Saturday, September 6, 2014

असली आजादी की तलाश.प्रो - पुष्पेन्द्र पंत

आजकल अखिल भारतीय एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस यानी आम आदमी की बोली में आईएएस की प्रवेश परीक्षा के पाठ्यक्रम में बदलाव को लेकर जो बवंडर उठा उसके सिलसिले में सामान्य ज्ञान का पर्चा नम्बर दो सीसैट ही सारे बवाल की जड़ है और प्रमुख मुद्दा आसानी से मान लिया जा रहा है। कभी इसे हिन्दी/अन्य भारतीय भाषाओं बनाम अंगे्रजी की लड़ाई बनाकर पेश किया जाता है तो कभी देहात और शहर का शास्वत संग्राम। किसी को इसमें विज्ञान और तकनीक के छात्रों को मानविकी एवं समाज शास्त्र के विद्यार्थियों पर तरजीह देने की साजिश दिखाई देती है।
बरहाल! हमारी समझ में असली समस्या ‘सीसैट’ नहीं बल्कि गुलामी के दौर से चली आ रही सदियों पुरानी प्रशासनिक सेवा को आजादी के बाद किसी न किसी बहाने पैबन्द लगा, पंचर ठीक करवा, जोड़-जंतर-जुगाड़ से काम चलाऊ बनाए रखने से पैदा हुई है। हम इसे बहुत आसानी से और खतरनाक तरीके से भुला चुके हैं, कि जिस बापू ने आजादी के वक्त कांग्रेस पार्टी के विलय-विसर्जन की बात सुझाई थी वैसे ही कुछ समझदार लोगों ने ‘आईसीएस’ से निजात पाने को असली आजादी से जोड़ा था।
भले ही इसको अंग्रेज हाकिम और उनके पिट्ठू ‘आईएएस’ ऐसा इस्पाती ढ़ाँचा बताते थे जिसके अभाव में हिन्दुस्तान की एकता, अखण्डता, शान्ति और सुव्यवस्था बरकरार नहीं रह सकती थी। हकीकत यह थी कि खुद देवदŸा अधिकार से शासक बने प्रशंसकों की इस बिरादरी ने तरह-तरह के मिथकों से महिमामण्डित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यह हरफनमौला (पहले अंगे्रज फिर उनके नकलची भूरे साहिब) कभी जिलाधीश बन जाते तो कभी जज या राजदूत। देशी रियासतों के रेजीडेन्टों की भूमिका भी इनके सिवा कौन निभा सकता था? सिर्फ फौज वाले इनसे महफूज रहे। यह ना भूलें कि साढ़े पाँच सौ रजवाड़ों-रियासतों में इनकी हस्ती सीधे ब्रिटेन द्वारा शासित इलाके जैसी नहीं थी। अतः यह सोचना गलत है कि औपनिवेशिक दौर में सारा देश यही चलाते थे।
दूसरे महायुद्ध तक ‘आईसीएस’ की प्रवेश परीक्षा विलायत में ही होती थी। अतः इसमें बेहद सम्पन्न परिवार के कुलदीपक ही हिस्सा ले सकते थे। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ‘आईसीएस’ में कामयाब होने वाले पहले हिन्दुस्तानी थे और यह वैतरणी पार करने के लिए वह बरसों विलायत में रहकर अपना चोला बदल चुके थे। यह भी भुलाना कठिन है कि कांगे्रस पार्टी का जन्म जिस ‘आन्दोलन’ की प्रसव वेदना के वाद हुआ, उसका मकसद ‘आईसीएस’ परीक्षा में भारतीय उम्मीदवारों की आयु सीमा बढ़वाने की माँग था। मजेदार बात यह है कि उस जमाने में भी महत्वाकांक्षी अभिभावक संतान के उज्जवल भविष्य के लिए उसे ‘आईसीएस’ बनाने पर अमादा रहते थे, परन्तु स्वाभिमानी संतानें स्वेच्छा से तरक्की की राह को तज देती थीं। योगी अरविन्द घोष से लेकर नेता जी सुभाष चन्द्र बोस तक के नाम इस सिलसिले में आते हैं जो असाधारण प्रतिभा के बावजूद जानबूझकर परीक्षा में फेल हुए। वह विलायती मोल वाली देशी मुर्गी बनने को राजी नहीं हो सके।
आजादी के साथ आया देश का विभाजन। तत्कालीन गृहमन्त्री सरदार पटेल के सामने विकराल चुनौती थी दंगों को काबू पाना, शरणार्थियो को फिर से बसाना और फिर रियासतों-रजवाड़ों को भारतीय जनतन्त्र में विलय करना। इस कारण जर्जर और जंग लगे ही सही नाममात्र के ‘इस्पाती ढ़ांचे’ को गिराना सम्भव नहीं था। कुछ पल की मोहलत पाने से इन हाकिमों को लंबी राहत मिल गई। अंग्रेजों और अंगे्रजीपरस्त नेहरू को यह समझाते इन सलाहकारों को देर नहीं लगी कि वह तो मजबूरी में अंग्रेजों की खिदमत कर रहे थे। बदले निजाम में वह अपनी बहुमूल्य सेवाएं आजाद भारत के नागरिकों को मालिक मान देने लगेंगे। तब से राजनेताओं को पटाने के इन हुनरमंद लोगों ने पीछे पलटकर नहीं देखा। शासक कोई भी हो राज यहाँ आला अफसर व संतरी ही करते हैं। पैंसठ-सŸार बरस में हाल बद से बदतर होता गया है।
‘आईसीएस’ से रूपान्तरित ‘आईएएस’ इस्पाती ढ़ांचे का रूपान्तरण एक ऐसी व्यवस्था में हो चुका है, जिसकी चोटी पर विराजते हैं ‘आईएएस’ अधिकारी  और फिर क्रमशः अन्य अपेक्षाकृत पिछड़े जो महज कुछ नम्बरों की कमी से वंचित रह जाते हैं। सबसे बड़ा दुर्भाग्य इस देश का यह है कि मशहूर समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवासन की संस्कृतीकरण की अवधारणा यहाँ भी असरदार दिखती है। जो प्रत्याशी वंचित-देहाती तबके से संयोगवश, आरक्षण की व्यवस्था और मलाईदार परत के संयोग से, या असाधारण प्रतिभा के धनी होने के कारण एक बार आला अफसर बन जाते हैं वह नए जमाने के ‘द्विज’ बन अपनों से और आम आदमी से कट जाते हैं। ऐसे ‘पुरोहितो’ से यह आशा कैसे की जा सकती है कि वह कोई वास्तव में जनतान्त्रिक जनहितकारी परिवर्तन का सूत्रपात करेंगे।
जब-जब संघ लोक सेवा आयोग नई जरूरतों के अनुसार किसी रचनात्मक परिवर्तन का अभियान छेड़ता है उसकी कमान इन्हीं भीष्म पितामह महारथियों को सौंपी जाती है जो धर्म-अधर्म, नीति-अनीति से परे सरशैया पर लेटे उपदेश ही दे सकते हैं। अखिल भारतीय सेवाओं में निश्चय ही नगण्य संख्या में ही सही ईमानदार, सुयोग्य, अनुभवी तथा देशप्रेमी अधिकारी हैं पर वह अपवाद है। उन्हें जीवनपर्यन्त उपेक्षा-प्रताणना का शिकार होना पड़ता है। यदि वह किसी प्रकार टूटने से बचे रहते हैं तो इसके लिए अखिल भारतीय परीक्षा का पाठ्यक्रम या मसूरी में प्राप्त प्रशिक्षण नहीं वरन् उनका अपना जमीर और मूल्य ही निर्णायक महत्व के समझे जाने चाहिए। यह बहस ‘सीसैट’ तक सीमित न रहनी चाहिए। आजाद हिन्दुस्तान में औपनिवेसिक नौकरशाही के तिलिस्म को तोड़ने की माँग से जोड़ी जानी चाहिए। तत्काल।
- स्कूल आफ इंटरनेशनल स्टडीज,जेएनयू