Saturday, September 6, 2014

योजना आयोग का अवसान. - प्रोफेसर ए॰पी॰ तिवारी

स्वतंत्र भारत में योजना आयोग का गठन भारत सरकार द्वारा 15 मार्च, 1950 को किया गया। भारतीय संविधान में इसके गठन के सम्बन्ध में कोई प्रावधान नहीं है। अतः यह एक संविधानातीत संस्था है। इसे एक परामर्शी निकाय की भी संज्ञा दी जाती है। योजना आयोग का कार्य राज्यों को नियोजन एवं विकास के सम्बन्ध में व्यापक दिशा-निर्देश देना है; किन्तु राज्य इनका पालन करने के लिए संवैधानिक रूप से विवश नहीं हैं। ऐसे में, भारत में नियोजन का स्वरूप आरम्भ से ही निर्देशात्मक रहा है, न कि आदेशात्मक जैसा कि सोवियत संघ में था। सोवियत संघ की नियोजन प्रणाली पूर्णतया केन्द्रीयकृत थी। सोवियत संघ के टूटने के साथ इस प्रणाली का नामोनिशान मिट चुका है।
भारत की मिश्रित अर्थव्यवस्था में देश के भौतिक संसाधनों तथा जनशक्ति का आंकलन करने तथा आवश्यकतानुसार उसमें संवर्द्धन हेतु योजना आयोग की रचना की गई। योजना आयोग पं॰ जवाहर लाल नेहरू का ‘ब्रेन-चाइल्ड’ था। योजना आयोग का पदेन अध्यक्ष प्रधानमन्त्री होता है। इस प्रकार पं॰ नेहरू योजना आयोग के प्रथम अध्यक्ष बने। पं॰ नेहरू की विचारणा थी कि काँग्रेस के आर्थिक प्रोग्राम को योजना आयोग द्वारा नियोजित विकास के रूप में अमली जामा पहनाया जायेगा। इसमें अध्यक्ष होने के नाते उनकी केन्द्रीय भूमिका होगी। विकास व नियोजन के सोवियत माॅडल से सम्मोहित नेहरू ने भारत के विकास में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को प्रबल माना तथा निजी क्षेत्र की भूमिका को सापेक्षतया क्षीण। देश के विकास के आरम्भिक चरण में योजना आयोग तथा सार्वजनिक क्षेत्र की यथावाँछित भूमिका रूपायित भी हुई। हालाँकि नियोजित विकास की प्रक्रिया में अनेकानेक समाजार्थिक ऐंठने पड़ती गईं। योजना आयोग एक ‘सुपर कैबिनेट’ के रूप में कार्य करने लगा। इससे ”भारत राज्यों का एक संघ होगा“ की संवैधानिक अभिधारणा का प्राण-तत्व आहत हुआ तथा विकास सरोकारों को लेकर केन्द्र एवं राज्यों में खटास बढ़ी।
मुख्य कार्य:
योजना आयोग का गठन जिन विशिष्ट कार्यों के सम्पादन के लिए किया गया, वे निम्नवत् हैं:
1 देश के भौतिक, पूँजी एवं मानवीय संसाधनों का आकलन करना।
2. मानवीय संसाधनों के प्रभावी एवं संतुलित उपयोजन हेतु योजना तैयार करना।
3. नियोजन के विभिन्न चरणों को निर्धारित करना तथा प्राथमिकता के आधार पर संसाधनों के आवंटन को प्रस्तावित करना।
4. सरकार को उन कारकों से अवगत कराना जो आर्थिक विकास में बाधक हैं तथा उन परिस्थितियों को निर्धारित करना जो प्रचलित सामाजिक एवं राजनीतिक स्थितियों में योजनाओं के कार्यान्वयन हेतु आवश्यक हैं।
5. योजना के विभिन्न चरणों पर उसकी प्रगति का समय-समय पर मूल्याँकन करना तथा सुधार हेतु उपाय सुझाना।
6. आयोग को संदर्भित विशिष्ट विषयों पर केन्द्र एवं राज्य सरकारों को समय-समय पर परामर्श देना।
पंचवर्षीय योजनाओं का फ़ोकस:
नियोजित विकास की प्रक्रिया में पंचवर्षीय योजनाओं का केन्द्रीय फोकस बदलता रहा है। पहली पंचवर्षीय योजना में भूमि सुधारों एवं सामुदायिक विकास कार्यक्रम के माध्यम से कृषि-विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। कृषि पूरी तरह से विकसित हुई नहीं और दूसरी पंचवर्षीय योजना में विकास की ‘नेहरू-महालनोबिस रणनीति’ के अन्तर्गत आधारभूत एवं भीमकाय उद्योगों के विकास को सबसे ऊपर रख दिया गया। इस रणनीति ने भारत की ज़मीनी सच्चाई को दरकिनार करते हुए आर्थिक तरक्की के गाँधीवादी रास्ते को पूरी तरह से खारिज कर दिया। फलस्वरूप देश की समाजार्थिक संरचना में जो ढाँचागत ऐंठने पड़ीं उन्हें हम आज तक ठीक नहीं कर पाये। विकास व नियोजन मामलों के जानकार स्वर्गीय प्रो॰ शैलेन्द्र सिंह कहा करते थे ”अभी भी योजना आयोग के गलियारों में नेहरू एवं महालनोबिस की प्रेतात्माएँ चक्कर लगाती हैं।“ उनका यह लाक्षणिक कथन नितान्त गूढ़ था। योजना आयोग जमीनी सच्चाई से कटकर अपने वातानुकूलित कक्षों में योजनाएँ तो बनाता रहा लेकिन उनका लाभ लक्षित समूहों तक यथापेक्षित नहीं रिस पाया। योजना आयोग द्वारा तैयार किये जाने वाले दस्तावेज पढ़ने में तो अच्छे लगते रहे किन्तु अमली जामा पहनाये जाने में बेहद कमजोर। गाँधी के आर्थिक-दर्शन की अनदेखी और नेहरू के आर्थिक दर्शन की मौन स्वीकृति एक राष्ट्र के रूप में हमें बहुत महंगी पड़ी है।
प्रथम तीन पंचवर्षीय योजनाएँ अपने आप में भिन्न हैं। इसकी वजह यह है कि ये नेहरू की अध्यक्षता में तैयार की गईं तथा क्रमिक रूप में इनकी कुल कालावधि पन्द्रह वर्षों की रही। तीसरी योजना (1961-66) में अर्थव्यवस्था को आत्मस्फूर्त एवं आत्मपोषणीय बनाने को प्राथमिकता दी गई। लेकिन भारत-चीन युद्ध एवं भारत-पाक युद्ध तथा 1965 एवं 1967 में मानसून देवता के कुपित होने से लगातार सूखे की स्थिति से अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त हो गई। परिणामतः चैथी योजना समय से नहीं शुरू की जा सकी और 1966-69 के लिए योजना की छुट्टी कर देनी पड़ी। चैथी योजना में ‘स्थिरता के साथ विकास’ का नारा दिया गया। 1971 में इन्दिरा गाँधी द्वारा ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया गया। यह आर्थिक नारा था जिसके राजनीतिक निहितार्थ थे। पाँचवीं योजना में ‘गरीबी-उन्मूलन एवं आत्मनिर्भरता की प्राप्ति’ का नारा दिया गया। हालाँकि इस योजना को एक वर्ष पूर्व ही समाप्त करना पड़ा। 1977 के चुनाव के परिणामों ने नियोजन-क्षेत्र में एक मूल परिवर्तन को जन्म दिया। तत्कालीन जनता पार्टी की सरकार द्वारा 1978-83 के लिए जो छठी पंचवर्षीय योजना की रूपरेखा तैयार की गई उसमें विकास के गाँधीवादी दर्शन को समावेशित करने की चेष्टा की गई। यही एक ऐसी योजना थी जिसमें ‘रोजगार’ को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई और आर्थिक संवृद्धि को द्वितीयक स्थान दिया गया। राजनीतिक घटनाचक्र में परिवर्तन के चलते काँग्रेस ने 1980-85 के लिए जो छठी योजना बनाई उसमें आर्थिक संवृद्धि को पुनः सबसे ऊपर रख दिया गया। हालाँकि गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन की भी बात की गई। सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) में ‘गरीबी पर प्रत्यक्ष प्रहार’ की रणनीति अपनाई गई। लेकिन गरीबी का परिदृश्य लगभग वही रहा जो छठी योजना में था। आठवीं योजना समय से लागू नहीं की जा सकी। इसके मुख्य कारण थे: निरन्तर राजनीतिक अस्थिरता एवं तीन बार योजना आयोग का पुनर्गठन, राजकोषीय संकट, मुद्रास्फीति का भारी दबाव, भुगतान सन्तुलन का संकट एवं खाड़ी युद्ध।
आठवीं योजना (1992-97) उदारीकृत परिवेश में बनाई गई पहली योजना थी। इसमें सर्वप्रथम मानव विकास पर जोर दिया गया। इस योजना में कहा गया कि ‘अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों/क्रियाओं का सुस्पष्ट प्राथमिकीकरण किया जायेगा।’ इस प्रकार, योजना आयोग की भूमिका को ‘निर्देशात्मक नियोजन’ की नीति के तहत कतर-ब्योंत दिया गया। ध्यातव्य है कि नई आर्थिक नीति व सुधारों की प्रक्रिया का जुलाई 1991 में शंखनाद हो चुका था। इसके अधीन सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को कम करते हुए निजी क्षेत्र के वर्चस्व को बढ़ा दिया गया था। इसका प्रभाव पूरी तरह से इस योजना की दार्शनिक पृष्ठभूमि एवं लक्ष्यों तथा रणनीति पर पड़ना अवश्यम्भावी था। यह सोंच बलवती हो चुकी थी कि योजना आयोग की भूमिका केवल प्राथमिकताओं को तय करना होगा और व्यापक पूँजी-निवेश का दारोमदार निजी क्षेत्र पर होगा। हालाँकि विकास एवं नियोजन की प्रक्रिया के संरचनात्मक नौकरशाहीकरण से इसमें रोध बने रहे।
नवीं योजना का नारा था, ”समता एवं वितरणात्मक न्याय से साथ संवृद्धि“। इसमें पर्याप्त उत्पादक रोजगार-सृजन एवं गरीबी दूर करने हेतु कृषि एवं गाँवों के विकास, खाद्य सुरक्षा, आधारभूत सेवाओं का प्रावधान एवं आत्मनिर्भरता पर जोर दिया गया। दसवीं योजना में संवृद्धि, समता व सामाजिक न्याय एवं पोषणीयता पर फोकस किया गया। इस योजना के लिए अंगीकृत रणनीति में सरकार की कार्य-भूमिका को नये सिरे से परिभाषित करने, निजी क्षेत्र के सबल उभार, अवस्थापना में अधिक निवेश तथा मौद्रिक व राजकोषीय नीतियांे को लोचशील बनाये जाने पर भी बल दिया गया। ग्यारहवीं योजना में ‘अधिक तीव्र एवं समावेशी संवृद्धि’ को केन्द्रीय विचार के रूप में आत्मसात किया गया। हालाँकि तेज संवृद्धि एवं समावेशी संवृद्धि परस्पर प्रतिद्वन्द्वी स्वभाव के हैं। फिर भी, बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) में ‘तीव्र’ एवं ‘समावेशी’ प्रत्ययों के साथ ‘पोषणीय’ संवृद्धि को रेखाँकित किया गया है। लेकिन विकास को लेकर शब्दावलियों में परिवर्तन मात्र से कोई आमूलचूल बदलाव नहीं आने वाला है।
केन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति:
योजना आयोग की कार्यप्रणाली की समीक्षा से पता चलता है कि लगातार इसमें केन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति विद्यमान रही है। यह भारतीय संघीय गणतंत्र की मूल भावना के विरूद्ध है। केन्द्र से राज्यों को दी जाने वाली योजनागत सहायता जिन स्कीमों के लिए दी जाती है वे हैं: ;पद्ध केन्द्र द्वारा प्रायोजित स्कीमें, ;पपद्ध राज्यों द्वारा प्रायोजित स्कीमें एवं वाह््य सहायतित स्कीमें। राज्यों को हस्तान्तरित होने वाली योजनागत सहायता के बावजूद अन्तर-राज्यीय विकास असमानताएँ बढ़ी हैं। साथ ही वित्तीय संसाधनों पर सापेक्षतया केन्द्र के अधिक वर्चस्व से राज्यों की केन्द्र पर पराश्रिता से विकास मामलों में राज्यों की स्वायत्तता को ठेस पहुँचती रही है। पिछड़े हुए राज्यों के उत्पादनशील कार्यों को विस्तार देने के लिए आवश्यक है कि प्रति हेक्टेयर कृषि-उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि की जाय। साथ ही साथ ग्रामीण एवं उपनगरीय क्षेत्रों में लघु एवं मझोले उद्योगों में रोजगार-वर्द्धन के ठोस प्रयास किये जाने की बेहद जरूरत है।
राजकोषीय संकट:
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र का न केवल आवश्यकता से अधिक विस्तार हुआ बल्कि ‘लाइसेंस-परमिट राज’ की एक ऐसी प्रणाली ने जड़ पकड़ लिया कि जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला और विकास के प्रयास नौकरशाही के चंगुल में फँस गये। यही कारण था कि 1950 से 1980 के तीन दशकों के बीच औसत वार्षिक संवृद्धि दर 3.5 प्रतिशत पर अटकी रही। इस निम्न संवृद्धि दर को डाॅ. राजकृष्ण ने ‘हिन्दू संवृद्धि दर’ की संज्ञा दी। सार्वजनिक क्षेत्र के नाम पर सरकार उन उद्यमों में कर्ज लेकर निवेश करती गई जो लगातार घाटे पर चल रहे थे। इस तरह राजकोषीय संकट पैदा हो गया। कर्ज की वापसी के लिए सरकार कर्ज लेती रही और वह एक ‘ऋण-जाल’ सरीखी स्थिति में फँस गई।
योजना आयोग बनाम वित्त आयोग:
सरकारी व्यय के ‘योजना’ एवं ‘गैर-योजना’ कोटियों में कृत्रिम वर्गीकरण से गैर-योजना व गैर-विकासगामी व्यय में अनियंत्रणात्मक वृद्धि से राजकोषीय असंतुलनों में वृद्धि हुई है। इससे राजकोषीय संकट गहराया है। ध्यातत्व है कि राज्यों को योजना अन्तरणों को कार्यरूप देने वाली संस्था योजना आयोग है जबकि गैर-योजनागत अन्तरण वित्त आयोग द्वारा किये जाते हैं। यह बात बहुत महत्वपूर्ण है ‘वित्त आयोग’ एक संवैधानिक संस्था है जिसके गठन के सम्बन्ध में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 में प्रावधान है। इसके आमने-सामने ‘योजना आयोग’ एक संविधानातीत संस्था है। लेकिन कार्यप्रणाली में योजना आयोग का दबदबा रहा है। यह समझने की बात है कि योजना आयोग के गठन मात्र से ही वित्त आयोग की संवैधानिक कार्य-भूमिका को आघात पहुँचाया गया। उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान वित्त आयोग को कहीं भी योजनागत कार्यों पर विचार करने से नहीं रोकता क्येांकि संविधान में सरकारी व्यय का वर्गीकरण ‘योजना’ एवं ‘गैर-योजना’ कोटियों में वर्णित नहीं है।
विकल्प:
इस प्रकार, नितान्त आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी व्यय के ‘योजना’ एवं ‘गैर-योजना’ के कृत्रिम उभयनिष्ठी वर्गीकरण को समाप्त कर व्यय की एक समेकित प्रणाली को अपनाया जाय जो अधिक आर्थिक एवं यथार्थपरक हो। साथ ही साथ उदारीकरण एवं भूमण्डलीकरण के वर्तमान संदर्श में योजना आयोग के स्थान पर एक ‘राष्ट्रीय विकास आयोग’ का गठन किया जाय जो ‘सार्वजनिक-निजी भागीदारी’ के प्रकल्प को कार्य रूप देने में उपकरणात्मक भूमिका निभाये। साथ ही साथ वित्त मंत्रालय एवं वित्त आयोग की कार्य-भूमिका को अधिक बलवती बनाना होगा। एक राष्ट्र के रूप में हमें चाहिए कि हम सब मिलजुलकर अपनी विपुल प्राकृतिक एवं मानवीय संपदा का पोषणीय उपयोग करें। आजीविका के स्रोतों का विविधीकरण एवं उनकी पोषणीयता, प्रशासनिक एवं वित्तीय विकेन्द्रीयकरण तथा जन-भागीदारी पर केन्द्रित विकास की रणनीति बेहतर परिणाम देगी। कौशल व उद्यमिता विकास, अवस्थापना सुविधाओं का वर्द्धन तथा विपणन व गुणवत्ता नियंत्रण इस रणनीति के अनिवार्य तत्व होंगे। एक राष्ट्र के रूप में हमारी आर्थिक सृजनशीलता जिन तीन मूल तत्वों से निर्धारित होगी, वे हैंः ;पद्ध परम्परागत ज्ञान, ;पपद्ध नवोन्मेश एवं ;पपपद्ध हमारी आरम्भिक संस्कृति की शक्ति। ु
- अध्यक्ष, अर्थशास्त्र विभाग एवं डीन 
डाॅ. शकुन्तला मिश्रा विश्वविद्यालय, लखनऊ।
ई-मेलः कतण्जपूंतपंच/हउंपसण्बवउ