विश्व के किसी भी राष्ट्र, चाहें वहाँ राजतन्त्र हो अथवा लोकतन्त्र, में शासन प्रणाली का उद्देश्य लोकहित तथा लोकोन्नति रहा है। भारतीय मनीषियों ने तो ‘राजा प्रजारन्जनात्’ कहकर राजा का राजतत्व ही प्रजा के सन्तोष के कारण माना। भारतीय लोकतन्त्र में, जहाँ शासक भी स्वच्छन्द न होेकर लोकमर्यादा में बँधा हुआ कहा गया, वहाँ राजधर्म का सर्वोपरि आदर्श एक ऐसे राज्य की संरचना करना रहा है, जहाँ प्रथम से लेकर अन्तिम नागरिक तक निर्बाध योगक्षेम को प्राप्त करे। प्रेम, सौहार्द तथा विश्वास के बल पर प्रत्येक प्रजाजन आत्मोत्थान के मार्ग पर चलता हुआ राष्ट्र के अभ्युदय में सहायक हो। हमारे पूर्वज ऋषियों की राष्ट्र संकल्पना का आधार यजुर्वेद का वह मन्त्र है, जिसमें ईश्वर से एक ऐसे राष्ट्र की कामना की गई है, जिसमें ईश्वर सशक्त वर्ग-व्यवस्था (कर्मणा) हो, सबल पशुधन हो, बलवान तथा सभ्य योद्धा हों, चरित्रवति नारियाँ एवं संस्कारित युवक हों। मानव तथा प्रकृति के मध्य ऐसा सामन्जस्यपूर्ण सह सम्बन्ध हो, जिससे मानव स्वास्थ्य और राष्ट्र के आर्थिक विकास में सहायक प्रचुर धन धान्य उपलब्ध हो।सुख और समृद्धि के साधक इन घटकों की स्थायी उपलब्धता में समस्त मानव संसाधन का नीतिपूर्ण सदुपयोग तथा यथासमय यथायोग्य सामाजिक-आर्थिक नीतिनिर्धारण व नियन्त्रण शासन का दायित्व है। जहाँ शासनतन्त्र अहर्निश प्रजा के कल्याण में लगा रहे तथा प्रजा सर्वतोभावेन राष्ट्र तथा राष्ट्रनायक के प्रति श्रद्धा और समर्पण में रन्चमात्र प्रमाद न करे, वहीं आदर्श तथा अग्रणी समाज की संरचना सम्भव है। यह सब ‘सुशासन’ द्वारा सम्भव है।
यद्यपि ‘शासन’ शब्द स्वयं ही उक्त अभिप्राय को व्यक्त करता है, किन्तु ‘सु’ उपसर्ग लगाने की आवश्यकता तब पड़ती है जब राज्य में अनियन्त्रण तथा असामन्जस्य की स्थिति सीमा पार करने लगे। शासन का आधार अनुशासन है तथा सुशासन का आधार धर्म होता है। अनुशासन तथा धर्म एक ही सिक्के के दो पटल कहे जा सकते हैं। अथवा यह कह लिया जाए, कि अनुशासन का मूल धर्म है तथा धर्म का मूल अनुशासन है। अनुशासन को वाह्य नियन्त्रण का व्यावहारिक परिदृश्य कहा जा सकता है, तो धर्म आत्मनियन्त्रित देशकाल परिस्थिति के अनुकूल इष्ट आचरण। अनुशासन तथा धर्म दोनों सुशासन के सन्दर्भ में एक दूसरे के अनुपूरक होते हुए दण्डनीति का पर्याय हैं।
उक्त अर्थ में दण्ड ही प्रजा के नियन्त्रण, अनुरक्षण तथा अभिवृद्धि का आधार है। दण्ड को धर्म का पर्याय बताते हुए स्मृतिकारों नंे सत्य ही कहा है -
दण्ड शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेपु जागर्ति दण्डं धर्म विदुर्वुधाः।।
अर्थात् दण्ड ही प्रजा को अनुशासित करता है, दण्ड ही सबकी रक्षा करता है। प्रजा के अजागरूक (सुप्त) होने पर दण्ड ही जगाता है। इस प्रकार विद्वानों ने दण्ड को ही धर्म कहा है। धर्म दण्ड के प्रमुख कार्य हैं- अवान्छित तथा सुरक्षित शान्त जीवन में बाधा उत्पन्न करने वाले लोगों का नियन्त्रण एवं उसके द्वारा प्रजा की रक्षा। जब दण्ड सजग होता है, तब प्रजा निश्चिन्त सो सकती है। इस दण्डरूप धर्म की संस्थापना के लिए ही कृष्ण जैसे ईश्वर अथवा महापुरूष जन्म लेते हैं जिनका उद्धोष ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतां, धर्मसंस्थापनार्थाय...............’ होता है।
इस दृष्टि से दण्ड का अर्थ अपराधी को दमित करना मात्र नहीं, अपितु निरपराध की रक्षा तथा अपराधरहित समाज की रचना करना भी है। दण्डनीति का निर्धारण करने वाले धर्म शास्त्रियों तथा अर्थ शास्त्रियों की दृष्टि सदा इस प्रयोजन पर रही है। इसी कारण दण्डनीति धर्मशास्त्र तथा अर्थशास्त्र दोनों का प्रतिपाद्य रहा है। यद्यपि प्रतिपाद्य की दृष्टि से दोनों शास्त्र एक ही दिशा में प्रवृत्त होते हैं, किन्तु अधिकार की सीमा दोनों को एक दूसरे से पृथक करती है। उल्लेख करना आवश्यक होगा, कि अर्थशास्त्र का क्षेत्र प्रधानतः राजदायित्व तथा राजधर्म के अन्तर्गत आता है, जबकि धर्मशास्त्र का प्रधान क्षेत्र सामाजिक व्यवस्था का निदर्शन करना है। राज्य की प्राप्ति, रक्षा, वृद्धि तथा वृद्ध संसाधनों का नियोजन अर्थशास्त्र का विषय है, तो वर्ण, पुरूषार्थ तथा आश्रम के कर्तव्याधिकारों का समुद्वेश धर्मशास्त्र का विषय है।
उक्त उल्लेख इस दृष्टि से प्रासंगिक है, कि सुशासन की संस्थापना के लिए दोनों का समान रूप से अन्योऽन्याश्रयत्व तथा महत्व है। यहाँ यह उल्लेख भी प्रासंगिक प्रतीत होता है, कि धर्मशास्त्र की मर्यादाएँ पाप और प्रायश्चित् के रूप में प्रकारान्तर से दण्डनीति का समर्थन करती हैं। पाप और प्रायश्चित अपराध तथा दण्ड के आत्मनियन्त्रित रूप हैं। किन्तु, धर्म की मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले पापियों (सामाजिक-सांस्कृतिक अपराधियों) के लिए धर्मशास्त्र भी निष्पक्ष तथा निश्चित दण्ड का यथायोग्य प्रावधान करता है। सभी परिस्थितियों में समग्र दण्डनीति का सार्थक्य उसके यथोचित तथा यथासम्भव क्रियान्वयन में है, जिससे प्रजा की संरक्षा-सुरक्षा, अपराधनियन्त्रण तथा अपराधियों का दण्डन इस प्रकार हो, कि समाज में न्याय एवं सर्वहितरक्षण हो सके।
विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र भारत में राज्य व्यवस्था का आरम्भ ही दण्डनीति के साथ हुआ था। समय-समय पर नीतिकारों ने राजाओं को सुशासन का मार्ग निर्दिष्ट किया है। जहाँ ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः’ कह कर प्रजा को स्वधर्म में प्रवृत्त होने का निर्देश किया गया, जहाँ ‘सर्वेषां हि शौचानामर्थशौचं पर स्मृतम्’ कह कर आर्थिक पवित्रता का पाठ पढ़ाया गया, जहाँ ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ कहकर स्त्री सम्मान को देवत्व (दैवी गुणों) की प्राप्ति का साधन बतलाया गया, वहाँ आज धर्म, अर्थ तथा काम का जो उपहास हो रहा है, वह अकल्पनीय तथा अवर्णनीय है।
भ्रष्टाचार के ताण्डव से त्राही-त्राही करती जनता की इच्छाशक्ति टूटती दिखाई दे रही है। नैतिकता, निष्ठा तथा ईमानदारी को मूर्खता या निर्बलता का लक्षण समझा जाने लगा है। घूसखोरी का दानव सरकारी कार्यालयों से लेकर वणिक् के व्यवसाय तक अपना आतंक फैला रहा है। प्रतिभा का हनन हो रहा है तथा अयोग्यों को पदों पर अभिषिक्त किया जा रहा है। भाई-भतीजा-वाद अब कालातीत हो गया है। पिता पुत्र से तथा पुत्र पिता से लाभ हानि की बात सोचने लगा है। विद्यालयी शिक्षा से लेकर व्यावसायिक शिक्षा तक ‘समर्थ’ लोगों का एकछत्र साम्राज्य बढ़ता जा रहा है, जिसका परिणाम करूणाहीन चिकित्सकों, अर्थलोलुप अभियन्ताओं विद्या का व्यापार करने वाले शिक्षकों, एक-एक पत्रावली का सुविधा शुल्क निर्धारित करने वाले लिपिकों, हस्ताक्षर का ‘मूल्य’ वसूल करने वाले अधिकारियों, मिलावटखोर खाद्यव्यापारियों तथा मृत्यु का प्रच्छन्न व्यापार करने वाले सफेदपोश कर्णधारों के रूप में प्रतिक्षण दिखाई दे रहा है। काले धन की अपरिमित खानों में निरन्तर वृद्धि हो रही है। कुल मिला कर जो जहाँ है, वहाँ नेत्र बन्द कर बहती गंगा में हाथ धो रहा है। परिवारों के सम्बन्ध स्वार्थ के पाश में जकड़े हुए पैतृक सम्पत्ति तथा अपने अघोषित अधिकारों के लिए एक दूसरे के रक्त के प्यासे हो रहे हैं।
स्त्री जाति के प्रति अपराध तथा दमन की सीमा मनोविक्षिप्त के रूप में दिखाई दे रही है। स्वतन्त्र राष्ट्र की राजधानियों में भी किसी भी जाति, वर्ग, अवस्था की स्त्री घर-बाहर सुरक्षित नहीं है। कभी भी किसी के साथ कोई घटना घट सकती है। लूटपाट, चोरी-डकैती तो शायद अपराध की कोटि में समझें ही नहीं जाते।
राष्ट्र की रक्षा प्रणाली भी भ्रष्टाचार के कलंक से दूषित हो गई है। कोई भी सूचना, कोई भी योजना अथवा कोई भी प्रकल्प गुप्त नहीं है। पुलिस सेना तथा न्यायाधिकरण जैसे प्रजारक्षण के लिए उत्तरदायी विभागों तक में छोटे स्तर के कर्मचारी से लेकर न्याय के मन्च पर बैठे न्यायाधिकारी तक किसी अपराध से अछूते नहीं हैं। ेइस समग्र परिदृश्य का मूल कारण है, कानून व्यवस्था का छिन्न-भिन्न होना। जब रक्षक ही भक्षक बन जाये, तो कैसे हो रक्षा समाज की! जब शासन तन्त्र केे मखमली वस्त्र में छिद्र हों, तो कैसे बच पाएगी शासित प्रजा की लाज?
जैसा कि ऊपर चर्चा की गई, कि भारतीय लोकतन्त्र एक सबल लोकतन्त्र समझा जाता है, जहाँ प्रजा को अपना राजा चुनने तथा अपदस्थ करने का पूरा अधिकार है, किन्तु प्रजा के समक्ष योग्य व्यक्ति को चुनना बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि निवार्चन प्रणाली को भी बहुत प्रभावपूर्ण नहीं कहा जा सकता। उससे भी बड़ी चुनौती है निर्वाचित शासन तन्त्र को सुशासन की दिशा में प्रवृत्त होने का मनोबल प्रदान करना तथा सहयोग करना, क्योंकि आज मँहगाई, भ्रष्टाचार, असुरक्षा आदि समस्याओं से जूझती जनता त्रस्त होकर धैर्य खो बैठी है। सुशासन का स्वप्न साकार करने के लिए जनता को कुछ धैर्य तथा विवेक का परिचय अवश्य देना होगा।
दूसरी ओर वर्तमान केन्द्रीय तथा राज्य-सरकारों के परिप्रेक्ष्य में सुशासन पर विचार किया जाए, तो निर्विवाद यह कहा जा सकता है, कि प्रजा की तात्कालिक अपेक्षा उक्त तीन क्षेत्रों- मँहगाई, भ्रष्टाचार तथा सुरक्षा सम्बन्धी समस्याओं के निवारण में है। प्रायः जनता के कुछ ‘सुविज्ञ’ जन कहते हैं, कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ इस घोष वाक्य के साथ विकास का जो वादा किया था वर्तमान प्रधानमन्त्री ने, वह कब पूरा होगा? इस सन्दर्भ में हमें विचार करना चाहिए, कि नखशिख तक कलंक के पंक में सनी भ्रष्ट सामाजिक संरचना को धोकर स्वच्छ करने में सामूहिक इच्छाशक्ति तथा धीरे-धीरे एक-एक अंग की मलिनता दूर करने की आवश्यकता है। तात्पर्य यह है कि प्राथमिकता का स्तर निश्चित कर तदनुसार कार्ययोजना से सुशासन का मार्ग सरल होगा।
उल्लेखनीय है, कि पाँच वर्ष का समय एक संक्रामक रोग के समूल उपचार के लिए कम नहीं तो अधिक भी नहीं है। लोकतन्त्र में जनता शासक की अपेक्षा अधिक बलवती होती है, इसमें सन्देह नहीं, किन्तु जब जनता स्वयं दिगभ्रमित हो जाए, तो उसको अनुशासित करना शासक का धर्म है। प्रजा के रक्षण के लिए आतताइयों के मूलोच्छेद में शासन को भय अथवा प्रमाद से ग्रस्त नहीं होना चाहिए।
धर्मशास्त्रीय सिद्धान्तों के पोषक वर्तमान भारतीय संविधान को विश्व के उत्कृष्ट संविधानों में से एक समझा जाता है। सैद्धान्तिक रूप से यह मानव तथा मानवाधिकार की रक्षा करने वाला मूल्यनिष्ठ संविधान है, किन्तु क्रियात्मक दृष्टि से यह अत्यन्त शिथिल तथा विरोधाभासों से युक्त दण्डनीति को प्रस्तुत करता है। यहाँ दण्ड प्रक्रिया की व्याख्या नहीं की जा रही है, किन्तु दण्डनीति का सामथ्र्य क्या है? एक समर्थ दण्डनीति कैसी हो सकती है यह अवश्य विचारणीय है। सूत्र रूप में कहा जाए, तो दण्डनीति का सामथ्र्य त्वरित तथा सुनिश्चित न्याय प्रक्रिया पर निर्भर है। यदि आतंकवादी के वादनिर्णय में मानवाधिकार की दुहाई देकर उसके अभियोग को सिद्ध करने व दण्डित करने में समय की कोई सीमा निर्धारित नहीं की जाती, यदि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था के पश्चात् भी अभियुक्त को यथा समय दण्ड नहीं मिल पाता, तो इस प्रकार की घटनाओं में वृद्धि तो निश्चित है।
चाहे खाद्य वस्तुओं में मिलावट का विषय हो, या घटतौली की प्रवृत्ति, अथवा वस्तुओं के अनावश्यक भण्डारण की बात, मनमाने मूल्यों पर वस्तु के विक्रय पर रोक लगनी ही चाहिए। किन्तु अभियोजन विभाग स्वयं कितना ईमानदार है, सब जानते हैं। ऐसी स्थिति में अपराध नियन्त्रण के लिए उत्तरदायी विभागों पर राज अंकुश अत्यावश्यक है।
प्रश्न यह है कि एक नितान्त ईमानदार राष्ट्रनिष्ठ तथा प्रबल सत्व वाला शासक भी बिना अपने जैसी मनोवृत्ति तथा मानसिकता वाले सहयोगियों के अधिक सफल नहीं हो सकता। अतः शासक को निर्भीक होकर सच्चाई एवं नैतिकता का मार्ग अपनाने वाले सहयोगियों का दल बना कर जनता के अनुशासन तथा दण्ड की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। ऐसे दृढ़ इच्छा शक्ति वाले निष्ठावान् नेतृवर्ग के अथक प्रयास तथा ‘कड़े फैसलों’ के बिना ‘सुशासन’ के मार्ग की बाधाएँ नहीं दूर हो सकतीं।
निश्चित रूप से सुशासन का स्थायी उपाय शिक्षा, संस्कार तथा राष्ट्रीय भावना का विकास करने वाली नीतियों एवं कार्ययोजनाओं द्वारा प्रजा को जाग्रत तथा समर्थ बनाना है, किन्तु तात्कालिक रूप से किसी भी मूल्य पर भारतीय दण्डनीति के मूल्यपरक पक्ष को उद्बुध कर न्यायक्रिया को समर्थ तथा गतिशील बनाने की नितान्त आवश्यकता है, अन्यथा भ्रष्टाचार का कैंसर राष्ट्र के ‘जीवन’ को कहीं इतना संकटापन्न न कर दे, कि मानवता का बीज ही नष्ट हो जाए।
- के-680, आशियाना, लखनऊ।





