भारत के नवोन्मेष के प्रतीक भासित होने वाले प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी गुजरात में सरदार पटेल बाँध पर भारत के प्रथम गृहमन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की 597 फिट (182 मीटर) ऊँची प्रतिमा स्थापित करने जा रहे हंै। जिसके निर्माण के लिए भारत के प्रत्येक ग्राम पंचायत से लौह दान एकत्र किया गया है, जो अमेरिका के ‘स्टेचू आफ लिबर्टी’ से भी ऊँची व संसार की सर्वाधिक ऊँची और उच्चस्तरीय लौह मूर्ती होगी।
इस मूर्ति को ‘स्टेचू आफ यूनिटी’ की संज्ञा दी गई है। इसके पीछे यह भाव स्पष्ट होता है कि ‘लिबर्टी’ (स्वतंत्रता) बिना ‘यूनिटी’ सम्भव नहीं। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के राजनीतिकार क्रान्तिकारियों ने जन-जन में यूनिटी अर्थात् एकता स्थापित करने के अनेक सूत्रों, संस्थाओं, संसाधनों का पहले सूत्रपात किया, बाद में ही आन्दोलन और संघर्ष की गतिविधियों को आका
र मिल सका है। इतिहास साक्षी है जब-जब हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन की किसी भी पहल या रूपरेखा में एकता का अभाव हुआ, वहाँ विफलता हाथ लगी।
महात्मा गाँधी और सरदार पटेल दोनों ही संस्कार शील और धार्मिक परिवार से जुड़े थे। दोनों ही बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त कर चुके थे। किन्तु गाँधी जी ने अपनी डिग्री का उपयोग व्यावसायिक दृष्टि से भी किया, किन्तु एक सफल बैरिस्टर होते हुए भी सरदार पटेल ने 1913 में बम्बई के मुख्य न्यायाधीश बेसिल स्काट के द्वारा जिलान्यायाधीश बनाये जाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया, वहीं उन्होने प्रक्टिस करने और लाॅ कालेज में शिक्षक होकर धनार्जन करने के प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर दिया।
गुजरात प्रान्त के काठियावाड़ क्षेत्र ने भारत को तीन महापुरूष प्रदान किए जिन्होंने भारत में जम चुके ब्रिटिश शासन को समूल विखण्डित करने में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें मोहनदास कर्मचन्द गाँधी, आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती और सरदार बल्लभ भाई पटेल के नाम विश्व विदित हैं। सरदार पटेल के पिता झबेर भाई 1857 में रानी लक्ष्मीबाई की फौज में सम्मिलित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे वे नानाराव पेशावर और तात्याटोपे के भी साथ रहे थे। इस प्रकार सरदार जी का परिवार संस्कारशील होने के साथ-साथ संघर्षशील भी था। 31 अक्टूबर, 1875 में गुजरात के काठियावाड़ गाँव में जन्मे सरदार पटेल को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का ऊर्जावान भाव विरासत में मिला था।
ब्रिटिश शासन में काठियावाड़ की एक तहसील बारडोली के किसान अपने कठोर परिश्रम से अति समृद्ध बन गये थे। हुकूमत ने इन किसानों के लगान पर 30 प्रतिशत की अचानक वृद्धि कर दी थी। सरदार पटेल ने किसानों को संगठित कर उस वृद्धि का विरोध किया और बढ़ा हुआ लगान न देने की घोषणा की। अंग्रेजी शासन ने किसानों के अन्न-धन-संसाधनों की कुर्की कर भारी दमन चक्र चलाया किन्तु सरदार जी के सफल और सशक्त नेतृत्व ने इस आन्दोलन की सफलता की धाक लन्दन तक पहुँचा दी और इसी बारडोली आन्दोलन से बल्लभ भाई पटेल ‘सरदार बल्लभ भाई पटेल’ बन गये।
सरदार पटेल ने पण्डित नेहरू के समानान्तर ही देश की स्वतंत्रता प्राप्ति आन्दोलन में भागीदारी की थी। बाल कृष्ण गोखले, गंगाधर तिलक, महामना मदन मोहन मालवीय, विपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपतराय तथा सुभाषचन्द्र बोस एवं महात्मा गाँधी के कृत्रित्व तथा भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरू, अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी, रोशन सिंह आदि शहीदों के बलिदान से मिली भारतीय स्वतंत्रता का असली परिष्कार और संस्कार उस यूनिटी ने दिया, जिसके सरदार बल्लभ भाई पटेल जनक माने जाते हैं।
भारतीय एकता का चुनौती भरा अद्भुत कार्य: देश का विभाजन अवश्यम्भावी हो गया था। दो टुकड़े पाकिस्तान और हिन्दुस्तान बन गया। ब्रिटिश शासन ने भारत के टुकड़ों में बाट देने की योजना डेढ़ सौ वर्ष पहले से ही बना रखी थी, उसे कार्यान्वित करने का असली षडयन्त्र 1947 के बाद लन्दन से लेकर अन्तिम वायस राय माउन्ट बेटिन द्वारा अन्त तक संचालित किया गया।
सरदार पटेल ने जिन आन्दोलनों-सत्याग्रहों में सफलता प्राप्त की उसमें प्रतिपक्ष में फिरंगियों का शासन तन्त्र था, किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गणतंत्र को पूरा आकार न मिल सके इसके लिए अंग्रेजों ने देश के राजाऔं, नवाबों, रियासतदारों को पहले से जो विशेषाधिकार दे रखे थे, उनकी समाप्ति की आशंका इन रजवाड़ों को सताने लगी और इसको विदा होता अंग्रेजी शासन परोक्ष षडयन्त्रों से और बढ़ा रहा था। पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना का जिन्न इन नवावों और रजवाड़ों पर सिर चढ़ कर बोलने लगा था। इन सबकी मंशा बन रही थी कि उनके रजवाड़ों-रियासतों को भारत में विलीन न कर स्वतन्त्र रहने दिया जाय। इन परिस्थितियों में भारत की 565 रियासतों को देश की भूगोल में विलय कर के सुदृढ़-सबल और वास्तविक रूप से ‘एक’ भारत का निर्माण करना बहुत ही चुनौती भरा कार्य था।
सरदार पटेल ने 5 जुलाई, 1947 को देशी रियासतों के लिए एक नये विभाग की अलग से स्थापना की तथा सभी नवाबों एवं नरेशों को मार्मिक पत्र लिख कर राष्ट्रीय किन्तु मैत्रीय सहयोग की भावना से भारतीय संघ की संविधान सभा में सम्मिलित होने का आग्रह किया। उन्होंने दिनांँक 10 जुलाई, 1947 को अपने निवास पर कुछ राजाआंें की बैठक बुलाकर भारत में उनकी रियासतों के विलय का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित करा दिया। रियासतों के एक संगठन ‘चैम्बर आफ प्रिन्सेज’ के भी तत्कालीन अध्यक्ष भोपाल के नवाब द्वारा 25 जुलाई, 1947 को बैठक बुलाकर लार्ड माउन्ट बेटन की उपस्थिति में सरदार पटेल ने बड़ी कूटनीतिक सूझबूझ से भारत संघ में विलय का प्रस्ताव पारित करवा दिया। इनमें इन्दौर, जोधपुर, बीकानेर तथा उदयपुर आदि राज्य शामिल थे।
मुस्लिम लीग का षडयन्त्र इन राजाओं को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था। मुस्लिम रियासतों के नवाब इस भूमिका में शामिल थे और वायसराय का राजनीतिक प्रकोष्ठ भी परोक्ष रूप से षडयन्त्र को हवा दे रहा था लेकिन सरदार पटेल की कूटनीति ने इस समूचे भारत विरोधी संजाल को ध्वस्त कर दिया।
जो नम्रता-समरसता की भाषा से नहीं माने, हैदराबाद के निजाम और जूनागढ़ के नवाब को गृहमंत्री के रूप में सरदार ने अपनी सैन्य शक्ति से विवश करके उनके मुस्लिम लीग प्रेरित पाकिस्तान प्रेम की सारी हवा निकाल दी, यद्यपि प्रधानमंत्री के रूप में पं॰ जवाहरलाल नेहरू सरदार पटेल की शक्ति प्रदर्शन की नीति से सहमत नहीं थे। इसी कारण काश्मीर की स्थिति आज भी भारत के लिए कंटकमय और संकटमय बनी हुई है। अलगाववादियों और आतंकवादियों से जूझ रही कश्यप ऋषी की यह काश्मीर की पवित्र धरती कब प्रफुल्लित होकर लाखों-लाखों संख्या में निर्वासित काश्मीरी पण्डितों का फिर से स्वागत और अभिनन्दन करेगी?
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की संकल्पना वाली सरदार पटेल की ‘स्टेचू आफॅ यूनिटी’ असरदार सरदार की एकता शक्ति की अवश्य प्रतीक बनेगी, तथा ऐसा विश्वास भारतीय गणतंत्र के जन-गण में उदित हो चुका है। ु
- प्रधानाचार्य, गुरूगोविन्द सिंह विद्या मन्दिर इण्टर कालेज, रिखौना, सीतापुर।





