Saturday, September 6, 2014

लाल किले की प्राचीर से 68वें स्वतन्त्रता दिवस का ऐतिहासिक संदेश - आशीष वशिष्ठ

लाल किला हमारे पिछले 67 स्वतन्त्रता समारोहों का गवाह है, परन्तु इस साल 15 अगस्त को 68वें स्वतन्त्रता दिवस के समारोह में लाल किले ने वह देखा-सुना! जो उसने पहले कभी नहीं देखा-सुना था।
1. इस स्वतन्त्रता के मौके पर आजाद भारत में जन्मे पहले प्रधानमन्त्री के रूप में नरेन्द्र मोदी नेे लाल किले पर अपने विशिष्ट अन्दाज में झण्डा फहराया।
2. राष्ट्रीय स्वाभिमान, संस्कृति और विकास की प्रतीक परम्परागत पगड़ी नरेन्द्र मोदी ने पहनी हुई थी, जिसमें भारतीय संस्कृति के केसरिया रंग में समाई सफेद बिन्दियां विविधता में राष्ट्रीय एकात्मता तथा हरे-धानी रंग की कलंगी मानो विकास का प्रतिनिधित्व कर रही थी।
3. आजादी के पावन पर्व पर देशवासियों को भारत के प्रधान सेवक की अनेक-अनेक शुभ कामनाएं देते हुए जब उन्होनंे कहा ‘मै आपके बीच में प्रधानमन्त्री के रूप में नहीं प्रधान सेवक के रूप में उपस्थित हूँ।’ यह सम्बोधन अपने आप में महत्वपूर्ण कार्य सांस्कृतिक परिवर्तन का द्योतक है।
4. लिखित भाषण की प्रचलित परम्परा को तोड़ प्रधानमन्त्री ने अपने सम्बोधन से सीधे जन-संवाद स्थापित कर, यह संदेश दिया, कि हम आप से विशिष्ट व अलग नहीं हैं।
5. स्वतन्त्रता दिवस पर पहली बार विशिष्ट नागरिकांे के साथ देश की जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित की गई।
6. स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्र गीत के साथ पहली बार वंदेमातरम का मन्त्र गूँजा।
7. भाषण के बाद वापसी के लिए कार में बैठे प्रधानमन्त्री जब 68वें स्वतन्त्रा दिवस को आकार दे रहे बच्चों के पास पहुंँचे, तो कार से उतर कर सीधे बच्चों के बीच पहुँच गए और उनसे हाथ मिलाए।
68वें स्वतन्त्रता दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर लाल किले की प्राचीर से अपनी जनता के बीच खड़े इस जननेता के संवाद में सारा जोर पुराने ढ़र्रे की कई दीवारें गिरानें और राष्ट्र निर्माण का नया खाका सामने रखने पर था। नियति, नीति और नजरिए की पुरानी दीवारें गिराकर ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ का सपना साकार करने पर उन्होनें बल दिया।
जनमत की ताकत से लालकिले तक पहुँचे मोदी ने सुनिश्चित किया कि स्वाधीनता दिवस सम्बोधन के दौरान उनके और जनता के बीच बुलेटपू्रफ काँच की कोई भी दीवार न रहे और उन्होने यह कर दिखाया।
योजनायंे केवल राजनेताओं के नाम पर ही न चलें, तो इसमें सीधी भागीदारी जन प्रतिनिधियों की सुनिश्चित करते हुए ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ की घोषणा ही नहीं की तो सांसद विकास निधि का उपयोग स्कूलों में शौचालय निर्माण तथा प्रतिवर्ष 3 से 5 हजार आबादी वाले एक गाँव को आदर्श बनाने पर व्यय हो, इस हेतू 11 अक्टूबर जयप्रकाश नारायण जयन्ती पर इसकी स्पष्ट रूपरेखा देने का भी संकेत किया।
केवल राजनेता, जनप्रतिनिधि और शासक, प्रशासक ही नहीं तो जन-जन की राष्ट्रीय विकास में भागीदारी हो, इसके लिए गाँधी जयन्ती, 2 अक्टूबर से स्वच्छ भारत अभियान की घोषणा की, जिसके अन्र्तगत 2019 तक गाँव, शहर, मोहल्ला, अस्पताल, स्कूल, मन्दिर सभी क्षेत्रों को गंदगी मुक्त बनाने का लक्ष्य, एक महत्वपूर्ण कदम है।
कोई भी राष्ट्र तभी सामथ्र्यवान हो सकता है, जब उसका जन-जन सामथ्र्यवान हो, इस विचार को मूर्तरूप देने के लिए प्रधानमन्त्री जन-धन योजना की भी घोषणा की गई। जिसके अन्र्तगत प्रत्येक भारतवासी का बैंक में एक खाता, एक डेविट कार्ड और एक लाख रूपये तक के बीमें का प्रावधान होगा।
किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए वहाँ के सम्पूर्ण समाज की गहरी भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसके लिए उन्होनें सरकार में बैठे हुए लोगों की सामथर््य को जगाते हुए कहा ‘मेरा क्या, मुझे क्या’, की भावना से मुक्त होकर भारत की नियति ‘राष्ट्र-कल्याण की भावना’ से कार्य करें।
विकास का पहिया उद्योगों से घूमता है, जिसके लिए मोदी के नए मन्त्र ‘मेक इन इण्डिया’ ने देश व दुनियाँ का ध्यान खींचा, वहीं उसके लिए उन्होंने भारतीय उद्यमियों को विकास की विश्वनीयता व प्राकृतिक संरक्षण की दूरगामी नीति ‘जीरो डिफेक्ट व जीरो इफेक्ट’ का संदेश देकर अपने कार्य की दिशा व दशा का भी परिचय दे दिया।
‘नैतिक जीवन मूल्य’ विकास क्रम में सबसे महत्वपूर्ण व सबसे ऊपर हंै, यह कार्य सरकारों पर नहीं तो मोदी ने अभिभावकों को सौंपा और प्रश्न किया, क्या वह अपने बेटों से पूछताछ करते हैं, कि उनका बेटा क्या कर रहा है, कहाँ जा रहा है? क्योंकि युवा ही भारत का भविष्य है और उसके राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण परिवार से ही सम्भव है, जिससे मांँ-बहन-बेटियों के सम्मान व सुरक्षा की गारन्टी सुनिश्चित होगी।
मोदी ने भारत को गरीबी के अभिशाप से मुक्ति के लिए गरीबी उन्मूलन नहीं, गरीबी निर्मूलन के महामन्त्र के साथ, पड़ोसी देशों से शान्ति व प्रगति के लिए साथ-साथ चलने का अह्वान कर, अपनी प्राथमिकताएं बता दीं। राजनीतिक परिदृश्य में मोदी दूसरे नेताओं से काफी अलग हैं। वास्तव में वह राजनीति को राष्ट्र निर्माण की जागृति का हिस्सा मानते हैं, क्योंकि वह विवेकानन्द के उस आध्यात्मिक और राष्ट्रीय भाव से प्रेरित हैं, जैसा कि 19वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में उन्होनंे कहा था। वास्तव में मोदी खुद को अपने पद से अलग रखते हुए, भारत को वैश्विक शक्ति से जोड़ रहे हंै। वह चीजों को बदलने में दक्ष हैं और अपने नियम खुद तय करते हैं। यही कारण है कि स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लालकिले से दिये प्रधानमन्त्री के भाषण ने बड़ी तादाद में लोगों को प्रभावित किया। ु