Saturday, September 6, 2014

पूर्व ही करें विपत्ति हित शोध.- दयानन्द जडि़या ‘‘अबोध’

विनय है प्रभु से बारम्बार।
आपदायें मत करें प्रहार।।
न दैहिक, दैविक, भौतिक, कष्ट।
किसी का तन, घर कर दें नष्ट।।
न किंचित हो विवेक बल ह्रास।
बढ़ंे विपदा में हम सोल्लास।।
न अब तक हुआ किसी को ज्ञात।
विपति कल कर देगी आघात।।
इसलिये हम विवेक बल, ज्ञान।
न होने दें इनका अवसान।।
सहायक बनें कर्म पथ ग्राह्य।
न समझें विपदा में रिपु बाह्य।।
विपद हो कैसी भी घनघोर।
न ताकें शासन की मुख ओर।।
मदद को फैला कर निज हाथ।
कहें मत डरो बन्धु! हम साथ।।
मिले सब को घर, भोजन, वस्त्र।
रहे इस हित चिंतन सर्वत्र।।
करें हम ऐसे सभी प्रबन्ध।
चलें सब मिला कन्ध से कन्ध।।
साथ है शासन का भी काम।
मदद हित करे प्रबन्ध तमाम।।
आपदा हित हो संचय कोष।
दिलाये औषधि राहत तोष।।
पूर्व ही हो विपत्ति हित शोध।
यही इच्छा बस एक ‘‘अबोध’’।।
- ‘चन्द्र-मण्डप’, 370/27, हाता नूरबेग,
संगम लाल वीथिका, सआदतगंज, लखनऊ-226003
दूरभाष: 9235989096