मैं खाना खाता होऊँ, अन्तःपुर में होऊँ या शयनागार में, प्रतिवेदक लोग प्रजा का कार्य मुझे सर्वत्र सूचित करें। मैं सब समय प्रजा का ही कार्य करूँगा। जो कुछ आज्ञा मैं मौखिक दूँगा या अमात्यांें को अत्यधिक कार्य सौंपूँगा, उस सम्बन्ध में विवाद या एतराज मुझे सूचित किया जाये।
कितना ही उद्यम करूँ, कार्य में लगा रहूँ, मुझे संतोष नहीं होता। सब प्राणियों का हित करना ही मैने अपना कर्तव्य माना है और उसका मूल है उद्यम तथा कार्य तत्परता। लोगों के लिए कार्य करने के अतिरिक्त मेरा अपना कोई काम नहीं है।
जो कुछ प्रक्रम करता हँू, इसलिए करता हूँ, कि जीवों के ऋण से उऋण होऊँ। बिना उत्कृष्ट प्रक्रम के यह दुष्कर है।





