बचपन से दूसरों की मूर्खता के लिए एक कहावत सुनते आ रहे हैं, ‘‘जिस डाल पर बैठे हैं, उसी डाल को काट रहे हैं।’’ या कभी-कभी यह भी कहते सुना है, ‘‘जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं।’’ यह कहावतें पता नहीं, कुछ लोगों की मूर्खतापूर्ण कार्यों से बनी थीं या आज के प्रगतिशील कहे जाने वाले समाज के लिए हैं? जो भी हो! हाँ कालीदास की कहानी से यह अवश्य पता चलता है कि वह जंगल में जिस डाल पर बैठे थे, उसी डाल को काट रहे थे। और कहते हैं, उनके इसी गुण के कारण उनका विवाह एक बुद्धिमान लड़की विद्वोŸामा से करा दिया गया था, जिसके प्रभाव से कालीदास परम विद्वान व विश्व के प्रथम कवि बन गये। यदि यह सच है, तो निश्चित रूप से हमारे आज के समाज को किसी विद्वोŸामा की तलाश है? आइये, अपने कारनामों को स्वयं देखें और फिर निर्णय करें।
विद्वानों का मत है कि, मनुष्य इस ब्रह्माण्ड का सबसे बुद्धिमान प्राणी है, सम्भवतः इसीलिए उसने प्रकृति के साथ जीने का रास्ता चुना। हमारे पूर्वजों ने तो प्रकृति के साथ अपने रिश्ते मजबूत बनाये रखने के लिए पेड़ों, पत्थरों, पहाड़ों में देवत्व की स्थापना की, जल-स्रोतों, नदियों, पौधों में माँ के दर्शन किए और पशु-पक्षियों को देवताओं के वाहन के रूप में मान्यता देकर सदैव उनके सहअस्तित्व का मार्ग अपनाया।
मनुष्य को अपने जीवन के लिए सबसे पहले प्राणवायु की आवश्यकता होती है, जिसके बिना कुछ क्षण जीना भी असम्भव है। प्रकृति ने हमारी इस आवश्यकता की पूर्ति हेतु पेड़-पौधों की संरचना की, जो बिना कुछ लिए निरन्तर हमें प्राण वायु देते रहते हैं और हम उसका उपयोग करने के बाद जो प्रदूषित वायु (कार्बनडाई आक्साईड) प्रकृति को लौटाते हैं, उसको भी वह सोख कर, हमें उसके दुष्प्रभाव से बचाते हैं। स्वंय सोचें! यदि ऐसा न होता तो, हम क्या होते? हमारे पूर्वर्जों ने प्रकृति के इस रहस्य को समझ कर हमारे दैनन्दिन जीवन के लिए ऐसी व्यवस्थायें बनाईं, जो हमारे जीवन का सदैव सुरक्षा कवच बनी रहीं। उन्होंने हमे बताया था, पेड़ों में देवता का वास होता है, अतः हरे पेड़ को काटना पाप है और यह भी बताया कि अपनी जरूरत के लिए सूखी डाली का ही उपयोग करें और यदि जीवन रक्षण के लिए हरी वनस्पति की आवश्यकता पड़े तो प्रार्थना करके ही उसका उपयोग करें। परन्तु पश्चिम की संस्कृति ने कहा, प्रकृति में जो कुछ भी है, वह सब कुछ हमारे उपभोग के लिए है। वहीं विज्ञान रूपी आविष्कार ने उन्हंे जिस पेड़ पर बैठे थे, उसी डाल को काटने वाली कुल्हाड़ी भी उपलब्ध करा दी। हमारे पूर्वजों की सीख के कारण हरे पेड़ सुरक्षित बने रहते थे। इतना ही नही ंतो कुछ पेड़ों को सुरक्षित रखना आवश्यक समझकर, उन्हें काटना वर्जित ही कर दिया था, जिसके कारण समाज का सामान्य व्यक्ति आज भी पीपल आदि पेड़ों को काटने से बचता है।
परन्तु हमने विज्ञान के अधूरे ज्ञान और उसकी अधूरी समझ से वह सब किया, जिससे सावधान करने के लिए सदैव कहा जाता रहा है- ‘‘नीम हकीम, खतरे जान।’’ हमने पेड़ों को काटना प्रारम्भ कर दिया, क्योंकि अब हमें उनमें बसे किसी देवता या उन्हें काटने पर पाप का कोई डर नहीं बचा था। जब देश में अन्न संकट गहराया, तो आधुनिक ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने समाधान दिया, ‘अधिक अन्न उपजाओ’ आगे बढ़ना है तो बड़े-बड़े उद्योग चहिए। अधिक अन्न उपजाने के लिए अधिक खेत चाहिए और अधिक खेतों के लिए प्राणवायु की आवश्यकता को नजरंदाज करते हुए जंगलों को काटना प्रारम्भ हो गया।
पर, सच को कोई झुठला नहीं सकता। विज्ञान की अधूरी समझ के कारण जब पूरे विश्व के जंगल-बाग काट कर हमने खेत बना डाले, उन पर खेती करने लगे व बड़े-उद्योग खड़े कर लिए, तब हमारे आज के ऋषियों (वैज्ञानिक) नें चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा- ‘‘तैतीस प्रतिशत धरती पर हरे पेड़-पौधे चाहिए, तभी हमारी मानवता सुरक्षित रह सकेगी।’’ बस! फिर क्या था, अधिक अन्न उपजाओं के स्थान पर अब अधिक पेड़ लगाओं का नारा बुलन्द हो रहा है। अर्थात् हमारे ऋषियों ने जो हमंे सीख दी थी कि प्रकृति का विनाश पाप है, हरे पेड़ को काटना पाप है, तब हमने उनकी बात को अनसुना कर आज के ऋषियों की बात आँख बंद कर मानी और बाग, जंगल काटे और पाप किया। पाप का फल भोगना अवश्यमभावी है, जो हम कम होते जल, भूगर्भ जल स्तर, सूखते जल-स्रोत, सिकुड़ती व प्रदूषित होती नदियाँं, समाप्त होती कृषि भूमि की उर्वरा-शक्ति, कम होती खाद्यान्न की गुणवत्ता, आँखों से ओझल होती जैव विविधता और बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के रूप में भोग रहे हैं।
उŸार प्रदेश के संदर्भ में देखें, तो हमारे प्रदेश का वनावरण मात्र 7 प्रतिशत बचा है और यदि उसमें से तराई व पहाड़ी भाग को निकाल दे ंतो मैदानी क्षेत्र में मात्र 4 प्रतिशत वनावरण ही शेष है, परिणामतः गंगा कराह रही है, गोमती जैसी भूगर्भ जल स्रोतों से बहने वाली नदियाँ दम तोड़ रहीं हैं, निरन्तर बहने वाले छोटे नाले सूख चुके हैं, खेती की उर्वरा शक्ति समाप्त हो रही है। इसके साथ ही खेती के लिए आवश्यक पशुओं से विहीन होते गाँव, गाँवों से होता निरन्तर पलायन, जिससे वहाँ घर के स्थान पर सूने मकानों की निरन्तर बढ़ रही संख्या, दूसरी ओर शहरों का बढ़ता अनियोजित तथाकथित विकास व विस्तार, झुग्गी झोपडि़यों व फुटपाथ पर सोने वालों की बढ़ती संख्या, टूटते परिवारिक रिश्ते, शुद्ध पेयजल का बढ़ता संकट और न जाने कितनी जनमन को पीडि़त करने वाली नितनवीन घटित होती घटनायें।
अब प्रश्न उठता है कि, पाप का फल भोगना या उससे बचने के लिए प्रयाश्चित करना? आज के ऋषियों ने भी हमें प्रयाश्चित का ही मार्ग बताया है। अब हम कहने लगे हैं, ‘एक पेड़ सौ पुत्र समान’, हरे पेड़ काटने पर कानूनी शिकंजा, मारे गये पशु-पक्षिओं के प्रयाश्चित के लिए अभयारण्य, संरक्षण एवं संवर्धन स्थल तथा आगे प्रयाश्चित की तैयारी, जिसमें भूगर्भ जल निकालने हेतु बोरिंग बनाने के लिए परमिट, डार्कजोन में पानी निकालने पर लगने वाला प्रतिबन्ध, जितना भूगर्भ से पानी निकालो उतना वर्षाजल धरती की कोख में भरने की अनिवार्यता, पशु-पक्षियों एवं जैवविविधता संरक्षण के लिए लगने वाला टैक्स जैसे न जाने कितने प्रयाश्चित अपनी ना समझी के लिए करने अनिवार्य होंगे? कहते हैं, ‘‘गलती करना मनुष्यता है, पर गलती को बार-बार करना मूर्खता और की गई गलती से सबक लेकर आगे का मार्ग बनाना बुद्धिमŸाा है।’’ आज सम्पूर्ण समाज से उसी बुद्धिमŸाापूर्ण व्यवहार की आवश्यकता है। हम सब उस दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ा कर, सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
लोक भारती ने समाज की उस अपेक्षा व अपने नाम के अनुरूप प्रथमतः पर्यावरण संरक्षण हेतु लोक आधारित, लोक जागरण की योजना बनाकर उŸार प्रदेश के 999 विद्यालयों, महाविद्यालयों में जागरूकता कार्यक्रमों के आयोजन किए, जिनके माध्यम से लगभग दो लाख छात्र एवं शिक्षकों के साथ इस दिशा में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ताओं व विशेषज्ञों से सम्पर्क बढ़ाया। क्योंकि पर्यावरण संरक्षण में प्राणिमात्र के जीवन के लिए सर्वाधिक आवश्यक शुद्ध वायु, शुद्ध जल एवं शुद्ध खाद्यान्न आता है। अतः लोक भारती ने इन्हीं विषयों के लिए सामाजिक जागरूकता तथा आवश्यक प्रशिक्षण एवं समस्या निवारण के लिए करणीय कार्यों पर ध्यान केन्द्रित कर अपनी शक्ति-सामथ्र्य के अनुरूप क्रमशः कदम बढ़ाये।
शुद्व वायु के लिए आवश्यक है, 33 प्रतिशत भूभाग पर वृक्षावरण, इसकी पूर्ति के लिए पूरे देश के लिए सनातन आस्था केन्द्र नैमिषारण्य तथा उसके चैरासी कोसी परिक्रमा पथ पर सम्पूर्ण देश के स्थापित तीर्थ क्षेत्रों में श्री राधेकृष्ण दुबे के नेतृत्व में देववृक्ष अभियान चलाया गया, जिसके अन्तर्गत परिक्रमापथ के 108 गावों में एक माह की जागरूकता यात्रा, पौध-दान एवं पौधारोपण के आयोजन किए गये, जिसके परिणामस्वरूप परिक्रमा पथ के सीतापुर व हरदोई जिले में 88 हजार ऋषियों की स्मृति में 88 हजार पेड़ सामाजिक सहयोग एवं वन विभाग द्वारा सम्पूर्ण सुरक्षा व्यवस्था के साथ लगाये गये, जो नैमिषारण्य में अरण्यभाव को सार्थक करने का प्रभावी कदम सिद्ध हुआ है। इस अभियान की सफलता के परिणामस्वरूप लखनऊ के निकट गोमती तट पर स्थित चन्द्रिका देवी क्षेत्र, मथुरा जिले के वृन्दावन क्षेत्र में यमुना किनारे, गंगा तट पर श्रृंगवेरपुर क्षेत्र व गोमती की सहायक 700 कि॰मी॰ दूरी तक बहने वाली सई नदी क्षेत्र में वृक्षारोपण अभियान चलाया जा रहा है, जिसके अन्तर्गत हरियाली पखवारा, पौध-भण्डारा, वृक्षारोपण-यज्ञ, हरियाली-चूनर, हरियाली-चादर एवं वृक्ष-डोली जैसे कार्यक्रम प्रारम्भ हुए हैं। इन अभियानों में कृत संकल्पित, निरन्तर संलग्न अनेक विभूतियों का महत्वपूर्ण योगदान है।
वायु के बाद जल हमारी दूसरी अनिवार्य आवश्यकता है। इस विषय को समझने-समझाने के लिए सबसे पहले मासिक पत्रिका ‘लोक सम्मान’ के विशेषांक से प्रारम्भ करके जल विशेषज्ञों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की कार्यशालाएं, संगोष्ठियांँ, देश भर में किए गयेे कार्यों का अध्ययन एवं प्रत्यक्ष दर्शन व देश भ्रमण जैसे कार्यक्रम आयोजित हुए, जिसमें से वर्षा जल संग्रहण विधियों पर शोध, तकनीकी विकास एवं इसके लिए कार्य करने वाले व्यक्ति विशेष से लेकर कार्य-समूह एवं प्रशासनिक अधिकारियों तक में संकल्प जाग्रत हुआ और उसके प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाई देने लगे, जो पे्ररक व विश्वास पैदा करने वाले हैं। नगरों में वर्षाजल से भूगर्भ जल-भरण, नई बन रही कालोनियों में घरेलू मल-मूत्र युक्त जल के शोधन संयन्त्रों की स्थापना, जल-संकट से जूझते बुन्देलखण्ड के महोबा जिले में परम्परागत तालाबों की सामाजिक सहयोग से खुदाई-सफाई के साथ ही महोबा व बाँदा जिले में वर्ष 2013-14 में लगभग 100 खेत-तालाबों का निर्माण तथा 2000 तालाब बनाने का संकल्प केसर सिंह एवं उनकी टोली के सहयोग से लिया गया।
जल का सम्बन्ध वर्षा के साथ ही भूगर्भ-जल, ग्लैशियरों एवं नदियों से भी है। अतः लोक भारती ने जल एवं नदियों पर कार्य करने वाले अग्रणी संगठनों, व्यक्तियों से सम्पर्क, उनके कार्य का अध्ययन, उनके माध्यम से सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों के आयोजनों एवं उनके साथ प्रत्यक्ष कार्य में सहयोग की भूमिका के साथ कदम आगे बढ़ाये। प्रारम्भ में गंगोत्री से गंगा सागर तक आयोजित दो यात्राओं में सहयोग के अनुभव के परिणामस्वरूप संस्था का निश्चय बना, यदि गंगा को स्वच्छ जल युक्त रखना है तो गंगा में मिलने वाली सभी नदियों पर कार्य करना होगा। अतः संस्था ने उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड की सभी नदियों व उन पर कार्यरत व्यक्तियों, समूहांे की सूची बनाकर सम्पर्क किया और 23 व 24 जनवरी, 2011 को लखनऊ में ‘माँ गंगा समग्र चिन्तन वर्ग’ का आयोजन किया जिसमें 20 नदियों के 400 प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा उसी आयोजन में लोक भारती ने प्रत्यक्ष कार्यानुभव हेतु 960 किमी॰ मैदानी भाग में बहकर गंगा में मिलने वाली लखनऊ की जीवन रेखा, आदिगंगा गोमती के अध्ययन एवं सामाजिक जागरूकता हेतु एक सप्ताह की गोमती यात्रा का निश्चय किया, जो 28 मार्च से 3 अप्रैल, 2011 को गोमती प्रवाह के 13 जिलों में होती हुई 33 स्थानों पर गोमती मित्र-मण्डलों के निर्माण के साथ सम्पन्न हुई।
गोमती यात्रा के परिणामस्वरूप समाज में गोमती संरक्षण के प्रति आयी जागरूकता और प्रदेश सरकार को सौंपी गई उसकी कार्य योजना रिर्पोट ने तात्कालिक प्रदेश सरकार को भी प्रेरित किया और यात्रा के एक सप्ताह के अन्दर ही पीलीभीत जिले के गोमती उद्गम स्थल, माधौटाण्डा में प्रदेश सरकार के एक सचिव द्वारा वहाँ जिलाधिकारी, तहसीलदार एवं सिचाई विभाग के अधिकरियों के साथ निरीक्षण किया, जिसके बाद, पीलीभीत से लखनऊ तक गोमती को सुजला व प्रदूषण मुक्त रखने की कार्य योजना बनाई गई और तत्काल उसका क्रियान्वयन प्रारम्भ हो गया। क्रियान्वयन के प्रथम चरण में पीलीभीत में 47 किमी॰, शाहजहाँपुर जिले में 16 किमी॰ गोमती क्षेत्र की नाप, उसका चिन्हीकरण और खुदाई का कार्य किया गया। गोमती संरक्षण परियोजना को दिये जा रहे महत्व को इससे समझ सकते हें कि, पूरे-पूरे पृष्ठ के सभी समाचार पत्रों में विज्ञापन छपवाकर सरकार द्वारा अपने संकल्प की सार्वजनिक अभिव्यक्ति की गई। परन्तु इसके कुछ समय बाद हुए चुनाव में सरकार बदल गई और नई सरकार के आते ही अधिकारियों ने कार्य बंद कर फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
इसके बाद भी लोक भारती द्वारा पूरे गोमती क्षेत्र में गोमती संरक्षण हेतु नदी स्वच्छता अभियानों, जल के लैव परीक्षणों, तट, घाट एवं एस॰टी॰पी॰ के सामाजिक निरीक्षणों, उपवास, संगोष्ठी, ज्ञापन, प्रतिनिधि मण्डलों के मिलन, पत्राचार, समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं में लेखन गोमती क्षेत्र में वृक्षारोपण, आरती, दीपोत्सव जैसे सामाजिक व प्रशासनिक जारूकता के विविध कार्याें की निरन्तरता बनाये रखी। जिससे समाज के अनेक व्यक्ति व संगठन गोमती संरक्षण अभियान में सम्मिलित होते गए, वहीं सई, तमसा, ससुर खदेरी, हिन्डन, काली, मनोरमा आदि प्रदेश की अन्य नदियों के संरक्षण अभियानों में भी तेजी आयी, जिसका प्रभाव राजनैतिक क्षेत्र में कार्यरत लोगों पर भी हुआ और शासन के अधिकारियों ने भी जल, जल-स्रोत एवं छोटी नदियों के संरक्षण के लिए कुछ कदम उठाये। परिणामस्वरूप जून 2013 में मऊ जिले में तमसा तथा फतेहपुर जिले में स्वामी विज्ञानानन्द की प्रेरणा से ससुर खदेरी नदी के उद्गम से लेकर 36 किमी॰ तक मनरेगा से खुदाई, महोबा जिले में सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं जिलाधिकारी की अग्रणी भूमिका से जिले के प्रसिद्ध सरोवर कीर्तिसागर की हजारों लोगों ने निरन्तर लगकर खुदाई व सफाई का कार्य किया। लखनऊ में भी शासन, प्रशासन ने गोमती संरक्षण में सक्रियता दिखाई। तीन दिसम्बर, 2013 को लोक भारती की अग्रणी भूमिका में लखनऊ में शासन द्वारा जल-स्रोत संरक्ष्ण हेतु एक अभूतपूर्व क्रियान्वयन कार्यशाला का आयोजन मुख्य सचिव, कृषि उत्पादन आयुक्त (एपीसी) की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ, जिसमें प्रदेश में 50 नदियों एवं जल-स्रोतों पर कार्य करने वाले संगठनों के प्रतिनिधियों तथा 50 जिलों से जिलाधिकारी, सी॰डी॰ओ॰ व समकक्ष अधिकारियों के साथ ही प्रदेश के ग्राम विकास, भूमि संरक्षण विभाग के सचिव, ग्राम विकास व मनरेगा के आयुक्त सम्मिलित हुए और प्रदेश भर में जल-स्रोतों, झीलों, तालाबों व सिकुड़ती नदियों की खुदाई तथा उन पर वर्षाजल संग्रहण के लिए स्थान-स्थान पर जल-बंध (चेक डैम) बनाने की योजना बनी। जिसके परिणामस्वरूप गोमती की सहायक नदी छोहा पर 8, अंधरा छोहा पर 7 तथा बेहता पर 2 चेक डैम बनाए गए, जो मरती नदियों के पुनर्जीवन की दिशा में प्रेरक कदम है।
प्रदेश के अन्य जिलों के साथ ही पीलीभीत जिले में तत्काल गोमती पर पिछली सरकार के समय प्रारम्भ किए गये कार्यों को पुनः प्रारम्भ करने हतु सर्वेक्षण का कार्य पूरा करके, परियोजना पर कार्य प्रारम्भ हुआ, वहीं महोबा एवं बांदा जिले में एक-एक हजार खेत तालाब बनाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता व प्रशासन दोनांे सक्रियता निरन्तर प्रयत्न की उपलब्धि है।
लोक भारती भी महत्वपूर्ण भूमिका गंगोत्री से गंगा सागर तक चल रहे सामाजिक प्रयास ‘गंगा समग्र अभिायान’ में भी रही, जिसके सतत प्रयत्न के परिणाम स्वरूप वर्तमान सरकार ने गंगा की अविरलता-निर्मलता के लिए ‘‘नमामि गंगे’’ परियोजना प्रारम्भ की है। वहीं दैनिक जागरण ने इस जारूकता अभियान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए देव प्रयाग से गंगा सागर तक ‘गंगा यात्रा’ का आयोजन कर महत्वपूर्ण पहल की।
वायु, जल-स्रोत एवं नदियों के संरक्षण के साथ ही खाद्यान्न की गुणवत्तापूर्ण उत्पादकता एवं मृदा संरक्षण आवश्यक है, इस हेतु लोक भारती ने 2001 से सम्पूर्ण उत्तर भारत में जैविक खेती तथा 2012 से शास्वत खेती (जीरो बजट प्राकृतिक खेती) के प्रचार-प्रसार हेतु व्यापक व सघन अभियान चला रखा है, जिसके अन्तर्गत अभी तक मथुरा, अलीगढ़, झाँसी, बाँदा, देवरिया, लखनऊ, पीलीभीत, सहारनपुर, कन्नौज, बस्ती, कुरूक्षेत्र सहित 11 स्थानों पर बडे़-बड़े प्रशिक्षण वर्गों के आयोजन सम्पन्न हुए हैं, जिनमें 8 प्रदेशों के 50 से अधिक जिलों के लगभग 5 हजार किसानों नें प्रशिक्षण प्राप्त कर, माॅडल कृषि क्षेत्र विकसित किए हैं, जो इस कृषि-विद्या के विस्तार में सहायक हांेगे। जिससे किसान स्वावलम्बी, कृषि भूमि की उर्वरा-शक्ति का संवर्धन, गुणवत्ता-युक्त खाद्यान्न उप्पादन में वृद्धि, सिंचाई में केवल 10 प्रतिशत जल उपयोग से भू-गर्भ स्तर में बढ़त तथा जैवविविधता का संरक्षण संवर्धन होगा। यह कार्य एक देशी गाय से 15 से 20 एकड़ खेती में सम्भव है, अतः किसान गाय पालेगा, जिससे देशी गाय, किसान और किसानी का अभिन्न अंग बनेगी और उसका संरक्षण-संवर्धन सुनिश्चित होगा। इस हेतु आगामी प्रशिक्षण वर्ग 10 से 14 सितम्बर, 2014 को शाहजहाँपुर जिले के गांधी भवन में सम्पन्न होगा, इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में वाराणसी व छŸाीसगढ़ के रायपुर में जीरो बजट प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण वर्ग प्रस्तावित हैं।
इस प्रकार लोक भारती विभिन्न सामाजिक संगठनों, व्यक्तियों, विशेषज्ञों एवं शासन-प्रशासन तथा विभिन्न सम्बन्धित संस्थानों, प्रतिष्ठानों को सहभागी बनाते हुए निरन्तर आगे बढते हुए निम्ननांकित आयामों-अभियानों के लिए निरन्तर प्रयत्नशील है।
(1) मेरा गाँव-मेरा तीर्थ, (2) पर्यावरण संरक्षण, (3) वृक्षारोपण एवं हरियाली पखवारा (4). जल एवं नदी संरक्षण, (5) गंगा-समग्र एवं गोमती संरक्षण, (6) जीरो बजट प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण, (7) ग्रामीण तकनीकी विकास एवं प्रसार, (8) व्यक्तित्व विकास एवं गौरव सम्मान, (9) स्वयंसेवी संस्थाओं के मध्य समन्वय, (10) साहित्य एवं मासिक पत्रिका ‘लोक सम्मान’ का प्रकाशन तथा (11) समय के साथ गतिमानता हेतु ई-भारती एवं वेब साइड का उपयोग प्रारम्भ किया है, जिसके लिए सवाइींतजपपदकपंण्बवउएतपअमतण्हवउजपण्पदए उंहं्रपदमण्सवाइींतजपपदकपंण्बवउ तथा ूूूण्मइींतजपण्वतह पर संस्था से जुड़ा जा सकता है।
लोक भारती का कार्य लक्ष्य है - ‘भारत का विश्व में सर्वोच्च, गौरवपूर्ण स्थान’ बने, उसके लिए हमारे पास ‘वसुधैव कुटुम्बकम्ं’ की भावना के साथ प्रकृति-मूलक विकास का ध्येय मन्त्र है-
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे शन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मां कश्चिद् दुखः भाग्भवेत।।’’
- राष्ट्रीय संगठन मन्त्री, लोक भारती






