Saturday, September 6, 2014

उत्तराखण्ड के विकास में प्रकृति एवं विज्ञान की अनदेखी न करें - चेतन चैहान एवं प्रेम बडाकोटी

उत्तर-पश्चिमी हिमालय में बसे राज्यों मेंउत्तराखण्ड ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जहाँ वन-क्षेत्रों में कमी आई है। स्वतन्त्रता के बाद पिछले कालखण्ड को छोड़ भी दें तो केवल 2001 से 2013 तक राज्य में 500 वर्ग किलोमीटर वन काटे गए हैं। जबकि इसी दौरान हिमांचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की हरित पट्टी में फैलाव हुआ है। उŸाराखण्ड में हरित पट्टी का सर्वाधिक नुकसान उŸारकाशी और रूद्रप्रयाग जिले में हुआ है। ये वे क्षेत्र हैं, जो पिछले व इस वर्ष अचानक आए मानसून के कारण आने वाली बाढ़ के केन्द्र में थे।
इसके अतिरिक्त वनों की सघनता में भी कमी आई है, जो मानसूनी बरसातों की तेज वृष्टि को रोकने के लिए जरूरी होती है। एक रिपोर्ट के अनुसार उŸाराखण्ड के वनों में वृक्षों का घनत्व घटा तथा घने वनों की पट्टी भी कम हुई है।
नेचर कंजर्वेशन फाउन्डेशन के जीव विज्ञानी टी॰एस॰ शंकर रमन के अनुसार, ‘घने वन मानसूनी बारिश के पानी को सोखते हैं, जिससे नुकसान नहीं होता। वनों की सघनता कम होने से उसकीे पानी रोकने की क्षमता भी कम हो जाती है, जिससे मिट्टी का कटाव होता है।’
वनों के कटाव के साथ-साथ पिछले दशक से पारिस्थितिकी की दृष्टि से कमजोर राज्य के भीतरी क्षेत्रों में मानव निर्मित सड़कों का महाजाल फैला है। इन मार्गों के निर्माण में जियाॅलोजिकल वैज्ञानिक संवेदनशील व सक्रिय टैक्टाँनिक फाॅल्ट-लाइन्स को बचाने में अहमं भूमिका निभा सकते थे, लेकिन या तो वे इसमें शामिल नहीं थे अथवा उन्हें नजर अंदाज किया गया।
बेंगलूरू के जवाहर लाल नेहरू सेन्टरफाॅर  एडवांस साइन्टिफिक रिसर्च के प्रोफेसर के॰एस॰ वैद्य कहते हंै, ‘यह ध्यान देना बहुत जरूरी है कि सड़कें पानी के प्राकृतिक बहाव वाले रास्तों में रूकावट न बनें, जिस कारण बाढ़ अधिक विकराल रूप धारण कर लेती है। लेकिन चेतावनी के बावजूद अधिकतर सड़कें पुरानी फाॅल्ट लाइनों पर ही बनाई गईं। ’दशकों से प्रशासन द्वारा राज्य के जियोलाॅजिकल स्वरूप व जल मार्गों की  ‘आपराधिक अनदेखी’ के कारण ही बाढ़ से जान-माल का नुकसान हुआ है।’  जबकि नेशनल डिजास्टर मैनेजमेन्ट अथाॅरिटी ने राज्य के मार्ग निर्माण में भू-विज्ञानियों के मत को शामिल करने की बात कही थी।
इसी के साथ राज्य में बड़ी संख्या में चल रहे हाइडेल प्रोजेक्ट्स से जुड़े खतरों पर भी बहस चल रही है। गतवर्ष की त्रासदी के बाद राज्य में नदी जल के बहाव से जुड़ा एक अध्ययन भी सामने आया है। हालांकि इस शोध की उन सिफारिशों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, जिसमें राज्य में बेतरतीव विकास को रोकने पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही राज्य की इकोलाॅजी पर हाइड्रो परियोजनाओं के असर के अध्ययन के लिए पूर्व कैविनेट सेक्रेटरी बी॰के॰ चतुर्वेदी की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने जल के न्युनतम बहाव की सीमा 30 प्रतिशत (सर्दियों में 50 प्रतिशत) तय की थी।
दिल्ली स्थित साउथ ऐशियन नेटवर्क फाॅर रिसर्च, डेम्स एण्ड पीपल नामक एक सलाहकार समूह के हिमांशु ठक्कर के अनुसार, जून 2013 की त्रासदी को बेतरतीव हाइडेल प्रोजेक्ट्स को रोकने वाली बड़ी चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए था, पर ऐसा नहीं हुआ।
उŸाराखण्ड के विज्ञान सम्मत विकास के साथ ही हमें उसकी अनेक विशेषताओं का ध्यान रखते हुए भी विकास सम्बन्धी योजना बनानी चाहिए। कयोंकि यहांँ से वह भगीरथी प्रवाहित होती है, जो हमारे पूर्वजों के पुरूषार्थ एवं सतत् साधना का उद्घोष है और जो सम्पूर्ण भारत को ही नहीं तो सम्पूर्ण भारतीयता को एक सूत्र में बांधे रखने का वह अलौकिक तत्व है जो हम अपनी भावी पीढ़ी को किस रूप में सौपना चाहते हैं? इस सन्दर्भ में अनेकानेक यक्ष-प्रश्न हैं। इस हेतु आवश्यकता है कि, पहले हम समग्रता से इस क्षेत्र को जानें और फिर उसके अनुसार अपने अतीत को वर्तमान की कसौटी पर उतार कर भावी पीढ़ी को सौंपने की भगीरथ साधना को आगे बढ़ायें। इस निमिŸा उŸाराखण्ड की कुछ विशेषताओं को यहांँ पर दर्शाया गया है, अतः उन विशेषताओं के अनुरूप इस प्रदेश के विकास की रूपरेखा बनाई जाये, यह आज की आवश्यकता है।
इस क्षेत्र की प्रकृति और विज्ञान सम्मत जो विकास होगा, उससे यहाँ आर्थिक समृद्धि आयेगी, रोजगार सृजन होगा, पलायन रूकेगा, सीमा का क्षेत्र सशक्त प्रहरी बन कर खड़ा होगा और पर्यावरण संरक्षण के साथ ही केवल भारत ही नहीं तो सम्पूर्ण विश्व के आकर्षण का केन्द्र भी बनेगा।  क्योंकि, सही सोच से उŸाराखण्ड को अभिशाप बनने से बचाकर, वरदान बनाया जा सकता है? पर! यह स्मरण रखना चाहिए, ‘समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।’ ु
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