अंगे्रजी अखबारों नें सीसैट के मुद्दे पर चले आन्दोलन को ‘अंगे्रजी विरोधी’ माना, जो कि बिल्कुल गलत था। यदि ऐसा होता तो विद्यार्थी मुख्य परीक्षा में शामिल अंगे्रजी अनिवार्य प्रश्नपत्र का भी विरोध करते। पहले इसके भी अंक मेरिट में जुड़ते थे, जिसे विरोध के कारण बाद में क्वालीफाईंग कर दिया गया। दिल्ली उच्च न्यायालय 31 मई, 2013 का इस बारे में दिया गया निर्णय मूलतः तत्कालीन सरकार और यूपीएससी को खुले रूप में शक के घेरे में खड़ा करता है। अब, जबकि इस मामले पर विचार करने के लिए सर्वदलीय बैठक की जायेगी, बेहतर होगा कि सभी दलों के प्रतिनिधि भारतीय न्यायालय के इस निर्णय पर भी विचार करें। साथ ही इस बात पर भी कि मुख्य परीक्षा में शामिल ‘अंगे्रजी अनिवार्य’ का पेपर जरूरी क्यों है?
सवा सौ करोड़ की आबादी, जिसकी साठ प्रतिशत आबादी गाँवों में रहती हो, जिसके 45 प्रतिशत लोग अशिक्षित हों, उस देश में तीन प्रतिशत लोगों के द्वारा जानी जाने वाली अंगे्रजी भाषा की प्रशासकीय अनिवार्यता के मिथक की यथार्थवादी जाँच-परख होनी चाहिए और इस बात की भी कि जापान, चीन और फ्रान्स जैसे अंगे्रजी न जानने वाले विश्व के शक्ति सम्पन्न देश दुनियाँ के साथ कैसे जुड़े हुए हैं।
भाषा जैसे प्रश्न का सम्बन्ध केवल सिविल सेवा परीक्षा से ही नहीं है, बल्कि भारत जैसे देश की ‘सम्प्रभुता सम्पन्नता’ से भी है। ‘अनिवार्यता’ एक बात है और ‘आवश्यकता’ एक अलग बात। अंग्रेजी के सम्बन्ध में इन दोनों को मिलाकर नहीं देखा जाना चाहिए। साथ ही यह भी कि सिविल सेवा परीक्षा ‘अच्छे प्रशासकों’ का चयन करना नही है, बल्कि उन सम्भावनाओं की ‘तलाश’ करना है, जिन्हें अच्छा प्रशासक बनाया जा सकता है। इसके लिए अच्छे प्रशिक्षण की व्यवस्था है ही और यदि अंग्रेजी आवश्यक ही है तो इसे टेªनिंग के दौरान उन्हें उसी तरह अंग्रेजी सिखाई जा सकती है, जैसे औरंगाबाद के लड़के को तमिलनाडु कैडर मिलने पर तमिल सिखाई जाती है। साथ ही इस बात की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि सिविल सेवा परीक्षा से केवल भावी आईएएस और आईएफएस की ही भर्ती नहीं की जाती। अन्य लगभग बीस सेवाओं के लिए भी भर्ती होती है, जिनका न तो दिल्ली जैसे शहर से बहुत वास्ता होता है और न ही लंदन और न्युयार्क से। सच यह है कि इस पूरे मुद्दे को उसकी सम्पूर्णता और व्यावहारिकता में नए नजरिये से देखने की जरूरत है, अब तक बने बनाये ढर्रे से हट कर बिल्कुल आज के सन्दर्भ में। ऐसा अभी भी सरकार कर सकती है, क्योंकि 25 सालों के बाद ‘मजबूर’ नहीं ‘मजबूत’ सरकार मिली है।
- लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं।





