Saturday, September 6, 2014

16वीं लोकसभा के समक्ष राष्ट्र को गढ़ने की भारी चुनौती - डा॰ विशेष गुप्ता

नि.संदेंह 16वीं लोकसभा के लिए देश ने एनडीए को प्रचण्ड जनादेश दिया। उसी के तहत नरेन्द्र मोदी इस नई लोकसभा में बहुमत दल के नेता बने। अपने एक आदर्श मंत्री मण्डल के साथ उन्होंने देश के सोलहवें प्रधानमंत्री के रुप में शपथ ग्रहण की है। प्रधानमंत्री पद की इस शपथ में जिस प्रकार सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया गया उससे निश्चित ही सार्क परिक्षेत्र इस शपथ के भव्य आयोजन का गवाह बना। भाजपा-नीत एनडीए के नेतृत्व में सबका साथ-सबका विकास की अवधारणा पर आधारित पूर्ण बहुमत की इस सरकार से आम जन खासकर युवाओं ने बड़ी उम्मीदें लगा रखी हंै। देश को भी मोदी सरकार से बहुत अपेक्षाएं हैं। परन्तु पिछली यूपीए सरकार से मिलीं वे चुनौतियाँ भी उनके सामने हैं जिनसे मोदी सरकार को रुबरु होना पड़ेगा। इसलिए नई सरकार से उम्मीदें और उसके समक्ष आने वाली चुनौतियों की पड़ताल करने का भी आज यह उपयुक्त समय है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि देश में इस बदलाव की राजनीति के नरेन्द्र मोदी ध्वजावाहक बने हैं। पूरी दुनिया ने मोदी के इस राष्ट्रीय विजन को अनुभव किया। कहना न होगा कि ‘राष्ट्र सर्वोपरिता’ प्रत्येक देश के निवासियों का ट्टढ़ संकल्प होती है। जहाँ अन्य राजनीतिक दलों ने देश के विकास में राष्ट्र की भूमिका को पृष्ठभूमि में रखा, वहीं नरेन्द्र मोदी अपने पूरे अभियान में विकास और सुशासन में देश सर्वोपरि है, इस सच्चाई को कभी नहीं भूलें। गौरतलब है कि मोदी के ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ जैसे वाक्य ने दस साल पुरानी यूपीए-2 की मनमोहन सरकार के कुशासन, भ्रष्टाचार, मंहगाई व बेरोजगारी से देश को निजात दिलायी। इसमें कोई संदेह नहीं कि यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में संसदीय संस्थाओं को बहुत नुकसान पहुँचा है। पिछले दस सालों में संसद की प्रतिष्ठा कम हुई है। मनमोहन सिंह का यह कार्यकाल जहाँ सांसदों के व्यवहार और संसद की गरिमा को हुए नुकसान के लिए याद किया जायेगा, वहीं दूसरी ओर सरकार में होने वाले विभिन्न घोटालों के तमाम दागों से वे बच नहीं सकते। यही कारण रहा कि मनमोहन सिंह एक गैर हाजिर शिक्षक, पक्षपाती राजनेता और गैर अनुभवी राजनीतिज्ञ की छवि लेकर वापस हुए हैं।
समाज शास्त्रीयों का मत है  कि नई व्यवस्था की आधारशिला पुरानी व्यवस्था में ही रखी जाती है। इस चुनाव में भी ऐसा ही हुआ है। देश के लोग यूपीए-2 सरकार से आजिज आकर एक सशक्त, दृढ़ संकल्प और एक प्रभावी नेतृत्व वाली सरकार की राह देख रहे थे। वर्तमान के राजनीतिक परिदृष्य में चूकि नरेन्द्र मोदी ही इस भूमिका में उपयुक्त नजर आ रहे थे, इसलिए देश की जनता ने उन्हें अपना पथ प्रदर्शक बनाया। हालाकि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पूर्व ही उनके विकास और सुशासन के एजेन्डे पर काम भी होना शुरु हो गया है। परन्तु फिर भी देश के विकास से जुड़े और भी कुछ खास मुद्दे हैं जिन पर मोदी सरकार को बिना समय गंवाये काम करना है। इस संदर्भ में हाल ही में एडीआर द्वारा 525 संसदीय सीटों पर किया गया दुनियाँ का अब तक का सबसे बड़ा सर्वेक्षण उल्लेखनीय है। इसमें तकरीबन 2.5 लाख से भी अधिक लोगों ने अपना मत दिया। इसमें देश में समस्त पुरुषों व महिलाओं ने ग्रामीण व शहरी विभेद भूलकर पहली प्राथमिकता रोजगार और नौकरियों के बढ़ाने को दी है। दूसरी प्राथमिकता बुनियादी सुविधाओं मसलन पीने के पानी, स्वास्थ्य सेवाएं ओर प्राथमिक शिक्षा से सम्बधित रहीं हैं। तीसरी प्राथमिकता आधारभूत ढ़ांचे, सड़क, बिजली, पानी व सार्वजनिक परिवहन से जुड़ीं रहीं। अन्तिम रुप से लोग आज अच्छी कानून व्यवस्था तथा महिला सुरक्षा के साथ में शहरी व ग्रामीण गरीब सार्वजनिक वितरण प्रणाली से प्राप्त होने वाली खाद्य वस्तुओं के लिए काफी चिंतित हैं। ध्यान रहे कि इन मदों में केन्द्र सरकार का  आज इस बजट का खर्च लगभग 18 लाख करोड़ रुपये का है। इस हिसाब से नई सरकार के हिस्से में अगले पाँच सालों के लिए हर परिवार के हिस्से में सालाना तकरीबन चार लाख रुपये आते हैं। कहना न होगा कि पिछले दस साल के काल खण्ड में बजटीय खर्च और देश की जनता की प्राथमिकताओं का तालमेल बहुत बिगड़ा है। पिछली सरकार की स्थिति यह थी कि स्वास्थ्य और शिक्षा पर लगभग 24 हजार करोड़ रुपये का बजट था। परन्तु उसमें से कुल खर्च का केवल ड़ेढ फीसदी ही खर्च किया गया। यही वजह रही कि स्वास्थ्य के स्तर पर सरकार काम करने में नाकाम रही। शिक्षा क्षेत्र से जुड़ीं तमाम रिपोर्ट गवाह हैं कि 2010 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो जाने के बाद भी लाखों बच्चे अभी भी स्कूली शिक्षा से बाहर हैं। स्थिति यह है कि दर्जे पाँच व छह के बच्चे दूसरी व तीसरी कक्षा का सामान्य गणित भी हल नहीं कर पाते। देश में उच्च शिक्षा की दशा तो किसी से छिपी नहीं है। आज उच्च शिक्षा से जुड़ी विश्व की 200 संस्थाओं में भारत की एक भी संस्था नहीं है। आँकड़े खुद गवाह हैं कि उच्च व व्यावसायिक शिक्षा मुट्ठीभर लोगों के मुनाफा कमाने का जरिया बन गयी है। हाल के आँकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षा पाने वाले चार फीसदी छात्रों में से 65 फीसदी छात्र देश के बाहर रोजगार के लिए चले जाते हैं। निश्चित ही मोदी सरकार के सामने इस शिक्षा के स्तर को सुधारने की बड़ी चुनौती है। पुरानी सरकार के आर्थिक माॅडल ने जो काम किया उसमें एक ओर बहुमंजिले आशियाने बने हैं तो दूसरी ओर झोपड़-पट्टी में परिभाषित होते गरीब हैं। इस बीच नवउदारवादी विकास की असमान अंधीं दौड़ में अमीर और गरीब के बीच का फासला काफी बढ़ा है। यह सच है कि सरकारें हर आदमी के घर जाकर विकास का एजेंडा नहीं बाँट सकती। परन्तु यह जरुरी है कि समाज के अंतिम छोर पर रहने वाले कमजोर व गरीब तबकों को इस विकास की प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाय। यह तभी सम्भव है जब आमजन की क्रय शक्ति बढ़े और वे लोग इस अर्थव्यवस्था की धुरी बन जायें।
आज किसान की स्थिति के बारे में जरा गौर करें कि मनमोहन सरकार की सत्ता के दौरान नौ फीसदी खेती की जमीन किसानों से छीन ली गयी। तकरीबन तीन करोड़ से भी अधिक किसान निर्माण मजदूर में बदल गये। इसी बीच देशभर में लाखों किसानों ने आत्महत्यायें कर लीं। आखिर यह खेती-किसानी कैसे देश की आर्थिक मुख्यधारा से जुड़े, यह चुनौती भी मोदी सरकार के सामने रहेगी। निःसंदेह भारत आज भी गाँवों का देश है। परन्तु पिछली सरकार का जोर शहरीकरण पर ही अधिक रहा है। लिहाजा आज मोदी के विकास माडल में जरुरत यह है कि गाँव की अर्थव्यवस्था पुनः स्वावलम्बन की ओर बढ़े तथा लोग गाँव को वापस लौटंे। कड़वा सच यह है कि आने वाले दशक में भारत दुनियाँ का चैथा अरबपति देश होगा। साथ ही इसी कालखण्ड में भारत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का भी विश्व में पहले नम्बर वाला देश होगा। लिहाजा देश में इस बढ़ती असमानता के कारण यहाँ की व्यवस्था में फैले तनाव और निराशा को कम करने की चुनौती भी मोदी जी के सामने है। इसके अलावा जल स़्ा्रोतों का उपयोग, नदियों को जोड़ने व उनकी साफ-सफाई, गंगा की साँस्कृतिक विरासत को लौटाने जैसे मुद्दे तो उनकी प्राथमिकता की सूची में रहेगें ही। इनके अलावा नासूर बन रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों पर उचित कार्यवाही करने, समान नागरिक संहिता पर काम करने तथा जम्मू-कश्मीर के हालातों पर विस्तृत विमर्श मोदी सरकार की चिंता के विषय होने चाहिए।
निःसंदेह मोदी सरकार को ऐसी अर्थव्यवस्था विरासत में मिली है जिसकी विकास दर एक दशक में 8.2 से गिरकर 4.8 तक आ गई। अब मोदी को देश को नहीं, बल्कि राष्ट्र को नये सिरे से गढ़ना है। उन्हें राजनीतिक प्रशासन और नौकरशाही की जड़ता से भी लड़ना होगा। हालाँकि गुजरात को आर्थिक माडल के रुप में खड़ा करने के अनुभव के साथ अब देश की बागडोर संभालते हुए उन्हें यह भी साबित करना होगा कि उनमें श्रेष्ठ बौद्धिक क्षमता के साथ-साथ भावनात्मक परिपक्वता भी भरपूर है। देश में यह पहली बार है जब किसी राजनेता ने राष्ट्र को भारत माता के रुप में स्वीकार किया है। देश की बहुविध संस्कृतियों ने मोदी पर अटूट भरोसा किया है तो यह उनकी राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की ओर भी इशारा करता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी के सामने चुनौतियाँ बड़ी हैं। परन्तु दूसरी ओर उन चुनौतियों का सामना करने का उनका विजन भी उतना ही बड़ा और स्पष्ट है। मोदी अब राष्ट्र के नायक हैं तथा उन पर राष्ट्र के तकाजों को पूरा करने का भी दायित्व है। देश को आशा है कि भारत की राजनीति का यह सिकंदर सबका साथ लेकर सबके विकास के लिए प्राणपण से जुटते हुए राष्ट्र को प्रगति के उच्च शिखर पर ले जाने में कोई कसर बाकी नहीं रखेगा। ु
- एसोसिऐट प्रोफेसर, समाजशास्त्र
महाराजा हरिश्चन्द्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मुरादाबाद।