Saturday, September 6, 2014

भारतीय पत्रकारिता कल और आज - डा॰अब्दुर्रहीम

ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के बावजूद भारतीय पत्रकार अपने मिशन की ओर निरन्तर बढ़ते ही रहे थे। यह देखकर ब्रिटिश सरकार ने 13 मई, 1799 ई॰ में पहला प्रेस कानून बनाया जिसके अन्तर्गत पत्र प्रकाशन के सम्बन्ध में कठोर आदेश था कि पत्र की सामग्री का सर्वेक्षण किसी सरकारी अधिकारी द्वारा किया जायेगा। कुछ समय पश्चात् 04 अपै्रल सन् 1823 ई॰ को प्रेस सम्बन्धी एक काला कानून लागू हो गया जिसके अन्तर्गत जान ऐडम ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष समाचार पत्रों पर नियन्त्रण किये जाने के कुछ प्रस्ताव प्रस्तुत किये जिन पर विचारोपरान्त गवर्नर जनरल ने एक रेग्यूलेशन जारी करते हुए व्यवस्था दी कि सरकारी अनुमति के बिना पुस्तकों तथा पत्रों का प्रकाशन और प्रेस का उपयोग करना निषिद्ध होगा। कुछ समय पश्चात जून 1857 ई॰ में लार्ड केनिंग ने नया प्रेस एक्ट लागू किया जिसे गलाघोंट प्रेस एक्ट के नाम से चिन्हित किया गया। इस प्रकार अंगे्रज सरकार के काले कानूनों का भारतीय पत्रों की स्वतंत्रता पर प्रहार तो अवश्य होता रहा, किन्तु निराशा और हताशा का वातावरण पत्रकारिता के क्षेत्र में कभी नहीं रहा। सरकार की दमनकारी नीतियों के फलस्वरूप समाचार पत्रों के माध्यम से सरकार का विरोध निरन्तर होता रहा। सरकार द्वारा यद्यपि सम्पादकों को दण्डित किया जाता रहा; किन्तु आज़ादी के दीवाने अपने मिशन के पक्के भारतीय पत्रकारों ने हार नहीं मानी। इन समाचार पत्रों की कड़ी में जून 1854 ई॰ में कलकत्ता से समाचार ‘सुधावर्षण’ का प्रकाशन श्याम सुन्दर सेन ने किया। इस पत्र में क्रान्ति का स्वर मुखर होने पर ब्रिटिश सरकार ने पत्र प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया। इसी बीच दिल्ली से एक राष्ट्रीय पत्र ‘पयामे आज़ादी’ का प्रकाशन 08 फरवरी सन् 1857 ई॰ को प्रारम्भ हुआ। उक्त पत्र का प्रकाशन तत्कालीन स्वतंत्रता संग्राम के नेता अज़ीमुल्लाह ख़ाँ के नेतृत्व में प्रारम्भ हुआ। अज़ीमुल्लाह ख़ाँ नाना साहब पेशवा के परामर्शदाताओं में से एक थे। यह पत्र पहले उर्दू में प्रकाशित हुआ, किन्तु बाद में हिन्दी में प्रकाशित होने लगा। ‘पयामें आज़ादी’ में अज़ीमुल्लाह ख़ाँ द्वारा रचित एक आह्वान गीत की जोशीली पंक्तियाँ यहाँ दृष्टव्य हैं-
‘‘हम हैं इसके मालिक, हिन्दुस्तान हमारा
पाक वतन है क़ौम का, जन्नत से भी प्यारा
ये है हमारी मिल्कियत, हिन्दुस्तान हमारा।
इसकी ही नियत से रोशन है जग सारा।
कितना क़दीम कितना नईम, सब दुनिया से न्यारा।
करती है ज़रख़ेज़ जिसे गंगो-जमुन की धारा।
आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा
तोड़ो ग़ुलामी की जंज़ीरें बरसाओ अंगारा
हिन्दु मुसलमां-सिख, हमारा भाई-भाई प्यारा
यह है आज़ादी का झण्डा, इसे सलाम हमारा।’’
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े पत्रकारों में प्रमुख रूप से भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र का नाम प्रथम पंक्ति के शीर्ष पर अंकित है। उन्होंने 15 अगस्त सन् 1867 ई॰ में मासिक पत्रिका ‘कवि वचन सुधा’ का प्रकाशन एवं सम्पादन प्रारम्भ किया। इसके बाद उन्होंने काशी से 15 अक्टुबर सन् 1873 ई॰ में ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ मासिक का प्रकाशन किया। इसके अतिरिक्त भारतेन्दु ने 09 जनवरी सन् 1874 ई॰ में ‘बालबोधिनी’ मासिक तथा जून सन् 1874 ई॰ में ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ का प्रकाशन तथा सम्पादन किया। ‘कवि वचन सुधा’ में प्रारम्भ में प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाएँ प्रकाशित होती थीं, जिनमें देव का अष्टायाम, दीनदयाल गिरि का अनुराग बाग, कवि चन्द का रासौ काव्य, जायसी का पद्मावत, कबीर की साखी, गिरधर दास का नहुष नाटक आदि का प्रकाशन हुआ। 23 मार्च सन् 1874 ई॰ में इस पत्र के माध्यम से भारतेन्दु बाबू ने स्वदेशी वस्त्र पहनने का आह्वान किया। इसका सिद्धान्त वाक्य था -‘‘स्वत्व निज भारत गहे।’’ इस पत्र की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरोध में सरकार की दमनकारी नीतियों के कारण इसका प्रकाशन बन्द हो गया। यद्यपि 15 अक्टुबर सन् 1873 ई॰ में भारतेन्दु जी ने ‘हरिश्चन्द्र मैगज़ीन’ का प्रकाशन प्रारम्भ कर दिया था जो एक मासिक पत्रिका थी जिसमें देश भक्ति गीतों का प्रकाशन होने लगा। इसी कारण इस पत्रिका पर भी सरकारी प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इसी कड़ी में भारतेन्दु बाबू ने 09 जनवरी सन् 1874 ई॰ में ‘बालबोधिनी’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह पत्रिका नारी जागरण की दृष्टि से नारियों की मासिक पत्रिका थी। इस पत्रिका के प्रथम अंक के प्रथम पृष्ठ पर जागरण सम्बन्धी एक निवेदन प्रकाशित हुआ था जिसकी कुछ पंक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत हैं -
‘‘मेरी प्यारी बहिनो! मैं एक तुम्हारी नयी बहिन ‘बाल बोधिनी’ आज तुमसे मिलने आयी हूँं। मैं तुम लोगों से हाथ जोड़कर और आँचल खोलकर यही माँगती हूँ कि मैं जो कभी कोई भली-बुरी, कड़ी-नरम, कही अनकहनी कहूँ, उसे मुझे अपनी समझकर क्षमा करना, क्योंकि मैं जो कुछ भी कहूँगी सो तुम्हारे हित की कहूँगी।’’
पं॰ बालकृष्ण भट्ट ने 01 सितम्बर सन् 1877 ई॰ में प्रयाग से हिन्दी पत्र ‘प्रदीप’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया जिसका विमोचन भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने किया था। इस पत्र का प्रकाशन पत्रकारिता के इतिहास में एक क्रान्तिकारी घटना थी जिसने हिन्दी पत्रकारिता को एक नयी दिशा प्रदान की। इस पत्र का स्वर राष्ट्रीयता, निर्भीकता और तेजस्विता का था। सरकार इस पत्र पर कड़ी नजर रखती थी क्योंकि यह काव्य के प्रकाशन में तहलका मचाने वाली पत्रिका थी। पं॰ माधव शुक्ल की कविता-‘‘जरा सोचो तो लोग बम क्या है’’ के प्रकाशन के पश्चात् तो बिट्रिश सरकार के कान ही खड़े हो गये थे अन्ततोगत्वा इसके प्रकाशन पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया। यद्यपि ‘प्रदीप’ का प्रकाशन निरन्तर 35 वर्षो तक हुआ और अपने उद्देश्य के प्रति सजग पत्रकारिता का भाग बनी रही।
17 मई सन् 1878 ई॰ में पं॰ हरमुकुन्द शास्त्री ने कलकत्ता से ‘भारत मित्र’ का सम्पादन प्रारम्भ किया, जिन्हें लाहौर से बुलवाकर वेतन पर नियुक्त किया गया था। उनके बाद पं॰ दुर्गा प्रसाद मिश्र, बाबू राॅव विष्णु पराडकर और पं॰ अम्बिका प्रसाद बाजपेयी आदि मनीषी पत्रकारों के द्वारा इस पत्र का सम्पादन किया गया, किन्तु विपरीत परिस्थितियों के कारण यह सन् 1935 ई॰ में प्रकाशित होना बन्द हो गया।
07 अगस्त सन् 188॰ ई0 में एक तेजस्वी पत्र - ‘उचित वक्ता’ का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ जिसका सम्पादन पं॰ दुर्गा प्रसाद मिश्र ने किया। इस पत्र के द्वारा इल्बर्ट बिल, प्रेस कानून तथा वर्नाक्यूलर एक्ट का निर्भीकता से
विरोध किया गया।
काशी नागरी प्रचारिणी सभा के तत्वावधान में सन् 1896 ई॰ में ‘नागरी प्रचारिणी’ त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन हुआ। इसके सम्पादक बाबू श्याम सुन्दार दास थे। कुछ वर्षो के पश्चात सन 1907 ई॰ में यह पत्रिका मासिक रूप में प्रकाशित होने लगी। इसके सम्पादकों में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, राम चन्द्र वर्मा व वेणी प्रसाद भी रहे। इस पत्रिका के माध्यम से हिन्दी भाषा तथा नागरी प्रचारिणी सभा के समर्थन से ही सन् 1900 ई॰ में एक युगान्तकारी राष्ट्रीय जागरण की पत्रिका ‘सरस्वती’ का सम्पादन बंगाली बाबू चिन्तामणि घोष ने काशी से किया। बाद में सन् 1903 ई॰ में महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके सम्पादक नियुक्त हुए। आचार्य द्विवेदी ने राष्ट्रीय चेतना के कारण रू॰ दौ सौ की नौकरी छोड़कर रू॰ पच्चीस मात्र में सरस्वती का सम्पादन भार ग्रहण किया। द्विवेदी जी ने 20 सितम्बर, सन् 1904 ई॰ को पं॰ जनार्दन झा को अपने एक पत्र में लिखा था - ‘‘जब हमने सरस्वती का अधिकार अपने हाथ में लिया था तब उसकी दशा बहुत ही हीन थी’’ इसका स्वराज्य विशेषांक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तथा राष्ट्रीय जागरण पर आधारित था। ‘सरस्वती’ एक पूर्ण रूपेण साहित्यिक पत्रिका थी।
इस प्रकार सन् 1900 ई॰ के पश्चात द्विवेदी युग में भारतीय स्वतंत्रता की छटपटाहट बढ़ती गयी। इस युग में पत्र-पत्रिकाओं के स्वरूप में भी निखार आया। अधिकांश पत्रों के माध्यम से राष्ट्रीय जागरण और एकता की अलख जगाने का कार्य पत्रकारों ने किया। यह युग राजनीतिक क्षेत्र में गाँधी, सुभाष, शहीद भगत सिंह, अशफाकुल्लाह खाँ, आज़ाद, बिस्मिल, रोशन सिंह और लाहिड़ी का युग था। इस युग में पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबू राॅव विष्णु पराडकर, अम्बिका प्रसाद बाजपेयी, लक्ष्मी नारायण और बनारसी दास चतुर्वेदी आदि जुझारू पत्रकार थे। इसी समय ‘अभ्युदय’, ‘हिन्द केसरी’, ‘स्वराज’, नृसिंह’, ‘प्रताप’, ‘कर्मवीर’, ‘स्वतंत्र’, ‘आज’, ‘मतवाला’ और ‘विशाल भारत’ जैसे क्रान्ति लाने वाले पत्रांे का प्रकाशन हुआ। सन् 1907 ई॰ में महामना पं॰ मदन मोहन मालवीय ने ‘अभ्युदय’ का प्रकाशन कर उत्तर प्रदेश में जनजागृति का बिगुल बजा दिया। यह एक साप्ताहिक पत्र के रूप में प्रकाशित हुआ। बाद में सन् 1918 ई॰ में यह दैनिक पत्र के रूप में प्रकाशित होने लगा था। सरदार भगत सिंह को अंगे्रजों के द्वारा फाँसी के फँदे पर लटका देने के पश्चात ‘अभ्युदय’ का ‘फाँसी’ अंक प्रकाशित हुआ था, जिसमें ब्रिटिश सरकार की जल्लादी प्रवृत्ति का पर्दा उठ जाने से भारत के कोने-कोने में क्रान्ति की लहर दौड़ पड़ी थी।
इसी कड़ी में ख्यातिलब्ध नेता डाॅ बाल कृष्ण शिवराम मुंजे ने 13 अपै्रल सन् 1907 ई॰ में नागपुर से ‘हिन्द केसरी’ का प्रकाशन किया, जिसका सम्पादन पं॰ माधव राॅव सप्रे ने किया। उस समय हिन्दी भाषी इसे बड़े चाव से पढ़ते थे। हिन्द केसरी के द्वारा नवयुवकों में देश भक्ति जागृत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया गया। यह पत्र गरम दल का समर्थक रहा, जिसको सरकार की दमनकारी नीतियों का कोपभाजन होना सुनिश्चित था। पत्र में ‘भारत माता’ और ‘काला पानी’ दो सम्पादकीय टिप्पणियों के प्रकाशन पर 23 अगस्त सन् 1908 ई॰ में इसके सम्पादक पं॰ माधव राॅव सप्रे को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और अतिशीघ्र सन् 1909 ई॰ में ही पत्र का प्रकाशन बन्द हो गया। ‘हिन्द केसरी’ की भाँति सन् 1907 ई॰ में ही कलकत्ता से ‘नृसिंह’ पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ जिसे प्रसिद्ध पत्रकार पं॰ अम्बिका प्रसाद बाजपेयी ने प्रकाशित किया। पत्र नृसिंह भी गरम दल का समर्थक रहा। यह पत्र अपनी विचार-धारा के अनुरूप गरम दल को ‘नृसिंह राष्ट्रीय’ और नरम दल को ‘धृतराष्ट्रीय’ कहता था।
अंगे्रज़ सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में कूदे पत्रकारों में सम्पादक शान्ति नारायण भटनागर का नाम भी स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगा। उन्होंने सन् 1907 ई॰ में इलाहाबाद से पत्र ‘स्वराज’ का प्रकाशन कर तहलका मचा दिया। यह एक साप्ताहिक पत्र था, जिसके सम्पादक को ब्रिटिश सरकार ने आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन के अपराध में न्यायालय में दण्डित किया गया। ‘स्वराज’ वैसे भी एक उग्र रूपेण राष्ट्रीय विचार धारा का पत्र था। ब्रिटिश सरकार के द्वारा इसी कारण इस पत्र पर सन् 1910 ई0 में भारतीय प्रेस अधिनियम लागू कर दिया गया। इसके पश्चात भी पत्र ‘स्वराज’ के सम्पादक शान्ति नारायण भटनागर ने हार नहीं मानी। स्वराज के दृष्टिकोण के अनुरूप पत्र के सम्पादक की नियुक्ति हेतु एक विज्ञप्ति प्रकाशित हुई, जिसकी पंक्तियाँ सच्चे स्वराज की पक्षधर हैं - ‘‘चाहिए स्वराज के लिए एक सम्पादक-वेतन-दो सूखी रोटियाँ, एक गिलास ठंडा पानी और हर सम्पादकीय के लिए दस साल जेल।’’ इतना प्रकाशित होना था कि आवेदन पत्रों का ढे़र लग गया। यह थी क्रान्ति की लहर और राष्ट्र के प्रति आहुति का भाव, जिसे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी स्वतंत्रता आन्दोलनो के समानान्तर रूप में देखा जा सकता है।
पत्रकारिता की इस कड़ी में निराला जी भी 26 अगस्त सन् 1923 ई॰ को ‘मतवाला’ पत्र का सम्पादन किया। सन् 1928 ई॰ को रामानन्द चट्टोपाध्याय ने ‘विशाल भारत’ का प्रकाशन किया। प्रेमचन्द ने ‘मर्यादा’, ‘माधुरी’, ‘हंस’ और ‘जागरण’ का सम्पादन करके सरकार का कड़ा विरोध किया तथा आजादी की जंग में प्रेमचन्द की कलम का रंग कभी फीका नहीं पड़ा। 12 अप्रैल सन् 1936 ई॰ को ‘हिन्दुस्तान’ दैनिक का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। पं॰ अम्बिका प्रसाद बाजपेयी ने 04 अगस्त सन् 1940 ई॰ को कलकत्ता से ‘स्वतंत्र’ नामक पत्र का प्रकाशन इसी मिशन के अन्तर्गत किया। 05 जनवरी सन् 1947 ई॰ को ‘नई दुनिया’ दैनिक का प्रकाशन आरम्भ हुआ। सन् 1947 ई॰ मंे ही कानपुर से पूर्णचन्द्र गुप्त ने ‘दैनिक जागरण’ का प्रकाशन आरम्भ किया। अन्ततः 15 अगस्त सन् 1947 ई॰ को आजादी हासिल हो गयी और इसी दिन लखनऊ से ‘स्वतंत्र भारत’ का प्रकाशन भारतीय पत्रकारिता के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सफलतासूचक के रूप में सामने आया। 04 अप्रैल सन् 1947 ई॰ को दिल्ली से ‘नवभारत’ का प्रकाशन हुआ। आगरा से सन् 1948 ई॰ को ‘अमर उजाला’ का प्रकाशन तथा सन् 1958 ई॰ को ‘दैनिक भास्कर’ और सन् 1965 ई॰ को ‘पंजाब केसरी’ का प्रकाशन आदि भारतीय पत्रकारिता की सशक्त कड़ी रहे हैं। इसके पश्चात् तो समाचार पत्रों के प्रकाशन की बाढ़-सी ही आ गयी है, किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् आज की पत्रकारिता का स्वरूप ही बदल गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व भारतीय पत्रकारिता एक मिशन के रूप में थी जो आज चैथे स्तम्भ के रूप में प्रावंच्च तो चढ़ी है; किन्तु क्या आज की पत्रकारिता एक निष्ठापूर्ण कर्म है? क्या पत्रकार एक दायित्वशील व्यक्ति के रूप में कर्मयोगी है? यह एक प्रश्न उभर कर सामने आता है। एक ओर हम यह कह सकते हैं कि भारतीय पत्रकारिता मूलतः आज हमारे राष्ट्र के प्रजातांत्रिक स्वरूप को बनाये रखने में अनेक राजनीतिक दलों के बीच महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। साथ ही राजनीतिक दलों के दिन-प्रतिदिन बढ़ते हुए मकड़जाल के कारण इसकी आवश्यकता भी बढ़ती ही जा रही है। इस सबके बावजूद कभी-कभी पत्रकारिता की निष्पक्षता और ईमानदारी पर सवाल उठाये जाते रहते हैं जिसके कारण चैथे स्तम्भ को आघात भी पहुँचता है जिससे बचने का प्रयास हमारे पत्रकारों को निरन्तर करना ही चाहिए। ताकि आमजन के हृदय में पत्रकारिता के प्रति निष्ठा का भाव बना रहे और पत्रकारिता भ्रष्टाचार का भण्डाफोड़ करती हुई व्यावसायिकता से भी अछूती रहे। ऐसा होने पर ही पत्रकारिता एक पवित्र स्तम्भ के रूप में सुदृढ़ रह सकती है अन्यथा आज की पत्रकारिता के प्रति समाज में विश्वास भी टूट सकता है जिसके दुष्परिणाम गम्भीर होंगे। जैसे कि ट्राई ने इस क्षेत्र में प्रवेश करने वाले राजनीतिक निकायों और व्यावसायिक घरानों पर पाबंदियाँ लगाने की सिफारिश की है। साथ ही ‘पेड न्यूज’ और निजी समझौतों के आधार पर समाचार प्रकाशन पर रोक लगाने की भी सिफारिश की है ताकि भारतीय पत्रकारिता की स्वतंत्रता को बनाये रखा जाये और ऐसी उम्मीद भी है। 
- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, मुमताज पी॰जी॰ काॅलेज, लखनऊ।