Saturday, September 6, 2014

आजाद भारत में सिसकता बचपन.- डाॅ॰ माधुरी यादव

हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी का दिन हमारी आजादी और हमारे गणतांत्रिक व्यवस्था के गौरवपूर्ण इतिहास को याद दिलाने ही नहीं आता, बल्कि अपने देश के सिंहावलोकन का भी जरिया बनता है। इस मौके पर जब भी हम पीछे मुड़कर आजाद भारत के इतिहास को देखते है तो हमें अभाव से शुरू हुई यात्रा का विकास पथ जहाँ दिखता है वहाँ अपनी असफलताएँ भी नजर आती हैं, लेकिन हमें पता है कि भौतिकता की राह पर आजादी के 67 सालों में भारतीय गणराज्य ने कितनी गहन और बड़ी यात्रा पूरी की है।
आज भी मस्तिष्क में यह विचार उठने लगता है कि भला वास्तव में हम कितने स्वाधीन हैं? एक स्वाधीन राष्ट्र की तरह भारत में जनता द्वारा चुनी गई सरकार है जो कि लोकतांत्रिक ढंग से काम करती है, साथ ही स्वतंत्र न्यायपालिका है जो कि सरकार तक के फैसलों-नीतियों का परीक्षण करने और रद्द करने का अधिकार रखती है। भारत में सशक्त और स्वतंत्र मीडिया है जो सभी विषयों पर अपनी राय और समाचार देता रहता है। इस तरह सैद्धान्तिक रूप से भारत स्वाधीन है और स्वाधीन राष्ट्र के समस्त लक्षण इसमें परिलक्षित होते हैं, लेकिन व्यवहारिक परिप्रेक्ष्य में विचार करें तो स्थिति थोड़ी भिन्न दिखाई देती है। यूँ तो तमाम नागरिक जीवन-यापन के अवसरों से वंचित है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा की बुनियादी सुविधाएँ भारत के बहुत सारे नागरिकों को प्राप्त नहीं है। हमारा संविधान चैदह साल तक के बच्चों की अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा की बात करता है, लेकिन वास्तविकता भयावह है। बालश्रम के आँकड़े डरावने हैं।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने एक बार कहा था कि ‘‘मैं देश के हर बच्चे की आँख में आने वाले हिन्दुस्तान की तस्वीर देखता हूँ।’’ पण्डित नेहरू की यह पंक्तियाँ आज भी उतना ही महत्व रखती है, जितना उस समय रखती थीं। पर क्या हम सोंच पाते हंै उन बच्चों के बारे में जो बाल्यकाल में भी अपना बचपन जी नहीं पाते और जिनके कंधे पर लाद दी जाती है दो जून की रोटी की जुगाड़ करने की जिम्मेदारी। ऐसे बाल मजदूरों की संख्या सात करोड़ के आस-पास बताई जाती है। आज हमारे चारो ओर बाल मजदूरों की फौज खड़ी है, क्या सचमुच यह हमारे देश के लिए राष्ट्रीय और सामाजिक कलंक नहीं है।
बाल मजदूरों के कई रूप हमें होटलों-ढाबों में प्लेटें मांजते या गैराजों में नट-बोल्ट कसते दिखते हैं। इसके अलावा घरों में घरेलू नौकरों के रूप में भी छोटे-छोटे काम करते दिखाई देते हैं। बाल मजदूरों का एक वर्ग हमें कष्ट साध्य और जोखिम भरे कामों में भी संलग्न दिखाई देता है, कुछ बच्चे जरी या काशीदाकारी करते, बीड़ी, माचिस या पटाखा फैक्ट्रियों, खानों-खदानों, ईंट-भट्ठा या पत्थर तोड़ने जैसे कठिन और खतरनाक कार्य करते दिखाई देते हैं।
बाल मजदूरों का एक वर्ग ऐसा भी है जो भुगतान रहित होता है, दरअसल इस वर्ग के बच्चे बचपन से ही किताब-कापी छोड़कर पारिवारिक और परम्परागत कामों में शामिल होकर बड़ों का साथ देते हैं यथा - पशुपालन, मछलीपालन, सब्जी बेचने में करोड़ों बच्चे संलग्न हंै। इसके अतिरिक्त अनेक बच्चे कचरा, प्लास्टिक, पेपर आदि चुनते हैं और उन्हें बेचकर पैसा कमाते हंै। स्टेशनों पर अखबार या खाने-पीने की सामग्री बेचने वाले, कार पोंछने वाले, जूते पाॅलिश करने वाले बच्चे ऐसे ही वर्ग में आते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि बाल श्रमिक सामाज के बेहद गरीब और अभावग्रस्त तबके से आते हंै। बालश्रम और गरीबी में चोली-दामन का साथ होता है।
बालश्रम न सिर्फ बच्चों के लिए अभिशाप के समान है, बल्कि यह समाज और देश के माथे पर कलंक है, सो इसके लिए हम आप सबको अपने प्रकार से सामाजिक कदम उठाने चाहिए। जरूरत इस बात की है कि गरीबी उन्मूलन पर ध्यान दिया जाए, रोजगारपरक शिक्षा उपलब्ध कराई जाए और अभिभावकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाया जाए। बालश्रम उन्मूलन अकेले सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, वास्तव में इस दिशा में परिवर्तन के लिए हमें व्यापक नीतियाँ और कार्यक्रम तैयार करने होंगे और नीतियों का क्रियान्वयन ठीक ढंग से किया जाना चाहिए।
फिलहाल बच्चों पर मंडराते संकट के ये बादल कब छटेंगे, कहा नही जा सकता है, पर एक बात तो तय है कि बगैर बच्चों के दुःखद हालात को सुधारे, राष्ट्र को प्रगति के पथ पर तेजी से अग्रसर नहीं किया जा सकता है। आजादी के 67 साल पूरे होने के अवसर पर पूरे भारत को बच्चों की दयनीय स्थिति में सुधार का संकल्प लेने की जरूरत है। जन-जन की सामाजिक भागीदारी के बिना यह लक्ष्य नहीं पाया जा सकता, पर सरकार की इसमें अहम् भूमिका है। समय रहते बच्चों की वर्तमान स्थिति को बदलना ही होगा, क्योंकि बच्चों के उज्ज्वल भविष्य से ही देश का भविष्य उज्ज्वल होगा। 
- वरिष्ठ प्रवक्ता, हिन्दी विभाग,
ए॰पी॰ सेन मेमोरियल गल्र्स कालेज, चारबाग, लखनऊ।