Saturday, September 6, 2014

सामाजिक दायित्व से भटक, व्यवसाय का रूप लेती शिक्षा. डाॅ॰ अंशु केडिया

सार्वभौम निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की माँग आजादी आन्दोलन के समय से उठी थी। ‘शिक्षा सबके लिए’ की माँग वैज्ञानिक, धर्म निरपेक्ष, जनवादी शिक्षा की परिकल्पना का अभिन्न हिस्सा थी। संविधान निर्माण के समय भी यह माँग उठी थी, परन्तु शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार की श्रेणी में न रख नीति निदेशक तत्व में शामिल करने पर ही सहमति बन पायी।
देश का संविधान समाजवाद, कल्याणकारी सभी के लिए समान अवसर जैसे सुन्दर शब्दों से युक्त है। आजादी के बाद देश के विकास के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनायी गयी। यह आर्थिक व्यवस्था निजी क्षेत्र व सार्वजनिक क्षेत्र दोनो के सहयोग पर आधारित थी। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्र सरकार की जिम्मेदारी थे। प्रारम्भ में सरकारों ने इसे अपना दायित्व समझा परन्तु धीरे-धीरे केन्द्र व राज्य सरकारें दोनों ही इस दायित्व से पीछे हटने लगीं। ज्ञातव्य है किसी भी देश के स्वस्थ विकास में शिक्षा का महत्पूर्ण योगदान है। अतः सरकारों से अपेक्षा की गयी कि इस क्षेत्र को नजर अंदाज न कर, पर्याप्त धन आवंटन किया जाए। शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति (1968) ने सुझाव दिया था कि कुल बजट का 6 प्रतिशत शिक्षा पर आवंटित किया जाना चाहिए। इस सुझाव के 46 वर्ष बाद भी सरकारें 3 से 4 प्रतिशत के बीच ही धनराशी शिक्षा पर आवंटित कर रही हैं। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग व यशपाल कमेटी सभी ने नामांकन दर बढ़ाने की बात की है। अब जब जरूरत है कि अधिक लोगों के नामांकन के लिए अधिक बजट दिया जाए, सरकारों का जिम्मेदारी से हाथ खींचते जाना कहीं से शुभ संकेत नही है।
वर्तमान में हमने ळ।ज्ै (सेवा के क्षेत्र मेें व्यापार समझौता) से अपने आप को जोड़ लिया है। इस समझौते के अनुसार शिक्षा भी व्यापार की वस्तु बन गयी है और अब कोई भी व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में व्यापार हेतु निवेश कर लाभ कमा सकता है। चाहे हम प्राइमरी शिक्षा देखें या उच्च शिक्षा सभी लाभ कमाने के धन्धे दिखाई देने लगे हंै। प्राइमरी स्कूल के लिए तो सरकार ने त्ज्म् (09) पारित किया परन्तु प्राइवेट स्कूलों पर किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं लगाया, ना ही सरकारें इन प्राइवेट प्राइमरी स्कूलोें पर सफलतापूर्वक दबाव ही डाल पायीं कि क्यों 25 प्रतिशत सीटें गरीब छात्र-छात्राओं से नहीं भरी गयीं। डोनेशन व कैपिटेशन फीस के नाम पर मनमानी फीस बढ़ाने की छूट ले इस धन्धे को खूब फलने-फूलने का मौका दिया। बजट की कमी व जवाबदेही की कमी के चलते सरकारी स्कूलों की दुर्दशा ने अभिभावकों को मजबूरन अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजना पड़ता है। इन प्राइवेट स्कूलों की मनमानी मागों की पूर्ती हेतु आधी तनख्वाह तक भेंट कर देनी पड़ती है।
अब शिक्षा अपनी मूल अवधारणा चरित्र, ज्ञान, जिज्ञासा, सच्चाई, व्यक्तित्व निर्माण प्रक्रिया को बहुत पीछे छोड़कर पूँजी निर्माण की व्यवस्था बन गयी है।
भारत एक गरीब देश है। गरीब देश में शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरत को बाजार के हाथों में छोड़ देना निःसंदेह देश की जड़ को खोखला करना है। समय की माँग है कि शिक्षा पर हो रहे निजीकरण के लगातार प्रहार का एकजुट होकर विरोध किया जाए अन्यथा पैसे के प्रवाह में शिक्षा का बचाखुचा उद्देश्य भी खत्म होते देर नहीं लगेगी। ु
- महामंत्री, लुआक्टा
लखनऊ वि॰वि, सम्बद्ध महाविद्यालय शिक्षक संघ