पर चला गया। शायद देश के भाषा आधारित बंटवारे के पीछे यह भाव था कि सभी भाषाएं फले-फूलें। पर स्थिति ने विकृत रूप ले लिया। अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ता गया और भारतीय भाषाएं दुर्बल होती गई। कुछ भाषा वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पूरा भारत एक भाषिक क्षेत्र है। ऐसा सोचने का आधार यह अद्भुत तथ्य है कि भारोपीय परिवार की कई भारतीय भाषाएं अपने परिवार की भाषाओं से तो भिन्न हैं पर यहीं की अन्य भाषा-परिवारों की कुछ भाषाओं के निकट है। उदाहरण के लिए ‘हिन्दी’, ‘तमिल’ और ‘मुंडा’ भाषाओं की आन्तरिक समानता विलक्षण है। यह बात कहीं गहरी सामाजिक-सांस्कृतिक एकात्मकता को ही द्योतित करती है। इन भाषाओं में घ्वनि, शब्द, वाक्य तथा लिपि इन सब दृृष्टियों से समानता दिखती है। भारतीय आर्य भाषा और द्रविड़ परिवार की भाषाओं का वर्णमाला क्रम एक ही तरह का है। ऐसे ही हिन्दी की वाक्य रचना में कर्ता-कर्म-क्रिया की व्यवस्था मिलती है जो आर्य, द्रविड़ और मुंडा इन सभी भारतीय भाषाओं में दृृष्टिगत होती है।
हिन्दी का शब्द-भण्डार मुख्यतः भारतीय आर्यभाषा का शब्द भण्डार है। इनमें तद्भव और देशज दोनों ही तरह के शब्द शामिल हैं। हिन्दी का शब्द जगत अनेक भाषाओं के शब्दों से समृद्ध है। इसमें जहाँ अरबी मूल का ‘असर’, ‘किताब’ और ‘मालूम’ है तो फारसी का ‘चश्मा’, ‘औरत’ और ‘कालीन’ भी है और तुर्की का ‘चाकू’, ‘दरोगा’ और ‘चोगा’ भी है। अंग्रेजी का स्टेशन, रेल, कोट, क्लर्क आदि भी हिन्दी में सम्मिलित है। यह भी गौरतलब है कि भारतीय भाषाओं में कश्मीरी, सिंधी और उर्दू को छोड़, जो फारसी लिपि पर आधारित हैं, कुल नौ लिपियाँ प्रयोग में दिखती हैं। ये सब की सब मूलतः ब्राह्मी लिपि से उद्भूत हैं। इसका एक परिणाम यह है कि इनमें सम्मिलित वर्णों में समानता है हिन्दी, मराठी तथा संस्कृत की लिपि देवनागरी है। तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़, गुजराती, पंजाबी और बंगला की अपनी अलग-अलग लिपियाँ हैं। भाषाओं में निजता और वैयक्तिकता तो है पर इनमें समानता का भी व्यापक आधार है। अनेक क्षेत्रों और मतावलम्बी साधु-सन्तों ने हिन्दी को दिल से अपनाया। इसकी व्यापकता का विस्तार नाथ पंथ के गोरखनाथ, महाराष्ट्र के नामदेव, बाहर से आए अमीर खुसरो और रसखान, गुजरात के दयाराम, बंगाल में कुतबन जिन्होंने ‘मृगावती’ की रचना की, ने किया। ब्रजबुली में राधाकृष्ण का लीला-वर्णन, आसाम के शंकर देव, पंजाब के गुरुनानक और दक्खिनी हिन्दी की रचनाएं सब में दिखता है। आज अंग्रेजी घर कर गई है और नौकरशाही उसका धड़ल्ले से उपयोग कर रही है। अपने लिखित रूप में अंग्रेजी विशेष महत्वशाली है। हमारे अधिकांश दस्तावेजों के मूल रूप, यहाँ तक कि हमारे ‘भारतीय संविधान’ का प्रामाणिक रूप भी इसी भाषा में है। उसे ही ‘मूल’ माना गया है। पर आम जनता की बोलचाल की भाषा अंग्रेजी नहीं है इसमे कोई संदेह नहीं है। अंग्रेजी भाषा 90 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय नहीं समझते। पर गम्भीर विचार-विमर्श के लिए अंग्रेजी को ही प्रमुखता मिली हुई है। यह विडम्बना ही है कि उन अंग्रेजों को हिन्दी में दक्षता हासिल करनी होती थी जो इंग्लैण्ड से भारत में नौकरी करने आते थे पर भारतीयों को भारत में शासकीय सेवा में हिन्दी न आए, कोई बात नहीं अंग्रेजी की क्षमता जरूरी है। अंग्रेजी के पक्षकार मानते है कि अंग्रेजी आर्थिक विकास की वाहिका है और उससे भारतीय समाज का सशक्तीकरण होगा। पर कटुु सत्य यह है कि अंग्रेजी की बाध्यता का मनोभाव न केवल देश के आर्थिक विकास को क्षति पहुँचा रहा है, बल्कि गुणवत्ता वाली शिक्षा के लक्ष्य को पाने में बाधक बनकर खड़ा है।
भारत जैसे देश में जहाँ ज्यादातर लोग अंग्रेजी नहीं बोलते हैं, हर भारतीय को अंग्रेजी बोलना सिखाना या सभी को अंग्रेजी शिक्षा मुहैया करा पाना एक असम्भव सा लक्ष्य है। दूसरी ओर उपेक्षा के कारण बहुसंख्यक भारतीय जो अपनी मातृ भाषा का उपयोग करते है आधुनिक विचार और विमर्श से कटे होते है। भारतीय भाषाओं में बौद्धिक विमर्श का अभाव उनके विकास और उपयोग को कम कर देता है। उन भाषाओं में तकनीकी और स्तरीय शैक्षिक सामग्री का अभाव है। इसका परिणाम यह है कि भारतीय की गैर अंग्रेजी-भाषा भाषियों चीनी, जापानी, फ्रेंच या जर्मनी लोगोें की तुलना में ज्ञान तक पहुँच कम हो जाती है। मातृ भाषा में शिक्षा न पाने के कारण कुशिक्षितों की जनसंख्या ही बढ़ी है। शैक्षिक उपलब्धि के मामले में ऐसे बच्चे बहुत पीछे होते है। विदेशी भाषा द्वारा सीखना बच्चे के सीखने की प्रगति को धीमा कर देता है। दिमाग को अनुवाद करने में कुछ समय लगता है। ज्ञानार्जन और एक दूसरी भाषा जैसे अंग्रेजी को सीखना तभी अच्छा हो सकता है, जब बच्चे के पास एक मूल भाषा की दक्षता मौैजूद हो।
एक खराब ढ़ंग से शिक्षित समाज अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं हो सकता। लाखों लोगों को एक नई भाषा द्वारा सफेदपोश नौकरी का मनोभाव सिखाना कुण्ठा और संघर्ष को ही जन्म देगा। यह गम्भीरता से सोचने की जरूरत है कि कितने ऐसे काम है जिनके लिए अंग्रेजी का ज्ञान अनिवार्य है? थोड़े से ही काम ऐसे हैं जिनके लिए अंग्रेजी जरूरी होगी। यह भी समझना और महसूस करना जरूरी है कि आर्थिक और राजनीतिक विकास अंग्रेजी से नहीं, बल्कि स्थानीय भाषा के उपयोग के आधार पर ही हो सकेगा। ऐसा करने से वह मानसिक बाधा दूर हो सकेगी के ‘अंग्रेजी ही सफलता की कुँजी है’। हमें युवकों को ऐसे कौशल और ज्ञान से सुसज्जित करना होगा जो देश के भीतर ही सफलता दिला सकें। यह उनकी अपनी भाषा द्वारा ही सम्भव हो सकता है।
- (लेखक महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति हैं)
विश्व में भारतीय युवाओं का बढ़ता प्रभाव - डा॰ ओम प्रकाश
भारतीय नौ जवानो में प्रतिभा, उद्यमिता और कौशल की कमी नहीं है। चाहें प्रतिष्ठित उद्योगों को चलाना हो या नए उद्यम शुरू करने हों, भारतीय हर जगह अब्बल हैं। भारतीयों ने सिलिकान वैली में तो असीम उँचाइयां हासिल की हैं, उनमें से गूगल के नए सीईओ बने सुन्दर पिच्चई, गूगल के ही सीनियर वाइस प्रेसीडेन्ट रूड़की के पूर्व छात्र अमिति सिंघल, माक्रोसाफट के सीईओ सत्या नडेला सहित तमाम भारतीय नाम शिखर पर है। ऐसे तमाम भारतीयों पर गर्व किया जा सकता है। यद्यपि सिलिकान वैली में भारतीय प्रवासी या भारतीय मूल की भागीदारी केवल 6 प्रतिशत है, लेकिन नए उद्यमों के प्रारम्भ में भारतीय 15 प्रतिशत हैं। अमेरिका में प्रवासियों द्वारा प्रारम्भ किए गये उद्यमों में से 32.4 प्रतिशत भारतीयों के हैं।
यहीं पर यह भी विचारणीय है, कि जब भारतीय युवा विदेशों के उद्यमों में शिखर पर पहुँच सकते हैं, तो भारत में क्यों नहीं? इसका उत्तर हमें खोजना होगा। हमारे देश के पिच्चई और नड़ेला जैसे नौ जवान यह सिद्ध करते हैं कि यदि हम अपने देश में उनके विकास की राह के रोड़े हटा सकें तो, हम दुनियाँ में अब्बल हो सकते हैं।
इसके साथ ही हमारे देश में युवाओं की अपार शक्ति है, पर वह खाली हाथ निराशा से जूझ रहे हैं। हमें इस ओर भी ध्यान देना होगा और युवाओं के विकास के अनुकूल व्यवस्था निर्माण के साथ ही उनमें कौशल विकास के लिए उनके मानस को भी बदलना होगा।
एक युवा प्रमोटर का कहना है कि बहुत से लोग कौशल विकास के लिए औपचारिक शिक्षा को ही साधन मानते हैं, पर इसका एक तरीका अवैतनिक कार्य भी है। एक आई॰टी॰ प्रोफेशनल का रूझान प्रबन्धन की ओर देख कर मैने उन्हें चैरिअी कमेटी से जुड़ने की सलाह दी, ताकि उनके स्ट्रैटजिक और आपरेशनल मैनेजमेन्ट का दायरा बढ़ सके। बाद में उनका यही अनुभव उन्हें टेंकनिकल से मैनेजमेन्ट कैरियर में ले जाने में सहायक सिद्ध हुआ।
कितने ही ऐसे युवाओं से आपका मिलना होता होगा, जो अफसोस जाहिर करते मिलेंगे कि पढ़ाई के दौरान ही मैने यह क्यों नहीं सोचा या यह विषय क्यों नहीं लिया। ऐसा उसी बक्त कर लिया होता तो अपना कैरियर आज मनमुताविक डिजाइन कर पाता?
अतः जो युवा अभी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, उनको सोचने का नहीं, करने का अवसर है। इसके लिए आवश्यक है कि औपचारिक पढ़ाई के साथ अपने आप में कोई न कोई स्किल अवश्य जोड़ें।
इसके अतिरिक्त एक सफल युवक के लिए लोगों से व्यवहार, कठिन परिस्थितियों से निकलने की कला, सकारात्मक सोच, नेतृत्व क्षमता, लक्ष्य के प्रति समर्पण, कम्युनिकेशन स्किल, पर्सनालिटी लुक, भाषा पर अच्छी पकड़, आत्मविश्वास आदि गुणों का अपने आप में विकसित करना भी आवश्यक है।
इसके साथ ही अनेक बार आपको अपनी औपचारिक शिक्षा के विपरीत भी कार्य करना या चुनना पड़ता है। वहाँ पर आपकी कार्यकुशलाता व धैर्य की परीक्षा होती है। आपने ‘‘बेलकम टू सुजानपुर’’ फिल्म देखी होगी? इस फिल्म के नायक को जब अपने मनमुताविक काम नहीं मिलता, तो वह गांव के लोगों की चिट्ठियाँ लिखने लगता है, लेकिन अपने आप को यहीं तक सीमित नहीं रखता। वह गांव में हो रहे सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक हर तरह के बदलाव पर नजर रखता है और बदले बक्त तथा हालात के हिसाब से खुद को अपडेट कर अपनी काबिलियात निखारता जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि वह पत्र लेखक से प्रसिद्ध साहित्यिक लेखक बन जाता है।
आप में कुशलता समय, स्थान और परिस्थिति के अनुकूल चयन की विकसित होनी चाहिए, जब आप कभी भी यह कहने की स्थिति में होंगे, मेरे पास कोई काम नहीं है और अनेक युवाओं के लिए प्रेरणा के दीपक बन सकेंगे, जिसकी आज नितान्त आवश्यकता है।
सुभाष चन्द्र बोस का बहुआयामी व्यक्तित्च - संकलित
नेता जी सुभास चन्द्र बोस स्वामी विवेकानन्द को अपना आदर्श और प्रेरणास्रोत मानते थे। युवाओ के प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेकानन्द जिनके जन्मदिन (12 जनवरी) को सम्पूर्ण देश ‘राष्ट्रीय युवा दिवस‘ के रूप मे मनाता है। स्वामी जी का जीवन और चरित्र आज भी युवाओं का मार्ग दर्शन करता है। स्वामी जी का शक्तिशाली एवं प्रेरणा दाई विचार सुप्त एव शिथिल मानव मस्तिष्क मे भी ज्वलंत ऊर्जा के संचार से ओत-प्रोत कराता है। असहाय एव आत्मविश्वास विहीन मन को भी स्वामी जी के विचारों से शक्ति का प्रवाह होता है और व्यक्ति अपने स्वरूप तथा असीमित क्षमता से अपने लक्ष्य की तरफ अग्रसर होता है। नेता जी ने लिखा है की जब मैं 15 साल की अवस्था में था तो विवेकानन्द जी के साहित्य और विचारों से परिचित हुआ। स्वतन्त्रता संग्राम के समय जब में हताश एवं निराश होता था तब स्वामी जी का फोटो अपने सामने रखता था उसको एकटक देखता था और मुझमें एक नवीन ऊर्जा का संचार होता फिर में दूने उत्साह के साथ अपनी लड़ाई जारी रखता।
स्वामी विवेकानन्द ने सत्य ही कहा था, ’स्वाधीनता आत्मा का संगीत है’। इससे प्रतीत होता है कि स्वामी जी के विचारों का प्रभाव नेता जी के मन मस्तिष्क पर था। नेता जी को तो स्वामी जी के इस विचार ने कि ‘मानव सेवा ही माधव सेवा है’ के आह्वान पर अपने गृह नगर कटक मे बाढ़ पीड़ितो के लिए 18 वर्ष कि आयु में मित्रों के साथ सेवा कार्य किया। स्वामी जी की उद्घोषणा थी की ‘मैं उस प्रभु का सेवक हूँ जिसको मूर्ख लोग मनुष्य कहते हैं। यह सेवा एवं समरसता का मूल मंत्र है। यदि इस भाव और समर्पण से व्यक्ति समाज मैं कार्य करे तो आपसी वैमनष्यता एवं कटुता के साथ गरीबी, अशिक्षा, कुसंस्कर जैसी समस्याओ से भी समाज को मुक्ति मिल जाएगी। स्वामी जी के इन सिद्धांतों को मानते हुये नेता जी का झुकाव सेवा कार्य की तरफ हुआ। 3 मई, 1928 को पूना के अपने व्याख्यान मैं नेता जी ने कहा कि ‘स्वतन्त्रता मेरे लिए एक अंतिम लक्ष्य है, एक असीम सम्पदा है। मनुष्य की आत्मा के लिए स्वाधीनता अपरिहार्य है।’ नेता जी अपने भाषणों मे युवाओं को हमेशा स्वामी जी का साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। स्वामी जी के त्याग एवं चरित्र निर्माण के सन्देश को जीवन मे धारण करने के लिए कहते थे। नेता जी का मानना था कि स्वामी जी की शिक्षाओं को आत्मसात् किया जाय तो देशवासी अभूतपूर्व आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और आत्मप्रतिष्ठा का बोध कर सकेंगे। 6 मई, 1932 को मराठा पत्र के श्री ए॰आर॰ भट्ट को लिखे पत्र में नेता जी ने लिखा है कि ‘स्वामी जी के बारे मैं लिखते हुए मैं आत्मविभोर हुए बिना नहीं रह पाता। इस जगत में उनके जैसा व्यक्तित्व दुर्लभ है’। स्वामी जी की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने अपनी पुस्तक ‘मेरे गुरुदेव जैसा मैंने देखा’ में लिखा है कि ‘उनकी आराधना की देवी उनकी मातृभूमि थी’। नेता जी ने भी अपना सम्पूर्ण जीवन ही मातृभूमि के लिए न्योछावर कर दिया। आज भी हमारे देश के लक्षावधि युवा इन दोनों महापुरुषों से प्रेरणा लेते हंै, जो आज की आवश्यकता है।
प्राकृतिक सम्पदाओं में अपार संभावनाएँ? - संकलित
कहते हैं! दृष्टि से सृष्टि होती है, यह सच है। एक दृष्टिवान व्यक्ति आपदाओं को भी संपदा में बदल सकता है और दृष्टि हीनता से संपदायें भी अभिशाप बनी रहती हैं।
राजस्थान प्रदेश प्राकृतिक दृष्टि से अभी तक अभिशप्त सा लगता था। यहाँ सैकड़ों किलो मीटर क्षेत्र में फैली रेत, जहाँ न जल और न वनस्पतियाँ, केवल रेगिस्तान। परन्तु अब वहाँ उपलब्ध प्राकृतिक संपदा और उसकी क्षमताओं को समझना प्रारम्भ हुआ है, जिसमें - सूरज की कहर बरसाती 50 डिग्री से ऊपर तेज धूप, तेज चलती हवायें और मिट्टी में छिपे तेल के भण्डारों एवं उसके महत्व पर अब हमारे विशेषज्ञों की दृष्टि गई है जिसके वह अभिशप्त क्षेत्र भारत के भविष्य के लिए वरदान बनने जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार राजस्थान के पश्चिमी जिले अब सौर ऊर्जा के बड़े स्रोत के रूप में अपना स्थान बनाने बाले हैं, उनमें से जोधपुर जिले में ही अकेले 8.538.84 मेगावट तक के विजली उत्पादन लिए चिन्हित किया गया है। एक अनुमान के अनुसार अगले पाँच वर्षों में देश में कुल विजली की खपत की 10 प्रतिशत की पूर्ति इन्हीं क्षेत्रों से हो सकेगी।
प्र्रदेश में तेज हवाओं के उपयोग के लिए 14.390 मेगावट के विन्ड प्रोजेक्ट रजिस्टर्ड हुए है जिनमें से अकेले जैसलमेर में 10 हजार मेगावाट विद्युत उत्पादन की संभावना है।
यहाँ के भूगर्भ में बहुत दिनों से तेल तलासने के लिए चल रही खोज के क्रम में केयर्न ने 38 कुएँ स्थापित किए, जिनमें 10 अरब वैरल तेल भण्डार हैं, जिसके 3 कुओं से ही 30 करोड़ वैरल तेल निकाला जा चुका है जबकि अभी केवल 30 प्रतिशत ही खोज हो सकी है। वहीं जालौर के सांचैर वेल्ट में 1 से 3 अरब घन फीट गैस के भण्डारों का पता चला है।
इसी प्रकार देश के पास युवाओं की अपरिमित शक्ति है, आवश्यकता है, उनके सदुपयोगपूर्ण दृष्टि की।
गोमती की पुकार - सतीश कुमार
शिव ने आशीर्वाद दिया,
माँ जैसा तुम व्यवहार करो।
हो सदानीर तन से पोषित,
शिव पुत्री हो उपकार करो।
ऋषि वशिष्ठ ने पुत्री माना,
कौडिल्य ने तट वास किया।
सई, सरायन, सुखैती, छोहा,
सखियों ने जलदान दिया।
गंगा मेरी बड़ी बहन है,
और अवध की मैं माता।
पालन का दायित्व उठाती,
जन, जीवन से है नाता।
लेकिन मेरे तट के वासी,
तू है कैसा प्यार निभाता।
चाहे, अनचाहे कार्यों से,
जल को दूषित कर जाता।
सब को जीवन दान दे रही,
पल-पल प्रदूषण बढ़ता जाता।
मैं हूँ तेरी माँ गोमती,
आँचल जल घटता जाता।
- जे-102, एल्डिको पार्क ब्यु, सीतापुर रोड, लखनऊ।
पर्यावरण संरक्षण में युवकों की भूमिका - डाॅ॰ महेन्द्र प्रताप सिंह
किसी भी समाज का भविष्य उस समाज की युवाशक्ति पर आश्रित होता है। जब युवा शक्ति जागृत होती है तभी समाज विकास के पथ पर अग्रसित होता है। विश्व के बड़े से बड़े आन्दोलन युवा श्क्ति की सहभागिता से ही सफल हो सके। हमारे देश का स्वतन्त्रता आन्दोलन भी तभी गति पकड़ सका जब अनेक युवाओं ने अपनी जान की परवाह न करते हुये अपने प्राणों की आहुति दी।
पर्यावरण प्रदूषण आज की सबसे बड़ी समस्या है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, पालीथीन प्रदूषण, रेडियोएक्टिव प्रदूूषण, ओजोन परत में छेद, ग्लोबल वार्मिंग एवं अन्य अनेक स्वरूप में पर्यावरण प्रदूूषण लगातार भयानक रूप लेता जा रहा है। स्थिति करो या मरो की है। विकराल प्रदूूषण के कारण पूरे विश्व का अस्तित्व संकट मय है। ऐसी स्थिति में युवा वर्ग को आगे आना ही होगा। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है।
पर्यावरण प्रदूषण की समस्या इतनी विकराल है कि इसके निदान हेतु हर स्तर से प्रयास किये जाने की आवश्यकता है। प्रयास किये भी जा रहे हैं किन्तु समस्या की विकरालता को देखते हुये वे अपर्याप्त हैं। यहाॅं पर हम केवल उन प्रयासों का उल्लेख करेंगे जो युवा वर्ग द्वारा आसानी से किये जा सकते हैं, केवल संकल्पबद्ध होने की आवश्यकता है -
1. पालीथीन का प्रयोग रोकना: पालीथीन का प्रयोग आज बहुत व्यापक रूप से बढ़ गया है। यह एक स्थायी कूड़ा है जो लगभग हजार साल बाद समाप्त होता है। पालीथीन का प्रयोग कर हम धरती पर स्थायी कूड़ा घर बनाते जा रहे हैं। आज हम सब्जी लेने जाते हैं तो हर सब्जी यहाॅं तक कि धनिया, मिर्चा भी अलग पालीथीन में लेते है। इससे बचना होगा। जहाॅं बहुत आवश्यक न हो, वहाॅं किसी भी दशा में पालीथीन का प्रयोग नही करना चाहिये।
यदि युवा वर्ग पालीथीन का प्रयोग कम करने हेतु संकल्पबद्ध हो जाय तो पालीथीन प्रदूूषण को सीमित किया जा सकता है। इसके लिये किसी अतिरिक्त श्रम या संसाधन की आवश्यकता नहीं है, केवल आदत बनानी होगी। यदि युवावर्ग इसके लिये संकल्पित हो जाय जो पालीथीन प्रदूषण रोकने की दिशा में प्रभावी सफलता मिलेगी।
उक्त के अतिरिक्त शादी आदि के अवसरों पर पालीथीन का प्रयोग न करने से पालीथीन प्रदूूषण में कमी आ सकती है।
2. वाहन का सीमित प्रयोग: वायु प्रदूूषण आज की एक विकराल समस्या है। अधिकाधिक संख्या में बढ़ रहे वाहन इसका प्रमुख कारण हैं। इस पर विचार करना होगा कि हम इसे कैसे कर सकते हैं। जहाॅं अत्यन्त आवश्यक हो, वहाॅं वाहन का प्रयोग होना चाहिये। किन्तु छोटी दूरी पैदल या साइकिल से तय की जा सकती है। यह स्वास्थ्य के लिये तो लाभकारी है ही, वायु प्रदूूषण कम करने मे भी सहायक है।
3. जल प्रदूूषण नियन्त्रण: धरती का जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई स्थानों पर धीरे- धीरे टैंकर से जलापूर्ति की स्थिति आ रही है। कुछ विषेशज्ञों का मानना है कि धरती पर अगला विश्वयुद्ध पानी के लिये होगा। जाने अनजाने हम पानी का दुरुपयोग करते है। अतः व्यक्तिगत स्तर पर पानी का दुरुपयोग रोका जाना आश्यक है।
इसके अतिरिक्त हम अनेक रूपों में जल प्रदूषण बढ़ाने में सहभागी बन रहे हैं। उदाहरणार्थ नदियों में मूर्ति विसर्जन। अधिकतर नवरात्रि एवं अन्य पर्वों के उपरान्त मूर्ति विसर्जन नदियों में किया जाता है। इस कार्य में अधिकांशतः युवावर्ग ही सम्मिलित होता है। इसे रोककर धरती में गाड़कर या अन्य वैकल्पिक व्यवस्था द्वारा नदियों के प्रदूषण में कमी लायी जा सकती है।
4. मृदा प्रदूषण रोकना: आज कृषि योग्य भूमि उर्वरकों एवं कीटनाशक दवावों के अत्यधिक प्रयोग से लगातार भूमि उसरीली होती जा रही है। जो युवा कृषि कार्य में लगे हैं, वे जैविक खाद का प्रयोग कर प्राकृतिक खेती कर मृदा प्रदूषण रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
उक्त के अतिरिक्त गोबर गैस का प्रयोग कर ईंधन की बचत की जा सकती है तथा उसकी खाद का उपयोग कर उत्पादन बढ़ाने के साथ रासायनिक खाद के प्रयोग में कमी की जा सकती है।
5. ध्वनि प्रदूषण रोकना: धार्मिक एवं अन्य आयोजनों में अधिकांशतः उच्च स्वर वाले माइक लगााए जाते हैं। युवावर्ग इसे रोकने में प्रभावी भूमिका निभा सकता है। बहुत उपयोगी होने पर ही लाउड स्पीकर का प्रयोग किया जाना चाहिये तथा एक सीमा से अधिक ऊॅंची आवाज का उपयोग नहीं करना चाहिये।
6. सोलर सिस्टम का उपयोग: आजकल सोलर लाइट, सोलर कुकर एवं अन्य अनेक विकल्प उपलब्ध हैं जो विभिन्न प्रकार का प्रदूषण कम कर सकते हैं। युवा शक्ति को इनके उपयोग पर अधिक ध्यान देकर प्रदूषण को कम करने में सहयोग करना चाहिये।
7. वृक्षारोपण: वृक्ष सभी प्रकार के प्रदूषण को दूर करने में सहायक हैं। वृक्षारोपण कार्यक्रम इतना व्यापक है कि मात्र किसी संस्था, किसी विभाग या केवल कुछ लोगों द्वारा इसे नहीं पूर्ण किया सकता। यह प्रत्येक व्यक्ति का स्वाभाविक कर्तव्य है कि वृक्षारोपण के पुनीत कार्य से अपने को जोड़े। इसे जनभावना से जोडने हेतु निम्न उपाय किये जा सकते हैं:-
अ. अपने पूर्वजों की स्मृति में किसी मन्दिर परिसर या अन्य किसी उपयुक्त स्थान पर पौधारोपण कर उसकी सुरक्षा करना।
ब. परिवार में विवाहोत्सव, बच्चे पैदा होने या किसी अन्य पावन अवसर की स्मृति में किसी मन्दिर परिसर या अन्य किसी उपयुक्त स्थान पर पौधारोपण कर उसकी सुरक्षा करना।
स. अपने आस-पास पड़ी खाली भूमि, पार्क या अन्य नजदीकी स्थान पर पौधारोपण कर उसकी सुरक्षा करना।
द. यह आवश्यक नही कि केवल अपने द्वारा रोपित पौधों की ही सुरक्षा की जाय। अपने आस-पास किसी संस्था या व्यक्ति द्वारा रोपित पौध की सिंचाई एवं सुरक्षा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
य. अपने प्रियजन को अन्य उपहार के स्थान पर पौधे को उपहार स्वरूप देना।
युवा उर्जा से भरा होता है। यदि वह अपने को पौधारोपण एवं उसकी सुरक्षा के प्रति संकल्पबद्ध कर ले तो प्रदूषण को दूर करने हेतु यह अत्यन्त महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।
8. जागरुकता: पर्यावरण प्रदूषण हमारे लिये कितना बड़ा अभिशाप है तथा इसके निदान के लिये क्या प्रयास किये जा सकते है, इस दिशा में धीरे-धीरे समाज में जागरुकता बढ़ रही है। युवावर्ग समाज को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भारत का युवा आज केवल अपने देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में अपनी क्षमता का भरपूर प्रदर्शन कर रहा है। कोई कारण नहीं वह चाह ले और पर्यावरण प्रदूषण दूर न हो? केवल अपने को संकल्पित करने की आवश्यकता है। यहाँ पर कुछ सामान्य उपायों का उल्लेख किया गया है, जिसे थोड़े प्रयास से प्रदूषण पर किया जा सकता है। केवल सोचकर लगने की आवश्यकता है।
आज के युवा को गाँधी जी का यह सूत्र वाक्य सदैव स्मरण रखना होगा कि ‘‘धरती हमारी आवश्यकता की पूर्ति कर सकती है, विलासिता की नहीं’’। हमें प्रकृति से उतना ही लेना चाहिये, जितना अति आवश्यक हो तथा उसकी यथासम्भव भरपाई भी करने का प्रयास करना चाहिये।
यह आवश्यक नहीं कि पर्यावरण संरक्षण हेतु हर व्यक्ति बड़ा प्रयास ही करे। बूॅंद-बूॅंद से सिन्धु भरता है। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किया गया छोटे से छोटा प्रयास भी महत्वपूर्ण है। अतः जितना भी सम्भव हो सके, सभी को प्रदूषण पर नियन्त्रण का प्रयास करना है।
आज के युवा को यह समझना ही होगा कि बिना शुद्ध वायु एवं जल के जीवन सम्भव नहीं है। हम किसी भी दशा में मिनरलवाटर एवं आक्सीजन सिलिंडर के सहारे नहीं जी सकते। युवावर्ग की जिजीविषा शक्ति ऐसा होने नहीं देगी। आज पूरा समाज युवाशक्ति की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहा है। पर्यावरण प्रदूषण दूर करने की दिशा में जो प्रयास वर्तमान पीढ़ी नहीं कर पायी भविष्य में राष्ट्र की युवा शक्ति उसे अवश्य पूर्ण करेगी, ऐसा शुभ विश्वास है। जिस दिन भारत की युवा शक्ति की उर्जा पर्यावरण प्रदूषण दूर करने की दिशा में उद्यत होगी, समस्या के समाधान की दिशा में यह मील का पत्थर होगा।
- उप वन संरक्षक, कार्यालय प्रमुख वन संरक्षक,
17, राणा प्रताप मार्ग, उत्तर प्रदेश, लखनऊ।
उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय - डाॅ॰ रवीश कुमार
कुछ दिन पूर्व इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने काॅन्वेण्ट और मिशनरी विद्यालयों के सम्बन्ध में एक ऐतिहासिक और राष्ट्रवादी निर्णय दिया है। उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार समस्त शासकीय कर्मचारी (राजपत्रित एवं अराजप़ित्रत), सांसद, विधायक, न्यायाधीश तथा ऐसे व्यक्ति जिन्हें राजकोष से वेतन स्वरूप धनराशि प्राप्त होती है, वे अपने बच्चों की शिक्षण व्यवस्था किसी भी काॅन्वेण्ट या मिशनरी के विद्यालय में नहीं करा सकते हैं। यदि उपरोक्त व्यक्ति अपने बच्चों का प्रवेश किसी काॅन्वेण्ट या मिशनरी के विद्यालय में कराते हैं तो उन्हें उक्त विद्यालय के मासिक शुल्क के समानान्तर धनराशि शासन में भी जमा करनी होगी।
उच्च न्यायालय के इस निर्णय की भूरि-भूरि प्रशंसा की जानी चाहिये, क्योंकि यह राष्ट्रहित में देश के भविष्य को घ्यान में रखते हुए एक दूरगामी निर्णय है।
ईसाई मिशनरीज लगभग तीन सौ वर्षों से भारत के ईसाईकरण का प्रयास कर रही हैं। उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों (नागालैण्ड, मिजोरम, मेघालय) को छोड़कर पूरे देश में कहीं भी उन्हें आशातीत सफलता नहीं प्राप्त हुई है।
यह शत-प्रतिशत सत्य है कि ईसाई मिशनरीज भारतीय जतना की मानसिकता परिवर्तित करने में सफल रही हैं, और इस कार्य को काॅन्वेण्ट एवं मिशनरी विद्यालय पूर्ण मनोयोग से सम्पन्न कर रहे हैं। अतः इस प्रकार के विद्यालयों की देश में कोई आवश्यकता नही है, क्योंकि लगभग 200 वर्षों से शिक्षा प्रदान कर रहे काॅन्वेण्ट एवं मिशनरी विद्यालय देश को एक भी -
1. डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. राधाकृष्ष्णन्, सरदार पटेल, डा. अम्बेडकर, गुलजारी लाल नन्दा, लाल बहादुर शास्त्री अथवा लोक नायक जय प्रकाश नारायण नहीं दे पाये हैं।
2. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्र शेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू नहीं दे पाये हैं।
3. स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द घोष, महर्षि महेश योगी या स्वामी रामदेव नहीं दे पाये हैं।
4. डा॰ जगदीश चन्द्र बोस, डा॰ होमी जहाॅगीर भाभा, डा॰ विक्रम साराभाई और डा॰ ए. पी. जे. अब्दुल कलाम नहीं दे पाये हैं।
5. शेक्सपियर, मैथ्यू आॅरनाल्ड, राॅबिन्सन क्रूसो, थामस हाॅर्डी नहीं दे पाये हैं। अर्थात् काॅन्वेण्ट एवं मिशनरी विद्यालय ज्ञान-विज्ञान, कला, साहित्य, राष्ट्रवाद अथवा किसी भी क्षेत्र में देश को एक भी महापुरूष दे पाने में पूर्णतया असफल रहे हैं। अतएव, राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुये इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को और भी कठोर रूप प्रदान कर देश के सर्वोच्च न्यायालय को भी इसी प्रकार का राष्ट्रवादी निर्णय देना चाहिये।
सम्पर्क - लोक प्रशासन विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ।
घाघ की नीति परक कहावतें - डाॅ॰ रमेश प्रताप सिंह
पत्रिका के पिछले अँक में घाघ-भड्डरी के वर्षा सम्बन्धी कहावतों को संकलित करने का प्रयास किया था। यह अँक युवकों पर आधारित है। इस लिए कुछ कहावतें नीति सम्बन्धी देना उपयुक्त होगा। आज समाज में युवकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे समय पर यदि नीतिगत तरीके से कार्य नहीं किया गया तो भी देश का निर्माण सम्भव नहीं होगा -
खेती, पाती, बीनती, औ घोड़े की तंग।
अपने हाथ सवारियें, लाख लोग होय संग।
खेती, पत्र लेखन, प्रार्थना, घोड़े की जीन कसना, इन सब कार्यों को स्वयं करना चाहिए, चाहे जितना विश्वासी व्यक्ति आपके साथ हो, लेकिन इन कार्यों के लिए उन पर निर्भर न हो।
कहै घाघ घाघिन से रोय,
बहु संतान दरिद्री होय।
अर्थात् घाघ कहते हैं कि यदि संतान अधिक होगी तो उसका भरण-पोषण उतना ही कष्ट कर होगा। आज यदि कम संतान होगी तो समाज भी समृद्ध होगा और परिवार भी।
चाकर चोर राज बेपीर,
कहै घाघ का धारी धीर।
अर्थात् यदि नौकर चोर हो और राजा निर्दयी हो तो दोनो स्थितियों में धीरज रखना कठिन हो जाता है।
बढै़ पूत पिता के घर में,
खेती उपजै अपने कर्मे।
घाघ का मानना है कि पुत्र पिता के धर्म से फलता-फूलता है और खेती अपने कर्म से अच्छी होती है।
हमारे प्रेरणा स्रोत भारत रत्न पूर्व राश्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम - डाॅ॰ जगदीश गाँधी
भारत के सबसे ज्यादा लोकप्रिय ग्यारहवें राश्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को हुआ था। इनके पिता अपनी नावों को मछुआरों को देकर अपने परिवार का खर्च चलाते थे। अपनी आरंभिक पढ़ाई पूरी करने के लिए कलाम जी को घर-घर अखबार वितरण का भी काम करना पड़ा था। कलाम जी ने अपने पिता से ईमानदारी व आत्मानुशासन की विरासत पाई और माता से ईश्वर-विश्वास तथा करुणा का उपहार लिया। वे भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया का सिरमौर राष्ट्र बनना देखना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने अपने जीवन में अनेक उपलब्धियों को भारत के नाम भी किया। कलाम साहित्य में रूचि रखते थे, कविताएं लिखते थे, वीणा बजाते थे और अध्यात्म से गहराई से जुड़े थे।
एक गरीब परिवार से होने के बावजूद अपनी मेहनत और समर्पण के बल पर बड़े से बड़े सपनों को साकार करने का एक जीता-जागता उदाहरण है पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन। वे कहते थे ‘‘इससे पहले कि सपने सच हो आपको सपने देखने होंगे।’’ इसके साथ ही उनका यह भी कहना था कि ‘‘सपने वह नहीं जो आप नींद में देखते हैं। यह तो एक ऐसी चीज है जो आपको नींद ही नहीं आने देती।’’ उनका मानना था कि छोटी सोच सही नहीं है। जितना मुमकिन हो, उतने ख्वाब देखिये। तरक्की का उनका ख्वाब शहरों से नहीं बल्कि गांव की पंचायतों से शुरू होता था।
उनका मानना था कि आने वाली पीढ़ी हमें तभी याद रखेगी जब हम अपनी युवा पीढ़ी को एक समृद्ध और सुरक्षित भारत दे सके जो कि सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ आर्थिक समृद्धि के परिणामस्वरूप प्राप्त हो। उनका मानना था कि हम जैसा समाज चाहते हैं हमें वैसी ही शिक्षा अपने बच्चों को देनी चाहिए। इसके लिए वे कहते थे कि चूंकि एक शिक्षक का जीवन कई दीपों को प्रज्जवलित करता है, इसलिए एक शिक्षक को अपने पेशे के प्रति प्रतिबद्धता होनी चाहिए। वे इस बात पर विश्वास करते थे कि एक तेजस्वी मस्तिष्क इस धरती पर, धरती के नीचे या ऊपर आसमान में सबसे सशक्त संसाधन है। इसलिए हमारे शिक्षकों कोे युवा मस्तिष्कों को तेजस्वी बनाना चाहिए। शिक्षा के संबंध में उनका मानना था कि वास्तविक शिक्षा मानवीय गरिमा और व्यक्ति के स्वाभिमान में वृद्धि करती है।
कलाम जी का मानना था कि बच्चों को बचपन में दी गई शिक्षा ही उसके सारे जीवन का आधार बन जाती है। इसके लिए वे अपना उदाहरण देते हुए बताते थे कि वे बचपन से ही अपने गुरु श्री अय्यर जी से अत्यधिक प्रभावित थे। कक्षा 5 में पढ़ते हुए उनके गुरु श्री अय्यर जी ने उनकी कक्षा के सभी बच्चों को कक्षा में ‘पक्षियों को उड़ने की क्रिया’ पढा़ने के साथ ही उन सभी को शाम को समुद्र तट पर बुलाकर पक्षियों को उड़ते हुए भी दिखाया था। इसका कलाम जी के जीवन में बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा और आने वाले समय में एक राॅकेट इंजीनियर, एयरोस्पेस इंजीनियर तथा प्रौद्योगिकीवेत्ता के रूप में उनका जीवन रूपांतरित हो गया। कलाम जी का कहना था कि ‘‘सात साल के लिये कोई बच्चा मेरी निगरानी में रह जाये, फिर कोई भी उसे बदल नहीं सकता।’’
भगवान में उनकी गहरी आस्था थी। कोई तो है जो ब्रह्मांड चला रहा है। इतना बड़ा ब्रह्मांड, धरती के करोड़ों जीव-जन्तु क्या ऐसे ही पनप रहे हैं? कोई शक्ति है जिसके कारण ब्रह्मांड में सब कुछ इतना सुनियोजित है। हम उस शक्ति को कोई भी नाम दे सकते हैं। वे जहां एक ओर कुरान पढ़ते थे तो वहीं दूसरी ओर गीता भी पढ़ते थे। उनका मानना था कि भगवान, हमारे निर्माता ने हमारे मस्तिष्क और व्यक्तित्व में असीमित शक्तियां और क्षमताएं दी हैं और ईश्वर की प्रार्थना हमें इन शक्तियों को विकसित करने में मदद करती हैं। वे कहते थे कि आकाश की तरफ देखिये, हम अकेले नहीं हैं। सारा ब्रह्मांड हमारे लिये अनुकूल है और जो सपने देखते हैं और मेहनत करते हैं उन्हें प्रतिफल देने के लिए सारा ब्रह्मांड मदद करता है।
उनका मानना था कि शिक्षण का मुख्य उद्देश्य छात्रों में राष्ट्र निर्माण की क्षमताएँ पैदा करना है। ये क्षमताएँ शिक्षण संस्थानों के ध्येय से प्राप्त होती है तथा शिक्षकों के अनुभव से सृदृढ़ होती है, ताकि शिक्षण संस्थान से निकलने के बाद छात्रों में नेतृत्वकारी विशिष्टतायें आ जायें। कलाम जी कहते थे कि अगर किसी भी देश को भ्रष्टाचार-मुक्त और सुन्दर-मन वाले लोगों का देश बनाना है तो, मेरा दृढ़तापूर्वक मानना है कि समाज के तीन प्रमुख सदस्य माता, पिता और शिक्षक ही ये कर सकते हैं।
लगभग 40 विश्वविद्यालयों द्वारा मानद डाॅक्टरेट की उपाधि, पद्म भूषण और पद्म विभूषण व भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित होने वाले पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम बाल एवं युवा पीढ़ी के प्रेरणास्रोत थे। उनका पूरा जीवन अनुभव और ज्ञान का निचोड़ था।
डा. कलाम का कहना था कि अनजानी राह पर चलना ही साहस है। जब दिल में सच्चाई होती, तब चरित्र में सुन्दरता आती है। चरित्र में सुन्दरता से घर में एकता आती है। घर में एकता से देश में व्यवस्था का राज होता है। देश की व्यवस्था से विश्व में शांति आती है। इसलिए बच्चों, शपथ लो, मैं जहां भी रहूंगा, यही सोचूंगा कि मैं दूसरों को क्या दे सकता हूँ? हर काम को ईमानदारी से पूरा करूंगा और सफलता हासिल करूंगा। महान लक्ष्य निर्धारित करूँंगा। किताबें, अच्छे लोग और अच्छे शिक्षक मेरे दोस्त होंगे।
डा॰ कलाम ने भारत को अंतरिक्ष में पहुंचाने में अहम योगदान दिया था। 27 जुलाई 2015 को डा॰ कलाम जीवन की अन्तिम सांसें लेने से ऐन पहले वह छात्रों से बातें कर रहे थे, वह शायद ऐसी ही मौत चाहते होंगे।
वह जानते थे कि किसी व्यक्ति या राष्ट्र के समर्थ भविष्य के निर्माण में शिक्षा की क्या भूमिका हो सकती है। उनके पास भविष्य का एक स्पष्ट खाका था, जिसे उन्होंने अपनी पुस्तक ‘‘इंडिया 2020: ए विजन फाॅर द न्यू मिलिनियम’’ में प्रस्तुत किया। इंडिया 2020 पुस्तक में उन्होंने लिखा कि भारत को वर्ष 2020 तक एक विकसित देश और नाॅलेज सुपरपाॅवर बनाना होगा।
- संस्थापक-प्रबन्धक
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
नई ऊँचाई पर उम्मीदें - जी॰एन॰ वाजपेयी
वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य और अनुभवसिद्ध तमाम शोध उस बात की पुष्टि करते हैं कि लोकतंत्र किसी भी समाज को सुशासन देने के लिए एक बेहतर विकल्प है। यह किसी भी अन्य प्रणाली की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली है। एक लम्बे अर्से से लोकतंत्र ने चिभिन्न क्षेत्रों में अच्छी चीजंे दी हैं। यही लोकतंत्र का वरदान है। लोकतंत्र विचार-विमर्श का अवसर मुहैया कराता है। इसमें असहमति की आवाज के साथ-साथ अन्य विकल्प भी होते हैं, जिसमें सभी समुदायों के व्यापक हित में होता है। हालांकि कभी-कभी आम सहमति पर पहुँचने के लोकतांत्रिक तौर-तरीके अथवा उपाय विलम्ब का कारण बनते है और अक्सर ये तौर-तरीके संकीर्ण सोच तथा स्वार्थ को आगे बढ़ाते है। जब भी ऐसा होता है तो लोकतंत्र एक अभिशाप में बदल जाता है। आजाद भारत की प्रथम पीढ़ी के नेताओं की बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, त्याग और उनके साहस को श्रेय देना होगा कि उन्होंने लोकतंत्र (संसदीय) का कराया और शासन संचालन के लिए मताधिकार को आधार बनाया गया।
आजाद भारत की यात्रा में तमाम उथल-पुथल के बावजूद लोकतंत्र न केवल बचा रहा, बल्कि फलता-फूलता रहा। प्रत्येक लोकतंत्र में दिशा और गति दमने वाले राजनेताओं और राजनीतिज्ञों की तरह हमारे यहाँ भी राष्ट्रहित-चिन्तक लोग हैं। राजनीतिक विज्ञान में राजनेता उसे कहा गया है जो सिद्धान्तों विचारों के लिए कार्य करता है, जबकि आज का राजनीतिज्ञ वह होता है जो अपने निहित स्वार्थों की पूर्ती में अधिकाधिक लगा रहता है। आजाद भारत में जो तमाम वादे किए गए उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था देश के लाखों लोगों को आर्थिक तौर पर सशक्त करना। दुर्भाग्य से इस दिशा में प्रगति अपर्याप्त और निराशाजनक रही। आज का युवा भारत इस मामले में बहुत अधीर है, वह बहुत इंतजार करने को तैयार नहीं है। अप्रत्यक्ष तौर पर कहा जाए तो और इंतजार अब स्वीकार्य नहीं है। इसे पिछले वर्ष मई माह में आए चुनाव के परिणामों से भी समझ सकते हैं। नई सरकार का चुनाव ही इस जनादेश के साथ किया गया है कि वो समृद्धि लाने वाले उपायों पर काम करेगी, गरीबी और दरिद्रता का उन्मूलन करेगी। हालांकि इसमें समय लगेगा और पटरी से उतरी हुई अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने के लिए बहुत सारे प्रयास करने होंगे। यह एक चुनौती पूर्ण कार्य है। इसलिए और भी क्योंकि मौजूदा समय अर्थव्यवस्था वृहद आर्थिक अस्थिरता, राजकोषीय फिजूलखर्जी और सरकारी घाटे के बोझ तले दबी हुई है।
राजनीतिक कर्ता-धर्ता भले ही बहुत तेजी से स्थितियों को न बदल सके, लेकिन उन्हें मतदाताओं को अपनी ईमानदारी के प्रति भरोसा दिलाना होगा और टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए समग्रतावादी नजरिया अपनाना होगा। हमारे नीति-नियंताओं को अपने विचारों को बेहतर तरीके से जनता के बीच रखना होगा और उन्हें बताना होगा कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए क्या-क्या जरूरी है। हालांकि राज्यों और भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में समग्रतावादी नजरिएं का परिणाम आने में समय लगेगा। इस बीच सरकार की ईमानदारी और उसकी योग्यता-नीयत को लेकर किसी तरह का संदेह नहीं होना चाहिए। इसके लिए सरकार कई मोर्चों पर काम कर रही है तथा उसके कार्यान्वयन के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं जिसमें कई ऐसे विधेयक प्रस्तावित हैं जिससे देश में व्यवसाय के प्रति माहौल बना है और प्रक्रियाएं सरलीकृत हुई हैं। संसद के पिछले सत्र में केन्द्र सरकार ने अधीर भारत की बेचैनी को दूर करने के लिए अध्यादेशों के माध्यम से आर्थिक सुधारोें की गति को तेजी देने की कोशिश की ताकि स्थिति में बदलाव हो सके। इसके लिए सरकार ने भूमि अधिग्रहण विधेयक को पेश किया, कोयला, खदानों और खनिजों जैसी राष्ट्रीय सम्पदा की पारदर्शी बिक्री को सुनिश्चित किया और बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा में वृद्धि को अनुमति देने का काम किया।
कार्यपालिका के पास लोकहित में अध्यादेशों को जारी करने की शक्ति संविधान में मिली हुई है। इन अध्यादेशोें को संसद में पारित करा पाना सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक परीक्षा है। दुर्भाग्य से इस मुद्दे पर राजनीतिज्ञ अपने-अपने हितों के लिहाज से राजनीति कर रहे हैं और अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के कारण इसे विफल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि एक वर्ग अप्रत्यक्ष तौर पर इसे सहारा भी दे रहा है। सच्चाई यही है कि यह राजनीतिज्ञों की राजनीति है, न कि राजनेताओं की। इन लोगों ने ही आर्थिक विकास की गति को धीमा किया है और इस समय भी इसे विफल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि यह भी सच है कि भारत के पास आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक बेहतर अवसर है। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में जब गिरावट का दौर है तो भारत उम्मीद की एक नई ऊँचाई पर है। वैश्विक पूँजी बाजार को भारत में बेहतर लाभ मिलने की अपेक्षा है। कुछ सुधारों के साथ भारत अपनी नीतियों में बदलाव की घोषाणाएं करके व्यावसायिक सुशासन को दिशा दे सकता है। विशेषकर कर ढ़ाचे में सुधार और अनुपयुक्त नीतियों का त्याग करके। यह कदम वित्तीय पूँजी के लिहाज से आवश्यक है। वर्तमान में निजि क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्रों की बैंकिंग स्थिति खराब है और यह भारी एनपीए यानी गैर-निष्पादन सम्पत्ति के बोझ तले दबी हुई है। वास्तविकता यही है कि भारत का राजकोषीय संसाधन वृहद तौर पर कमजोर बुनियादी ढ़ाचे को इस रूप में सहारा देने के लिए अपर्याप्त है जिससे उच्च जीडीपी विकास दर का लक्ष्य हासिल किया जा सके और विशाल युवा आबादी के लिए देश को समृद्धि-सम्पन्नता की भूमि में बदला जा सके। इस क्रम मेें देश का नया मतदाता वर्ग क्षेत्रवाद अथवा सामाजिक इंजीनियरिंग से बहुत कम प्रभावित है। आज का आकांक्षी भारत इन बातों को अच्छे से समझता है कि नियंत्रित अर्थव्यवस्था उसके लिए बेहतर नहीं है।
उदारीकरण, वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण के माध्यम से दुनिया में आर्थिक बेहतरी की खबरों को मीडिया ने बखूबी पेश किया है। देश का युवा चाहता है कि हमारी जीडीपी का विकास इस स्तर पर हो कि उसकी आर्थिक सम्भावनाओं में इजाफा हो और लोगों की जीवन दशा अच्छी हो। यह भी सच्चाई है कि सामाजिक असंतोष और असमानता के कारण देश में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का विस्तार हुआ है। राजनीतिक व्यवस्था की प्रासंगिकता का परीक्षण समाज की मौजूदा आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उसकी दृढ़ता से ही हो सकेगा। क्रियान्वन में देरी राजनीतिक व्यवस्था को भी प्रभावित करेगी। मौजूदा समय में भारत बदलाव के दौर में है। प्रार्थना करें और उम्मीद रखें कि समावेशी आर्थिक विकास में विफलता और सामाजिक असंतोष की आग हमारे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरा नं बने।
- (लेखक सेबी और एलआइसी के पूर्व अध्यक्ष है।)
सात शपथ - मृदुला सिन्हा
आज हमारे बीच पूर्व राष्ट्रपति ए॰पी॰जे॰अब्दुल कलाम नहीं हैं, परन्तु उनके द्वारा युवाओं को दिलाई जाने वाली सात शपथ हैं, जो उनका हमेशा मार्गदर्शन करती रहेंगी।
पहली शपथ - ‘मैं मानता हूँ कि मुझे अपने जीवन में एक लक्ष्य तय करना है। लक्ष्य पाने के लिए मैं ज्ञान हासिल करूंँगा, मेहनत करूँगा और जब कोई समस्या आई, तो उस पर विजय प्राप्त कर सफल बनूंँगा।’
दूसरी शपथ - ‘अपने देश का एक युवा होने के नाते मैं अपने लक्ष्य्र में सफल होने के लिए हिम्मत से कार्य करूँगा और दूसरों की सफलता पर प्रश्न्न होऊँगा।’
तीसरी शपथ - ‘मैं हमेशा अपने घर, परिवेष को व्यवस्थित और स्वच्छ रखूँगा।’
चैथी शपथ - मैं मानता हूँ कि सदाचार से चरित्र निश्छल बनता है, निश्छल चरित्र से घर में मेल-जोल रहता है, घर में मेल-जोल से राष्ट्र व्यवस्थित रहता है और व्यवस्थित राष्ट्र से विश्व में शान्ति आती है।’
पाँचवी शपथ - ‘मैं भष्टाचार से मुक्त एक ईमानदार जीवन व्यतीत करूँगा और सदाचारपूर्ण जीवन अपनाने के लिए स्वयं दूसरों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करूँगा।’
छठी शपथ - ‘मैं देश में ज्ञान का प्रकाश फैलाऊँगा और कोशिश और कोशिश करूँगा कि हमशा फैलाता रहूँ।’
सातवीं शपथ - ‘मैं मानता हूँ यदि मैं हर एक कार्य ठीक से करूँगा, तो 2020 तक एक विकसित भारत बनाने के मिशन को साकार करने में अपना योगदान दे सकूँगा।’
आज समाज में समृद्धि और सद्ज्ञान की कमी नहीं है। समृद्धि बढ़ती जा रही हैं। जानकारियाँ बढ़ती जा रही हैं, ज्ञान बढ़ रहा है, कमी हे तो अपने ज्ञान को बाँटने के भाव और व्यवहार की। राष्ट्रपति पद के अपने कार्यकाल के दौरान उनके द्वारा राष्ट्र-निर्माण के सपने देखते रहना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात हे अपने सपनों को पैतालीस करोड़ युवाओं की आँखें में उतारना।
राष्ट्र निर्माण और युवा शक्ति - नवल किशोर
आधुनिक भारत युवाओं का देश है, 125 करोड़ आबादी में 60 करोड़ युवा-युवतियाँ है। इस विशाल युवा जन समूह को अपनी प्रतिभाओं की पंखुड़ियों को पूर्ण रूप से प्रसारित करने का, अपनी ताजगी भरी चेतना का उन्मेष करने का, अपने स्वतंत्र अस्तित्व की सुगन्ध से समाज और राष्ट्र के हर क्षेत्र को सुव्यवस्थित करने के सही अवसर और दिशायें मिलती हैं क्या?
जिस देश के युवाओं के सामने समुचित आदर्श न हो, कर्म परिकल्पना न हो, मूल्यों की धारणा न हो, केवल स्वार्थपरता, आलस्य, उदासीनता, कर्मविमुखता, भ्रष्टाचार से पूर्ण सामाजिक परिवेश हो तो वहाँ युवा शक्ति का दिशाहीन होना अवश्यम्भावी है। ‘युवाशक्ति’ इस शब्द से परिश्रम, सक्रियता, उत्साह, कर्मठता, आत्मविश्वास, त्याग, सहानुभूति, उदारता और तेजस्विता की अवधारणा मन में आती है।
ऊर्जा जन्मती है पर अपना उपयोग स्वयं नहीं कर पाती वही ऊर्जा चिकित्सालय रोग निदान का साधन बनती है, विद्यालय में अध्ययन, अध्यापन को सुगम बनाती है। विज्ञान के क्षेत्र में वही ऊर्जा नये शोध करती है। वही ऊर्जा आतंकवाद फैलाती है। तो वही ऊर्जा पशु वध कराती है। निर्भर होता है किसको किसका सानिध्य मिला, बल्कि यह कहा जाये, उस ऊर्जा का भगीरथ कौन बना? गंगा तो लिपटी सोई थी पिनाकवाणी शिव की जटाओं में, ऊर्जा थी नरेन्द्र में, स्वामी रामकृष्ण ने नरेन्द्र की ऊर्जा को विवेकानन्द का रूप दिया, जिसने सम्पूर्ण दुनिया में हिन्दु धर्म एवं हिन्दु संस्कृति की विजय पताका फहराई। ऊर्जा थी शिवाजी में, स्वामी समर्थ गुरू रामदास जी ने मुगल अत्याचार एवं मुगल शासन को समाप्त करके हिन्दु साम्राज्य की स्थापना कर शिवाजी को छत्रपति बनाकर शासन का नेतृत्व दिया। आचार्य चाणक्य ने भारत की अखण्डता और एकता के लिए चन्द्रगुप्त की ऊर्जा को सम्राट चन्द्रगुप्त के रूप में स्थापित किया। ऊर्जा थी डा॰ हेडगेवार में, जिसे डा॰ हेडगेवार ने माधव को गेरुआ वस्त्र पहना सन्यस्त होने के बजाए भारत को परमवैभव हेतु कंटकहीन बनाने के कार्य में जुटा दिया। ऊर्जा थी विनायक दामोदर सावरकर में जिन्होंने कितने ही युवकों को देश की स्वतंत्रता के लिए सुख वैभव को त्यागकर जीवन का अध्र्य चढ़ाने को तैयार किया। अर्थात ऊर्जा का सही उपयोग एवं दिशा की आवश्यकता होती है। इसके अनुकूल एवं उपयुक्त वायुमण्डल चाहिए।
भारत के प्रधानमन्त्री जब मोरार जी देशाई थे तब आचार्य रजनीश देश में बड़ी चर्चा में थे। पुणे उनका केन्द्र था। एक व्यक्ति ने कुछ बाते जोड़कर मोरार जी को बताई, मोरार जी बोले कि रजनीश अभी छोटा है, युवा है, समझ जायेगा। उसी संदेश वाहक ने रजनीश से जाकर कहीं तो रजनीश ने उत्तर दिया और कहा ‘मोरार जी को जाकर कह दो, मैं उतना छोटा नहीं हूँ’, जीसस जिस धर्म को प्रेम के रूप में व्याख्यायित कर रहे थे तो लोगों ने यही कहा था, ‘कि जीसस अभी छोटा है, समझ जायेगा। विवेकानन्द भी जब शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में भारतीय दर्शन की व्याख्या कर रहे थे, तो लोगों ने सही कहा था कि स्वामी अभी छोटा है। समझ जायेगा। जगतगुरू शंकराचार्य जब धर्म का मर्म समझा रहे थे तो लोगों ने यही कहा था कि अभी छोटा है, समझ जायेगा।’ इस प्रसंग को उद्धत करके मैं यह स्मरण कराना चाह रहा हूँ कि जीसस हों या शंकराचार्य हों या विवेकानन्द हों सभी ने यह पाया कि युवावस्था में ही विश्व को कुछ दिया।
हमारा भारतीय बांगमय तो युवाओं की सिद्धियों से उनके तेज ओज से भरा हुआ है। ध्रुव युवा थे वे दृढ़ता के प्रतिमान बन गये, प्रहलाद युवा थे जब उन्होंने यह जान लिया कि नारायण सर्वत्र हैं, जल में, थल में, खड़ग में, खम्भ में। राम युवा थे, जब पिताजी की आज्ञा शिरोधार्य कर सत्ता सिंहासन को त्याग कर वन में निकल गये थे। बुद्ध युवा थे जब संसार को समझने एवं प्राणी मात्र के कल्याण के लिए राजपाट त्याग दिया था। सम्राट अशोक युवा थे जब युद्ध से घृणा कर शस्त्र त्याग दिया था। राजा हर्ष युवा थे जब वर्षों की अर्जित सम्पदा प्रयाग में दान करने का निर्णय लिया था।
स्वामी विवेकानन्द कहते थे, कि ‘‘अगर मुझे सौ निष्ठावान, त्यागी सेवाभावना से युक्त निर्भीक युवा मिल जायें तो समाज की काया पलट कर सकता हूँ’’ उन्होंने विदेश प्रवास से लौटने पर शिष्या क्रिस्टायन को कहा था- "The Country is dead, The man making education is required" (राष्ट्र मृत प्राय है, व्यक्ति निर्माण की शिक्षा की आवश्यकता है)। राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यकता है तेजस्वी चरित्र सम्पन्न राष्ट्र भक्तों की जो अपने पूर्व पुरुषों के उज्ज्वल आदर्शों से ओतप्रोत हो, यह अपनत्व की अनुभूति जब कसक को जन्म देगी तभी भ्रष्ट जीवन की जिन्दगी दूर करेगी और भारत उन्ननि के शिखर की ओर प्रगति करेगा।
स्वामी रामदेव जी भी हर युवक एवं हर भारतीय को निम्नलिखित संकल्प लेने का आह्वान करते हैं - ‘‘मैं एक व्यक्ति नहीं, एक संस्कृति हूँ। मेरे प्राणों में भारत बसता है। हर भारतीय की पीड़ा मेरी वेदना है। भारत का उत्कर्ष मेरा उत्कर्ष है। अपने पुरुषार्थ से स्वयं का एवं राष्ट्र का भाग्योदय करूँगा। ऐसा संकल्प हर भारतीय का होना चाहिए।’’
प्रत्येक युवक को लगता है कि मै कहाँ करूँ और क्या करूँ? इसके उत्तर मे मैं यही कहना चाहँूगा कि आज नौकरी नहीं कर्म चाहिए, कार्यालय नहीं खेल भी चाहिए, कुर्सी नहीं धरती और सागर की छाती चाहिए, उठो! देखो! हिमाद्रि से लेकर सिन्धु तक फैली भारत की धरती तुम्हारे पुरुषार्थ को चुनौती देती है,। राजस्थान की तपती हुई माटी अपनी प्यास बुझाने के लिए आपकी ओर टकटकी लगाये निहार रही है। मध्य प्रदेश, उत्कल, महाराष्ट्र का वक्षस्थल हलधर की बाट जोह रहा है। आकाश को चूमती गिरिश्रंगों की ऊचाँईयाँ कर्मण्यता को आमन्त्रण दे रही है। रत्नगर्भा भारत वसुन्धरा अपने वैभव को करोड़ों करों में समर्पित करने को आतुर है। सागर अपनी सम्पदा अर्पित करने का खड़ा है। लक्ष्मी अपने पुत्रों को सर्वस्व देना चाहती है। पर कहाँ है वे कर? कहाँ है वे चरण? और कहा है वह दृष्टि?
स्वामी विवेकानन्द ने संजीवनी मंत्र के रूप में कहा - ‘तुम अपने आत्मत्व, स्वत्व को पहचानों। तुममें अदम्य, अपराजेय ऊर्जा सन्निहित है। यह ऊर्जा जब शक्तिमान हो जायेगी, आलस्य और निंद्रा पराभूत हो जायेगी तब निर्भय एवं साहसी होकर संगठित हो जाओगे तो भारत माता का कल्याण होगा।’
अतः उनका अविस्मरणीय अमर उद्घोष हुआ ‘‘उठो! जागो! एवं रुको नहीं जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाये’’ उतिष्ठ, जाग्रत, प्राप्य वरान्निवोधत।’’
युवा शक्ति तथा भारतीय राजनीति - डॉ० ओम प्रकाश सिंह
भारत युवाओं का देश है। संभावनाओं का देश है। क्योंकि यहाँ की जन संख्या में 54 प्रतिशत लोग 25 वर्ष तथा 65 प्रतिशत लोग 35 वर्ष आयु के हैं। आने वाले समय में युवाओं का प्रतिशत और अधिक होगा जो हमें युवा राष्ट्र होने का बोध कराता है। हमारे देश की प्रत्येक गतिविधियों में युवाओं का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यहाँ की राजनीति भी युवाओं के इर्दगिर्द ही घूमती है। भारतीय राजनीति में युवाओं के बगैर किसी प्रकार की गतिविधियाँ संभव ही नहीं होंगी, चाहे धरना प्रदर्शन, हडताल, रैली, चुनाव प्रचार सब में युवाओं की ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। चाहे यह किसी राष्ट्रीय पार्टी का हो या प्रादेशिक पार्टी सब युवाओं के बल पर ही चलती हैं। अनेकानेक सामाजिक आन्दोलनों में भी युवा अग्रणी भूमिका अदा करते हैं। प्रत्येक राजनैतिक दल महाविद्यालय, विश्वविद्यालयों में बड़े अच्छे ढ़ंग से छात्र संगठनों तथा मोर्चाओं का संचालन करते हैं जिसके माध्यम से अनेक योग्य नेतृत्व का भारतीय राजनीति में जन्म हुआ है।
प्रायः अब तक यह देखा गया है कि भारत में युवाओं के सहयोग से तथा उनके खून-पसीने से सींची हुई लहलहाती राजनीतिक फसल को राजनीतिक पार्टियाँ काटती रही हैं लेकिन सत्ता पाकर उन युवाओं को भुला देती हैं। युवकों की समस्याओं को जानना पहचानना तथा उसके निवारण हेतु कार्य योजना बनाना जिससे उनका चहुमुखी विकास हो सके ऐसा अभी तक नहीं के बराबर होता आया है।
युवकों को वर्तमान केन्द्रीय सरकार जिसमें माननीय प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी जी से अधिक अपेक्षा है, क्योंकि उनकी विजय में युवाओं का सवार्धिक योगदान रहा है। हमारे युवकों को सर्व प्रथम रोजगार मिले, उचित शिक्षा हेतु साधन मिलें, शिक्षण संसाधनों तथा शिक्षकों की गुणवत्ता में सुधार हो। छात्रावास, शिक्षा ऋण बिना ब्याज/कम ब्यज दर पर उपलब्ध हो, जिसके लिए वर्तमान सरकार प्रयासरत भी है। जैसे कौशल विकास योजना, मानव संसाधन का विकास, मेक इन इण्डिया, डिजिटल इण्डिया, असंगठित क्षेत्र के कामगारों को प्रशिक्षण। हमारे देश में काम करने लायक प्रशिक्षित आबादी 5 प्रतिशत ही है। ऐसे लोगों को प्रशिक्षित कर रोजगार उपलब्ध कराना अनिवार्य है। क्योंकि भारतीय युवाओं का विदेश में उनके ज्ञान बुद्धि का खूब सम्मान हो रहा है। पश्चिमी देशों में भारतीय युवाओं को अनेकों महत्वपूर्ण अवसर प्राप्त हो रहा है तथा वे उनकी अपेक्षा पर खरे भी उतर रहे हैं।
अतः भारत को विकास के पथ पर अग्रसर होने के लिए युवाओं का विकास अत्यन्त महत्वपूर्ण है। किसी भी देश के विकास में वहाँ की राजनीति का भी बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहता है। इसीलिए इस वर्ष शिक्षक दिवस के अवसर पर एक प्रश्न के उत्तर में प्रधान-मन्त्री ने बड़ी बेेबाकी से कहा कि अच्छी राजनीति के लिए सभी क्षेत्र के योग्य युवाओं को राजनीति में अवश्य आना चाहिए। उन्होने स्वतन्त्रता आन्दोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय देश के योग्यतम युवा राजनीति में सक्रिय थे इसीलिए वह समाज को पे्ररणा दे सके। आज राजनीति में पे्ररणा देने में सक्षम युवाओं की आवश्यकता है, जिससे समाज व राजनीति में व्याप्त निराशा का भाव समाप्त होकर सकारत्मक वातावरण बन सके। भारत को ऐसे युवा वर्ग की प्रतीक्षा है।
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