देश को आजाद हुए सड़सठ साल हो गए हैं और देश अब अपनी आजादी का 68वाँ स्वतन्त्रता दिवस मना रहा है। इस बार का स्वाधीनता दिवस कुछ अलग है और इसके पीछे पाँच बदली हुई परिस्थितियाँ हैं। पहला तो यही कि पिछले दस वर्षों से लाल किले की प्राचीर से कांगे्रसी प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह राष्ट्र को सम्बोधित करते आ रहे थे। इस बार यह क्रम टूट रहा है, क्योंकि इस एतिहासिक प्राचीर से स्वतन्त्रता के बाद जन्में पहले प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी सम्बोधित करेंगे। वही नरेन्द्र मोदी, जिन्होने आलोचकों के साथ समर्थकों को भी चैंकाते हुए इस मंच पर पहुंँचने का गौरव प्राप्त किया। उन्हें यह कामयावी कांग्रेस के भारी नुकसान के कारण मिली है, जो महज 44 सीटों पर सिमट कर रह गई, बल्कि लोकसभा में विपक्ष के नेता की हैसियत के लायक नम्बर भी नहीं पा सकी। कांग्रेस की यह अपमानजनक स्थिति कुछ-कुछ वैसी ही है, जैसी 2004 में भाजपा की थी, जो चुनाव हार चुकी थी, मगर उसे स्वीकारने को तैयार नहीं थी। जिस समय उसे आत्मचिन्तन की जरूरत है, वह अपने नेतृत्व के बचाव में जुटी है। एक राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर इसके पास देश के राजनीतिक विपक्ष की भूमिका निभाने के साधन हैं। मगर इस समय वह खीज की स्थिति में है। 1994 के बाद आज तक विपक्ष को इतना असहाय कभी नहीं देखा गया।
दूसरी, शायद यह पहली सरकार है, जिससे लोगों ने बेशुमार उम्मीदें पाल ली हैं। नरेन्द्र मोदी ने अपनी चुनावी फतह लोगों की इन्हीं उम्मीदों को अपने सांचे में ढ़ालकर हासिल की व नौजवानों को सपने देखने के लिए प्रेरित किया। हिन्दुस्तान की 65 फीसदी आबादी 35 साल से कम उम्र के लोगों की है। लेकिन सपने बेचने की भी एक कीमत होती है। जिन सरकारों ने अपने वादे पूरे नहीं किए, लोगों ने उन्हे माफ भी नहीं किया। गौर कीजिए यह अपेक्षाएं एक जैसी नहीं हैं और अपेक्षाओं का जिन्न दिन-ब-दिन बढ़ता है।
तीसरी, इस सरकार की शुरूआती 75 दिनों ने यह दर्शाया है कि वह लोगों को हकदार बनाने के आगे उनके सशक्तीकरण की तरफ बढ़ रही है। लेकिन इसमें काफी सतर्कता की जरूरत है।
चैथी, जिस तत्परता से मोदी सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह में पड़ोसी देश के नेता उमड़े, उससे दक्षिण एशिया में शान्ति की चाहत को बल मिला है। सिर्फ भारत व उसके पड़ोसी मुल्क नहीं, पूरी दुनियाँ आर्थिक असमानता व बेरोजगारी की समस्या से जूझ रही है। अवाम को युद्धोन्मादी बनाकर बहुत दिनों तक बहलाया नहीं जा सकता।
पाचंवी, डव्ल्यूटीओ में व्यापार को सुगम बनाने से सम्बन्धित करार के मामले में हम उहापोह में फंसे रहे हैं। पर जैसा कि मोदी ने भी भाजपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में पिछले दिनों कहा है, दुनियाँ एक बहुमत सरकार की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। जिस तरह से मोदी ने चुनाव अभियान के दौरान अपनी छाप छोड़ी, आज वह मौका है, कि इसे वह अपने नाम कर लें। ु
- डिप्टी मैनेजिंग एड़ीटर, मिन्ट





