1947 से 2014 के बीच भारत की विकास यात्रा अद्भुत रही। यह स्वंय में अभूतपूर्व सम्भावनायें समेटे है तथा इस विकास यात्रा में हमारी बहुत सी सफलतायंे और असफलतायें छिपी हुयी हैं जो भविष्य के नव निर्माण के लिए सफलताओं व असफलताओं के रूप में कई पाठ समेटे हैं। 2014 के आगे की यात्रा को एक सार्थक रूप देने के लिए 1947 से आज तक का आर्थिक विश्लेषण अत्यन्त सामायिक होगा।
आजादी के तुरन्त बाद 1950-51 में देश ने नियोजित विकास की ओर कदम बढाया। उसी समय स्पष्टतया देश के सामने तीन विशिष्ट कमियाँ थीं। (1) पूँजी/निवेश का अभाव (2) उद्ययम्तिा का अभाव (3) तकनीकि तथा प्रबन्धन कुशलता का अभाव। इन कमियों के चलते विशेष रूप से निजी क्षेत्र की सीमित क्षमताओं के चलते सार्वजनिक क्षेत्र का आह्वान किया गया कि वो देश का सबसे बडा उद्यमी तथा तथा सबसे बड़ा निवेशक बन जाये। इसी भूमिका के चलते पब्लिक सेक्टर अर्थव्यवस्था में ’कमाडिंग हाइट’ का दर्जा दिया गया। लेकिन उसी समय ये स्पष्ट कर दिया गया कि जैसे-जैसे निजी क्षेत्र क्षमतायें विकसित करेगा, सार्वजनिक क्षेत्र धीरे-धीरे पीछे हटता जायेगा। इस प्रक्रिया के चलते देश मंे विकास की नींव पड़ने लगी। लेकिन अभी भी हमारी विकास दर 1970 के दशक तक अत्यन्त धीमी रही। यह हिन्दू विकास दर के रूप में जानी गई (3 से 3.5ः की विकास दर)। 1980 के दशक में भारत की विकास दर एकाएक तेज हो गयी और पूरे दशक में हमारी विकास दर लगभग 5ः रही। इस दौरान प्रति क्रमिक उत्पादन तथा कुल फैक्टर उत्पादकता तेजी से बढी। फैक्टर उत्पादकता जो 1960 से 1980 के दौरान मात्र 0.3ः प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही थी वो 1980 के दशक में लगभग 2ः प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी। स्पष्ट है कि 1980 के दशक में हमारी तेज विकास दर उत्पादकता में हुये सकारात्मक परिवर्तन की वजह से सम्भव हुयी। इसीलिए यह भविष्य में भी बरकरार रहने की सम्भावना संजोए है। भारत जो अभी तक अक्षमताओं के लिए जाना जाता था वो अब उत्पादकता और तेज विकास का प्रतीक बन गया।
इसके बावजूद भी 1991 आते-आते देश आजादी के बाद के सबसे बडे़ आर्थिक संकट से घिर गया। महंगाई दो अंकों में पहुँच गयी। राजकोषीय घाटा लगभग 8ः पर था। व्यापार घाटा नियन्त्रण के बाहर था। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा का भण्डार मात्र 1.1 बिलियन डालर रह गया था जो छह हफ्तों तक भी अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को चलाने के लिये नाकाफी था। देश एक ऐसे आर्थिक संकट में था जिससे उबरने का रास्ता सूझ नही रहा था। लेकिन इस आर्थिक संकट के पीछे कई कारण थे। जिसमें हमारी नीतिगत गलतियाँ भी शामिल थीं। जहँा एक ओर 1980 के दशक में हमारी विकास दर बढ़ी, उसी के साथ-साथ राजकोषीय घाटा, व्यापार घाटा तथा अन्तर्राष्ट्रीय ऋण लगातार बढता गया। देश की नियन्त्रित मुद्रा व्यवस्था जहाँ हम रूपये की कीमत को 18 रूपये पर नियन्त्रित कर रहे थे, जबकि 1991 में इसका बाजार भाव लगभग 31.50 रूपये होना चाहिए था। परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ॰डी॰आई॰) तथा पोर्टफोलियो निवेश लगातार गिरता गया तथा विदेशी ऋण बढ़ता गया। सरकारी खर्च की न्यूनतम उत्पादकता आदि ने इस समस्या को बढ़ा दिया। विदेशी सार्वजनिक ऋण जो 1980 में सकल उत्पाद का 9ः था, वो 1990 तक 31.2ः हो गया। रूपये के बाजार भाव में और नियन्त्रित भाव में अन्तराल के चलते एक बड़ा काला बाजार विकसित हो गया। जिसे हम हवाला बाजार के नाम से जानते हैं। 1991 आते-आते यह स्थिति हो चुकी थी कि अन्र्तराष्ट्रीय निवेशक 31.5 रूपये के डाॅलर को देश में 18 रूपये की कीमत पर निवेश करने को तैयार नही थे। और यही हाल हमारे निर्यातकांे का भी था। रिजर्व बैंक के विदेशी मुद्रा अर्जित करने के यही दो सबसे बडे़ साधन थे। इन दोनों ही साधनों से अब रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा आना लगभग बंद हो चुकी थी। 1991 आते-आते हमारे पास सिर्फ 1.1 बिलियन डालर बचे थे जो देश के अन्र्तराष्ट्रीय व्यापार को चलाने के लिए नाकाफी था। 80 के दशक में उत्पादकता बढ़ती गयी, इसने देश की विकास दर को गति दी। लेकिन देश के नीति निर्धारक अर्थव्यवस्था में पनप रही संरचनात्मक विसंगतियों को न तो भाँप सके और न ही उसको सुधारने के लिए प्रगतिशील परिवर्तन ला पाये। अन्र्तराष्ट्रीय व्यापार में लगातार अदृश्य खाता (सेवायें) सकारात्मक भूमिका निभाता रहा है और व्यापार घाटे में होने वाली हानि को पूरा करने में मदद करता रहा है। लेकिन 80 के दशक में यह उल्टा यू (न्) रूप धारण कर लेता है। 1980 से 1984 तक यह लगातार बढ़ता जाता है और 1985 से 1990 तक यह तेजी से घटता जाता है, तथा देश के भुगतान संतुलन के लिए एक नयी समस्या खड़ी कर देता है। बिलकुल इसी तरह नियन्त्रित मुद्रा बाजार के चलते सोने की तस्करी बढ़ जाती है और मुद्रा भण्डार न्यूनतम स्तर पर चला जाता है। बजट की प्रक्रिया में ऋण भुगतान (ब्याज दर) राजस्व व्यय का 43ः हो जाता है। रक्षा तथा सब्सिडी के बजट को जोड़ने के बाद सरकार का प्रयास उत्पादकता सृजित करने में लगभग अक्षम हो जाता है। साथ ही आय के अन्य स्रोतों के अभाव में राजकोषीय घाटा भी लगातार बढ़ता गया। जिसके चलते मुद्रा स्फीति भी नियन्त्रण के बाहर होती चली गयी। हम अपने लिए एक ऐसा दुश्चक्र बना रहे थे जिसमें देश और देश की अर्थव्यवस्था उलझते चले जा रहे थे। और यहीं से देश में 1991 के आर्थिक सुधारों की शुरूआत हुयी।
यहाँ यह समझना जरूरी होगा कि 1980 के प्रारम्भ से देश में उदारीकरण की शुरूआत कर दी थी। 80 के दशक का उदारीकरण प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित नही करता था। उसका सारा ध्यान कार्यरत उद्योगों को खुलापन देने पर था और इसके सकारात्मक परिणाम देश को दिखायी पडे़। लेकिन हमने अर्थव्यवस्था के मूल तंत्र को उद्वेलित करने जैसी कोई शुरूआत नहीं की। 1991 आते-आते हमें स्पष्ट हो चुका था कि बाजार तंत्र दो महत्वपूर्ण कार्य सम्पादित करता है। (1) वह उपभोक्ताओं और उत्पादकों के बीच सूचना का आदान-प्रदान करता है या एक सूचना तंत्र के रूप में कार्य करता है। (2) साथ ही यह संसाधनों के वितरण का कार्य सम्पादित करता है। इन दोनों ही कार्यों के सम्पादन में बाजार तंत्र (उंतामज उमबींदपेउध्चतपबम उमबींदपेउ) सबसे ज्यादा सक्षम व कुशल व्यवस्था है।
1991 में किये गये ज्यादातर परिवर्तन बाजार व्यवस्था को आजाद करने का प्रयास थे ताकि वह एक सुचारू संयन्त्र के रूप में जानकारी के आदान-प्रदान तथा संसाधनों के कुशल वितरण के माध्यम से आम नागरिकों की अधिकतम आवश्यकताओं को पूरा कर सके। 1990 में किये गये परिवर्तनों ने भारत को एक आपदाओं से घिरी अर्थव्यवस्था से निकालकर दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्था की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। 90 के दशक में किये गये सुधार प्रथम श्रेणी के सुधार थे। जहाँ हमारा ध्यान सिर्फ औद्योगिक क्षेत्रों के सुधारों पर था। आशा की गयी थी कि जल्द हम द्वितीय श्रेणी के सुधार जिसमें ग्रामीण विकास एवं मानव विकास (शिक्षा एवं स्वास्थ्य) भी शामिल था, को पूर्ण रूप से लागू कर दंेगे।
यह विडम्बना ही है कि 2014 तक हम द्वितीय श्रेणी के सुधारों को सही मायने में शुरू भी नही कर पाए। साथ ही प्रथम श्रंेणी के वे तमाम सुधार जिसने देश की अर्थव्यवस्था को खुलापन दिया और दिशा दी। लगभग वह सभी सुधार 2013 आते-आते नकारे जा चुके थे। देश को हमने पुनः नियन्त्रण और अकुशलता की अर्थव्यवस्था की ओर ढ़केल दिया है। सन् 2001 से 2010 के बीच भारत की विकास दर लगभग 7.2ः रही। जिसमें सेवा क्षेत्र की विकास दर 9ः, औद्योगिक क्षेत्र की विकास दर लगभग 7.5ः और कृषि क्षेत्र की विकास दर मात्र 2.8ः दिखायी देती है। इस दौरान मध्यम वर्ग की संख्या कई गुना बढ़ती है और उसकी औसत आय भी बाकी वर्गों की तुलना में काफी बढ़ोत्तरी अर्जित करती है। यह असंतुलित विकास प्रक्रिया नई संरचनात्मक समस्या सृजित करती है। बढ़ती आय तथा मध्यम वर्ग की बढ़ती क्रय क्षमता के चलते यह स्पष्ट था कि सभी क्षेत्रों के उत्पादों के लिए माँग बढ़ेगी। कृषि उत्पादों की माँग भी इसका अपवाद नही है। जैसे-जैसे कृषि उत्पादों की माँग बढ़ी, उसके सापेक्ष पूर्ति के न बढ़ने से माँग व पूर्ति में अन्तराल पैदा हो गया, साथ ही इस दौरान सबसे ज्यादा माँग तिलहन, दलहन, सब्जियाँ व फलों की बढ़ी। यह वो चीजें हैं जिनका उत्पादन देश में बिलकुल भी नही बढ़ा। इन अभावों के चलते इन वस्तुओं की कीमतें बढ़ने लगीं। इनकी कीमतों को नियन्त्रित करने का देश के पास कोई साधन उपलब्ध नही था। पिछली शताब्दी के आखिरी तीन दशकों में कृषि वस्तुओं की कीमतों का नियन्त्रण आमतौर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से किया गया। 2001 से हम इन कीमतों पर नियन्त्रण नही कर पाये और इसका एक बड़ा कारण यह है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में जिन वस्तुओं को शामिल किया गया है, उनमें तिलहन, दलहन, सब्जियाँ और फल शामिल नही हंै। बावजूद इसके कि 2008 के बाद से महंगाई का एक बड़ा कारण कृषि पदार्थों की महंगाई है। हमने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार कर इन वस्तुओं के भण्डारण की कोई व्यवस्था नही की है। प्रतिवर्ष लगभग एक ट्रिªलियन रूपये के बराबर के कृषि पदार्थ सड़ जाते हैं, क्योंकि हमारे पास भण्डारण की व्यवस्था नही है। लॅाजिसटिक्स तथा कोल्ड चेन व्यवस्था विकसित नही है। 2007 की भारत सरकार की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि इन सब चीजों के लिए लगभग 75 हजार करोड़ रूपये की आवश्यकता है। भारत में 2014 का केन्द्र सरकार का व्यय लगभग 18 लाख करोड़ रूपये है। अगर राज्य सरकारों का व्यय भी जोड़ लिया जाये तो लगभग 35 से 40 लाख करोड़ रूपये सिर्फ सरकारें एक साल में व्यय करती हैं। यह आश्चर्यजनक सच है कि 1991 से 2014 तक हम कृषि क्षेत्र के लिए 75 हजार करोड़ रूपये संजो नही पाये। अगर यह व्यवस्था उपलब्ध करा दी जाये तो सालाना एक ट्रिलियन रूपये का कृषि पदार्थों का नुकसान बच जायेगा। यह तुरन्त हिन्दुस्तान की विकास दर को बढ़ा देगा। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान सबसे गरीब किसानों का होता है। अगर हम इस नुकसान को रोक पाते हैं तो यह देश का सबसे सहज व सबसे प्रभावी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम होगा तथा सबसे प्रभावशाली विकास कार्यक्रम होगा। साथ ही मुद्रा स्फीति को नियन्त्रित करने के लिए इसके अलावा और कोई रास्ता नही है। 2008 से लगातार कृषि क्षेत्र की महंगाई को रिजर्व बैंक के माध्यम से नियन्त्रित करने की कोशिश की जा रही है। रिजर्व बंैक के पास सिर्फ मैकरो (वृहत्) इकनाॅमिक्स संयन्त्र उपलब्ध है, जो इस तरह के क्षेत्रीय मुद्रा स्फीति को नियन्त्रित करने में पूर्णतया अक्षम हैं। यही कारण है कि हम 2008 के बाद से हिन्दुस्तान में महंगाई को नियन्त्रित नही कर पाये हैं। अगर हम इस व्यवस्था को सुदृढ नही कर पाते हैं तो आने वाले 20 वर्षों में भी इस महंगाई को नियन्त्रित नही कर पायेगें।
लगातार देश की नीतिगत विफलताओं का ठीकरा हमने वैश्विक मंदी पर फोड़ा है। जबकि हकीकत यह है कि भारत जैसी अर्थव्यवस्था में हमारी घरेलू अर्थव्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण है और वर्ष 2008 तक हमारी अर्थव्यवस्था का मूल आधार बहुत मजबूत था जिसको 2014 आते-आते हमने अत्यन्त दुर्बल बना दिया और इसमें हमारी नीतिगत विफलता का महत्वपूर्ण योगदान है। देश में आर्थिक सम्भावनाओं का अंाकलन इसी बात से किया जा सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब कुछ वर्षों पूर्व हिन्दुस्तान आये तो वहाँ से चलते वक्त जब उनकी मीडिया ने उनसे पूछा कि वह भारत क्यों जा रहे हैं तो उनका जवाब था कि मैं मार्केट एक्सेस माँगने जा रहा हूँ। भारत का बाजार चीन के साथ दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। 2008-09 की वैश्विक मंदी से निपटने के लिये अमेरिका ने 2 ट्रिलियन डालर का पैकेज अपनी निजी क्षेत्र को दिया। इसी तरह यूरोपीय देशों ने मिलकर के अपनी अर्थव्यवस्था में 2 ट्रिलियन डालर कर पैकेज दिया। क्योंकि ये पैकेज निजी क्षेत्र की विफलता के कारण दिया जा रहा था। इसके लिए संसाधन जुटाने हेतु अतिरिक्त कर लगाना सम्भव नही था। परिणामस्वरूप इन देशों का राजकोषीय घाटा लगातार बढता चला गया। आज इंग्लैण्ड जैसे कई पश्चिमी देशों का राजकोषीय घाटा 13ः तक पहुँच गया है। निजी क्षेत्र अभी भी वैश्विक मंदी की गिरफ्त में हैं। वहीं अब सरकारों के लिए बजट से समर्थन दे पाना असम्भव होता जा रहा है। इंग्लैण्ड ने दो वर्षों पूर्व ही यह घोषित कर दिया कि वह आने वाले चार वर्षों में श्बेलआउट पैकेज में से 136 बिलियन डालर वापस ले लेगा। परिणाम स्वरूप तमाम सोशल सेक्टर व स्कॅालरशिप इत्यादि प्रभावित हुए। पहली बार लंदन की सड़कों पर दंगों (तपवज) जैसी स्थिति दिखायी पड़ी। आज की हकीकत यही है कि अमेरिका व इंग्लैण्ड जैसे पश्चिमी देशों को इस संकट से उबरना है तो सबसे सहज रास्ता भारत व चीन के बाजारों से होकर गुजरता है और ओबामा इसी ओर संकेत दे रहे हैं।
हमारा बाजार द्वितीय श्रेणी के सुधारों पर निर्भर करता है। 2008 के बाद से हिन्दुस्तान की औद्योगिक विकास दर लगातार घटती चली गयी है और अब हमारी विकास दर (जीडीपी) घटकर 5ः से भी कम हो गयी है। हमें सबसे पहले अपनी अर्थव्यवस्था के लिये द्वितीय श्रेणी के सुधार लाने होंगे। जिसके दो स्तम्भ होंगे। पहला स्तम्भ ग्रामीण विकास, जिसमें कृषि और छोटे उद्योग शामिल हैं। दूसरा स्तम्भ मानव विकास है, जिसमें स्वास्थ्य एवं शिक्षा शामिल है। भारत तीन इंजन का जहाज है। 1991 में हमने पहला इंजन खोला। जिसके परिणामस्वरूप एक आपदा ग्रसित अर्थव्यवस्था दुनियाँ की अग्रणी अर्थव्यवस्था में शामिल हो गयी। लेकिन एक इंजन से चलने वाला यह जहाज 2008 तक आते-आते लड़खड़ाने लगा। समय आ गया है कि हम इस जहाज के बाकी दो इंजन, ग्रामीण विकास और मानव विकास भी खोल दें। ऐसा करने से ग्रामीण क्षेत्र की क्रय शक्ति बढ़ेगी, जो देश की विकास दर में सकारात्मक योगदान देगी। साथ ही उद्योग जगत के लिए भी बाजार सृजित होगा। जहाँ वैश्विक बाजार घटता चला जा रहा है। हमारे ग्रामीण बाजार हमारी अपनी अर्थव्यवस्था को नयी दिशा दे पायेगें। हकीकत यह है कि अगर सारी पश्चिमी अर्थव्यवस्थायें डूब भी जाये तब भी यह दो इंजन खोलकर हम देश में दो अंकीय विकास सुनिश्चित कर सकते हैं। समय आ गया है कि देश द्वितीय श्रेणी के सुधारों को बहुत तेजी से आगे ले जाये। यह सुधार पहली श्रेणी से भिन्न है। यह सुधारों का मुश्किल हिस्सा हैं जहाँ प्रदेशों की भागीदारी महत्वपूर्ण है, साथ ही इसमें संस्थागत परिवर्तन तथा हैण्ड्स होलडिंग की आवश्यकता होगी। यह सुधार भारत की अर्थवस्था को रास्ते पर लाने के लिए जरूरी हंै और यही सुधार दुनिया को वैश्विक मंदी से उबारने के लिए भी जरूरी हैं। जरूरी होगा कि हम अपना बाजार सबसे पहले अपने लिये खोल दें और फिर उसके बाद ही बाकी विश्व के लिये खोलें। देश के विकास का रास्ता बिलकुल साफ है। 1991 के अधूरे सुधारों को हमें पूर्णता की ओर ले जाना होगा। ग्रामीण विकास तथा मानव विकास के क्षेत्रों में उदारीकरण लाना होगा। भूमि अर्जन सम्बन्धी कानून तथा श्रम कानूनों में सुधार लाने होेंगे। देश में नई सरकार के आने के बाद पॅालिसी पैरालिसिस के बादलों को कुछ हद तक छँटते देखा है। अब समय आ गया है कि हम द्वितीय श्रेणी के सुधारों की एक नई दास्ता लिखें। यही देश के विकास को गति देगा, मुद्रा स्फीति को नियन्त्रित करेगा और रोजगार सृजन सम्भव करेगा।
- अर्थशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ।





