स्वतंत्रता के 67 वर्षाे में भारत ने लगातार स्वयं को बदला है। आज दुनिया भारत को एक कमजोर देश के रूप में नहीं, बल्कि एक लगातार विकसित और उभरती शक्ति के रूप में लेती है। स्वतंत्रता दिवस वह क्षण है जब हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे है? आजादी के बाद से सभी अधिकारों की ही बात करते है। संवैधानिक अधिकार, मौलिक अधिकार, मानवाधिकार। केवल अधिकार ही अधिकार, कर्तव्य की बात तो भूले बिसरे भी ध्यान में नही आती है। प्राथमिक विद्यालयों में ‘वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डट जावें‘ वाली प्रार्थना भी कर्तव्य पथ पर अग्रसर नही कर पा रही है। वर्षो की गुलामी सहने और लाखो देशवासियों के प्राण न्योछावर करने के बाद बहुमूल्य आजादी पाई, आज की युवा पीढ़ी उस आजादी के वास्तविक अर्थ भूलती जा रही है। पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण कर वह अपनी सभ्यता संस्कृति और विरासत से दूर होती जा रही है, जिसे आजादी का सम्यक अर्थ समझााने की आवश्यकता है कि, विकास के पथ पर आगे बढ़कर देश और समाज को ऐसी दिशा देना जिससें देश की संस्कृति की सोंधी खुशबू चारो ओर फैले।
हम चाहते है कि देश तरक्की करे तो सबसे पहले हमें अपने काम के प्रति ईमानदारी, साहसी, सहनशील और प्रतिबद्ध होना होगा। जब हम देश के उज्जवल भविष्य के लिए भ्रष्टचार, रूढि़वादिता, जातिवाद और आंतकवाद आदि को खत्म करने में कामयाब होगें तभी सही मायने में आजाद होंगे। सच्चे अर्थों मंे आजाद देश वही है जहाँ पर नागरिकों को उसकी क्षमता और इच्छा के अनुसार अपनी उन्नति का समान अवसर मिले। अमीर-गरीब सबको सुलभ और पक्षपात रहित न्याय मिले। देश के सर्वांगीण विकास के लिए हर नागरिक का कर्तव्य है कि परिवार-समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करें।
ध्यातब्य है कि, व्यक्तिगत समृद्धि का जितना महत्व है उतना ही राष्ट्र की समृद्धि का भी है। राष्ट्र की समृद्धि के बिना निजी वैभव को बहुत अधिक महत्व नही दिया जा सकता है। महात्मा गाँधी ने सलाह दी थी कि हमें ‘‘सिद्धान्त के बिना राजनीति, श्रम के बिना धन, विवेक के बिना सुख, चरित्र के बिना ज्ञान, नैतिकता के बिना व्यापार, मानवीयता के बिना विज्ञान तथा त्याग के बिना पूजा‘ से बचना चाहिए।’ जब हम आधुनिक लोकतंत्र के निर्माण के लिए अग्रसर हो रहे हंै तो उनकी सलाह पर ध्यान देना चाहिए।
सवा करोड़ से अधिक आबादी वाला यह देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर है। हम दुनिया भर में चावल के सबसे बड़े तथा गेहूं के दूसरे सबसे बड़े निर्यातक हंै। दुग्ध उत्पादन में भारत विश्व का अग्रणी राष्ट्र है। वैश्वीकृत दुनिया में बढ़ती हुई आर्थिक जटिलताओं के बीच हम अपनी बाहरी तथा घरेलू दोनों ही प्रकार की कठिनाईयों का बेहतर ढंग से सामना कर रहे हंै। स्वतंत्रता पश्चात् जो हमने आधुनिकता तथा समतापूर्ण आर्थिक विकास का दीपक जलाया था इस दीपक के जलते रहने के लिए गरीबी उन्मूलन सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। गरीबी की दर में स्पष्ट रूप से गिरावट का रूझान दिखाई दे रहा है, परन्तु इस लड़ाई में अत्यधिक तीव्रता की आवश्यकता है। इस अभिशाप के उन्मूलन के लिए भारत के पास प्रतिभा-योग्यता तथा संसाधन भी मौजूद है।ं अगले दो दशकों में जनसंख्या के अनुकूल बदलाव का देश बहुत लाभ उठा सकता है। इसके लिए औद्योगिक रूपांतरण और रोजगारों के अवसरों के तेजी से सृजन की आवश्यकता है। नयी सरकार द्वारा शुरू किया गया सुव्यस्थित शहरीकरण, नई विर्निमाण नीति, शहरी एवं ग्रामीण अवसंरचना का नवीनीकरण तथा महत्वाकांक्षी कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों, सुपर फास्ट ट्रेनों, नये एक्सप्रेस वे व राजमार्गों, उच्च प्रौद्योगिकी से संचालित अधिक उपज वाली खेती जैसी विभिन्न पहल पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है। प्रगति की इस दौड़ में यह भी ध्यान रखना होगा कि इंसान और प्रकृति के बीच का सन्तुलन बिगाड़ने न पायंे।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घनघोर सकारात्मक वातावरण निर्मित करते हुए सार्क देशों के साथ ही विश्व के अन्य देशों से जिस प्रकार सीधा संवाद बनाने का अतुलनीय प्रयास किया है। वह निश्चित ही भारत का विश्व के अन्य देशों से सम्बन्धों को एक नई दिशा, गति-लय और परस्पर प्रतिबद्धता प्रदान करेगा।
वर्तमान में जरूरत है कि खांचे से बाहर निकलकर सोचने की। सरकार ही सब कुछ करेगी, इस सोच से निकलने की आवश्यकता है। परिस्थितियांे को बदलने के लिए आवश्यक है स्वंय के कर्तव्यों पर पूरी तरह अग्रसर होने की। वर्तमान नेतृत्व भी खोखले अधिकारों की बाते नहीं कर रही हंै। बल्कि श्रम के गौरव तथा रोजगार पर जोर दे रही है। ये खैरात की बात करने की बजाय सम्पदा बनाने तथा उद्यमी भावना और युवा भारत की उम्मीदों से लाभ उठाने की बात कर रहे है। अर्थव्यवस्था को प्रगति पर ले जाने के लिए सुशासन की प्रतिबद्धता आवश्यक है। देश को आगे बढ़ाने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति व संकल्प के साथ ऐसी सुचिता की आवश्यकता है जो देश के नौजवानों को रोजगार व सम्मान दिला सके। सामान्य जनों का कर्तव्य पालन और राजनैतिक इच्छाशक्ति ही संस्थागत हो चुके कुशासन को दूर कर आर्थिक-सामाजिक, राजनैतिक रूप से देश को विश्व के अग्रणी राष्ट्रों में खड़ा कर सकता है।
स्वतंत्रता पश्चात् देश का नेतृत्व करने वालों का दायित्व था कि देश के लोगों को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक, शिक्षित और प्रशिक्षित करना। लेकिन नेतृत्व करने वालांे ने जानबूझकर इससे वंचित कर दिया। क्योंकि देश के नागरिक अपने मौलिक कर्तव्यों को समझ लेता तो समाज के छटे हुए अयोग्य और धनपशुओं को अपना प्रतिनिधि नहीं चुनता। यदि अपने मौलिक कर्तव्यों को समझता तो खुद को संख्या बल में तब्दील नहीं करता और पशुओं की तरह से बच्चा पैदा कर केवल वह वोटर नही रहता। नेताओं की साजिश थी कि अधिकतर वंचित भीड़ अधिकार की आस लगाये वोट डालती रहे और सत्ता का धंधा चलता रहे।
हमें कर्तव्यों को प्राथमिकता के रूप में पूर्ति करनी होगी। अगर हमारा कर्तव्य पूरा है तो अधिकार अपने आप ही रास्ता बनाकर अपने पास आ जायेगा। अतः हमें उस आन्दोलन का हिस्सा होना है जिसमें कि संविधान में मौलिक कर्तव्य प्राथमिकता से शामिल हो। कर्तव्य उपेक्षित न हो। यदि अधिकार मांगने से मिलता तो स्वतंत्रता के 67 वर्षों में मिल गया होता। नेता यह जानते हैं कि आम आदमी को अधिकार देना नहीं है, केवल अधिकार की बातें करनी हैं। अधिकार के प्रति आकर्षण का भ्रम बनाये रखना है। मानवाधिकार आयोग समेत ये जितने भी आयोग है ये सभी सियासी दुकानें है। अंग्रेजों के काले कानूनों के अलावा आजादी के बाद बने कानूनों की लम्बी फेहरिस्त है। जिन्हें जनता के अधिकारों को कुचलने के लिए मनमाने ढंग से इस्तेमाल किया जाता है। देश का संविधान इतना लचीला है कि आप लोकतंत्र की आत्मा संसद पर भी हमला कर दो, आपकी खातिरदारी की जायेगी और कठोर इतना है कि आप अपना हक मांगने के लिए अगर अनशन पर बैठ गये तो आप पर रात में लाठियां बरसायी जायेगी, यहां तक जान भी ले ली जायेगी।
आवश्यकता है आंख खोलकर देश की स्थिति और परिस्थिति का अध्ययन करने और दिमाग खोलकर भविष्य निर्माण पर विचार करने की। देश की स्वतंत्रता के नाम पर मर मिटने वालों ने देशभक्ति को व्यवसाय नही बनाया। हमें उनके चरित्र व आचरण की श्रेष्ठता को अपने कर्तव्यों के माध्यम से जीवन में अपनाना होगा। वर्तमान परिस्थितियों की आवश्यकता है कि हम कठोर परिश्रम व कर्तव्य पालन के द्वारा समर्थ स्वराज के निर्माण में सहभागी बनंे। कर्तव्य पूर्ति के बिना अधिकारों की चेष्टा बेइमानी है। आइये व्यक्ति-समाज-देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर सशक्त एवं समृद्ध राष्ट्र की तरफ अग्रसर हों। ु
- महासचिव कर्तव्या फाउण्डेशन एवं प्रवक्ता कालीचरण पी॰जी॰ कालेज






