यहांँ पर यह याद रखना बेहद जरूरी है कि स्वतन्त्रता किसी भी तरह निरपेक्ष स्वछन्दता का पर्याय नहीं हो सकती। अगर ऐसा हो तो आत्महंता हो सकती है, जैसा कि कई देशों में हुआ है। वहांँ प्रजातन्त्र तो आया परन्तु ठहर नहीं सका। सही अर्थो में स्वतन्त्रता मिलने के साथ व्यक्ति के साथ दायित्व और कर्तव्य भी जुड़ जाते हैं। आत्मनियन्त्रण और लगातार चैकसी के अभाव में स्वतन्त्रता की परिकल्पना अधूरी ही रहेगी। हम खुद को आज स्वातन्त्रयोŸार युग का वासी मानते हैं। लगता है मानो स्वतन्त्रता कालक्रम में एक बिन्दु था, न कि कोई सतत अनुभव।
ऐसा लगता है मानो पश्चिमीकरण की स्वाभाविक नियति की दिशा में आगे बढ़ती हमारी यात्रा राजनैतिक स्वतन्त्रता महज एक पड़ाव थी। आज भाषा, व्यवहार और विचार के दायरे से स्वतन्त्रता, स्वाधीनता लगभग बाहर सी धकेल दी गई है। कभी-कभी लगता है कि स्वतन्त्रता, आत्मगौरव और आत्मबोध की जगह हम अंगे्रजी राज के उŸाराधिकारी बनकर रह गये हैं। वैश्विीकरण के दबाव में हम मान बैठे हैं कि पश्चिमी सभ्यता अकाट्य और अपरिवर्तनीय यात्रा-पथ और भविष्य है। राजनीतिक रूप से भी स्वाधीन होकर भी आज हम हीनताबोध से ग्रस्त, भारतीयता के बारे में अस्पष्ट, ज्ञान-विज्ञान के आयातक और अपनी जड़ों से कटते चले गए हैं। गांधी जी का हिन्द स्वराज हमारी रीति-नीति से कब का हाशिये पर जा चुका है।
बौद्धिक चर्चाओं में जिस अमूर्तीकृत भारतीय जीवन का विश्लेषण हो रहा है, वह साम्राज्यवादी आधार पर भी अप्रासांगिक है और केवल आरोपित दृष्टि को ही प्रोत्साहित कर रहा है। वह न ज्ञान से जुड़ रहा हैं, न समाज से और न ही कोई वैकल्पिक दिशा या राह ही ढूँढ़ पा रहा है। स्वदेशी या देशज विचार उपयोगी हो सकते हैं पर इसके लिए जो संकल्प और इच्छाशक्ति चाहिए वह विरल होती जा रही है और जो प्रयास हो भी रहे हैं वे अधकचरे और बेमन से हो रहे हैं। वस्तुतः स्वतन्त्रता एक मूल्य है, जीवन से भी बड़ा मूल्य।
धरती पर मनुष्य ही अकेला जीव है जिसके लिए उसका शारीरिक और भौतिक जीवन नाकाफी या अपर्याप्त होता है, क्योंकि वह अपनी बुद्धि के बल पर इसके पार भी झाँक पाता है और कुछ मूल्यों या आदर्शों का सृजन कर पाता है। मूल्यों का जगत सम्भावना का जगत है और इसका प्रयोजन मनुष्य को राह दिखाना और मार्ग प्रशस्त करना है।
स्वतन्त्रता कभी निरपेक्ष नहीं होती, पर इसका गलत अर्थ लगाकर हम स्वछन्द होते जा रहे हैं और उसका परिणाम लूट-मार, हत्या, घोटालों, त्रासदियों, अत्याचार, व्यभिचार और हिंसा की असंख्य घटनाओं के रूप में आये दिन हमारे सामने उपस्थित होता रहता है। स्वतन्त्रता भी धर्म का ही एक रूप है। सही अर्थों में स्वतन्त्रता तभी आ सकती है जब हमारा आत्मबोध व्यापक बनेगा और पूरे समाज और समग्र जीवन की चिन्ता हमारी अपनी चिन्ता का हिस्सा बनेगी। वैश्वीकरण के दौर में चाहकर भी आज अकेला व्यक्ति और अकेले देश के सुखी जीवन की कल्पना सम्भव नहीं है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का प्रिय भजन भी यही कहता और बताता है कि पराई पीर और दुख को समझने-बूझने वाला मनुष्य ही वैष्णव है। स्वतन्त्रता शुतुरमुर्ग जैसे पलायन की नहीं दूसरों के साथ, सबके साथ, लोक के साथ जुड़ने और जोड़ने के उद्यम की अपेक्षा करती है। ु





