हमारे देश की नदियाँ पहले शुद्ध जल से परिपूर्ण थीं जिसका पान एवं स्नान कर लोग आनन्द की अनुभूति करते थे। इन्हीं पावन नदियों के तट पर हमारे प्रमुख तीर्थ स्थल स्थित हैं। प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनि नदियों के किनारे स्थित इन तीर्थ स्थलों पर प्रकृति की गोद में रहते थे। सृष्टि के सभी जीव-जन्तुओं एवं पेड़ पौधों से उनका पारिवारिक सम्बन्ध होता था। वे अपने बच्चों के समान प्रकृति के प्रत्येक अवयव की देखभाल एवं सुरक्षा करते थे। नदी तट पर स्थित आश्रम शिक्षा का केन्द्र थे जिससे देश के भावी कर्णधार प्रकृति के प्रति स्वाभाविक प्रेम का पाठ पढ़ कर एवं उसे आत्मसात कर जीवन की कर्मभूमि में प्रवेश करते थे। नदियों की पावन धारा के निर्मल प्रवाह के साथ ही नदी तट पर स्थित इन आश्रमों से ज्ञान-विज्ञान की पावन यशस्वी धारा भी सतत प्रवाहित होती थी जिससे यह भारत देश जगद्गुरु के रूप में समस्त विश्व के लिये पे्ररणा का स्रोत था।
नदी तट पर स्थित वे तीर्थं आज भी विद्यमान हैं किन्तु नदियों का जल पीना तो दूर, नहाने लायक भी नहीं है। तीर्थ स्थलों की हरीतिमा लुप्त हो गई है। तीर्थ स्थलों की गन्दगी से मन कराह उठता है। तीर्थ स्थलों पर पक्के निर्माण तो लगातार हो रहे हैं किन्तु उनके पर्यावरणीय विकास पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। वस्तुतः तीर्थस्थलों का विकास पाँच सितारा संस्कृति से भिन्न है। तीर्थ स्थलों का पर्यावरणीय विकास करकेे ही उन्हें आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत बनाया जा सकता है। दुर्भाग्यवश इस दिशा में प्रभावी प्रयास नहीं हो सके हंै।
निश्चित रूप से यह बहुत बड़ा कार्य है जिसके लिये लगातार प्रभावी प्रयास की आवश्यकता है। इस दिशा में विचार करने पर मुख्यतः तीन कार्य किये जाने की आवश्यकता दृष्टिगोचर होती है -
¨ पहला नदियों एवं पवित्र कुण्डों की सफाई।
¨ दूसरा तीर्थस्थलों को हरा-भरा करना।
¨ तीसरा तीर्थस्थलों को पालीथीन मुक्त करना।
मेरा यह अनुभव है कि पालीथीन मुक्त करके हम किसी भी क्षेत्र को स्थाई रूप से गन्दा होने से बचाते हैं। नदियों को स्वच्छ रखने एवं सभी प्रकार के पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिये वनों एवं वृक्षों की सुरक्षा तथा अधिक से अधिक पौधारोपण ही एकमात्र विकल्प हैं। उक्त समस्या के दृष्टिगत राष्ट्रीय वन नीति में देश के भौगोलिक क्षेत्रफल का 1/3 अर्थात् कुल भू-भाग का 33 प्रतिशत वनों एवं वृक्षों से आच्छादित करने का लक्ष्य रखा गया है किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के 67 वर्ष बाद भी हम इस लक्ष्य से काफी पीछे हैं। वर्तमान में देश के कुल भू-भाग का 20.60 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है एवं उत्तर प्रदेश के कुल भू-भाग का मात्र 5.56 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। उक्त से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में पौधारोपण की दिशा में विशेष प्रयास की आवश्यकता है। अतएव इस दिशा में किये गये कतिपय कार्यों का उल्लेख यहाँ पर किया जा रहा है।
¨ माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर - लखनऊ से लगभग 30 कि॰मी॰ दूर बख्शी का तालाब के आगे माँ चन्द्रिका देवी शक्तिपीठ परिसर स्थित है। नवरात्रि, अमावस्या एवं अन्य अवसरों पर वहाँ अपार भीड़ होती है। यह महाभारत कालीन एवं श्री कृष्ण से जुड़ा तीर्थस्थल है। इस मन्दिर का परिसर अत्यन्त विशाल है। इसी परिसर में सुधन्वा कुण्ड स्थित है। यहाँ पालीथीन की अधिकता के कारण यह कुण्ड धीरे-धीरे प्रदूषित हो रहा है तथा उसकी मछलियाँ भी मर रही हैं।
अतः मेरे मन में विचार आया कि क्यों न इस परिसर को पालीथीन प्रदूषण मुक्त कराने का प्रयास किया जाय। मेरे विभागीय मित्र श्री ए॰पी॰ सिन्हा एवं श्री वी॰के॰ मिश्र के सहयोग से दिनाँक 11.09.2011 को मन्दिर समिति के अध्यक्ष श्री अखिलेश सिंह चैहान, महामन्त्री श्री अनुराग तिवारी ‘अन्नू’, डा॰ एस॰के॰ सिंह, श्री बी॰डी॰ सिंह, सभी दुकानदारों एवं स्थानीय व्यक्तियों के साथ बैठक की गई। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि दिनाँक 28.09.2011 से इस परिसर को पालीथीन मुक्त किया जायगा। उसके बाद आस-पास के कुम्हारों के साथ बैठक कर कुल्हड़ आपूर्ति की व्यवस्था की गई। पालीथीन थैली के विकल्प रूप में दुकानदारों को कागज एवं वैकल्पिक थैले उपलब्ध कराये गये। इस प्रकार प्रथम चरण में दुकानों पर पालीथीन कप के स्थान पर कुल्हड़ लाये गये तथा पालीथीन थैलियों के स्थान पर कागज एवं अन्य थैलों का प्रयोग प्रारम्भ किया गया।
इस सफलता को स्थायित्व देने के लिए यह विचार किया गया कि स्थानीय ग्रामवासियों, मन्दिर समिति के लोगों एवं दुकानदारों को किसी श्रेष्ठ सन्त से सौगन्ध दिलाई जाय। इसी के क्रम में दिनाँक 28.09.2011 को नवरात्रि के प्रथम दिवस पर मन्दिर परिसर में मेरे आध्यात्मिक गुरु सन्त स्वामी महेशानन्द जी द्वारा सभी को परिसर को पालीथीन मुक्त करने की शपथ दिलाई गई। शपथ ग्रहण समारोह में मन्दिर समिति के संरक्षक श्री भगवती सिंह जी, लखनऊ विश्व विद्यालय के प्रो॰ हरि शंकर मिश्र एवं अनेक शिक्षाविद्, मन्दिर समिति के सभी पदाधिकारी, वन विभाग के अनेक सहयोगी, परिसर के सभी दुकानदार एवं अनेक स्थानीय लोगों द्वारा परिसर में पालीथीन का प्रयोग न करने का संकल्प लिया गया। इस समय तक परिसर में काफी सीमा तक दुकानों को पालीथीन मुक्त किया जा चुका है। श्रद्धालुओं एवं भक्तों द्वारा पालीथीन का प्रयोग रुकवाने एवं मेला के दिनों में बाहर से आने वालों सेे पालीथीन रुकवाने की दिशा में मन्दिर समिति के सहयोग से प्रयास जारी है।
दिनाँक 28.09.2011 को ही स्वामी जी द्वारा कृष्णवट का रोपण कर परिसर में वृक्षारोपण का शुभारम्भ कर दिया गया जो अब वृक्ष का रूप ले रहे हैं। इसके बाद मेरे मन में यह विचार आया कि इतने विशाल परिसर में सुनियोजित ढंग से न केवल पौधारोपण कराया जाय बल्कि उसे स्थापित कर इसे हरा-भरा किया जाय। वृक्षारोपण के बारे में मेरा यह अनुभव रहा है कि अनेक माध्यमों से प्रतिवर्ष व्यापक रूप से वृक्षारोपण किया जाता है किन्तु अधिकांशतः उनकी सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। पौधों की सुरक्षा बच्चे को पालने जैसी है। पौधारोपण के बाद लम्बे समय तक, जब तक कि वह पूर्णतः स्थापित न हो जाय, उसकी सुरक्षा आवश्यक है। वर्ष 2012 एवं 2013 में मन्दिर समिति एवं वन विभाग के सहयोग से व्यापक पौधारोपण किया गया। गोमती तट पर जल भराव वाले क्षेत्र में अर्जुन का रोपण किया गया एवं मन्दिर के आस-पास पीपल, पाकड़ एवं बरगद के साथ-साथ कैथ, बड़हर एवं आमरा जैसी अनेक लुप्त हो रही प्रजातियों को रोपित किया गया। इसमें धार्मिक महत्व को देखते हुये यहाँ कल्पवृक्ष का भी रोपण किया गया है। सन्तोष का विषय है कि सभी प्रजातियाँ न केवल जीवित हैं बल्कि अच्छी दशा में चल रही हैं।
अब यह देखकर बड़ी प्रसन्नता एवं सन्तोष का अनुभव होता है कि वहाँ पर चाय आदि की दुकानों पर मिट्टी के कुल्हड़, चाट की दुकानों पर पत्तल एवं अन्य दुकानों पर कागज के थैलों का व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। इससे वहाँ होने वाली गन्दगी में कमी आयी है। इस उल्लेखनीय पहल के लिये मन्दिर समिति के सभी पदाधिकारी, परिसर के दुकानदार एवं सहयोगी मित्रगण बधाई के पात्र हैं। मन्दिर परिसर में कराए गये कार्यों का स्मरण करने पर बरबस उन दो सहयोगियों की याद आती है जो अब इस दुनियाँ में नहीं रहे। श्री बबलू सिंह पालीथ्ीन मुक्ति एवं मो॰ इदरीश वृक्षारोपण कार्यक्रम में ऐसे लगे रहते थे जैसे उनके घर का कोई कार्य हो। इन मित्रों को याद करके आज भी आँख नम हो जाती है।
इसके अगले चरण में भक्तों द्वारा बाहर से लाई जाने वाली पालीथीन पर नियन्त्रण किये जाने की दिशा में अभी व्यापक प्रयास किये जाने की आवश्यकता है। पालीथीन का प्रयोग बन्द होना एवं जनसहयोग से पौधारोपण करने की यह स्वतः स्फूर्त छोटी सी पहल सुखद, प्रेरणास्पद एवं अनुकरणीय है।
¨ नैमिषारण्य - उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में स्थित नैमिषारण्य एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन तीर्थस्थल है। यह प्राचीन ऋषियों की तपस्थली रही है। प्राचीन काल में यहाँ सघन वन था, इसीलिये इस क्षेत्र का नाम नैमिषारण्य था, परन्तु वर्तमान में यहाँ वन नहीं बचे हैं। आज नैमिषारण्य में नैमिष मात्र बचा है, अरण्य गायब है। यह विचारणीय विषय है, जिस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है।
मेरे आध्यात्मिक गुरु श्री अखण्डानन्द आश्रम, वृन्दावन के स्वामी महेशानन्द जी हैं। कभी-कभी लखनऊ स्थित मेरे निवास पर उनका आना होता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल श्री विष्णुकान्त शास्त्री जी उनके गुरुभाई थे। जब भी स्वामी जी लखनऊ आते थे, शास्त्री जी से मिलने अवश्य जाते थे। शास्त्री जी एक बार लखनऊ प्राणि उद्यान में एक समारोह में आए थे, तब उन्होंने वन विभाग के अधिकारियों से कहा था कि वृन्दावन एवं नैमिषारण्य हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। आज न तो वृन्दावन में वन है और नही नैमिषारण्य में अरण्य। श्री राज्यपाल ने आग्रह किया कि वृन्दावन में वन एवं नैमिषारण्य में अरण्य स्थापित करने का विशेष प्रयास किया जाय। स्वामी जी के साथ मैं तीन बार शास्त्री जी से मिला। मेरे वन विभाग में कार्यरत होने के कारण उन्होंने मुझसे तीनों बार जोर देकर कहा कि वृन्दावन में वन एवं नैमिषारण्य में अरण्य स्थापित करने की दिशा में कुछ किया जाय। मैंने कुछ विभागीय अधिकारियों से इसकी चर्चा भी की किन्तु कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। बहुत दिन बाद मैंने समाचार पत्र में पढ़ा कि शास्त्री जी नहीं रहे। उस दिन के बाद मैं कई दिन तक व्यथित रहा। उनके हृदय की पीड़ा को मैने अपने मन में आत्मसात् किया एवं तय किया कि शास्त्री जी की इच्छा पूर्ण करने की दिशा में यथासम्भव प्रयास करूँगा।
इसी बीच मेरे मित्र श्री राधे कृष्ण दुबे द्वारा एक महीने तक नैमिषारण्य परिक्रमा पथ की पदयात्रा कर परिक्रमा पथ पर स्थानीय लोगों एवं वन विभाग के सहयोग से 88000 ऋषियों की स्मृति में 88000 पौधों का रोपण कराया गया। यह एक अद्भुत पदयात्रा थी जिसमें व्यापक जन समर्थन मिला। यह एक ऐसी पदयात्रा थी जिसे लम्बे समय तक याद किया जायगा। इस पद यात्रा में मुझे भी दो दिन सम्मिलित होने का अवसर मिला तथा कार्य को आगे बढ़ाने का संकल्प मन मे आकार लेने लगा। इसके अतिरिक्त चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर में पालीथीन मुक्ति एवं सफल वृक्षारोपण से मन में विश्वास उत्पन्न हुआ तथा नैमिषारण्य में इस दिशा में कुछ किए जाने का भाव जगा।
मेरे मित्र एवं प्रभागीय वनाधिकारी सीतापुर श्री वी॰के॰ मिश्र के सहयोग से नैमिषारण्य स्थित पहला आश्रम में दिनाँक 16 दिसम्बर, 2012 को पहली सभा की गई। इस सभा में विभिन्न आश्रमों के प्रमुख सन्त, व्यापार मण्डल के प्रतिनिधिगण, वन विभाग के अधिकारी कर्मचारी गण, मीडिया से जुड़े प्रतिनिधि एवं स्थानीय गणमान्य लोग उपस्थित थे। इस सभा में निर्णय लिया गया कि नैमिषारण्य स्थित श्मशान घाट एवं उसके आस-पास की भूमि पर वृक्षारोपण कार्य कराया जाय। वन विभाग के क्षेत्रीय वनाधिकारी श्री ए॰के॰ सिंह एवं अन्य कर्मचारियों को यह दायित्व दिया गया कि सम्बन्धित ग्राम प्रधान से उक्त भूमि का वृक्षारोपण हेतु प्रस्ताव प्राप्त किया जाय तथा उस पर विशेष ध्यान देकर रोपण कार्य कराया जाय। पालीथीन मुक्त क्षेत्र बनाने पर लोगों की राय थी कि यह अत्यन्त कठिन कार्य है। श्री ए॰के॰ सिंह अध्यक्ष व्यापार मण्डल के सुझाव पर यह तय हुआ 29 दिसम्बर सन् 2012 को नैमिषारण्य के प्रमुख साधु सन्त, व्यापार मण्डल के प्रतिनिधि गण एवं गणमान्यलोग माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर में आकर देखें कि वहाँ पर पालीथीन के विकल्प का कैसे प्रयोग किया जा रहा है तथा वहाँ गोमती नदी के किनारे किये जा रहे रोपण कार्य को भी देखें ताकि एक सकारात्मक एवं व्यावहारिक सोच जागृत हो सके।
दिनाँक 29 दिसम्बर सन् 2012 को चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर में सभा की गई। इस सभा में चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर के अध्यक्ष श्री अखिलेश सिंह चैहान ने सभी को वहाँ पर पालीथीन के विकल्पों को दिखाया। चाय एवं चाट की दुकानों पर कुल्हड़ एवं पत्तल का प्रयोग देखकर लोग बहुत प्रभावित हुये। इस सभा से एक सकारात्मक वातावरण बना तथा नैमिषारण्य के गणमान्य लोगों के मन में यह भाव आया कि पालीथीन के विकल्प का प्रयोग कर इसे हटाया जा सकता है। यह निश्चित हुआ कि दिनाँक 27 जनवरी 2013 को चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर के पालीथीन के विकल्प के विक्रेता को नैमिषारण्य लाया जाय तथा पालीथीन को बन्द करने की दिशा में आगे कार्यवाही की जाय।
दिनाँक 27 जनवरी 2013 को पालीथीन के विकल्प के विक्रेता के साथ मैं नैमिषारण्य पहुँचा। इस सभा में पहला आश्रम के महन्त जी एवं अन्य कई लोगों ने पालीथीन के विकल्प के रूप में प्रयोग की जाने वाली थैलियाँ खरीदीं। इस सभा में उत्तर प्रदेश में पालीथीन को प्रतिबन्धित करने के मा॰ उच्च न्यायालय के आदेश से सबको अवगत कराया गया। ललिता पीठ के श्री गौरी शंकर जी द्वारा सुझाव दिया गया कि यदि मा॰ उच्च न्यायालय के आदेश के क्रम में आग्रह करके प्रशासक से ललितापीठ को पालीथीन मुक्त करने का आदेश करा लिया जाय तो पालीथीन मुक्त करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। मेरे मित्र श्री विनय कृष्ण मिश्र जी के प्रयास से दिनाँक 8 मार्च 2013 को माँ ललिता देवी परिसर को पालीथीन मुक्त करने का आदेश रिसीवर महोदय से निर्गत हो गया। इस प्रकार पालीथीन मुक्ति की दिशा में एक सार्थक प्रयास हुआ।
इसके अतिरिक्त गोमती के तट पर शमशान घाट के निकट वन विभाग द्वारा स्थानीय गणमान्य नागरिकों के सहयोग से भूमि का प्रस्ताव प्राप्त कर वृक्षारोपण कार्य भी प्रारम्भ कर दिया गया। यह वह भूमि है जिस पर लगातार अतिक्रमण होता जा रहा था। नदी तट स्थित इस संवेदनशील भूमि पर 05 हे॰ क्षेत्र में वन विभाग एवं स्थानीय लोगों के सहयोग से विधिवत् पौधारोपण कार्य कराया गया। इसके अतिरिक्त बालाजी मन्दिर परिसर में पंचवटी, नवग्रह वाटिका एवं नक्षत्र वाटिका की स्थापना कराई गई। ईश्वर की कृपा से यहाँ पर रोपित सभी पौधे सुरक्षित एवं प्रफुल्लित हैं। इस समय वन विभाग के साथ-साथ स्वामी बालकृष्ण शास्त्री जी द्वारा इन पौधों की देखभाल की जा रही है जिसके लिये वे बधाई के पात्र हैं।
उक्त के अतिरिक्त गोमतीपार क्षेत्र स्थित पहला आश्रम की भूमि पर भी व्यापक रोपण तथा नैमिषारण्य से थोड़ी दूर स्थित रुद्रावर्त मन्दिर के पास हरिशंकरी स्थापित की गई। भगवान शिव के अद्भुत भक्त यहाँ के महात्मा जी द्वारा हरिशंकरी की स्वयं सेवा की जा रही है जिसके लिये वे साधुवाद के पात्र हैं। हरिशंकरी में ब्रह्मा, विष्णु, महेश त्रिदेव के प्रतीक रूप में पीपल, बरगद एवं पाकड़ का पास-पास रोपण किया जाता है, जो बड़े होने पर एक रूप हो जाते हैं।
¨ वृन्दावन - दिनाँक 11.05.2013 को वृन्दावन में साधुसन्तों एवं स्थानीय प्रबुद्ध लोगों के साथ वृन्दावन को हरा-भरा करने के सम्बन्ध में बैठक की गई। इस बैठक में तटिया स्थान के स्वामी मदन बिहारी दास द्वारा वृन्दावन को हरा करने में विशेष रुचि दिखाई गई। इसी दिन स्वामी मदन बिहारी दास जी के साथ उन स्थलों का भ्रमण किया गया जहाँ पौधारोपण कराया जा सकता था। भ्रमण के उपरान्त वृन्दावन दिल्ली मार्ग पर स्थित सुनरख क्षेत्र में में पौधारोपण कराने का निर्णय लिया गया। यहाँ पानी खारा है तथा पौधों को बचाने की विकट समस्या है। विशेष प्रयास करके वन विभाग की सहायता से 2013 वर्षाकाल में यहाँ पर 119 एकड़ क्षेत्र में पौधारोपण कार्य कराया गया। ईश्वर की कृपा से यहाँ अधिकांश पौधे जीवित हैं।
स्वामी मदन बिहारी दास जी द्वारा इस क्षेत्र की लगातार प्रभावी देखभाल की जा रही है। स्वामी जी का यह कार्य हम सबके लिए पे्ररणास्रोत एवं अनुकरणीय है।
¨ धौम्य ऋषि आश्रम, धोबियाघाट -हरदोई जनपद में गोमती के तट पर स्थित धोबियाघाट एक अद्भुत स्थान है। यह दो कारणों से अद्भुत है- पहला यहाँ भूमि से अनेक पानी के सोते निकलते हैं जो बाद में गोमती नदी में मिलते हैं तथा दूसरा गोमती के तट पर स्थित मन्दिर के सघन वन क्षेत्र को देखकर प्राचीन आश्रमों की परिकल्पना साकार रूप लेती है। आज के व्यावसायिक युग में यहाँ के सघन वन क्षेत्र को बचाये रखने के लिये यहाँ के महन्त श्री नारायणानन्द जी अभिनन्दन के योग्य हैं। मैं लोक भारती के मित्रों मुख्यतः श्री बृजेन्द्र पाल सिंह जी का आभारी हूँ कि उनके माध्यम से मुझे गोमती के तट पर स्थित ऐसे हरे भरे क्षेत्र में स्थित तीर्थस्थल का दर्शन करने का अवसर प्राप्त हुआ। लोक भारती के नेतृत्व में यहाँ पर एक सभा का आयोजन कर यहाँ पर पालीथीन बन्द करने पर विचार किया गया। यहाँ की सभा में हमें स्वामी जी एवं अन्य सभी का व्यापक सहयोग मिला एवं पालीथीन बन्द करने का अभियान यहाँ भी प्रारम्भ हो गया।
कभी-कभी मन में विचार आता है कि ऐसे प्रतीकात्मक रोपण से पर्यावरण प्रदूषण की समस्या नहीं हल होने वाली है। पर्यावरण प्रदूषण की विकट समस्या को देखते हुये थोड़ी देर लगता है कि बात तो सही है, किन्तु फिर अपनी ही कृति ‘नारद की भू-यात्रा’ की अन्तिम पंक्तियाँ मेरा पथ प्रदर्शन करती हैं -
‘घनी काली रातों में
सपनों के सूरज देखने से अच्छा है,
कि इस रात में जागकर
निःस्वार्थ प्रयास का
माँ प्रकृति की आराधना में
सरिता गिरि तरु उपासना में
एक छोटा ही दीप जलाएॅं
आज के मुख्य युगधर्म को निभाएॅं।
इस छोटे से चिराग की रोशनी में संशय के घनघोर अँधेरें में भी मुझे अपना कर्तव्य पथ साफ-साफ दिखता है और मैं उसी पर चलने का प्रयास भी कर रहा हूँ। ु
- उप वन संरक्षक, कार्यालय प्रमुख वन संरक्षक,
17, राणा प्रताप मार्ग, उत्तर प्रदेश, लखनऊ।






