सामूहिकता प्राणी की प्रकृति है। मनुष्य और प्रकृति के सम्बन्ध अंगांगी हैं। प्रकृति में अनेक प्राणी हैं, मनुष्य भी प्रकृति का भाग है। मनुष्य और प्रकृति की आत्मीयता में आनंदरस है लेकिन तमाम अन्तर्विरोध भी हैं। तमाम प्राकृतिक आपदांए आती हैं। मनुष्य पीडि़त होते हैं। सामूहिकता ऐसे अन्तर्विरोधों से लड़ने की शक्ति देती है। इसलिए आदिम मनुष्य सामूहिक जीवन की राह चला। सामूहिक होने के लिए एक समान मन जरूरी है। सामूहिकता में सहमन की विशेष भूमिका है। आदिम मनुष्य की सामूहिकता का पहला नाम पड़ा - गण। ऋग्वेद विश्व मानवता का प्रथम ज्ञान अभिलेख है। ऋग्वेद में ‘गण’ की अनेकशः चर्चा है। ऋग्वेद के समय का समाज गण-सामूहिकता से आगे बढ़ गया है। देवोपासना, प्रीति प्यार, रीति रिवाज, विवाह आदि सामाजिक सांस्कृतिक कारणों से गण टूटते रहे और गण से बड़ी इकाई ‘जन’ का विकास हुआ। ऋग्वेद में गण समाज की स्मृतियां हैं और गण के साथ जन-समाज की भी प्रतिष्ठा है। ऋषियों ने मरूतांे को मरूद्गण कहा है। देवों के समूह भी गण कहे गये हैं। आदर्श सामाजिकता का मार्ग सामूहिकता से होकर ही जाता है। गण समूह के सदस्य परस्पर स्नेही हैं। ऋग्वेद के ऋषि पूषा देव से स्तुति करते हैं “गायों के खोजी इस गण का मार्ग प्रशस्त करो - इमं गवेषणं गणम्।” यहाँ व्यक्ति नहीं गण ही गायों का पता लगा रहे हैं।
‘गण सामूहिकता के पर्याय हैं लेकिन ऋग्वेद में उनकी कई विशेषताएं हैं। गणों के अपने उपास्य देव भी हैं। गणेष गण-ईश हैं। वे गणपति हैं और गणों में श्रेष्ठ भी। वैदिक इन्द्र भी किसी एक या तमाम गणों के देवता रहे होंगे। ऋषि इन्द्र से कहते हैं “मरूत्गण आपके हैं।” गण के भीतर कुछ व्यक्ति महत्वपूर्ण भी रहे होंगे। ऋषि ‘गणों में हंस’ की उपमा देते हैं। जान पड़ता है कि गण स्वच्छंद विचरण वाले स्वतंत्र चेता समूह थे। ऋग्वेद में संकेत हैं कि वे स्वंय अपने शासक हैं। आधुनिक गणतंत्र वैदिक काल और उसके पूर्व के स्वशासित गण की परम्परा का विकास हो सकता है। अग्नि ऋग्वेद के लाडले देवता हैं। ऋषि उनसे स्तुति करते हैं “आओ! हमारे गण के बीच आसन ग्रहण करो - गणे अ निशध। गण तमाम देवों की स्तुति करते थे। गणों की भी स्तुति थी - गणं स्तुषे। गण प्राचीनतम मानव समूह हैं। गण सदस्यों में परस्पर भेदभाव नहीं है। वे साथ-साथ रहते हैं। उत्पादन भी प्रायः सामूहिक है। व्यक्तिगत सम्पत्ति का विशेष प्रादुर्भाव गण काल में नहीं है। गणों की यही विशेषता मरूत देव को मरूत्-गण बनाती है।
मरूत्-गण उपास्य हैं। ऋग्वेद में उन्हें रूद्र का पुत्र बताया है। पौराणिक गणेश भी शिव पुत्र कहे गये हैं। शिव गण प्रेमी हैं। उनसे बड़ा गणप्रेमी देवता दूसरा है ही नहीं। महाभारत अनुशासन पर्व में शिव के गण प्रेम का प्यारा उल्लेख है। शिव अपने गणों के साथ गाते, नाचते और विशेष प्रकार के वाद्ययंत्र भी बजाते हैं - वाद्यत्यति वाद्यानि विचित्राणि गणैमुताः। शिव प्रतीक बड़ा आनंदी है। शिव का अर्थ है - लोककल्याण और लोककल्याण बढ़ता है सामूहिकता में। शिव स्वाभाविक ही गण, गणपति गणेश प्रिय हैं। गणों का गठन और विकास एक समान सामूहिक जीवन की इच्छा से हुआ। समान विचार और समान अभिलाषा वाले लोगों ने अपना जीवन सामूहिक बनाया। प्राचीन भारत में अनेक गण थे। गण छोटे समूह थे। सांस्कृतिक आर्थिक कारणवश गणों में परस्पर सम्पर्क बढ़ा। प्रगाढ़ प्रेम और आत्मीयता भी बढ़ी। अनेक गण मिलकर बड़ी इकाई में संगठित हुए। गणों से भिन्न इस सामूहिक इकाई का नाम ‘जन’ पड़ा। ऋग्वेद में ‘पंच जन’ का उल्लेख है। अदिति देव हैं। वे धरती आकाश माता पिता व पुत्र भी है और पंचजनाः भी। एक वैदिक देव हैं मित्र। मित्र देव को आहुतियां देने वाले भी यही पांच जन हैं।
सामान्यतया 5 जन का अर्थ पांच व्यक्ति भी हो सकता है। लेकिन अनेक मंत्रों में पंचजनाः का प्रयोग व्यापक अर्थ में ही हुआ है। इन्द्र बड़े देवता हैं। ऋग्वेद में “इन्द्र की व्यापकता पंचजनो” तक विस्तृत है। ये पांच जन पांच बड़े मानव समूह है और सरस्वती आदि नदियों के तट पर आनंदमगन जीवन जीते हैं। सरस्वती पंचजातावर्द्धयन्ती है। पांचजनों को समृद्धि देती है। वैदिक साहित्य में पांचजनों का उल्लेख कई बार आया है। अथर्ववेद में वे पंचजनाः के साथ पंचमानवाः है। ऋग्वेद में वे पंचजनाः हैं लेकिन पंच मानुषा व पंचकृष्टया भी हैं। जन वस्तुतः समूह ही हैं। ग्रिफ्थ, मैक्डनल और तिस्मर जेसे विद्वानों ने जन को समूह ही बताया है और तुर्वस, यदु, अनु, दु्रह्य और पुरू को पांच जन समूह बताया है। परवर्ती कुछेक भारतीय विद्वानों ने इन्हें चार वर्ण और पांचवा निषाद बताया है। लेकिन पांच जन वर्ण नहीं जान पड़ते। ऋग्वेद में स्तुति है कि पांच जन हमारे यज्ञ में पधारें। जन और भी थे। लेकिन पांच जन मुख्य थे। अथर्ववेद में भी पांचजनों की समृद्धि मांगी गयी है। गण प्राचीन समूह थे, सम्भवतः छोटे थे और जन का विकास बड़े समूहों के रूप में हुआ। जन, गण भारतीय समाज के मुख्य घटक हैं। जन और विशेष भूखण्ड के निवास की इकाई जनपद के रूप में प्रतिष्ठित हुई।
मन, भारतीय चिन्तन और दर्शन का प्रीतिपूर्ण विषय है। मन वैयक्तिक होता है। सांस्कृतिक सामूहिकता व्यक्तिगत मन को सामूहिक बनाती है। मन सभी संकल्पों और गतिविधियों का केन्द्र है। गण-समूह का विकास व्यक्तियों की सामूहिक मानसिक प्यास से ही हुआ। मन मिलता है, तो सामूहिक इच्छाएं व्यक्तिगत इच्छाओं पर भारी पड़ती है। ऋग्वेद में सामूहिक मन की स्तुतियां है। जन-गण का एक मन ऋग्वैदिक ऋषियों की प्यास है। सामूहिक मन से ही लोकमंगल के काम होते हैं। हरेक व्यक्ति स्वभाव से व्यक्तिगत है और व्यक्तिगत दृष्टिकोण भी रखता है लेकिन जन या गण के सदस्य अपने व्यक्तिगत को सामूहिकता के लिए छोटा या कम करते है। जन गण अपने आप में पर्याप्त नहीं है। जनगण के साथ मन जरूरी है। मन भी अपने आप में परिपूर्ण नहीं है। आनंददाता तो कतई नहीं। जनगणमन एक होकर ही लोकमंगल और लोक आनन्द के सर्जक हैं। जनगणमन इन्द्रधनुषी है। मधुरस परिपूरित है। भारत का मन रस जनगण-मधुकरों के ही श्रम तप मंे मधुमय है। भारत के भारत होने और विश्व में विशेष प्रतिष्ठित होने के उद्यम में जनगणमन की भूमिका है। भारत के मधुकलश को जनगणमन ही भरता है और वही उसका रसपान भी करता है। विश्व कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर ने उचित ही ‘जनगणमन’ का एक साथ प्रयोग किया है।
संविधान की उद्देषिका में ‘हम भारत के लोग - वी दि पिपुल आॅफ इण्डिया’ है। यह लोग भारत के हैं। भारत का अन्तरंग सांस्कृतिक है। इस संस्कृति में ढेर सारे देवता हैं। ईश्वर एक है, उपासनाएं अनेक हैं। देवता भी अनेक हैं, देवोपासनाएं भी अनेक हैं। ऋग्वेद की उदात्त घोषणा है कि सत्य एक है। विद्वान उसे इन्द्र अग्नि आदि नामों से पुकारते हैं। यहां गण हैं, जन हैं। इस जनगण की सामूहिक चेतना है। यह चेतना सत्य अभीप्सु है। मुक्त चिन्तन, प्रश्न प्रतिप्रश्न पर आधारित यह जनगण चेतना ‘जनगणमन’ के सामूहिक रूपक में इन्द्र धनुष बनती है। भारतीय जनगणमन विश्व समृद्धि, विश्व शान्ति का मंगलकामी है। जनगणमन के लिए विश्व एक परिवार है। इस मन के अंतरंग में सृष्टि का परस्परावलम्बन है और अद्वैत की अनुभूति। विश्व, ब्रह्माण्ड एक है। रूप और नाम अलग हैं बावजूद इसके सब एक है। एक ही सृष्टि के अंग। जनगणमन नमस्कारों के योग्य है। ु





