Saturday, September 6, 2014

जीएम फसलें सवालों के घेरे में - .डा॰ भरत झुनझुनवाला

जीन परिवर्तित खाद्य फसलों का मामला लंबे समय से विवादित रहा है। संप्रंग सरकार में तत्कालीन पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश तथा जयन्ती नटराजन ने जीएम फसलों के फील्ड ट्रायल की अनुमति नहीं दी थी। इसके बाद गत वर्ष वीरप्पा मोइली ने हरी झंड़ी दे दी। अब राजग सरकार के पर्यावरण मन्त्री प्रकाश जावड़ेकर ने पुनः लाल बŸाी दिखा दी।
प्रकृति में जीन का लेन-देन सामान्य रूप से होता रहता है। नर और मादा के संयोग से नए जीन बनते रहते हैं, लेकिन जीन का यह लेन-देन एक ही जाति के पौधों के बीच धीरे-धीरे होता है। जीएम बीजों में जीन परिवर्तन तकनीक में स्वजातीय लेन-देन का प्रतिबन्ध समाप्त हो जाता है, जैसे हिरण के झुंड में शेर जबरन घुस जाता है। इस तकनीक से दूसरी प्रजाति के जीन को आरोपित किया जा सकता है, जैसे कपास के पौधे में जहरीले कीड़े के जीन को जोड़ दिया गया।  इससे बीटी काटन बना। इस पौधे का जड़, तना, पŸो और फल सब जहरीले हो जाते हैं। वाल वर्म नाम का कीड़ा जब इस पौधे की पŸाी आदि को खाता है तो वह मर जाता है। अपने देश में लगभग 95 प्रतिशत कपास का उत्पादन इस प्रकार के जीन परिवर्तित बीटी काटन का हो रहा है। 
जीन परिवर्तित बीज को कामर्शियल स्तर पर बेचने के पहले इसका फील्ड ट्रायल किया जाता है। प्रयोगशाला में बनाये गए पौधे खेत में कितना सफल हैं, इसका आकलन किया जाता है। फील्ड ट्रायल में सही-सही पता लगता है कि मेजवान पौधे में दाता का कौन सा जीन आरोपित किया गया है। जैसे कपास के पौधे पर बीटी कीड़े का जीन जोड़ने से कपास का रंग काला हो सकता है, पौधा बौना हो सकता है तथा कीटनाशक क्षमता पैदा हो सकती है। मेजवान पौधे ने दाता के किस गुण को अंगीकार किया है यह फील्ड ट्रायल से पता लगता है। इस तरह के फील्ड ट्रायल के लिए पर्यावरण मन्त्रालय से मंजूरी लेनी जरूरी होती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि फील्ड ट्रायल में कई तरह का खतरा होता है। जैसे मान लीजिए सरसों के जीन परिवर्तित बीज का फील्ड ट्रायल किया गया। इस जीन परिवर्तित पौधे में कीटाणुओं को मारने की क्षमता है, लेकिन फील्ड ट्रायल में पाया गया कि सरसों का दाना भी जहरीला हो गया। ऐसे में इस प्रजाति को रोका जा सकता है, परन्तु ट्रायल की अवधि में यह जीन फैल सकता है। जहरीले फूल के पराग को मधुमक्खी आदि के द्वारा दूसरे खेत में उग रही सरसों के खेत में पहुँचा दिया जाता है।  ऐसे में जहरीलापन सम्पूर्ण क्षेत्र के सरसों के खेतों में फैल सकता है, जिससे सावधानी के अभाव में बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अमेरिका ने जीन परिवर्तित मक्के की खेती को हरी झण्डी दे दी थी। स्वीकृतियों के अनुसार केवल एक प्रतिशत खेती मे ही जीन परिवर्तित मक्के की खेती हो रही थी, लेकिन लगभग आधे क्षेत्र में उग रहे मक्के में जीन परिवर्तिन पाया गया। यानी एक प्रतिशत क्षेत्र से  50 प्रतिशत क्षेत्र में वह जीन स्वतः फैल गया था। इसी प्रकार इंग्लैण्ड की सरकार द्वारा सरसों के बीज में जीन परिवर्तन सम्बन्धी ट्रायल की स्वीकृति दी गई। इस दौरान पाया गया कि 200 गज से भी दूर उग रहे सामान्य पौधों मे भी जीन परिर्वतन का प्रसार हो गया था। साथ-साथ जीन परिवर्तन सरसों की कीटनाशक  क्षमता जंगली पौधों में भी फैल गई थी। इन पौधों में कीटनाशक दवाओं का प्रतिरोध करने की क्षमता बढ़ गई थी। फलस्वरूप इन्हें कीटनाशकों से मारना कठिन हो गया था। वैज्ञानिकों के अनुसार इससे ‘सुपर वीड’ के पैदा होने की सम्भावना है, जो कांग्रेस घास की तरह सर्वत्र फैल सकती है और जिसका उन्मूलन करना कठिन होगा। इससे खेतों के आसपास जंगली पौधों के बीज पैदा करने की क्षमता भी कम हो गई। ये जंगली बीज ही चिडि़यों, मधुमक्खियों तथा तितलियों का भोजन होते हैं। फलस्वरूप उस पूरी क्षेत्र में इन जीवों पर दुष्प्रभाव पड़ने और सम्पूर्ण क्षेत्र के पर्यावरण में बदलाव आने की सम्भावना बन रही है। इन कारणों से फील्ड ट्रायल पर रोक लगाना उचित है।
अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जीन परिवर्तित खाद्य पदार्थो पर सहमति नहीं है। फ्रांस ने इनके ट्रायल और उत्पादन पर रोक लगा रखी है, जबकि स्पेन में छूट है। पंजाब तथा महाराष्ट्र ने इनका स्वागत किया है, जबकि तमिलनाडु तथा केरल ने इनका विरोध किया। अनिश्चितता का यह वातावरण बताता है के इस विषय की पूरी जानकारी हमें नहीं है। पर्यावारणविद् वंदना शिवा बताती है कि वैश्विक स्तर पर जीन परिवर्तित फसलों के ट्रायल पर अभी चर्चा चल रही है और निर्णय आना बाकी है। अनिश्चितता के इस वातावरण में जल्दबाजी करके जीन परिवर्तित फसलों को स्वीकार करना गलत होगा। जीन परिवर्तित फसलों के पक्ष में मुख्य तर्क उत्पादन में वृद्धि का है। कहा जा रहा है कि विश्व में भुखमरी को समाप्त करने के लिए खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि जरूरी है। यह कार्य जीन परिवर्तित फसलों के माध्यम से किया जा सकता है। यह सही है कि जीन परिवर्तन से प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ सकता है, परन्तु इससे भुखमरी समाप्त होगी, इस बारे में मुझे संशय है। इसका कारण यह है कि बढ़े हुए उत्पादन का उपयोग खाद्यान्न के स्थान पर बायोडीजल उत्पादन हेतु किया जा सकता है। वर्तमान में अमेरिका में मक्के की आधी फसल का उपयोग बायोडीजल के लिए किया जा रहा है। सम्भव है कि जीन परिवर्तित गेंहूँ का उपयोग भी बायोडीजल के लिए किया जाए। ऐसे में भुखमरी ज्यों की त्यों बनी रहेगी। वास्तव में भुखमरी की समस्या उत्पादन से जुड़ा नहीं है। बल्कि यह वितरण व्यवस्था की समस्या है। उपलब्ध खाद्यान्नों का वितरण गरीबों को कर दिया जाए तो गरीबी रातों-रात गायब हो जाएगी।
जीन परिवर्तित फसलों के पक्ष में दूसरा तर्क वैश्विक प्रतिस्पर्धा का दिया जा रहा है। उदाहरण के लिए मान लीजिए आॅस्ट्रेलिया ने जीन परिवर्तित गेंहूँ को अपना लिया और वहाँ गेंहूँ के उत्पादन में वृद्धि हुई, परिणामस्वरूप गेंहूँ की आपूर्ति बढ़ी और बाजार में इसके दाम गिर गए। इससे आस्ट्रेलिया का जीन परिवर्तित गेंहूँ विश्व बाजार में सस्ता बिकने लगा और भारत में इसका आयात होने लगा। ऐसे में हमारे किसानों के लिए जरूरी हो जाएगा की वे जीन परिवर्तित गंेहूँ का उत्पादन करें अन्यथा उनका गेंहूँ मंहगा पड़ेगा और वे बाजार से बाहर हो जाएंगे। यह समस्या वास्तविक और गम्भीर है, लेकिन इसका दूसरा समाधान भी उपलब्ध है। हम आस्ट्रेलिया के जीन परिवर्तित गेंहूँपर अधिक आयात कर आरोपित करके उसे बाजार से बाहर कर सकते हंै। इस तरह अपने किसानों द्वारा उत्पादित अनाज पर निर्यात सब्सिडी देकर विश्व बाजार में अपना स्थान बना सकते हंै। अतः जीन परिवर्तित खाद्यान्नों को अपनाना जरूरी नहीं दिखता है। फिलहाल इनको अपनाए जाने के खतरों को देखते हुए इनसे बचा जाना ही उचित है। 
- लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।