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Monday, September 15, 2014

lokbharti@yahoo.com

Saturday, September 6, 2014

लाल किले पर हमारे प्रधानमन्त्री


देश के सभी प्रधानमन्त्रियों को लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराकर देशवासियों को सम्बोधित करने का कितनी बार सौभाग्य मिला। 
जवाहरलाल नेहरू 17 बार
इन्दिरा गाँधी 16 बार  
डा॰ मनमोहन सिंह 10 बार
अटल बिहारी बाजपेई 6 बार
राजीव गाँधी 5 बार
पी॰वी॰ नरसिंह राव 5 बार
लाल बहादुर शास्त्री 2 बार
मोरारजी देसाई 2 बार
चैधरी चरण सिंह, वीपी सिंह, एचडी देवगौड़ा और आई के गुजराल को एक बार लाल किले पर झंडा फहराने का सौभाग्य मिला। जबकि 222 दिन पद पर रहने के बाद चन्द्र शेखर एवं दो बार कार्यवाहक प्रधानमन्त्री रहे गुलजारी लाल नन्दा को लालकिले पर तिरंगा फहराने का अवसर नहीं मिला।
नरेन्द्र मोदी लाल किले पर झंडा फहराने वाले 7वें गैर कांगे्रसी तथा स्वतन्त्र भारत में पैदा होने वाले पहले प्रधानमन्त्री हैं।

लोक भारती के बढ़ते चरण - ब्रजेन्द्र पाल सिंह

बचपन से दूसरों की मूर्खता के लिए एक कहावत सुनते आ रहे हैं, ‘‘जिस डाल पर बैठे हैं, उसी डाल को काट रहे हैं।’’ या कभी-कभी यह भी कहते सुना है, ‘‘जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं।’’ यह कहावतें पता नहीं, कुछ लोगों की मूर्खतापूर्ण कार्यों से बनी थीं या आज के प्रगतिशील कहे जाने वाले समाज के लिए हैं? जो भी हो! हाँ कालीदास की कहानी से यह अवश्य पता चलता है कि वह जंगल में जिस डाल पर बैठे थे, उसी डाल को काट रहे थे। और कहते हैं, उनके इसी गुण के कारण उनका विवाह एक बुद्धिमान लड़की विद्वोŸामा से करा दिया गया था, जिसके प्रभाव से कालीदास परम विद्वान व विश्व के प्रथम कवि बन गये। यदि यह सच है, तो निश्चित रूप से हमारे आज के समाज को किसी विद्वोŸामा की तलाश है? आइये, अपने कारनामों को स्वयं देखें और फिर निर्णय करें।
विद्वानों का मत है कि, मनुष्य इस ब्रह्माण्ड का सबसे बुद्धिमान प्राणी है, सम्भवतः इसीलिए उसने प्रकृति के साथ जीने का रास्ता चुना। हमारे पूर्वजों ने तो प्रकृति के साथ अपने रिश्ते मजबूत बनाये रखने के लिए पेड़ों, पत्थरों, पहाड़ों में देवत्व की स्थापना की, जल-स्रोतों, नदियों, पौधों में माँ के दर्शन किए और पशु-पक्षियों को देवताओं के वाहन के रूप में मान्यता देकर सदैव उनके सहअस्तित्व का मार्ग अपनाया।
मनुष्य को अपने जीवन के लिए सबसे पहले प्राणवायु की आवश्यकता होती है, जिसके बिना कुछ क्षण जीना भी असम्भव है। प्रकृति ने हमारी इस आवश्यकता की पूर्ति हेतु पेड़-पौधों की संरचना की, जो बिना कुछ लिए निरन्तर हमें प्राण वायु देते रहते हैं और हम उसका उपयोग करने के बाद जो प्रदूषित वायु (कार्बनडाई आक्साईड) प्रकृति को लौटाते हैं, उसको भी वह सोख कर, हमें उसके दुष्प्रभाव से बचाते हैं। स्वंय सोचें! यदि ऐसा न होता तो, हम क्या होते? हमारे पूर्वर्जों ने प्रकृति के इस रहस्य को समझ कर हमारे दैनन्दिन जीवन के लिए ऐसी व्यवस्थायें बनाईं, जो हमारे जीवन का सदैव सुरक्षा कवच बनी रहीं। उन्होंने हमे बताया था, पेड़ों में देवता का वास होता है, अतः हरे पेड़ को काटना पाप है और यह भी बताया कि अपनी जरूरत के लिए सूखी डाली का ही उपयोग करें और यदि जीवन रक्षण के लिए हरी वनस्पति की आवश्यकता पड़े तो प्रार्थना करके ही उसका उपयोग करें। परन्तु पश्चिम की संस्कृति ने कहा, प्रकृति में जो कुछ भी है, वह सब कुछ हमारे उपभोग के लिए है। वहीं विज्ञान रूपी आविष्कार ने उन्हंे जिस पेड़ पर बैठे थे, उसी डाल को काटने वाली कुल्हाड़ी भी उपलब्ध करा दी। हमारे पूर्वजों की सीख के कारण हरे पेड़ सुरक्षित बने रहते थे। इतना ही नही ंतो कुछ पेड़ों को सुरक्षित रखना आवश्यक समझकर, उन्हें काटना वर्जित ही कर दिया था, जिसके कारण समाज का सामान्य व्यक्ति आज भी पीपल आदि पेड़ों को काटने से बचता है।
परन्तु हमने विज्ञान के अधूरे ज्ञान और उसकी अधूरी समझ से वह सब किया, जिससे सावधान करने के लिए सदैव कहा जाता रहा है- ‘‘नीम हकीम, खतरे जान।’’ हमने पेड़ों को काटना प्रारम्भ कर दिया, क्योंकि अब हमें उनमें बसे किसी देवता या उन्हें काटने पर पाप का कोई डर नहीं बचा था। जब देश में अन्न संकट गहराया, तो आधुनिक ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने समाधान दिया, ‘अधिक अन्न उपजाओ’ आगे बढ़ना है तो बड़े-बड़े उद्योग चहिए। अधिक अन्न उपजाने के लिए अधिक खेत चाहिए और अधिक खेतों के लिए प्राणवायु की आवश्यकता को नजरंदाज करते हुए जंगलों को काटना प्रारम्भ हो गया। 
पर, सच को कोई झुठला नहीं सकता। विज्ञान की अधूरी समझ के कारण जब पूरे विश्व के जंगल-बाग काट कर हमने खेत बना डाले, उन पर खेती करने लगे व बड़े-उद्योग खड़े कर लिए, तब हमारे आज के ऋषियों (वैज्ञानिक) नें चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा- ‘‘तैतीस प्रतिशत धरती पर हरे पेड़-पौधे चाहिए, तभी हमारी मानवता सुरक्षित रह सकेगी।’’ बस! फिर क्या था, अधिक अन्न उपजाओं के स्थान पर अब अधिक पेड़ लगाओं का नारा बुलन्द हो रहा है। अर्थात् हमारे ऋषियों ने जो हमंे सीख दी थी कि प्रकृति का विनाश पाप है, हरे पेड़ को काटना पाप है, तब हमने उनकी बात को अनसुना कर आज के ऋषियों की बात आँख बंद कर मानी और बाग, जंगल काटे और पाप किया। पाप का फल  भोगना अवश्यमभावी है, जो हम कम होते जल, भूगर्भ जल स्तर, सूखते जल-स्रोत, सिकुड़ती व प्रदूषित होती नदियाँं, समाप्त होती कृषि भूमि की उर्वरा-शक्ति, कम होती खाद्यान्न की गुणवत्ता, आँखों से ओझल होती जैव विविधता और बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के रूप में भोग रहे हैं।
उŸार प्रदेश के संदर्भ में देखें, तो हमारे प्रदेश का वनावरण मात्र 7 प्रतिशत बचा है और यदि उसमें से तराई व पहाड़ी भाग को निकाल दे ंतो मैदानी क्षेत्र में मात्र 4 प्रतिशत वनावरण ही शेष है, परिणामतः गंगा कराह रही है, गोमती जैसी भूगर्भ जल स्रोतों से बहने वाली नदियाँ दम तोड़ रहीं हैं, निरन्तर बहने वाले छोटे नाले सूख चुके हैं, खेती की उर्वरा शक्ति समाप्त हो रही है। इसके साथ ही खेती के लिए आवश्यक पशुओं से विहीन होते गाँव, गाँवों से होता निरन्तर पलायन, जिससे वहाँ घर के स्थान पर सूने मकानों की निरन्तर बढ़ रही संख्या, दूसरी ओर शहरों का बढ़ता अनियोजित तथाकथित विकास व विस्तार, झुग्गी झोपडि़यों व फुटपाथ पर सोने वालों की बढ़ती संख्या, टूटते परिवारिक रिश्ते, शुद्ध पेयजल का बढ़ता संकट और न जाने कितनी जनमन को पीडि़त करने वाली नितनवीन घटित होती घटनायें।
अब प्रश्न उठता है कि, पाप का फल भोगना या उससे बचने के लिए प्रयाश्चित करना? आज के ऋषियों ने भी हमें प्रयाश्चित का ही मार्ग बताया है। अब हम कहने लगे हैं, ‘एक पेड़ सौ पुत्र समान’, हरे पेड़ काटने पर कानूनी शिकंजा, मारे गये पशु-पक्षिओं के प्रयाश्चित के लिए अभयारण्य, संरक्षण एवं संवर्धन स्थल तथा आगे प्रयाश्चित की तैयारी, जिसमें भूगर्भ जल निकालने हेतु बोरिंग बनाने के लिए परमिट, डार्कजोन में पानी निकालने पर लगने वाला प्रतिबन्ध, जितना भूगर्भ से पानी निकालो उतना वर्षाजल धरती की कोख में भरने की अनिवार्यता, पशु-पक्षियों एवं जैवविविधता संरक्षण के लिए लगने वाला टैक्स जैसे न जाने कितने प्रयाश्चित अपनी ना समझी के लिए करने अनिवार्य होंगे? कहते हैं, ‘‘गलती करना मनुष्यता है, पर गलती को बार-बार करना मूर्खता और की गई गलती से सबक लेकर आगे का मार्ग बनाना बुद्धिमŸाा है।’’ आज सम्पूर्ण समाज से उसी बुद्धिमŸाापूर्ण व्यवहार की आवश्यकता है। हम सब उस दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ा कर, सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
लोक भारती ने समाज की उस अपेक्षा व अपने नाम के अनुरूप प्रथमतः पर्यावरण संरक्षण हेतु लोक आधारित, लोक जागरण की योजना बनाकर उŸार प्रदेश के 999 विद्यालयों, महाविद्यालयों में जागरूकता कार्यक्रमों के आयोजन किए, जिनके माध्यम से लगभग दो लाख छात्र एवं शिक्षकों के साथ इस दिशा में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ताओं व विशेषज्ञों से सम्पर्क बढ़ाया। क्योंकि पर्यावरण संरक्षण में प्राणिमात्र के जीवन के लिए सर्वाधिक आवश्यक शुद्ध वायु, शुद्ध जल एवं शुद्ध खाद्यान्न आता है। अतः लोक भारती ने इन्हीं विषयों के लिए सामाजिक जागरूकता तथा आवश्यक प्रशिक्षण एवं समस्या निवारण के लिए करणीय कार्यों पर ध्यान केन्द्रित कर अपनी शक्ति-सामथ्र्य के अनुरूप क्रमशः कदम बढ़ाये।
शुद्व वायु के लिए आवश्यक है, 33 प्रतिशत भूभाग पर वृक्षावरण, इसकी पूर्ति के लिए पूरे देश के लिए सनातन आस्था केन्द्र नैमिषारण्य तथा उसके चैरासी कोसी परिक्रमा पथ पर सम्पूर्ण देश के स्थापित तीर्थ क्षेत्रों में श्री राधेकृष्ण दुबे के नेतृत्व में देववृक्ष अभियान चलाया गया, जिसके अन्तर्गत परिक्रमापथ के 108 गावों में एक माह की जागरूकता यात्रा, पौध-दान एवं पौधारोपण के आयोजन किए गये, जिसके परिणामस्वरूप परिक्रमा पथ के सीतापुर व हरदोई जिले में 88 हजार ऋषियों की स्मृति में 88 हजार पेड़ सामाजिक सहयोग एवं वन विभाग द्वारा सम्पूर्ण सुरक्षा व्यवस्था के साथ लगाये गये, जो नैमिषारण्य में अरण्यभाव को सार्थक करने का प्रभावी कदम सिद्ध हुआ है। इस अभियान की सफलता के परिणामस्वरूप लखनऊ के निकट गोमती तट पर स्थित चन्द्रिका देवी क्षेत्र, मथुरा जिले के वृन्दावन क्षेत्र में यमुना किनारे, गंगा तट पर श्रृंगवेरपुर क्षेत्र व गोमती की सहायक 700 कि॰मी॰ दूरी तक बहने वाली सई नदी क्षेत्र में वृक्षारोपण अभियान चलाया जा रहा है, जिसके अन्तर्गत हरियाली पखवारा, पौध-भण्डारा, वृक्षारोपण-यज्ञ, हरियाली-चूनर, हरियाली-चादर एवं वृक्ष-डोली जैसे कार्यक्रम प्रारम्भ हुए हैं। इन अभियानों में कृत संकल्पित, निरन्तर संलग्न अनेक विभूतियों का महत्वपूर्ण योगदान है।
वायु के बाद जल हमारी दूसरी अनिवार्य आवश्यकता है। इस विषय को समझने-समझाने के लिए सबसे पहले मासिक पत्रिका ‘लोक सम्मान’ के  विशेषांक से प्रारम्भ करके जल विशेषज्ञों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की कार्यशालाएं, संगोष्ठियांँ, देश भर में किए गयेे कार्यों का अध्ययन एवं प्रत्यक्ष दर्शन व देश भ्रमण जैसे कार्यक्रम आयोजित हुए, जिसमें से वर्षा जल संग्रहण विधियों पर शोध, तकनीकी विकास एवं इसके लिए कार्य करने वाले व्यक्ति विशेष से लेकर कार्य-समूह एवं प्रशासनिक अधिकारियों तक में संकल्प जाग्रत हुआ और उसके प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाई देने लगे, जो पे्ररक व विश्वास पैदा करने वाले हैं। नगरों में वर्षाजल से भूगर्भ जल-भरण, नई बन रही कालोनियों में घरेलू मल-मूत्र युक्त जल के शोधन संयन्त्रों की स्थापना, जल-संकट से जूझते बुन्देलखण्ड के महोबा जिले में परम्परागत तालाबों की सामाजिक सहयोग से खुदाई-सफाई के साथ ही महोबा व बाँदा जिले में वर्ष 2013-14 में लगभग 100 खेत-तालाबों का निर्माण तथा 2000 तालाब बनाने का संकल्प केसर सिंह एवं उनकी टोली के सहयोग से लिया गया।
जल का सम्बन्ध वर्षा के साथ ही भूगर्भ-जल, ग्लैशियरों एवं नदियों से भी है। अतः लोक भारती ने जल एवं नदियों पर कार्य करने वाले अग्रणी संगठनों, व्यक्तियों से सम्पर्क, उनके कार्य का अध्ययन, उनके माध्यम से सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों के आयोजनों एवं उनके साथ प्रत्यक्ष कार्य में सहयोग की भूमिका के साथ कदम आगे बढ़ाये। प्रारम्भ में गंगोत्री से गंगा सागर तक आयोजित दो यात्राओं में सहयोग के अनुभव के परिणामस्वरूप संस्था का निश्चय बना, यदि गंगा को स्वच्छ जल युक्त रखना है तो गंगा में मिलने वाली सभी नदियों पर कार्य करना होगा। अतः संस्था ने उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड की सभी नदियों व उन पर कार्यरत व्यक्तियों, समूहांे की सूची बनाकर सम्पर्क किया और 23 व 24 जनवरी, 2011 को लखनऊ में ‘माँ गंगा समग्र चिन्तन वर्ग’ का आयोजन किया जिसमें 20 नदियों के 400 प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा उसी आयोजन में लोक भारती ने प्रत्यक्ष कार्यानुभव हेतु 960 किमी॰ मैदानी भाग में बहकर गंगा में मिलने वाली लखनऊ की जीवन रेखा, आदिगंगा गोमती के अध्ययन एवं सामाजिक जागरूकता हेतु एक सप्ताह की गोमती यात्रा का निश्चय किया, जो 28 मार्च से 3 अप्रैल, 2011 को गोमती प्रवाह के 13 जिलों में होती हुई 33 स्थानों पर गोमती मित्र-मण्डलों के निर्माण के साथ सम्पन्न हुई।
गोमती यात्रा के परिणामस्वरूप समाज में गोमती संरक्षण के प्रति आयी जागरूकता और प्रदेश सरकार को सौंपी गई उसकी कार्य योजना रिर्पोट ने तात्कालिक प्रदेश सरकार को भी प्रेरित किया और यात्रा के एक सप्ताह के अन्दर ही पीलीभीत जिले के गोमती उद्गम स्थल, माधौटाण्डा में प्रदेश सरकार के एक सचिव द्वारा वहाँ जिलाधिकारी, तहसीलदार एवं सिचाई विभाग के अधिकरियों के साथ निरीक्षण किया, जिसके बाद, पीलीभीत से लखनऊ तक गोमती को सुजला व प्रदूषण मुक्त रखने की कार्य योजना बनाई गई और तत्काल उसका क्रियान्वयन प्रारम्भ हो गया। क्रियान्वयन के प्रथम चरण में पीलीभीत में 47 किमी॰, शाहजहाँपुर जिले में 16 किमी॰ गोमती क्षेत्र की नाप, उसका चिन्हीकरण और खुदाई का कार्य किया गया। गोमती संरक्षण परियोजना को दिये जा रहे महत्व को इससे समझ सकते हें कि, पूरे-पूरे पृष्ठ के सभी समाचार पत्रों में विज्ञापन छपवाकर सरकार द्वारा अपने संकल्प की सार्वजनिक अभिव्यक्ति की गई। परन्तु इसके कुछ समय बाद हुए चुनाव में सरकार बदल गई और नई सरकार के आते ही अधिकारियों ने कार्य बंद कर फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
इसके बाद भी लोक भारती द्वारा पूरे गोमती क्षेत्र में गोमती संरक्षण हेतु नदी स्वच्छता अभियानों, जल के लैव परीक्षणों, तट, घाट एवं एस॰टी॰पी॰ के सामाजिक निरीक्षणों, उपवास, संगोष्ठी, ज्ञापन, प्रतिनिधि मण्डलों के मिलन, पत्राचार, समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं में लेखन गोमती क्षेत्र में वृक्षारोपण, आरती, दीपोत्सव जैसे सामाजिक व प्रशासनिक जारूकता के विविध कार्याें की निरन्तरता बनाये रखी। जिससे समाज के अनेक व्यक्ति व संगठन गोमती संरक्षण अभियान में सम्मिलित होते गए, वहीं सई, तमसा, ससुर खदेरी, हिन्डन, काली, मनोरमा आदि प्रदेश की अन्य नदियों के संरक्षण अभियानों में भी तेजी आयी, जिसका प्रभाव राजनैतिक क्षेत्र में कार्यरत लोगों पर भी हुआ और शासन के अधिकारियों ने भी जल, जल-स्रोत एवं छोटी नदियों के संरक्षण के लिए कुछ कदम उठाये। परिणामस्वरूप जून 2013 में मऊ जिले में तमसा तथा फतेहपुर जिले में स्वामी विज्ञानानन्द की प्रेरणा से ससुर खदेरी नदी के उद्गम से लेकर 36 किमी॰ तक मनरेगा से खुदाई, महोबा जिले में सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं जिलाधिकारी की अग्रणी भूमिका से जिले के प्रसिद्ध सरोवर कीर्तिसागर की हजारों लोगों ने निरन्तर लगकर खुदाई व सफाई का कार्य किया। लखनऊ में भी शासन, प्रशासन ने गोमती संरक्षण में सक्रियता दिखाई। तीन दिसम्बर, 2013 को लोक भारती की अग्रणी भूमिका में लखनऊ में शासन द्वारा जल-स्रोत संरक्ष्ण हेतु एक अभूतपूर्व क्रियान्वयन कार्यशाला का आयोजन मुख्य सचिव, कृषि उत्पादन आयुक्त (एपीसी) की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ, जिसमें प्रदेश में 50 नदियों एवं जल-स्रोतों पर कार्य करने वाले संगठनों के प्रतिनिधियों तथा 50 जिलों से जिलाधिकारी, सी॰डी॰ओ॰ व समकक्ष अधिकारियों के साथ ही प्रदेश के ग्राम विकास, भूमि संरक्षण विभाग के सचिव, ग्राम विकास व मनरेगा के आयुक्त सम्मिलित हुए और प्रदेश भर में जल-स्रोतों, झीलों, तालाबों व सिकुड़ती नदियों की खुदाई तथा उन पर वर्षाजल संग्रहण के लिए स्थान-स्थान पर जल-बंध (चेक डैम) बनाने की योजना बनी। जिसके परिणामस्वरूप गोमती की सहायक नदी छोहा पर 8, अंधरा छोहा पर 7 तथा बेहता पर 2 चेक डैम बनाए गए, जो मरती नदियों के पुनर्जीवन की दिशा में प्रेरक कदम है।

प्रदेश के अन्य जिलों के साथ ही पीलीभीत जिले में तत्काल गोमती पर पिछली सरकार के समय प्रारम्भ किए गये कार्यों को पुनः प्रारम्भ करने हतु सर्वेक्षण का कार्य पूरा करके, परियोजना पर कार्य प्रारम्भ हुआ, वहीं महोबा एवं बांदा जिले में एक-एक हजार खेत तालाब बनाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता व प्रशासन दोनांे सक्रियता निरन्तर प्रयत्न की उपलब्धि है।
लोक भारती भी महत्वपूर्ण भूमिका गंगोत्री से गंगा सागर तक चल रहे सामाजिक प्रयास ‘गंगा समग्र अभिायान’ में भी रही, जिसके सतत प्रयत्न के परिणाम स्वरूप वर्तमान सरकार ने गंगा की अविरलता-निर्मलता के लिए ‘‘नमामि गंगे’’ परियोजना प्रारम्भ की है। वहीं दैनिक जागरण ने इस जारूकता अभियान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए देव प्रयाग से गंगा सागर तक ‘गंगा यात्रा’ का आयोजन कर महत्वपूर्ण पहल की।
वायु, जल-स्रोत एवं नदियों के संरक्षण के साथ ही खाद्यान्न की गुणवत्तापूर्ण उत्पादकता एवं मृदा संरक्षण आवश्यक है, इस हेतु लोक भारती ने 2001 से सम्पूर्ण उत्तर भारत में जैविक खेती तथा 2012 से शास्वत खेती (जीरो बजट प्राकृतिक खेती) के प्रचार-प्रसार हेतु व्यापक व सघन अभियान चला रखा है, जिसके अन्तर्गत अभी तक मथुरा, अलीगढ़, झाँसी, बाँदा, देवरिया, लखनऊ, पीलीभीत, सहारनपुर, कन्नौज, बस्ती, कुरूक्षेत्र सहित 11 स्थानों पर बडे़-बड़े प्रशिक्षण वर्गों के आयोजन सम्पन्न हुए हैं, जिनमें 8 प्रदेशों के 50 से अधिक जिलों के लगभग 5 हजार किसानों नें प्रशिक्षण प्राप्त कर, माॅडल कृषि क्षेत्र विकसित किए हैं, जो इस कृषि-विद्या के विस्तार में सहायक हांेगे। जिससे किसान स्वावलम्बी, कृषि भूमि की उर्वरा-शक्ति का संवर्धन, गुणवत्ता-युक्त खाद्यान्न उप्पादन में वृद्धि, सिंचाई में केवल 10 प्रतिशत जल उपयोग से भू-गर्भ स्तर में बढ़त तथा जैवविविधता का संरक्षण संवर्धन होगा। यह कार्य एक देशी गाय से 15 से 20 एकड़ खेती में सम्भव है, अतः किसान गाय पालेगा, जिससे देशी गाय, किसान और किसानी का अभिन्न अंग बनेगी और उसका संरक्षण-संवर्धन सुनिश्चित होगा। इस हेतु आगामी प्रशिक्षण वर्ग 10 से 14 सितम्बर, 2014 को शाहजहाँपुर जिले के गांधी भवन में सम्पन्न होगा, इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में वाराणसी व छŸाीसगढ़ के रायपुर में जीरो बजट प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण वर्ग प्रस्तावित हैं।
इस प्रकार लोक भारती विभिन्न सामाजिक संगठनों, व्यक्तियों, विशेषज्ञों एवं शासन-प्रशासन तथा विभिन्न सम्बन्धित संस्थानों, प्रतिष्ठानों को सहभागी बनाते हुए निरन्तर आगे बढते हुए निम्ननांकित आयामों-अभियानों के लिए निरन्तर प्रयत्नशील है।
(1) मेरा गाँव-मेरा तीर्थ, (2) पर्यावरण संरक्षण, (3) वृक्षारोपण एवं हरियाली पखवारा (4). जल एवं नदी संरक्षण, (5) गंगा-समग्र एवं गोमती संरक्षण, (6) जीरो बजट प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण, (7) ग्रामीण तकनीकी विकास एवं प्रसार, (8) व्यक्तित्व विकास एवं गौरव सम्मान, (9) स्वयंसेवी संस्थाओं के मध्य समन्वय, (10) साहित्य एवं मासिक पत्रिका ‘लोक सम्मान’ का प्रकाशन तथा (11) समय के साथ गतिमानता हेतु ई-भारती एवं वेब साइड का उपयोग प्रारम्भ किया है, जिसके लिए सवाइींतजपपदकपंण्बवउएतपअमतण्हवउजपण्पदए उंहं्रपदमण्सवाइींतजपपदकपंण्बवउ तथा ूूूण्मइींतजपण्वतह पर संस्था से जुड़ा जा सकता है।
लोक भारती का कार्य लक्ष्य है - ‘भारत का विश्व में सर्वोच्च, गौरवपूर्ण स्थान’ बने, उसके लिए हमारे पास ‘वसुधैव कुटुम्बकम्ं’ की भावना के साथ प्रकृति-मूलक विकास का ध्येय मन्त्र है- 
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे शन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मां कश्चिद् दुखः भाग्भवेत।।’’ 
 - राष्ट्रीय संगठन मन्त्री, लोक भारती

समग्र नदी-संस्कृति एवं पारिस्थितिकी तन्त्र प्रबन्धन के लिए मार्गदर्शी: चैदह नदी सूत्र. - डा॰ वेंकटेश दŸाा

नदियों को पहले बेजान कर उन्हें पुनर्जीवित करने की कोशिश के बजाय, हमे उन्हें प्रारम्भ से ही स्वस्थ रखना होगा। क्योंकि हम सबको स्वस्थ रहने के लिए, हमारी नदियों का स्वस्थ रहना बहुत जरूरी है। 40-50 साल पहले बिना किसी फंडिंग प्रोजेक्ट या एक्शन प्लान के हमारी नदियांँ साफ थीं, निर्मल थीं, अविरल थीं, क्योंकि तब हमारे गाँव के लाखों किसान अपनी जिम्मेदारी को अपने कंधों पर लेकर पानी का काम करते थे।
विकास की अंधी दौड़ ने हमारी पारम्परिक समझ व जिम्मेदारी को कुंठित और साझेदारी के भाव को दिग्भ्रमित किया, परिणमतः आज हम नदियों में साफ पानी के लिए तरस रहे हैं।
वर्तमान समय में पारम्परिक नदी, नाव और गाँव की संस्कृति पर विश्वास कर अगर हम जन भागीदारी की योजना बनाएं और सामाजिक जागरूकता से लोगों को जोड़ें तो हम काफी हद तक अपनी नदियों को सुजला-सजला बनाते हुए गंगा को अविरल-निर्मल और नैसर्गिक बना सकते हैं। परन्तु इसके लिए हमें इन 14 नदी सूत्रों का स्मरण रखना होगा।
¨ चैदह नदी सूत्र -
1. नदियाँ हमारी प्राकृतिक विरासत का हिस्सा हैं।
2. जल, भूआकृतियाँ और कुदरती-निवास प्रशासनिक सीमाओं मे बंधे नहीं होते। 
3. नदियाँ प्राकृतिक रचनाएँ हैं, उनके कारणों को समझे बिना जब चाहे, जहांँ चाहे काटना या मोड़ना प्राकृतिक आपदाओं का कारण बन सकती हैं।
4. नदियाँ हमारे शरीर में बहने वाली रक्त शिराओं के समान हैं, जिनका कार्य शुद्ध रक्त को शरीर में प्रवाहित करना होता है, जबकि अशुद्ध रक्त के प्रवाह व शुद्धीकरण के लिए धमनियाँ होती हैं। शरीर की यह प्रकिृया जब तक ठीक है हम स्वस्थ हैं। उसी प्रकार समाज को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है कि नदियों को गंदगी ढ़ोने वाला नाला नहीं बनाऐं। अभी तक जो भूल हुई है,  अन्ततः उसमें सुधार करते हुए नदियों से गंदे नालें को अलग करना ही होगा। इसी में हमारा भविष्य सुरक्षित है।
5. नदियों के बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन्स) की प्राकृतिक प्रणालियाँ हजारों-हजारों सालों में विकसित हुई हैं, उनका अतिक्रमण या अपहरण आपदा का कारण बन सकते हैं। 
6. एक नदी, नदी बेसिन के हाइड्रोलाॅजिकल एकता का अविभाज्य अंग हैं और लैण्डस्केप घटक पानी और बाढ़  के मैदानों के प्रवाह के साथ जुड़े हुए हैं।
7. भू-जल गैर-मानसून मौसम में नदी प्रवाह को बनाये रखता है, अतः भूजल के स्तर को हम भी बनाये रखें।
8. सहायक नदियां एवं झीलें एक नदी के जीवन कार्यों के बनाये रखती हैं, अतः हम भी उन्हें जीवन्त बनाये रखें।
9. नदियांँ पारिस्थितिकी प्रणालियों में मीठे पानी की सबसे अधिक उत्पादक प्रणालियाँ हैं, जो जीवन का उत्पादन व रक्षण करती हैं।
10. नदियों का प्रवाह ही उनका जीवन है।
11. नदी के प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र (फ्लड प्लेन) नदी का अभिन्न हिस्सा हैं, अतः उसकी चोरी नहीं की जानी चाहिए।
12. नदी का बिस्तर (रिवरबेड) नदी का अभिन्न हिस्सा है, उसके साथ दुव्र्यवहार नहीं किया जाना चाहिए।
13. नदी का स्वास्थ्य उसके पारिस्थितिकी तन्त्र के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। अतः नदी संरक्षण का अर्थ है उसकी समस्त पारिस्थितिकी प्रणाली का संरक्षण।
14. भारत में नदियों और आध्यात्म के बीच सार्वभौमिक सम्बन्ध है। अतः नदी संरक्षण एवं प्रबन्धन की योजनाओं में आध्यात्मिक पहलुओं पर विशेष रूप से ध्यान देना होगा।  

एक पहल - नदियों के किनारे स्थित तीर्थों का पर्यावरणीय विकास. - डा॰ महेन्द्र प्रताप सिंह

हमारे देश की नदियाँ पहले शुद्ध जल से परिपूर्ण थीं जिसका पान एवं स्नान कर लोग आनन्द की अनुभूति करते थे। इन्हीं पावन नदियों के तट पर हमारे प्रमुख तीर्थ स्थल स्थित हैं। प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनि नदियों के किनारे स्थित इन तीर्थ स्थलों पर प्रकृति की गोद में रहते थे। सृष्टि के सभी जीव-जन्तुओं एवं पेड़ पौधों से उनका पारिवारिक सम्बन्ध होता था। वे अपने बच्चों के समान प्रकृति के प्रत्येक अवयव की देखभाल एवं सुरक्षा करते थे। नदी तट पर स्थित आश्रम शिक्षा का केन्द्र थे जिससे देश के भावी कर्णधार प्रकृति के प्रति स्वाभाविक प्रेम का पाठ पढ़ कर एवं उसे आत्मसात कर जीवन की कर्मभूमि में प्रवेश करते थे। नदियों की पावन धारा के निर्मल प्रवाह के साथ ही नदी तट पर स्थित इन आश्रमों से ज्ञान-विज्ञान की पावन यशस्वी धारा भी सतत प्रवाहित होती थी जिससे यह भारत देश जगद्गुरु के रूप में समस्त विश्व के लिये पे्ररणा का स्रोत था।
नदी तट पर स्थित वे तीर्थं आज भी विद्यमान हैं किन्तु नदियों का जल पीना तो दूर, नहाने लायक भी नहीं है। तीर्थ स्थलों की हरीतिमा लुप्त हो गई है। तीर्थ स्थलों की गन्दगी से मन कराह उठता है। तीर्थ स्थलों पर पक्के निर्माण तो लगातार हो रहे हैं किन्तु उनके पर्यावरणीय विकास पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। वस्तुतः तीर्थस्थलों का विकास पाँच सितारा संस्कृति से भिन्न है। तीर्थ स्थलों का पर्यावरणीय विकास करकेे ही उन्हें आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत बनाया जा सकता है। दुर्भाग्यवश इस दिशा में प्रभावी प्रयास नहीं हो सके हंै।
निश्चित रूप से यह बहुत बड़ा कार्य है जिसके लिये लगातार प्रभावी प्रयास की आवश्यकता है। इस दिशा में विचार करने पर मुख्यतः तीन कार्य किये जाने की आवश्यकता दृष्टिगोचर होती है -
¨ पहला नदियों एवं पवित्र कुण्डों की सफाई।
¨ दूसरा तीर्थस्थलों को हरा-भरा करना।
¨ तीसरा तीर्थस्थलों को पालीथीन मुक्त करना।
मेरा यह अनुभव है कि पालीथीन मुक्त करके हम किसी भी क्षेत्र को स्थाई रूप से गन्दा होने से बचाते हैं। नदियों को स्वच्छ रखने एवं सभी प्रकार के पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिये वनों एवं वृक्षों की सुरक्षा तथा अधिक से अधिक पौधारोपण ही एकमात्र विकल्प हैं। उक्त समस्या के दृष्टिगत राष्ट्रीय वन नीति में देश के भौगोलिक क्षेत्रफल का 1/3 अर्थात् कुल भू-भाग का 33 प्रतिशत वनों एवं वृक्षों से आच्छादित करने का लक्ष्य रखा गया है किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के 67 वर्ष बाद भी हम इस लक्ष्य से काफी पीछे हैं। वर्तमान में देश के कुल भू-भाग का 20.60 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है एवं उत्तर प्रदेश के कुल भू-भाग का मात्र 5.56 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। उक्त से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में पौधारोपण की दिशा में विशेष प्रयास की आवश्यकता है। अतएव इस दिशा में किये गये कतिपय कार्यों का उल्लेख यहाँ पर किया जा रहा है।
¨ माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर - लखनऊ से लगभग 30 कि॰मी॰ दूर बख्शी का तालाब के आगे माँ चन्द्रिका देवी शक्तिपीठ परिसर स्थित है। नवरात्रि, अमावस्या एवं अन्य अवसरों पर वहाँ अपार भीड़ होती है। यह महाभारत कालीन एवं श्री कृष्ण से जुड़ा तीर्थस्थल है। इस मन्दिर का परिसर अत्यन्त विशाल है। इसी परिसर में सुधन्वा कुण्ड स्थित है। यहाँ पालीथीन की अधिकता के कारण यह कुण्ड धीरे-धीरे प्रदूषित हो रहा है तथा उसकी मछलियाँ भी मर रही हैं।
अतः मेरे मन में विचार आया कि क्यों न इस परिसर को पालीथीन प्रदूषण मुक्त कराने का प्रयास किया जाय। मेरे विभागीय मित्र श्री ए॰पी॰ सिन्हा एवं श्री वी॰के॰ मिश्र के सहयोग से दिनाँक 11.09.2011 को मन्दिर समिति के अध्यक्ष श्री अखिलेश सिंह चैहान, महामन्त्री श्री अनुराग तिवारी ‘अन्नू’, डा॰ एस॰के॰ सिंह, श्री बी॰डी॰ सिंह, सभी दुकानदारों एवं स्थानीय व्यक्तियों के साथ बैठक की गई। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि दिनाँक 28.09.2011 से इस परिसर को पालीथीन मुक्त किया जायगा। उसके बाद आस-पास के कुम्हारों के साथ बैठक कर कुल्हड़ आपूर्ति की व्यवस्था की गई। पालीथीन थैली के विकल्प रूप में दुकानदारों को कागज एवं वैकल्पिक थैले उपलब्ध कराये गये। इस प्रकार प्रथम चरण में दुकानों पर पालीथीन कप के स्थान पर कुल्हड़ लाये गये तथा पालीथीन थैलियों के स्थान पर कागज एवं अन्य थैलों का प्रयोग प्रारम्भ किया गया।
इस सफलता को स्थायित्व देने के लिए यह विचार किया गया कि स्थानीय ग्रामवासियों, मन्दिर समिति के लोगों एवं दुकानदारों को किसी श्रेष्ठ सन्त से सौगन्ध दिलाई जाय। इसी के क्रम में दिनाँक 28.09.2011 को नवरात्रि के प्रथम दिवस पर मन्दिर परिसर में मेरे आध्यात्मिक गुरु सन्त स्वामी महेशानन्द जी द्वारा सभी को परिसर को पालीथीन मुक्त करने की शपथ दिलाई गई। शपथ ग्रहण समारोह में मन्दिर समिति के संरक्षक श्री भगवती सिंह जी, लखनऊ विश्व विद्यालय के प्रो॰ हरि शंकर मिश्र एवं अनेक शिक्षाविद्, मन्दिर समिति के सभी पदाधिकारी, वन विभाग के अनेक सहयोगी, परिसर के सभी दुकानदार एवं अनेक स्थानीय लोगों द्वारा परिसर में पालीथीन का प्रयोग न करने का संकल्प लिया गया। इस समय तक परिसर में काफी सीमा तक दुकानों को पालीथीन मुक्त किया जा चुका है। श्रद्धालुओं एवं भक्तों द्वारा पालीथीन का प्रयोग रुकवाने एवं मेला के दिनों में बाहर से आने वालों सेे पालीथीन रुकवाने की दिशा में मन्दिर समिति के सहयोग से प्रयास जारी है।
दिनाँक 28.09.2011 को ही स्वामी जी द्वारा कृष्णवट का रोपण कर परिसर में वृक्षारोपण का शुभारम्भ कर दिया गया जो अब वृक्ष का रूप ले रहे हैं। इसके बाद मेरे मन में यह विचार आया कि इतने विशाल परिसर में सुनियोजित ढंग से न केवल पौधारोपण कराया जाय बल्कि उसे स्थापित कर इसे हरा-भरा किया जाय। वृक्षारोपण के बारे में मेरा यह अनुभव रहा है कि अनेक माध्यमों से प्रतिवर्ष व्यापक रूप से वृक्षारोपण किया जाता है किन्तु अधिकांशतः उनकी सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। पौधों की सुरक्षा बच्चे को पालने जैसी है। पौधारोपण के बाद लम्बे समय तक, जब तक कि वह पूर्णतः स्थापित न हो जाय, उसकी सुरक्षा आवश्यक है। वर्ष 2012 एवं 2013 में मन्दिर समिति एवं वन विभाग के सहयोग से व्यापक पौधारोपण किया गया। गोमती तट पर जल भराव वाले क्षेत्र में अर्जुन का रोपण किया गया एवं मन्दिर के आस-पास पीपल, पाकड़ एवं बरगद के साथ-साथ कैथ, बड़हर एवं आमरा जैसी अनेक लुप्त हो रही प्रजातियों को रोपित किया गया। इसमें धार्मिक महत्व को देखते हुये यहाँ कल्पवृक्ष का भी रोपण किया गया है। सन्तोष का विषय है कि सभी प्रजातियाँ न केवल जीवित हैं बल्कि अच्छी दशा में चल रही हैं।
अब यह देखकर बड़ी प्रसन्नता एवं सन्तोष का अनुभव होता है कि वहाँ पर चाय आदि की दुकानों पर मिट्टी के कुल्हड़, चाट की दुकानों पर पत्तल एवं अन्य दुकानों पर कागज के थैलों का व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। इससे वहाँ होने वाली गन्दगी में कमी आयी है। इस उल्लेखनीय पहल के लिये मन्दिर समिति के सभी पदाधिकारी, परिसर के दुकानदार एवं सहयोगी मित्रगण बधाई के पात्र हैं। मन्दिर परिसर में कराए गये कार्यों का स्मरण करने पर बरबस उन दो सहयोगियों की याद आती है जो अब इस दुनियाँ में नहीं रहे। श्री बबलू सिंह पालीथ्ीन मुक्ति एवं मो॰ इदरीश वृक्षारोपण कार्यक्रम में ऐसे लगे रहते थे जैसे उनके घर का कोई कार्य हो। इन मित्रों को याद करके आज भी आँख नम हो जाती है।
इसके अगले चरण में भक्तों द्वारा बाहर से लाई जाने वाली पालीथीन पर नियन्त्रण किये जाने की दिशा में अभी व्यापक प्रयास किये जाने की आवश्यकता है। पालीथीन का प्रयोग बन्द होना एवं जनसहयोग से पौधारोपण करने की यह स्वतः स्फूर्त छोटी सी पहल सुखद, प्रेरणास्पद एवं अनुकरणीय है।
¨ नैमिषारण्य - उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में स्थित नैमिषारण्य एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन तीर्थस्थल है। यह प्राचीन ऋषियों की तपस्थली रही है। प्राचीन काल में यहाँ सघन वन था, इसीलिये इस क्षेत्र का नाम नैमिषारण्य था, परन्तु वर्तमान में यहाँ वन नहीं बचे हैं। आज नैमिषारण्य में नैमिष मात्र बचा है, अरण्य गायब है। यह विचारणीय  विषय है, जिस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है।
मेरे आध्यात्मिक गुरु श्री अखण्डानन्द आश्रम, वृन्दावन के स्वामी महेशानन्द जी हैं। कभी-कभी लखनऊ स्थित मेरे निवास पर उनका आना होता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल श्री विष्णुकान्त शास्त्री जी उनके गुरुभाई थे। जब भी स्वामी जी लखनऊ आते थे, शास्त्री जी से मिलने अवश्य जाते थे। शास्त्री जी एक बार लखनऊ प्राणि उद्यान में एक समारोह में आए थे, तब उन्होंने वन विभाग के अधिकारियों से कहा था कि वृन्दावन एवं नैमिषारण्य हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। आज न तो वृन्दावन में वन है और नही नैमिषारण्य में अरण्य। श्री राज्यपाल ने आग्रह किया कि वृन्दावन में वन एवं नैमिषारण्य में अरण्य स्थापित करने का विशेष प्रयास किया जाय। स्वामी जी के साथ मैं तीन बार शास्त्री जी से मिला। मेरे वन विभाग में कार्यरत होने के कारण उन्होंने मुझसे तीनों बार जोर देकर कहा कि वृन्दावन में वन एवं नैमिषारण्य में अरण्य स्थापित करने की दिशा में कुछ किया जाय। मैंने कुछ विभागीय अधिकारियों से इसकी चर्चा भी की किन्तु कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। बहुत दिन बाद मैंने समाचार पत्र में पढ़ा कि शास्त्री जी नहीं रहे। उस दिन के बाद मैं कई दिन तक व्यथित रहा। उनके हृदय की पीड़ा को मैने अपने मन में आत्मसात् किया एवं तय किया कि शास्त्री जी की इच्छा पूर्ण करने की दिशा में यथासम्भव प्रयास करूँगा।
इसी बीच मेरे मित्र श्री राधे कृष्ण दुबे द्वारा एक महीने तक नैमिषारण्य परिक्रमा पथ की पदयात्रा कर परिक्रमा पथ पर स्थानीय लोगों एवं वन विभाग के सहयोग से 88000 ऋषियों की स्मृति में 88000 पौधों का रोपण कराया गया। यह एक अद्भुत पदयात्रा थी जिसमें व्यापक जन समर्थन मिला। यह एक ऐसी पदयात्रा थी जिसे लम्बे समय तक याद किया जायगा। इस पद यात्रा में मुझे भी दो दिन सम्मिलित होने का अवसर मिला तथा कार्य को आगे बढ़ाने का संकल्प मन मे आकार लेने लगा। इसके अतिरिक्त चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर में पालीथीन मुक्ति एवं सफल वृक्षारोपण से मन में विश्वास उत्पन्न हुआ तथा नैमिषारण्य में इस दिशा में कुछ किए जाने का भाव जगा।
मेरे मित्र एवं प्रभागीय वनाधिकारी सीतापुर श्री वी॰के॰ मिश्र के सहयोग से नैमिषारण्य स्थित पहला आश्रम में दिनाँक 16 दिसम्बर, 2012 को पहली सभा की गई। इस सभा में विभिन्न आश्रमों के प्रमुख सन्त, व्यापार मण्डल के प्रतिनिधिगण, वन विभाग के अधिकारी कर्मचारी गण, मीडिया से जुड़े प्रतिनिधि एवं स्थानीय गणमान्य लोग उपस्थित थे। इस सभा में निर्णय लिया गया कि नैमिषारण्य स्थित श्मशान घाट एवं उसके आस-पास की भूमि पर वृक्षारोपण कार्य कराया जाय। वन विभाग के क्षेत्रीय वनाधिकारी श्री ए॰के॰ सिंह एवं अन्य कर्मचारियों को यह दायित्व दिया गया कि सम्बन्धित ग्राम प्रधान से उक्त भूमि का वृक्षारोपण हेतु प्रस्ताव प्राप्त किया जाय तथा उस पर विशेष ध्यान देकर रोपण कार्य कराया जाय। पालीथीन मुक्त क्षेत्र बनाने पर लोगों की राय थी कि यह अत्यन्त कठिन कार्य है। श्री ए॰के॰ सिंह अध्यक्ष व्यापार मण्डल के सुझाव पर यह तय हुआ 29 दिसम्बर सन् 2012 को नैमिषारण्य के प्रमुख साधु सन्त, व्यापार मण्डल के प्रतिनिधि गण एवं गणमान्यलोग माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर में आकर देखें कि वहाँ पर पालीथीन के विकल्प का कैसे प्रयोग किया जा रहा है तथा वहाँ गोमती नदी के किनारे किये जा रहे रोपण कार्य को भी देखें ताकि एक सकारात्मक एवं व्यावहारिक सोच जागृत हो सके।
दिनाँक 29 दिसम्बर सन् 2012 को चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर में सभा की गई। इस सभा में चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर के अध्यक्ष श्री अखिलेश सिंह चैहान ने सभी को वहाँ पर पालीथीन के विकल्पों को दिखाया। चाय एवं चाट की दुकानों पर कुल्हड़ एवं पत्तल का प्रयोग देखकर लोग बहुत प्रभावित हुये। इस सभा से एक सकारात्मक वातावरण बना तथा नैमिषारण्य के गणमान्य लोगों के मन में यह भाव आया कि पालीथीन के विकल्प का प्रयोग कर इसे हटाया जा सकता है। यह निश्चित हुआ कि दिनाँक 27 जनवरी 2013 को चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर के पालीथीन के विकल्प के विक्रेता को नैमिषारण्य लाया जाय तथा पालीथीन को बन्द करने की दिशा में आगे कार्यवाही की जाय।
दिनाँक 27 जनवरी 2013 को पालीथीन के विकल्प के विक्रेता के साथ मैं नैमिषारण्य पहुँचा। इस सभा में पहला आश्रम के महन्त जी एवं अन्य कई लोगों ने पालीथीन के विकल्प के रूप में प्रयोग की जाने वाली थैलियाँ खरीदीं। इस सभा में उत्तर प्रदेश में पालीथीन को प्रतिबन्धित करने के मा॰ उच्च न्यायालय के आदेश से सबको अवगत कराया गया। ललिता पीठ के श्री गौरी शंकर जी द्वारा सुझाव दिया गया कि यदि मा॰ उच्च न्यायालय के आदेश के क्रम में आग्रह करके प्रशासक से ललितापीठ को पालीथीन मुक्त करने का आदेश करा लिया जाय तो पालीथीन मुक्त करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। मेरे मित्र श्री विनय कृष्ण मिश्र जी के प्रयास से दिनाँक 8 मार्च 2013 को माँ ललिता देवी परिसर को पालीथीन मुक्त करने का आदेश रिसीवर महोदय से निर्गत हो गया। इस प्रकार पालीथीन मुक्ति की दिशा में एक सार्थक प्रयास हुआ।
इसके अतिरिक्त गोमती के तट पर शमशान घाट के निकट वन विभाग द्वारा स्थानीय गणमान्य नागरिकों के सहयोग से भूमि का प्रस्ताव प्राप्त कर वृक्षारोपण कार्य भी प्रारम्भ कर दिया गया। यह वह भूमि है जिस पर लगातार अतिक्रमण होता जा रहा था। नदी तट स्थित इस संवेदनशील भूमि पर 05 हे॰ क्षेत्र में वन विभाग एवं स्थानीय लोगों के सहयोग से विधिवत् पौधारोपण कार्य कराया गया। इसके अतिरिक्त बालाजी मन्दिर परिसर में पंचवटी, नवग्रह वाटिका एवं नक्षत्र वाटिका की स्थापना कराई गई। ईश्वर की कृपा से यहाँ पर रोपित सभी पौधे सुरक्षित एवं प्रफुल्लित हैं। इस समय वन विभाग के साथ-साथ स्वामी बालकृष्ण शास्त्री जी द्वारा इन पौधों की देखभाल की जा रही है जिसके लिये वे बधाई के पात्र हैं।
उक्त के अतिरिक्त गोमतीपार क्षेत्र स्थित पहला आश्रम की भूमि पर भी व्यापक रोपण तथा नैमिषारण्य से थोड़ी दूर स्थित रुद्रावर्त मन्दिर के पास हरिशंकरी स्थापित की गई। भगवान शिव के अद्भुत भक्त यहाँ के महात्मा जी द्वारा हरिशंकरी की स्वयं सेवा की जा रही है जिसके लिये वे साधुवाद के पात्र हैं। हरिशंकरी में ब्रह्मा, विष्णु, महेश त्रिदेव के प्रतीक रूप में पीपल, बरगद एवं पाकड़ का पास-पास रोपण किया जाता है, जो बड़े होने पर एक रूप हो जाते हैं।
¨ वृन्दावन - दिनाँक 11.05.2013 को वृन्दावन में साधुसन्तों एवं स्थानीय प्रबुद्ध लोगों के साथ वृन्दावन को हरा-भरा करने के सम्बन्ध में बैठक की गई। इस बैठक में तटिया स्थान के स्वामी मदन बिहारी दास द्वारा वृन्दावन को हरा करने में विशेष रुचि दिखाई गई। इसी दिन स्वामी मदन बिहारी दास जी के साथ उन स्थलों का भ्रमण किया गया जहाँ पौधारोपण कराया जा सकता था। भ्रमण के उपरान्त वृन्दावन दिल्ली मार्ग पर स्थित सुनरख क्षेत्र में में पौधारोपण कराने का निर्णय लिया गया। यहाँ पानी खारा है तथा पौधों को बचाने की विकट समस्या है। विशेष प्रयास करके वन विभाग की सहायता से 2013 वर्षाकाल में यहाँ पर 119 एकड़ क्षेत्र में पौधारोपण कार्य कराया गया। ईश्वर की कृपा से यहाँ अधिकांश पौधे जीवित हैं।
स्वामी मदन बिहारी दास जी द्वारा इस क्षेत्र की लगातार प्रभावी देखभाल की जा रही है। स्वामी जी का यह कार्य हम सबके लिए पे्ररणास्रोत एवं अनुकरणीय है।
¨ धौम्य ऋषि आश्रम, धोबियाघाट -हरदोई जनपद में गोमती के तट पर स्थित धोबियाघाट एक अद्भुत स्थान है। यह दो कारणों से अद्भुत है- पहला यहाँ भूमि से अनेक पानी के सोते निकलते हैं जो बाद में गोमती नदी में मिलते हैं तथा दूसरा गोमती के तट पर स्थित मन्दिर के सघन वन क्षेत्र को देखकर प्राचीन आश्रमों की परिकल्पना साकार रूप लेती है। आज के व्यावसायिक युग में यहाँ के सघन वन क्षेत्र को बचाये रखने के लिये यहाँ के महन्त श्री नारायणानन्द जी अभिनन्दन के योग्य हैं। मैं लोक भारती के मित्रों मुख्यतः श्री बृजेन्द्र पाल सिंह जी का आभारी हूँ  कि उनके माध्यम से मुझे गोमती के तट पर स्थित ऐसे हरे भरे क्षेत्र में स्थित तीर्थस्थल का दर्शन करने का अवसर प्राप्त हुआ। लोक भारती के नेतृत्व में यहाँ पर एक सभा का आयोजन कर यहाँ पर पालीथीन बन्द करने पर विचार किया गया। यहाँ की सभा में हमें स्वामी जी एवं अन्य सभी का व्यापक सहयोग मिला एवं पालीथीन बन्द करने का अभियान यहाँ भी प्रारम्भ हो गया।

¨ सैलानी माता मन्दिर - लखनऊ से लगभग 20 कि॰मी॰ दूर बाराबंकी जिले में गोमती नदी के तट पर सैलानी माता का मन्दिर स्थित है। लोक भारती के सहयोग से मन्दिर समिति के पदाधिकारियों के साथ यहाँ पौधारोपण के सम्बन्ध में बैठक की गई तथा वर्ष 2014 वर्षाकाल में यहाँ पर धार्मिक महत्व के एवं लुप्त हो रही वृक्ष प्रजातियों के व्यापक पौधारोपण की योजना बनायी गयी। उक्त पौधा रोपण हेतु मन्दिर समिति द्वारा यहाँ पर रोपण हेतु वृत्ताकार खाईं खुदवाई गयी। दिनाँक 04.05.2014 को मन्दिर समिति के अध्यक्ष श्री रामदुलारे यादव एवं मन्दिर के मुख्य पुजारी श्री वासुदेव जी द्वारा रुद्राक्ष के पौधे का रोपण कर पौध रोपण का शुभारम्भ किया गया। दिनाँक 20.07.2014 को सैलानी माता मन्दिर परिसर में कल्पवृक्ष, पारिजात (हरसिंगार), हरिशंकरी (पीपल, पाकड़ एवं बरगद), कैथ, खिरनी, कनकचम्पा, मौलश्री, खैर, बड़हल, गूलर आदि प्रजातियों का रोपण किया गया। उक्त पौधा रोपण हेतु श्री सुरेश चन्द्र यादव, प्रभागीय वनाधिकारी, लखनऊ वन प्रभाग द्वारा यहाँ पौध उपलब्ध कराकर प्रशंसनीय सहयोग किया गया। उक्त कार्यक्रम में वन विभाग के अनेक अधिकारियों मुख्यतः श्री ए॰पी॰ त्रिपाठी प्रभागीय वनाधिकारी सुल्तानपुर वन प्रभाग, श्री पी॰पी॰ सिंह प्रभागीय वनाधिकारी बाराबंकी वन प्रभाग एवं वन विभाग के अन्य सहयोगियों मुख्यतः श्री अनिल कान्त गुप्ता, श्री हरि राम यादव तथा श्री राम सेवक यादव का विशेष योगदान रहा है। उक्त परिसर में वृक्षारोपण कराये जाने एवं उसकी सुरक्षा हेतु सैलानी माता मन्दिर समिति के सभी सदस्य मुख्यतः श्री रामदुलारे यादव का अमूल्य सहयोग मिला, जिसके बिना यह कार्य कराया जाना सम्भव नहीं था।
कभी-कभी मन में विचार आता है कि ऐसे प्रतीकात्मक रोपण से पर्यावरण प्रदूषण की समस्या नहीं हल होने वाली है। पर्यावरण प्रदूषण की विकट समस्या को देखते हुये थोड़ी देर लगता है कि बात तो सही है, किन्तु फिर अपनी ही कृति ‘नारद की भू-यात्रा’ की अन्तिम पंक्तियाँ मेरा पथ प्रदर्शन करती हैं -
‘घनी काली रातों में
सपनों के सूरज देखने से अच्छा है,
कि इस रात में जागकर
निःस्वार्थ प्रयास का
माँ प्रकृति की आराधना में
सरिता गिरि तरु उपासना में
एक छोटा ही दीप जलाएॅं
आज के मुख्य युगधर्म को निभाएॅं।
इस छोटे से चिराग की रोशनी में संशय के घनघोर अँधेरें में भी मुझे अपना कर्तव्य पथ साफ-साफ दिखता है और मैं उसी पर चलने का प्रयास भी कर रहा हूँ। ु
- उप वन संरक्षक, कार्यालय प्रमुख वन संरक्षक,
17, राणा प्रताप मार्ग, उत्तर प्रदेश, लखनऊ।

हमारे राष्ट्रीय गर्व और सम्प्रभुता का प्रतीक भारतीय राष्ट्र ध्वज

राष्ट्रीय ध्वज हमारे देश के लोगों की आशा और आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करता है। भारत के ध्वज कोड 2002 के अनुसार आम लोगों, निजी संगठनों और शैक्षणिक संस्थानों इत्यादि के सदस्यों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन पर कोई पाबन्दी नहीं है। हालांकि ऐसा करने पर राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा और सम्मान बनाये रखने के लिए निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धान्तों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
ऽ ध्वज हमेशा सम्मानजनक स्थानों पर और साफ सुथरी जगह पर लगा हो।
ऽ ध्वज फहराते समय हमेशा ऊपरी भाग में ‘केसरिया’ रंग होना चाहिए।
ऽ इसे खम्भे पर किसी अन्य झण्डे के साथ न फहराया जाये। 
ऽ ध्वज को वंदनवार, चक्राकार खिड़की, ध्वजपट या किसी भी प्रकार की सजावट के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
ऽ क्षतिग्रस्त या बिखरे हुए ध्वज को नहीं फहराना चाहिए।
ऽ जहां तक सम्भव हो भारत का ध्वज कोड 2002 में निर्धारित विश्ष्टिताओं को पुष्ट करता हुआ ध्वज होना चाहिए।
ऽ ध्वज जब क्षतिग्रस्त या गंदे हालात में हो उसे ध्वज की मर्यादा के लिए वैयक्तिक दृढ़तापूर्वक उतार लेना चाहिए।
ऽ यदि ध्वज को सार्वजनिक रूप से फहराया जाता है तो इसे जहां तक सम्भव हो सके मौसम की स्थिति की परवाह किए बिना सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहरायें।
ऽ ध्वज को किसी भी व्यावसायिक उपयोग के लिए प्रयोग न करें। 
ऽ आम लोगों द्वारा कागज के बने ध्वजों का महत्वपूर्ण राष्ट्रीय, सांस्कृतिक समारोहों और खेल अवसरों पर उपयोग किया जा सकता है। हालांकि आयोजन के बाद ऐसे ध्वजों को जमीन पर छोड़ें या फेंके नहीं जाने चाहिए। जहां तक सम्भव हो ध्वज को वैयक्तिक दृढ़तापूर्वक उतार लिया जाये।
ऽ प्लास्टिक से बने ध्वज का उपयोग नहीं होना चाहिए। क्योंकि वह कागज के बने ध्वजों की तरह स्वाभाविक गलनशील नहीं होते। 
ऽ राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम, 1971 के अपमान निवारण के तहत राष्ट्रीय ध्वज के प्रति असम्मान प्रकट करना या अपमान करना दण्डनीय है। अधिक जानकारी हेतु गृह मन्त्रालय भारत सरकार की वेबसाइट ीजजचरूध्ध्उींण्दपबण्पद पर जायें।
ऽ राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में समान अनुपात में तीन क्षैतिज पट्टियां हैं, जिसमें गहरा केसरिया रंग सबसे ऊपर, सफेद बीच में तथा हरा रंग सबसे नीचे रहता है। ध्वज की लंबाई-चैड़ाई का अनुपात 3ः2 है। सफेद पट्टी के बीच में नीले रंग का अशोक चक्र है। इसमें 24 तीलियां हैं, जिसका मतलब है - सतत् विकास।
ऽ गहरा केसरिया रंग शक्ति और साहस दर्शाता है। बीच में स्थित सफेद पट्टी धर्म चक्र के साथ शान्ति और सत्य का संकेत है। हरा रंग देश के विकास और उर्वरता को दर्शाता है। ु

शून्य लागत प्राकृतिक खेती.एक एकड़ खेत का माॅडल.- हिमांशु गंगवार

किसानों के लिए शून्य लागत प्राकृतिक खेती वरदान सिद्ध हो सकती है। जिसके लिए आवश्यक है, किसान के पास एक देशी गाय और मिश्रित खेती करने का तरीका। इस पद्यति से पानी की खपत भी 1/10 ही होती है। सामान्यतः खेत में ली जाने वाली मिश्रित फसलों से लागत मूल्य निकल आता है और मूल फसल लाभ के रूप में बच जाती है। इस पद्यति से खेती करने पर जब किसान के बेटे को लाभ होता है, तो फिर उसे अपने घर-गांव को छोड़कर छोटी-छोटी नौकरियों के लिए मारा-मारा फिरना नहीं पड़ता। अच्छी पढ़ाई का मतलब नौकरी करना नहीं, अपितु स्वंय अपनी खेती द्वारा अच्छी आमदनी और स्वाभिमान की जिन्दगी का नाम ‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती’ है, ऐसा मेरा अनुभव है।
मैने स्वंय बीटेक किया, मेरे पिता जी उŸार प्रदेश पावर कार्पोरेशन में इन्जीनियर थे और लखनऊ में रहते हैं। पर! मैने नौकरी करने की अपेक्षा खेती करने को प्राथमिकता से लिया और फरूखाबाद जिले के अपने गाँव में रहने लगा, तभी 2011 में एक प्रशिक्षण वर्ग में शून्य लागत प्राकृतिक खेती के पुरस्कर्ता सुभाष पालेकर जी से भेट हुई। उनके द्वारा प्रतिपादित कृषि पद्यति समझ में आ गई और तब से उसी विधि से लाभकारी खेती कर रहा हूंँ। हमारे पास 16 एकड़ कृषि भूमि है, जो आज ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक विधि’’ खेती का माॅडल बन गया है। यहांँ पर मैं शून्य लागत प्राकृतिक खेती के एक एकड़ खेत का विवरण दे रहा हूंँ, जिससे आप अपने सम्बन्ध में स्वंय निर्णय ले सकेंगे।
एक एकड़ गन्ने की सहफसली में कुल लागत -
बुवाई का समय फसल बुवाई            दर  कुल बीज                     लागत
फरवरी, 2013 गन्ना 6 गुणा 9 फिट        5रू॰/गन्ना  70 गन्ना              350 रू॰
        मूंग गन्ने के बीच में                80रू॰/किग्रा  7  किग्रा              560 रू॰
जून, 2013         हल्दी मूंग के स्थान पर        25रू॰/किग्रा  350 किग्रा           8,750 रू॰
अन्य व्यय -
जुताई (पाटा सहित) गन्ना एवं मूग बुवाई से पूर्व        1100रू॰/एकड़   3 जुताई             3,300 रू॰
गन्ना गड़ाई                        200 रू॰/लेबर    2 लेबर             400 रू॰
मूंग बुवाई हल-बैल द्वारा गन्ना के बीच में लाइन से   1000 रू॰/ए.पाटा सहित    1,000 रू॰
निराई-गुड़ाई गन्ना, मूंग एवं हल्दी में        4000रू॰/निराई    4 निराई             16,000 रू॰
सिंचाई पूरे कार्यकाल में                 750रू॰/एकड़    6 सिंचाई                    4,500 रू॰
मूंग कटाई,मड़ाई                2500रू॰/एकड़     ............                  2,500 रू॰
हल्दी खुदाई                        2500रू॰/एकड़     ............                  2,500 रू॰
हल्दी सफाई                        3500रू॰/एकड़ ............          3,500 रू॰
गन्ना ढुलाई                          50 रू॰/कुन्तल    250 कुन्तल                12,500 रू॰
सुपरवीजन पूरे कार्यकाल में                  1000रू/माह     12 माह                      12,000 रू॰
कुल लागत                                                      66,610 रू॰

एक एकड़ गन्ने की सहफसली में कुल उत्पादन -
कटाई का समय         फसल उत्पादन दर                                    उत्पादन मूल्य
20 मई, 2013 मूंग        4 कुन्तल 8,000 रू॰/कुन्तल                    32,000  रू॰
दिसम्बर, 2013 हल्दी        50 कुन्तल         2000 रू॰/कन्तल                      1,00,000  रू॰
फरवरी, 2014 गन्ना      250 कुन्तल         270 रू॰/कुन्तल                    67,750  रू॰
कुल उत्पादन                                          1,99,750 रू॰

कुल लागत                                              66,610 रू॰
बचत                                                   1,33,140 रू॰

एक एकड़ खेती से एक वर्ष में 1,33,140 रू॰ के अनुसार प्रति माह आय हुई - 11,995 रू॰। इस प्रकार कुल मेरी 16 एकड़ खेती से प्रति वर्ष कुल बचत - 21,30,240 रू॰ हो जाती है, जो किसी भी नौकरशाह की सुख-शान्ति की तुलना में कम नहीं है। विचार कीजिए! यदि कम नहीं है, तो रासायनिक खेती से मुक्ति का मार्ग अपनाएंँ और दूसरों की गुलामी से अच्छा है, अपनी खेती करें और स्वावलम्बी व गौरवपूर्ण जिन्दगी जिएंँं।
एक एकड़ खेती वाला व्यक्ति भी कम से कम 12 हजार रू॰/महीना घर बैठे कमाई कर सकता है। जिसके लिए गन्ने के साथ सहफसली के रूप में अन्य कई फसलें ली जा सकती हैं, आइये देखें-
जायद के समय (फरवरी से मई तक, 4 माह) - लोबिया, मूंगफली, मक्का, प्याज तथा विभिन्न सब्जियाँ। 
खरीफ के समय (जून से सितम्बर तक, 4 माह)- लोबिया, ग्वार, मक्का, अरहर, तिल्ली तथा विभिन्न सब्जियांें की फसलें ली जा सकती हैं। पर! कम से कम एक फसल दलहन वर्ग की अवश्य लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त यदि गन्ने की बुबाई अक्टूबर में करनी हो तो, सहफसली के रूप में रबी की फसलों की सभी फसलें जैसे - बरसीम, सरसों, चना, मटर, जौ, गेहूंँ, आलू,, टमाटर, व अन्य सब्जियां मिट्टी व वातावरण के अनुसार ली जा सकती हैं।
मुझे शून्य लागत प्राकृतिक खेती करते हुए चार साल हो गये हैं। हमारी खेती सहफसली है, जिसमें मुख्य फसल आवश्यकतानुसार चैडे़ बेड पर निश्चित दूरी पर लाइन से बोई जाती है। उसके दोनो ओर नाली रहती है जिसके माध्यम से फसल को पानी दिया जाता है। नाली तथा मुख्य फसल के बीच खाली खेत में लाइन से मौसम के अनुसार सहफसल लेते हैं। उसमें भी कम पानी वाली सहफसल मुख्य फसल की ओर तथा अधिक पानी की माँग वाली फसल नाली की ओर लेते हैं। खेती में निकलने वाले फसलों के अपशिष्ट तथा निराई-गुड़ाई से निकलने वाला सभी खर-पतवार नली में आच्छादन के रूप में डालते हैं। इसके अतिरिक्त फसल के बेड पर भी आच्छादन करते हैं, जिससे फसल में खर-पतवार नहीं उगता। पूरी फसल में आच्छादन के कारण नमी अधिक समय तक टिकती है, जिससे पानी लगाने की अवधि व मात्रा दोनो घट जाती है। खेेत की परत पर आच्छादन के कारण अंधेरा रहता है, जिससे केंचुवा रात-दिन काम करता है, जिसके परिणाम स्वरूप खेत की मिट्टी इतनी मुलायम हो गई है कि, खेत में चलने से पैर जमीन में धसने लगते हैं। इससे दूसरी फसल लेने पर जुताई की आवश्यकता बहुत कम रह गई है। कई सहफसलों की तो बुवाई बिना जुताई-खुदाई के खुरपी या नुकीली लकड़ी से ही कर दी जाती है। फसल बोने से पूर्व जुताई के समय एक बार में 50 किलो के दो कट्टे घन-जीवामृत एक एकड़ में डाल कर जुताई द्वारा मिला देते हैं तथा प्रत्येक पानी के साथ एक टंकी जीवामृत का प्रयोग करते हैं, जिसकी मात्रा का अनुपात फसल के आयु-क्रम के साथ बदलता रहता है।
बीज का शोधन भी इसी विधि से बनने वाले बीज शोधक से करने के बाद ही बुवाई करते हैं, जिससे बीज का जमाव अधिक व रोग रहित होता है। भूमि का उपजाऊपन निरन्तर बढ़ने के साथ ही, उत्पादन दर बिना घटे, गुणवŸाा युक्त, अधिक टिकाऊ, अधिक स्वाद से युक्त व आरोग्यवर्धक होती है। अतः सामान्य बाजार मूल्य पर भी फसल में प्रति एकड़ अधिक बचत होती है। परन्तु इस विधि के उत्पादन की गुणवŸाा के कारण सामान्य रूप से इसका मूल्य बाजार मूल्य से न्युनतम 10 से 20 प्रतिशत अधिक ही मिलता है।

जीएम फसलें सवालों के घेरे में - .डा॰ भरत झुनझुनवाला

जीन परिवर्तित खाद्य फसलों का मामला लंबे समय से विवादित रहा है। संप्रंग सरकार में तत्कालीन पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश तथा जयन्ती नटराजन ने जीएम फसलों के फील्ड ट्रायल की अनुमति नहीं दी थी। इसके बाद गत वर्ष वीरप्पा मोइली ने हरी झंड़ी दे दी। अब राजग सरकार के पर्यावरण मन्त्री प्रकाश जावड़ेकर ने पुनः लाल बŸाी दिखा दी।
प्रकृति में जीन का लेन-देन सामान्य रूप से होता रहता है। नर और मादा के संयोग से नए जीन बनते रहते हैं, लेकिन जीन का यह लेन-देन एक ही जाति के पौधों के बीच धीरे-धीरे होता है। जीएम बीजों में जीन परिवर्तन तकनीक में स्वजातीय लेन-देन का प्रतिबन्ध समाप्त हो जाता है, जैसे हिरण के झुंड में शेर जबरन घुस जाता है। इस तकनीक से दूसरी प्रजाति के जीन को आरोपित किया जा सकता है, जैसे कपास के पौधे में जहरीले कीड़े के जीन को जोड़ दिया गया।  इससे बीटी काटन बना। इस पौधे का जड़, तना, पŸो और फल सब जहरीले हो जाते हैं। वाल वर्म नाम का कीड़ा जब इस पौधे की पŸाी आदि को खाता है तो वह मर जाता है। अपने देश में लगभग 95 प्रतिशत कपास का उत्पादन इस प्रकार के जीन परिवर्तित बीटी काटन का हो रहा है। 
जीन परिवर्तित बीज को कामर्शियल स्तर पर बेचने के पहले इसका फील्ड ट्रायल किया जाता है। प्रयोगशाला में बनाये गए पौधे खेत में कितना सफल हैं, इसका आकलन किया जाता है। फील्ड ट्रायल में सही-सही पता लगता है कि मेजवान पौधे में दाता का कौन सा जीन आरोपित किया गया है। जैसे कपास के पौधे पर बीटी कीड़े का जीन जोड़ने से कपास का रंग काला हो सकता है, पौधा बौना हो सकता है तथा कीटनाशक क्षमता पैदा हो सकती है। मेजवान पौधे ने दाता के किस गुण को अंगीकार किया है यह फील्ड ट्रायल से पता लगता है। इस तरह के फील्ड ट्रायल के लिए पर्यावरण मन्त्रालय से मंजूरी लेनी जरूरी होती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि फील्ड ट्रायल में कई तरह का खतरा होता है। जैसे मान लीजिए सरसों के जीन परिवर्तित बीज का फील्ड ट्रायल किया गया। इस जीन परिवर्तित पौधे में कीटाणुओं को मारने की क्षमता है, लेकिन फील्ड ट्रायल में पाया गया कि सरसों का दाना भी जहरीला हो गया। ऐसे में इस प्रजाति को रोका जा सकता है, परन्तु ट्रायल की अवधि में यह जीन फैल सकता है। जहरीले फूल के पराग को मधुमक्खी आदि के द्वारा दूसरे खेत में उग रही सरसों के खेत में पहुँचा दिया जाता है।  ऐसे में जहरीलापन सम्पूर्ण क्षेत्र के सरसों के खेतों में फैल सकता है, जिससे सावधानी के अभाव में बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अमेरिका ने जीन परिवर्तित मक्के की खेती को हरी झण्डी दे दी थी। स्वीकृतियों के अनुसार केवल एक प्रतिशत खेती मे ही जीन परिवर्तित मक्के की खेती हो रही थी, लेकिन लगभग आधे क्षेत्र में उग रहे मक्के में जीन परिवर्तिन पाया गया। यानी एक प्रतिशत क्षेत्र से  50 प्रतिशत क्षेत्र में वह जीन स्वतः फैल गया था। इसी प्रकार इंग्लैण्ड की सरकार द्वारा सरसों के बीज में जीन परिवर्तन सम्बन्धी ट्रायल की स्वीकृति दी गई। इस दौरान पाया गया कि 200 गज से भी दूर उग रहे सामान्य पौधों मे भी जीन परिर्वतन का प्रसार हो गया था। साथ-साथ जीन परिवर्तन सरसों की कीटनाशक  क्षमता जंगली पौधों में भी फैल गई थी। इन पौधों में कीटनाशक दवाओं का प्रतिरोध करने की क्षमता बढ़ गई थी। फलस्वरूप इन्हें कीटनाशकों से मारना कठिन हो गया था। वैज्ञानिकों के अनुसार इससे ‘सुपर वीड’ के पैदा होने की सम्भावना है, जो कांग्रेस घास की तरह सर्वत्र फैल सकती है और जिसका उन्मूलन करना कठिन होगा। इससे खेतों के आसपास जंगली पौधों के बीज पैदा करने की क्षमता भी कम हो गई। ये जंगली बीज ही चिडि़यों, मधुमक्खियों तथा तितलियों का भोजन होते हैं। फलस्वरूप उस पूरी क्षेत्र में इन जीवों पर दुष्प्रभाव पड़ने और सम्पूर्ण क्षेत्र के पर्यावरण में बदलाव आने की सम्भावना बन रही है। इन कारणों से फील्ड ट्रायल पर रोक लगाना उचित है।
अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जीन परिवर्तित खाद्य पदार्थो पर सहमति नहीं है। फ्रांस ने इनके ट्रायल और उत्पादन पर रोक लगा रखी है, जबकि स्पेन में छूट है। पंजाब तथा महाराष्ट्र ने इनका स्वागत किया है, जबकि तमिलनाडु तथा केरल ने इनका विरोध किया। अनिश्चितता का यह वातावरण बताता है के इस विषय की पूरी जानकारी हमें नहीं है। पर्यावारणविद् वंदना शिवा बताती है कि वैश्विक स्तर पर जीन परिवर्तित फसलों के ट्रायल पर अभी चर्चा चल रही है और निर्णय आना बाकी है। अनिश्चितता के इस वातावरण में जल्दबाजी करके जीन परिवर्तित फसलों को स्वीकार करना गलत होगा। जीन परिवर्तित फसलों के पक्ष में मुख्य तर्क उत्पादन में वृद्धि का है। कहा जा रहा है कि विश्व में भुखमरी को समाप्त करने के लिए खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि जरूरी है। यह कार्य जीन परिवर्तित फसलों के माध्यम से किया जा सकता है। यह सही है कि जीन परिवर्तन से प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ सकता है, परन्तु इससे भुखमरी समाप्त होगी, इस बारे में मुझे संशय है। इसका कारण यह है कि बढ़े हुए उत्पादन का उपयोग खाद्यान्न के स्थान पर बायोडीजल उत्पादन हेतु किया जा सकता है। वर्तमान में अमेरिका में मक्के की आधी फसल का उपयोग बायोडीजल के लिए किया जा रहा है। सम्भव है कि जीन परिवर्तित गेंहूँ का उपयोग भी बायोडीजल के लिए किया जाए। ऐसे में भुखमरी ज्यों की त्यों बनी रहेगी। वास्तव में भुखमरी की समस्या उत्पादन से जुड़ा नहीं है। बल्कि यह वितरण व्यवस्था की समस्या है। उपलब्ध खाद्यान्नों का वितरण गरीबों को कर दिया जाए तो गरीबी रातों-रात गायब हो जाएगी।
जीन परिवर्तित फसलों के पक्ष में दूसरा तर्क वैश्विक प्रतिस्पर्धा का दिया जा रहा है। उदाहरण के लिए मान लीजिए आॅस्ट्रेलिया ने जीन परिवर्तित गेंहूँ को अपना लिया और वहाँ गेंहूँ के उत्पादन में वृद्धि हुई, परिणामस्वरूप गेंहूँ की आपूर्ति बढ़ी और बाजार में इसके दाम गिर गए। इससे आस्ट्रेलिया का जीन परिवर्तित गेंहूँ विश्व बाजार में सस्ता बिकने लगा और भारत में इसका आयात होने लगा। ऐसे में हमारे किसानों के लिए जरूरी हो जाएगा की वे जीन परिवर्तित गंेहूँ का उत्पादन करें अन्यथा उनका गेंहूँ मंहगा पड़ेगा और वे बाजार से बाहर हो जाएंगे। यह समस्या वास्तविक और गम्भीर है, लेकिन इसका दूसरा समाधान भी उपलब्ध है। हम आस्ट्रेलिया के जीन परिवर्तित गेंहूँपर अधिक आयात कर आरोपित करके उसे बाजार से बाहर कर सकते हंै। इस तरह अपने किसानों द्वारा उत्पादित अनाज पर निर्यात सब्सिडी देकर विश्व बाजार में अपना स्थान बना सकते हंै। अतः जीन परिवर्तित खाद्यान्नों को अपनाना जरूरी नहीं दिखता है। फिलहाल इनको अपनाए जाने के खतरों को देखते हुए इनसे बचा जाना ही उचित है। 
- लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।

उत्तराखण्ड की विशेषताएंँ

उत्तराखण्ड की विशेषताएंँ                                                  करणीय उपक्रम
1. देवभूमि                                                                  तीर्थाटन
2. आध्यात्मिक साधना स्थली                                  साधना केन्द्र
3. प्राकृतिक सौन्दर्य स्थली                                          पर्यटन
4. गंगा जैसी पवित्र नदियों की उद्गम स्थली                  दर्शन, अघ्ययन, आध्यात्मिक पर्यटन
5. पर्यावरण संरक्षण एवं सन्तुलन स्थल                         अघ्ययन एवं शोध यात्रायें
6. वनौषधीय वनस्पतियों का भण्डार                         अघ्ययन, संवर्धन, संग्रहण, प्रसारण
7. जहर मुक्त फल एवं खाद्यान्न भण्डार                 प्रशोधन, प्रसंस्करण, प्रसाद
8. घाटियोें, शिखरों, जल-प्रवाहों की विविधता                 विविधताओं के अनुरूप विकास
9. देव संस्कृति क्षेत्र                                                 देव संस्कृति दर्शनाटन
10. मानव संसाधन ऊर्जा                                                 शिक्षा केन्द्र, कौशल्य विकास, विशिष्टता ज्ञान
11. भारत का सीमा-प्रहरी                                                 प्रहरी प्रशिक्षण एवं अभ्यास केन्द्र 

उत्तराखण्ड के विकास में प्रकृति एवं विज्ञान की अनदेखी न करें - चेतन चैहान एवं प्रेम बडाकोटी

उत्तर-पश्चिमी हिमालय में बसे राज्यों मेंउत्तराखण्ड ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जहाँ वन-क्षेत्रों में कमी आई है। स्वतन्त्रता के बाद पिछले कालखण्ड को छोड़ भी दें तो केवल 2001 से 2013 तक राज्य में 500 वर्ग किलोमीटर वन काटे गए हैं। जबकि इसी दौरान हिमांचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की हरित पट्टी में फैलाव हुआ है। उŸाराखण्ड में हरित पट्टी का सर्वाधिक नुकसान उŸारकाशी और रूद्रप्रयाग जिले में हुआ है। ये वे क्षेत्र हैं, जो पिछले व इस वर्ष अचानक आए मानसून के कारण आने वाली बाढ़ के केन्द्र में थे।
इसके अतिरिक्त वनों की सघनता में भी कमी आई है, जो मानसूनी बरसातों की तेज वृष्टि को रोकने के लिए जरूरी होती है। एक रिपोर्ट के अनुसार उŸाराखण्ड के वनों में वृक्षों का घनत्व घटा तथा घने वनों की पट्टी भी कम हुई है।
नेचर कंजर्वेशन फाउन्डेशन के जीव विज्ञानी टी॰एस॰ शंकर रमन के अनुसार, ‘घने वन मानसूनी बारिश के पानी को सोखते हैं, जिससे नुकसान नहीं होता। वनों की सघनता कम होने से उसकीे पानी रोकने की क्षमता भी कम हो जाती है, जिससे मिट्टी का कटाव होता है।’
वनों के कटाव के साथ-साथ पिछले दशक से पारिस्थितिकी की दृष्टि से कमजोर राज्य के भीतरी क्षेत्रों में मानव निर्मित सड़कों का महाजाल फैला है। इन मार्गों के निर्माण में जियाॅलोजिकल वैज्ञानिक संवेदनशील व सक्रिय टैक्टाँनिक फाॅल्ट-लाइन्स को बचाने में अहमं भूमिका निभा सकते थे, लेकिन या तो वे इसमें शामिल नहीं थे अथवा उन्हें नजर अंदाज किया गया।
बेंगलूरू के जवाहर लाल नेहरू सेन्टरफाॅर  एडवांस साइन्टिफिक रिसर्च के प्रोफेसर के॰एस॰ वैद्य कहते हंै, ‘यह ध्यान देना बहुत जरूरी है कि सड़कें पानी के प्राकृतिक बहाव वाले रास्तों में रूकावट न बनें, जिस कारण बाढ़ अधिक विकराल रूप धारण कर लेती है। लेकिन चेतावनी के बावजूद अधिकतर सड़कें पुरानी फाॅल्ट लाइनों पर ही बनाई गईं। ’दशकों से प्रशासन द्वारा राज्य के जियोलाॅजिकल स्वरूप व जल मार्गों की  ‘आपराधिक अनदेखी’ के कारण ही बाढ़ से जान-माल का नुकसान हुआ है।’  जबकि नेशनल डिजास्टर मैनेजमेन्ट अथाॅरिटी ने राज्य के मार्ग निर्माण में भू-विज्ञानियों के मत को शामिल करने की बात कही थी।
इसी के साथ राज्य में बड़ी संख्या में चल रहे हाइडेल प्रोजेक्ट्स से जुड़े खतरों पर भी बहस चल रही है। गतवर्ष की त्रासदी के बाद राज्य में नदी जल के बहाव से जुड़ा एक अध्ययन भी सामने आया है। हालांकि इस शोध की उन सिफारिशों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, जिसमें राज्य में बेतरतीव विकास को रोकने पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही राज्य की इकोलाॅजी पर हाइड्रो परियोजनाओं के असर के अध्ययन के लिए पूर्व कैविनेट सेक्रेटरी बी॰के॰ चतुर्वेदी की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने जल के न्युनतम बहाव की सीमा 30 प्रतिशत (सर्दियों में 50 प्रतिशत) तय की थी।
दिल्ली स्थित साउथ ऐशियन नेटवर्क फाॅर रिसर्च, डेम्स एण्ड पीपल नामक एक सलाहकार समूह के हिमांशु ठक्कर के अनुसार, जून 2013 की त्रासदी को बेतरतीव हाइडेल प्रोजेक्ट्स को रोकने वाली बड़ी चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए था, पर ऐसा नहीं हुआ।
उŸाराखण्ड के विज्ञान सम्मत विकास के साथ ही हमें उसकी अनेक विशेषताओं का ध्यान रखते हुए भी विकास सम्बन्धी योजना बनानी चाहिए। कयोंकि यहांँ से वह भगीरथी प्रवाहित होती है, जो हमारे पूर्वजों के पुरूषार्थ एवं सतत् साधना का उद्घोष है और जो सम्पूर्ण भारत को ही नहीं तो सम्पूर्ण भारतीयता को एक सूत्र में बांधे रखने का वह अलौकिक तत्व है जो हम अपनी भावी पीढ़ी को किस रूप में सौपना चाहते हैं? इस सन्दर्भ में अनेकानेक यक्ष-प्रश्न हैं। इस हेतु आवश्यकता है कि, पहले हम समग्रता से इस क्षेत्र को जानें और फिर उसके अनुसार अपने अतीत को वर्तमान की कसौटी पर उतार कर भावी पीढ़ी को सौंपने की भगीरथ साधना को आगे बढ़ायें। इस निमिŸा उŸाराखण्ड की कुछ विशेषताओं को यहांँ पर दर्शाया गया है, अतः उन विशेषताओं के अनुरूप इस प्रदेश के विकास की रूपरेखा बनाई जाये, यह आज की आवश्यकता है।
इस क्षेत्र की प्रकृति और विज्ञान सम्मत जो विकास होगा, उससे यहाँ आर्थिक समृद्धि आयेगी, रोजगार सृजन होगा, पलायन रूकेगा, सीमा का क्षेत्र सशक्त प्रहरी बन कर खड़ा होगा और पर्यावरण संरक्षण के साथ ही केवल भारत ही नहीं तो सम्पूर्ण विश्व के आकर्षण का केन्द्र भी बनेगा।  क्योंकि, सही सोच से उŸाराखण्ड को अभिशाप बनने से बचाकर, वरदान बनाया जा सकता है? पर! यह स्मरण रखना चाहिए, ‘समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।’ ु
- सम्पर्क: 08126905971, 09415018456, 09044302426

सम्राट अशोक के महान विचार

मैं खाना खाता होऊँ, अन्तःपुर में होऊँ या शयनागार में, प्रतिवेदक लोग प्रजा का कार्य मुझे सर्वत्र सूचित करें। मैं सब समय प्रजा का ही कार्य करूँगा। जो कुछ आज्ञा मैं मौखिक दूँगा या अमात्यांें को अत्यधिक कार्य सौंपूँगा, उस सम्बन्ध में विवाद या एतराज मुझे सूचित किया जाये।
कितना ही उद्यम करूँ, कार्य में लगा रहूँ, मुझे संतोष नहीं होता। सब प्राणियों का हित करना ही मैने अपना कर्तव्य माना है और उसका मूल है उद्यम तथा कार्य तत्परता। लोगों के लिए कार्य करने के अतिरिक्त मेरा अपना कोई काम नहीं है।
जो कुछ प्रक्रम करता हँू, इसलिए करता हूँ, कि जीवों के ऋण से उऋण होऊँ। बिना उत्कृष्ट प्रक्रम के यह दुष्कर है। 

भारतीय अर्थव्यवस्था चुनौतियाँ तथा सम्भावनायं - .प्रो॰ अरविन्द मोहन

2014 का भारत एक ऐसी आर्थिक महाशक्ति है जिसकी विकास दर घट रही है। महंगाई नियन्त्रण के बाहर है। बेरोजगारों व गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या लगातार बढती जा रही है। देश का मूल आर्थिक ढाँचा लगातार कमजोर होता जा रहा है और यह सब नयी सरकार के लिये विषम चुुनौतियाँ पेश करता है। 2008 में आयी वैश्विक मंदी के समय सभी आंकलन हिन्दुस्तान को एक अत्यन्त प्रभावशाली अर्थव्यवस्था के रूप में देख रहे थे। जिसके मूल आर्थिक तत्व सुदृढ़ थे तथा उस समय ये माना गया कि वैश्विक मंदी से भारत दुनिया में सबसे कम प्रभावित होने वाले देशों मंे से एक होगा। लेकिन पिछले छह वर्षों के (2008 से 2014) दौरान हमने देश की अर्थव्यवस्था को दीमक लगने दिया और यही कारण है कि अर्थव्यवस्था के मूल तत्व अत्यन्त दुर्बल नजर आ रहे हैं।
1947 से 2014 के बीच भारत की विकास यात्रा अद्भुत रही। यह स्वंय में अभूतपूर्व सम्भावनायें समेटे है तथा इस विकास यात्रा में हमारी बहुत सी सफलतायंे और असफलतायें छिपी हुयी हैं जो भविष्य के नव निर्माण के लिए सफलताओं व असफलताओं के रूप में कई पाठ समेटे हैं। 2014 के आगे की यात्रा को एक सार्थक रूप देने के लिए 1947 से आज तक का आर्थिक विश्लेषण अत्यन्त सामायिक होगा।
आजादी के तुरन्त बाद 1950-51 में देश ने नियोजित विकास की ओर कदम बढाया। उसी समय स्पष्टतया देश के सामने तीन विशिष्ट कमियाँ थीं।     (1) पूँजी/निवेश का अभाव (2) उद्ययम्तिा का अभाव (3) तकनीकि तथा प्रबन्धन कुशलता का अभाव। इन कमियों के चलते विशेष रूप से निजी क्षेत्र की सीमित क्षमताओं के चलते सार्वजनिक क्षेत्र का आह्वान किया गया कि वो देश का सबसे बडा उद्यमी तथा तथा सबसे बड़ा निवेशक बन जाये। इसी भूमिका के चलते पब्लिक सेक्टर अर्थव्यवस्था में ’कमाडिंग हाइट’ का दर्जा दिया गया। लेकिन उसी समय ये स्पष्ट कर दिया गया कि जैसे-जैसे निजी क्षेत्र क्षमतायें विकसित करेगा, सार्वजनिक क्षेत्र धीरे-धीरे पीछे हटता जायेगा। इस प्रक्रिया के चलते देश मंे विकास की नींव पड़ने लगी। लेकिन अभी भी हमारी विकास दर 1970 के दशक तक अत्यन्त धीमी रही। यह हिन्दू विकास दर के रूप में जानी गई (3 से 3.5ः की विकास दर)। 1980 के दशक में भारत की विकास दर एकाएक तेज हो गयी और पूरे दशक में हमारी विकास दर लगभग 5ः रही। इस दौरान प्रति क्रमिक उत्पादन तथा कुल फैक्टर उत्पादकता तेजी से बढी। फैक्टर उत्पादकता जो 1960 से 1980 के दौरान मात्र 0.3ः प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही थी वो 1980 के दशक में लगभग 2ः प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी। स्पष्ट है कि 1980 के दशक में हमारी तेज विकास दर उत्पादकता में हुये सकारात्मक परिवर्तन की वजह से सम्भव हुयी। इसीलिए यह भविष्य में भी बरकरार रहने की सम्भावना संजोए है। भारत जो अभी तक अक्षमताओं के लिए जाना जाता था वो अब उत्पादकता और तेज विकास का प्रतीक बन गया।
इसके बावजूद भी 1991 आते-आते देश आजादी के बाद के सबसे बडे़ आर्थिक संकट से घिर गया।  महंगाई दो अंकों में पहुँच गयी। राजकोषीय घाटा लगभग 8ः पर था। व्यापार घाटा नियन्त्रण के बाहर था। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा का भण्डार मात्र 1.1 बिलियन डालर रह गया था जो छह हफ्तों तक भी अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को चलाने के लिये नाकाफी था। देश एक ऐसे आर्थिक संकट में था जिससे उबरने का रास्ता सूझ नही रहा था। लेकिन इस आर्थिक संकट के पीछे कई कारण थे। जिसमें हमारी नीतिगत गलतियाँ भी शामिल थीं। जहँा एक ओर 1980 के दशक में हमारी विकास दर बढ़ी, उसी के साथ-साथ राजकोषीय घाटा, व्यापार घाटा तथा अन्तर्राष्ट्रीय ऋण लगातार बढता गया। देश की नियन्त्रित मुद्रा व्यवस्था जहाँ हम रूपये की कीमत को 18 रूपये पर नियन्त्रित कर रहे थे, जबकि 1991 में  इसका बाजार भाव लगभग 31.50 रूपये होना चाहिए था। परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ॰डी॰आई॰) तथा पोर्टफोलियो निवेश लगातार गिरता गया तथा विदेशी ऋण बढ़ता गया। सरकारी खर्च की न्यूनतम उत्पादकता आदि ने इस समस्या को बढ़ा दिया। विदेशी सार्वजनिक ऋण जो 1980 में सकल उत्पाद का 9ः था, वो 1990 तक 31.2ः हो गया। रूपये के बाजार भाव में और नियन्त्रित भाव में अन्तराल के चलते एक बड़ा काला बाजार विकसित हो गया। जिसे हम हवाला बाजार के नाम से जानते हैं। 1991 आते-आते यह स्थिति हो चुकी थी कि अन्र्तराष्ट्रीय निवेशक 31.5 रूपये के डाॅलर को देश में 18 रूपये की कीमत पर निवेश करने को तैयार नही थे। और यही हाल हमारे निर्यातकांे का भी था। रिजर्व बैंक के विदेशी मुद्रा अर्जित करने के यही दो सबसे बडे़ साधन थे। इन दोनों ही साधनों से अब रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा आना लगभग बंद हो चुकी थी। 1991 आते-आते हमारे पास सिर्फ 1.1 बिलियन डालर बचे थे जो देश के अन्र्तराष्ट्रीय व्यापार को चलाने के लिए नाकाफी था। 80 के दशक में उत्पादकता बढ़ती गयी, इसने देश की विकास दर को गति दी। लेकिन देश के नीति निर्धारक अर्थव्यवस्था में पनप रही संरचनात्मक विसंगतियों को न तो भाँप सके और न ही उसको सुधारने के लिए प्रगतिशील परिवर्तन ला पाये। अन्र्तराष्ट्रीय व्यापार में लगातार अदृश्य खाता (सेवायें) सकारात्मक भूमिका निभाता रहा है और व्यापार घाटे में होने वाली हानि को पूरा करने में मदद करता रहा है। लेकिन 80 के दशक में यह उल्टा यू (न्) रूप धारण कर लेता है। 1980 से 1984 तक यह लगातार बढ़ता जाता है और 1985 से 1990 तक यह तेजी से घटता जाता है, तथा देश के भुगतान संतुलन के लिए एक नयी समस्या खड़ी कर देता है। बिलकुल इसी तरह नियन्त्रित मुद्रा बाजार के चलते सोने की तस्करी बढ़ जाती है और मुद्रा भण्डार न्यूनतम स्तर पर चला जाता है। बजट की प्रक्रिया में ऋण भुगतान (ब्याज दर) राजस्व व्यय का 43ः हो जाता है। रक्षा तथा सब्सिडी के बजट को जोड़ने के बाद सरकार का प्रयास उत्पादकता सृजित करने में लगभग अक्षम हो जाता है। साथ ही आय के अन्य स्रोतों के अभाव में राजकोषीय घाटा भी लगातार बढ़ता गया। जिसके चलते मुद्रा स्फीति भी नियन्त्रण के बाहर होती चली गयी। हम अपने लिए एक ऐसा दुश्चक्र बना रहे थे जिसमें देश और देश की अर्थव्यवस्था उलझते चले जा रहे थे। और यहीं से देश में 1991 के आर्थिक सुधारों की शुरूआत हुयी।
यहाँ यह समझना जरूरी होगा कि 1980 के प्रारम्भ से देश में उदारीकरण की शुरूआत कर दी थी। 80 के दशक का उदारीकरण प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित नही करता था। उसका सारा ध्यान कार्यरत उद्योगों को खुलापन देने पर था और इसके सकारात्मक परिणाम देश को दिखायी पडे़। लेकिन हमने अर्थव्यवस्था के मूल तंत्र को उद्वेलित करने जैसी कोई शुरूआत नहीं की। 1991 आते-आते हमें स्पष्ट हो चुका था कि बाजार तंत्र दो महत्वपूर्ण कार्य सम्पादित करता है। (1) वह उपभोक्ताओं और उत्पादकों के बीच सूचना का आदान-प्रदान करता है या एक सूचना तंत्र के रूप में कार्य करता है। (2) साथ ही यह संसाधनों के वितरण का कार्य सम्पादित करता है। इन दोनों ही कार्यों के सम्पादन में बाजार तंत्र (उंतामज उमबींदपेउध्चतपबम उमबींदपेउ) सबसे ज्यादा सक्षम व कुशल व्यवस्था है।
1991 में किये गये ज्यादातर परिवर्तन बाजार व्यवस्था को आजाद करने का प्रयास थे ताकि वह एक सुचारू संयन्त्र के रूप में जानकारी के आदान-प्रदान तथा संसाधनों के कुशल वितरण के माध्यम से आम नागरिकों की अधिकतम आवश्यकताओं को पूरा कर सके। 1990 में किये गये परिवर्तनों ने भारत को एक आपदाओं से घिरी अर्थव्यवस्था से निकालकर दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्था की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। 90 के दशक में किये गये सुधार प्रथम श्रेणी के सुधार थे। जहाँ हमारा ध्यान सिर्फ औद्योगिक क्षेत्रों के सुधारों पर था। आशा की गयी थी कि जल्द हम द्वितीय श्रेणी के सुधार जिसमें ग्रामीण विकास एवं मानव विकास (शिक्षा एवं स्वास्थ्य) भी शामिल था, को पूर्ण रूप से लागू कर दंेगे।
यह विडम्बना ही है कि 2014 तक हम द्वितीय श्रेणी के सुधारों को सही मायने में शुरू भी नही कर पाए। साथ ही प्रथम श्रंेणी के वे तमाम सुधार जिसने देश की अर्थव्यवस्था को खुलापन दिया और दिशा दी। लगभग वह सभी सुधार 2013 आते-आते नकारे जा चुके थे। देश को हमने पुनः नियन्त्रण और अकुशलता की अर्थव्यवस्था की ओर ढ़केल दिया है। सन् 2001 से 2010 के बीच भारत की विकास दर लगभग 7.2ः रही। जिसमें सेवा क्षेत्र की विकास दर 9ः, औद्योगिक क्षेत्र की विकास दर लगभग 7.5ः और कृषि क्षेत्र की विकास दर मात्र 2.8ः दिखायी देती है। इस दौरान मध्यम वर्ग की संख्या कई गुना बढ़ती है और उसकी औसत आय भी बाकी वर्गों की तुलना में काफी बढ़ोत्तरी अर्जित करती है। यह असंतुलित विकास प्रक्रिया नई संरचनात्मक समस्या सृजित करती है। बढ़ती आय तथा मध्यम वर्ग की बढ़ती क्रय क्षमता के चलते यह स्पष्ट था कि सभी क्षेत्रों के उत्पादों के लिए माँग बढ़ेगी। कृषि उत्पादों की माँग भी इसका अपवाद नही है। जैसे-जैसे कृषि उत्पादों की माँग बढ़ी, उसके सापेक्ष पूर्ति के न बढ़ने से माँग व पूर्ति में अन्तराल पैदा हो गया, साथ ही इस दौरान सबसे ज्यादा माँग तिलहन, दलहन, सब्जियाँ व फलों की बढ़ी। यह वो चीजें हैं जिनका उत्पादन देश में बिलकुल भी नही बढ़ा। इन अभावों के चलते इन वस्तुओं की कीमतें बढ़ने लगीं। इनकी कीमतों को नियन्त्रित करने का देश के पास कोई साधन उपलब्ध नही था। पिछली शताब्दी के आखिरी तीन दशकों में कृषि वस्तुओं की कीमतों का नियन्त्रण आमतौर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से किया गया। 2001 से हम इन कीमतों पर नियन्त्रण नही कर पाये और इसका एक बड़ा कारण यह है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में जिन वस्तुओं को शामिल किया गया है, उनमें तिलहन, दलहन, सब्जियाँ और फल शामिल नही हंै। बावजूद इसके कि 2008 के बाद से महंगाई का एक बड़ा कारण कृषि पदार्थों की महंगाई है। हमने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार कर इन वस्तुओं के भण्डारण की कोई व्यवस्था नही की है। प्रतिवर्ष लगभग एक ट्रिªलियन रूपये के बराबर के कृषि पदार्थ सड़ जाते हैं, क्योंकि हमारे पास भण्डारण की व्यवस्था नही है। लॅाजिसटिक्स तथा कोल्ड चेन व्यवस्था विकसित नही है। 2007 की भारत सरकार की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि इन सब चीजों के लिए लगभग 75 हजार करोड़ रूपये की आवश्यकता है। भारत में 2014 का केन्द्र सरकार का व्यय लगभग 18 लाख करोड़ रूपये है। अगर राज्य सरकारों का व्यय भी जोड़ लिया जाये तो लगभग 35 से 40 लाख करोड़ रूपये सिर्फ सरकारें एक साल में व्यय करती हैं। यह आश्चर्यजनक सच है कि 1991 से 2014 तक हम कृषि क्षेत्र के लिए 75 हजार करोड़ रूपये संजो नही पाये। अगर यह व्यवस्था उपलब्ध करा दी जाये तो सालाना एक ट्रिलियन रूपये का कृषि पदार्थों का नुकसान बच जायेगा। यह तुरन्त हिन्दुस्तान की विकास दर को बढ़ा देगा। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान सबसे गरीब किसानों का होता है। अगर हम इस नुकसान को रोक पाते हैं तो यह देश का सबसे सहज व सबसे प्रभावी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम होगा तथा सबसे प्रभावशाली विकास कार्यक्रम होगा। साथ ही मुद्रा स्फीति को नियन्त्रित करने के लिए इसके अलावा और कोई रास्ता नही है। 2008 से लगातार कृषि क्षेत्र की महंगाई को रिजर्व बैंक के माध्यम से नियन्त्रित करने की कोशिश की जा रही है। रिजर्व बंैक के पास सिर्फ मैकरो (वृहत्) इकनाॅमिक्स संयन्त्र उपलब्ध है, जो इस तरह के क्षेत्रीय मुद्रा स्फीति को नियन्त्रित करने में पूर्णतया अक्षम हैं। यही कारण है कि हम 2008 के बाद से हिन्दुस्तान में महंगाई को नियन्त्रित नही कर पाये हैं। अगर हम इस व्यवस्था को सुदृढ नही कर पाते हैं तो आने वाले 20 वर्षों में भी इस महंगाई को नियन्त्रित नही कर पायेगें।
लगातार देश की नीतिगत विफलताओं का ठीकरा हमने वैश्विक मंदी पर फोड़ा है। जबकि हकीकत यह है कि भारत जैसी अर्थव्यवस्था में हमारी घरेलू अर्थव्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण है और वर्ष 2008 तक हमारी अर्थव्यवस्था का मूल आधार बहुत मजबूत था जिसको 2014 आते-आते हमने अत्यन्त दुर्बल बना दिया और इसमें हमारी नीतिगत विफलता का महत्वपूर्ण योगदान है। देश में आर्थिक सम्भावनाओं का अंाकलन इसी बात से किया जा सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब कुछ वर्षों पूर्व हिन्दुस्तान आये तो वहाँ से चलते वक्त जब उनकी मीडिया ने उनसे पूछा कि वह भारत क्यों जा रहे हैं तो उनका जवाब था कि मैं मार्केट एक्सेस माँगने जा रहा हूँ। भारत का बाजार चीन के साथ दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। 2008-09 की वैश्विक मंदी से निपटने के लिये अमेरिका ने 2 ट्रिलियन डालर का पैकेज अपनी निजी क्षेत्र को दिया। इसी तरह यूरोपीय देशों ने मिलकर के अपनी अर्थव्यवस्था में 2 ट्रिलियन डालर कर पैकेज दिया। क्योंकि ये पैकेज निजी क्षेत्र की विफलता के कारण दिया जा रहा था। इसके लिए संसाधन जुटाने हेतु अतिरिक्त कर लगाना सम्भव नही था। परिणामस्वरूप इन देशों का राजकोषीय घाटा लगातार बढता चला गया। आज इंग्लैण्ड जैसे कई पश्चिमी देशों का राजकोषीय घाटा 13ः तक पहुँच गया है। निजी क्षेत्र अभी भी वैश्विक मंदी की गिरफ्त में हैं। वहीं अब सरकारों के लिए बजट से समर्थन दे पाना असम्भव होता जा रहा है। इंग्लैण्ड ने दो वर्षों पूर्व ही यह घोषित कर दिया कि वह आने वाले चार वर्षों में श्बेलआउट पैकेज में से 136 बिलियन डालर वापस ले लेगा। परिणाम स्वरूप तमाम सोशल सेक्टर व स्कॅालरशिप इत्यादि प्रभावित हुए। पहली बार लंदन की सड़कों पर दंगों (तपवज) जैसी स्थिति दिखायी पड़ी। आज की हकीकत यही है कि अमेरिका व इंग्लैण्ड जैसे पश्चिमी देशों को इस संकट से उबरना है तो सबसे सहज रास्ता भारत व चीन के बाजारों से होकर गुजरता है और ओबामा इसी ओर संकेत दे रहे हैं।
हमारा बाजार द्वितीय श्रेणी के सुधारों पर निर्भर करता है। 2008 के बाद से हिन्दुस्तान की औद्योगिक विकास दर लगातार घटती चली गयी है और अब हमारी विकास दर (जीडीपी) घटकर 5ः से भी कम हो गयी है। हमें सबसे पहले अपनी अर्थव्यवस्था के लिये द्वितीय श्रेणी के सुधार लाने होंगे। जिसके दो स्तम्भ होंगे। पहला स्तम्भ ग्रामीण विकास, जिसमें कृषि और छोटे उद्योग शामिल हैं। दूसरा स्तम्भ मानव विकास है, जिसमें स्वास्थ्य एवं शिक्षा शामिल है। भारत तीन इंजन का जहाज है। 1991 में हमने पहला इंजन खोला। जिसके परिणामस्वरूप एक आपदा ग्रसित अर्थव्यवस्था दुनियाँ की अग्रणी अर्थव्यवस्था में शामिल हो गयी। लेकिन एक इंजन से चलने वाला यह जहाज 2008 तक आते-आते लड़खड़ाने लगा। समय आ गया है कि हम इस जहाज के बाकी दो इंजन, ग्रामीण विकास और मानव विकास भी खोल दें। ऐसा करने से ग्रामीण क्षेत्र की क्रय शक्ति बढ़ेगी, जो देश की विकास दर में सकारात्मक योगदान देगी। साथ ही उद्योग जगत के लिए भी बाजार सृजित होगा। जहाँ वैश्विक बाजार घटता चला जा रहा है। हमारे ग्रामीण बाजार हमारी अपनी अर्थव्यवस्था को नयी दिशा दे पायेगें। हकीकत यह है कि अगर सारी पश्चिमी अर्थव्यवस्थायें डूब भी जाये तब भी यह दो इंजन खोलकर हम देश में दो अंकीय विकास सुनिश्चित कर सकते हैं। समय आ गया है कि देश द्वितीय श्रेणी के सुधारों को बहुत तेजी से आगे ले जाये। यह सुधार पहली श्रेणी से भिन्न है। यह सुधारों का मुश्किल हिस्सा हैं जहाँ प्रदेशों की भागीदारी महत्वपूर्ण है, साथ ही इसमें संस्थागत परिवर्तन तथा हैण्ड्स होलडिंग की आवश्यकता होगी। यह सुधार भारत की अर्थवस्था को रास्ते पर लाने के लिए जरूरी हंै और यही सुधार दुनिया को वैश्विक मंदी से उबारने के लिए भी जरूरी हैं। जरूरी होगा कि हम अपना बाजार सबसे पहले अपने लिये खोल दें और फिर उसके बाद ही बाकी विश्व के लिये खोलें। देश के विकास का रास्ता बिलकुल साफ है। 1991 के अधूरे सुधारों को हमें पूर्णता की ओर ले जाना होगा। ग्रामीण विकास तथा मानव विकास के क्षेत्रों में उदारीकरण लाना होगा। भूमि अर्जन सम्बन्धी कानून तथा श्रम कानूनों में सुधार लाने होेंगे। देश में नई सरकार के आने के बाद पॅालिसी पैरालिसिस के बादलों को कुछ हद तक छँटते देखा है। अब समय आ गया है कि हम द्वितीय श्रेणी के सुधारों की एक नई दास्ता लिखें। यही देश के विकास को गति देगा, मुद्रा स्फीति को नियन्त्रित करेगा और रोजगार सृजन सम्भव करेगा। 
- अर्थशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ।

धरती माता से निवेदन - .रमेश शमा

हे सत् करने वाली धरती माता
भरपूर अन्न उत्पन्न करना।
ससुराल गई बहन-बुआ के भाग्य का देना।
पक्षियों को भी प्रेम से देना।
राहगीर भाई-बंधुओं के लिए देना।
घर आया साधु भूखा न रहे,
आवारा पशु भी पूरा खा सके।
चोर-चकोर भी अपने लिए ले जा सके।
ना हो खेती जिसके पास,
उसके लिए भी देना।
राजा का खजाना भी भर देना।
हे सबकी माता! सुनो,
छत्तीस कौमों की जरूरत पूरी करो।
उसके बाद तुम्हारे भंडार में कुछ बचे
तो मेरे बच्चों के लिए भी देना।
हे धरती माता! तुम ही सबको सत् देने वाली हो।

अंग्रेजी पर अधूरी बहस - डा॰ विजय अग्रवाल

अंगे्रजी अखबारों नें सीसैट के मुद्दे पर चले आन्दोलन को ‘अंगे्रजी विरोधी’ माना, जो कि बिल्कुल गलत था। यदि ऐसा होता तो विद्यार्थी मुख्य परीक्षा में शामिल अंगे्रजी अनिवार्य प्रश्नपत्र का भी विरोध करते। पहले इसके भी अंक मेरिट में जुड़ते थे, जिसे विरोध के कारण बाद में क्वालीफाईंग कर दिया गया। दिल्ली उच्च न्यायालय 31 मई, 2013 का इस बारे में दिया गया निर्णय मूलतः तत्कालीन सरकार और यूपीएससी को खुले रूप में शक के घेरे में खड़ा करता है। अब, जबकि इस मामले पर विचार करने के लिए सर्वदलीय बैठक की जायेगी, बेहतर होगा कि सभी दलों के प्रतिनिधि भारतीय न्यायालय के इस निर्णय पर भी विचार करें। साथ ही इस बात पर भी कि मुख्य परीक्षा में शामिल ‘अंगे्रजी  अनिवार्य’ का पेपर जरूरी क्यों है?
सवा सौ करोड़ की आबादी, जिसकी साठ प्रतिशत आबादी गाँवों में रहती हो, जिसके 45 प्रतिशत लोग अशिक्षित हों, उस देश में तीन प्रतिशत लोगों के द्वारा जानी  जाने वाली अंगे्रजी भाषा की प्रशासकीय अनिवार्यता के मिथक की यथार्थवादी जाँच-परख होनी चाहिए और इस बात की भी कि जापान, चीन और फ्रान्स जैसे अंगे्रजी न जानने वाले विश्व के शक्ति सम्पन्न देश दुनियाँ के साथ कैसे जुड़े हुए हैं।
भाषा जैसे प्रश्न का सम्बन्ध केवल सिविल सेवा परीक्षा से ही नहीं है, बल्कि भारत जैसे देश की ‘सम्प्रभुता सम्पन्नता’ से भी है। ‘अनिवार्यता’ एक बात है और ‘आवश्यकता’ एक अलग बात। अंग्रेजी के सम्बन्ध में इन दोनों को मिलाकर नहीं देखा जाना चाहिए। साथ ही यह भी कि सिविल सेवा परीक्षा ‘अच्छे प्रशासकों’ का चयन करना नही है, बल्कि उन सम्भावनाओं की ‘तलाश’ करना है, जिन्हें अच्छा प्रशासक बनाया जा सकता है। इसके लिए अच्छे प्रशिक्षण की व्यवस्था है ही और यदि अंग्रेजी आवश्यक ही है तो इसे टेªनिंग के दौरान उन्हें उसी तरह अंग्रेजी सिखाई जा सकती है, जैसे औरंगाबाद के लड़के को तमिलनाडु कैडर मिलने पर तमिल सिखाई जाती है। साथ ही इस बात की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि सिविल सेवा परीक्षा से केवल भावी आईएएस और आईएफएस की ही भर्ती नहीं की जाती। अन्य लगभग बीस सेवाओं के लिए भी भर्ती होती है, जिनका न तो दिल्ली जैसे शहर से बहुत वास्ता होता है और न ही लंदन और न्युयार्क से। सच यह है कि इस पूरे मुद्दे को उसकी सम्पूर्णता और व्यावहारिकता में नए नजरिये से देखने की जरूरत है, अब तक बने बनाये ढर्रे से हट कर बिल्कुल आज के सन्दर्भ में। ऐसा अभी भी सरकार कर सकती है, क्योंकि 25 सालों के बाद ‘मजबूर’ नहीं ‘मजबूत’ सरकार मिली है। 
- लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं।

सामाजिक दायित्व से भटक, व्यवसाय का रूप लेती शिक्षा. डाॅ॰ अंशु केडिया

सार्वभौम निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की माँग आजादी आन्दोलन के समय से उठी थी। ‘शिक्षा सबके लिए’ की माँग वैज्ञानिक, धर्म निरपेक्ष, जनवादी शिक्षा की परिकल्पना का अभिन्न हिस्सा थी। संविधान निर्माण के समय भी यह माँग उठी थी, परन्तु शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार की श्रेणी में न रख नीति निदेशक तत्व में शामिल करने पर ही सहमति बन पायी।
देश का संविधान समाजवाद, कल्याणकारी सभी के लिए समान अवसर जैसे सुन्दर शब्दों से युक्त है। आजादी के बाद देश के विकास के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनायी गयी। यह आर्थिक व्यवस्था निजी क्षेत्र व सार्वजनिक क्षेत्र दोनो के सहयोग पर आधारित थी। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्र सरकार की जिम्मेदारी थे। प्रारम्भ में सरकारों ने इसे अपना दायित्व समझा परन्तु धीरे-धीरे केन्द्र व राज्य सरकारें दोनों ही इस दायित्व से पीछे हटने लगीं। ज्ञातव्य है किसी भी देश के स्वस्थ विकास में शिक्षा का महत्पूर्ण योगदान है। अतः सरकारों से अपेक्षा की गयी कि इस क्षेत्र को नजर अंदाज न कर, पर्याप्त धन आवंटन किया जाए। शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति (1968) ने सुझाव दिया था कि कुल बजट का 6 प्रतिशत शिक्षा पर आवंटित किया जाना चाहिए। इस सुझाव के 46 वर्ष बाद भी सरकारें 3 से 4 प्रतिशत के बीच ही धनराशी शिक्षा पर आवंटित कर रही हैं। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग व यशपाल कमेटी सभी ने नामांकन दर बढ़ाने की बात की है। अब जब जरूरत है कि अधिक लोगों के नामांकन के लिए अधिक बजट दिया जाए, सरकारों का जिम्मेदारी से हाथ खींचते जाना कहीं से शुभ संकेत नही है।
वर्तमान में हमने ळ।ज्ै (सेवा के क्षेत्र मेें व्यापार समझौता) से अपने आप को जोड़ लिया है। इस समझौते के अनुसार शिक्षा भी व्यापार की वस्तु बन गयी है और अब कोई भी व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में व्यापार हेतु निवेश कर लाभ कमा सकता है। चाहे हम प्राइमरी शिक्षा देखें या उच्च शिक्षा सभी लाभ कमाने के धन्धे दिखाई देने लगे हंै। प्राइमरी स्कूल के लिए तो सरकार ने त्ज्म् (09) पारित किया परन्तु प्राइवेट स्कूलों पर किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं लगाया, ना ही सरकारें इन प्राइवेट प्राइमरी स्कूलोें पर सफलतापूर्वक दबाव ही डाल पायीं कि क्यों 25 प्रतिशत सीटें गरीब छात्र-छात्राओं से नहीं भरी गयीं। डोनेशन व कैपिटेशन फीस के नाम पर मनमानी फीस बढ़ाने की छूट ले इस धन्धे को खूब फलने-फूलने का मौका दिया। बजट की कमी व जवाबदेही की कमी के चलते सरकारी स्कूलों की दुर्दशा ने अभिभावकों को मजबूरन अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजना पड़ता है। इन प्राइवेट स्कूलों की मनमानी मागों की पूर्ती हेतु आधी तनख्वाह तक भेंट कर देनी पड़ती है।
अब शिक्षा अपनी मूल अवधारणा चरित्र, ज्ञान, जिज्ञासा, सच्चाई, व्यक्तित्व निर्माण प्रक्रिया को बहुत पीछे छोड़कर पूँजी निर्माण की व्यवस्था बन गयी है।
भारत एक गरीब देश है। गरीब देश में शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरत को बाजार के हाथों में छोड़ देना निःसंदेह देश की जड़ को खोखला करना है। समय की माँग है कि शिक्षा पर हो रहे निजीकरण के लगातार प्रहार का एकजुट होकर विरोध किया जाए अन्यथा पैसे के प्रवाह में शिक्षा का बचाखुचा उद्देश्य भी खत्म होते देर नहीं लगेगी। ु
- महामंत्री, लुआक्टा
लखनऊ वि॰वि, सम्बद्ध महाविद्यालय शिक्षक संघ

हमारे राष्ट्रीय प्रतीक

राजचिन्ह - भारत का राजचिन्ह सारनाथ स्थित अशोक के सिंह स्तम्भ की अनुक्रति है, जो सारनाथ के संग्रहालय में सुरक्षित है। भारत सरकार ने यह चिन्ह 26 जनवरी, 1950 को अपनाया। इसमें वस्तुतः चार सिंह हैं, लेकिन दिखते केवल तीन हैं।
राष्ट्रीय गीत - बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा संस्कृत में रचा गया वंदे मातरम देश का राष्ट्रीय गीत है। इसे पहली बार 1886 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सत्र में गाया गया था। 
राष्ट्रीय गान - रवीन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा लिखित गीत ‘जनगणमन’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया है।
राष्ट्रीय पक्षी - भारतीय मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है। इस प्रजाति का नर अधिक रंगीन होता है, जिसका सीना और गर्दन चमकीला नीला होता है। मादा भूरे रंग की होती है। उसमें पंखों का गुच्छा नहीं होता।
राष्ट्रीय पुष्प - कमल भारत का राष्ट्रीय पुष्प है।
राष्ट्रीय वृक्ष - भारतीय बरगद का पेड़ देश का राष्ट्रीय वृक्ष है।
राष्ट्रीय नदी - गंगा भारत की राष्ट्रीय नदी है, यह भारत की सबसे लंबी नदी है जो पर्वतों, घाटियों  और मैदानों में 2,510 किलोमीटर की दूरी तय करती है। 
राष्ट्रीय जलीय जीव - डाल्फिन है। पर्यावरण और जल मन्त्रालय ने राष्ट्रीय जल जीव के रूप में 18 मई 2010 को गंगा नदी की डाल्फिन को अधिसूचित किया। 

आजाद भारत में सिसकता बचपन.- डाॅ॰ माधुरी यादव

हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी का दिन हमारी आजादी और हमारे गणतांत्रिक व्यवस्था के गौरवपूर्ण इतिहास को याद दिलाने ही नहीं आता, बल्कि अपने देश के सिंहावलोकन का भी जरिया बनता है। इस मौके पर जब भी हम पीछे मुड़कर आजाद भारत के इतिहास को देखते है तो हमें अभाव से शुरू हुई यात्रा का विकास पथ जहाँ दिखता है वहाँ अपनी असफलताएँ भी नजर आती हैं, लेकिन हमें पता है कि भौतिकता की राह पर आजादी के 67 सालों में भारतीय गणराज्य ने कितनी गहन और बड़ी यात्रा पूरी की है।
आज भी मस्तिष्क में यह विचार उठने लगता है कि भला वास्तव में हम कितने स्वाधीन हैं? एक स्वाधीन राष्ट्र की तरह भारत में जनता द्वारा चुनी गई सरकार है जो कि लोकतांत्रिक ढंग से काम करती है, साथ ही स्वतंत्र न्यायपालिका है जो कि सरकार तक के फैसलों-नीतियों का परीक्षण करने और रद्द करने का अधिकार रखती है। भारत में सशक्त और स्वतंत्र मीडिया है जो सभी विषयों पर अपनी राय और समाचार देता रहता है। इस तरह सैद्धान्तिक रूप से भारत स्वाधीन है और स्वाधीन राष्ट्र के समस्त लक्षण इसमें परिलक्षित होते हैं, लेकिन व्यवहारिक परिप्रेक्ष्य में विचार करें तो स्थिति थोड़ी भिन्न दिखाई देती है। यूँ तो तमाम नागरिक जीवन-यापन के अवसरों से वंचित है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा की बुनियादी सुविधाएँ भारत के बहुत सारे नागरिकों को प्राप्त नहीं है। हमारा संविधान चैदह साल तक के बच्चों की अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा की बात करता है, लेकिन वास्तविकता भयावह है। बालश्रम के आँकड़े डरावने हैं।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने एक बार कहा था कि ‘‘मैं देश के हर बच्चे की आँख में आने वाले हिन्दुस्तान की तस्वीर देखता हूँ।’’ पण्डित नेहरू की यह पंक्तियाँ आज भी उतना ही महत्व रखती है, जितना उस समय रखती थीं। पर क्या हम सोंच पाते हंै उन बच्चों के बारे में जो बाल्यकाल में भी अपना बचपन जी नहीं पाते और जिनके कंधे पर लाद दी जाती है दो जून की रोटी की जुगाड़ करने की जिम्मेदारी। ऐसे बाल मजदूरों की संख्या सात करोड़ के आस-पास बताई जाती है। आज हमारे चारो ओर बाल मजदूरों की फौज खड़ी है, क्या सचमुच यह हमारे देश के लिए राष्ट्रीय और सामाजिक कलंक नहीं है।
बाल मजदूरों के कई रूप हमें होटलों-ढाबों में प्लेटें मांजते या गैराजों में नट-बोल्ट कसते दिखते हैं। इसके अलावा घरों में घरेलू नौकरों के रूप में भी छोटे-छोटे काम करते दिखाई देते हैं। बाल मजदूरों का एक वर्ग हमें कष्ट साध्य और जोखिम भरे कामों में भी संलग्न दिखाई देता है, कुछ बच्चे जरी या काशीदाकारी करते, बीड़ी, माचिस या पटाखा फैक्ट्रियों, खानों-खदानों, ईंट-भट्ठा या पत्थर तोड़ने जैसे कठिन और खतरनाक कार्य करते दिखाई देते हैं।
बाल मजदूरों का एक वर्ग ऐसा भी है जो भुगतान रहित होता है, दरअसल इस वर्ग के बच्चे बचपन से ही किताब-कापी छोड़कर पारिवारिक और परम्परागत कामों में शामिल होकर बड़ों का साथ देते हैं यथा - पशुपालन, मछलीपालन, सब्जी बेचने में करोड़ों बच्चे संलग्न हंै। इसके अतिरिक्त अनेक बच्चे कचरा, प्लास्टिक, पेपर आदि चुनते हैं और उन्हें बेचकर पैसा कमाते हंै। स्टेशनों पर अखबार या खाने-पीने की सामग्री बेचने वाले, कार पोंछने वाले, जूते पाॅलिश करने वाले बच्चे ऐसे ही वर्ग में आते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि बाल श्रमिक सामाज के बेहद गरीब और अभावग्रस्त तबके से आते हंै। बालश्रम और गरीबी में चोली-दामन का साथ होता है।
बालश्रम न सिर्फ बच्चों के लिए अभिशाप के समान है, बल्कि यह समाज और देश के माथे पर कलंक है, सो इसके लिए हम आप सबको अपने प्रकार से सामाजिक कदम उठाने चाहिए। जरूरत इस बात की है कि गरीबी उन्मूलन पर ध्यान दिया जाए, रोजगारपरक शिक्षा उपलब्ध कराई जाए और अभिभावकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाया जाए। बालश्रम उन्मूलन अकेले सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, वास्तव में इस दिशा में परिवर्तन के लिए हमें व्यापक नीतियाँ और कार्यक्रम तैयार करने होंगे और नीतियों का क्रियान्वयन ठीक ढंग से किया जाना चाहिए।
फिलहाल बच्चों पर मंडराते संकट के ये बादल कब छटेंगे, कहा नही जा सकता है, पर एक बात तो तय है कि बगैर बच्चों के दुःखद हालात को सुधारे, राष्ट्र को प्रगति के पथ पर तेजी से अग्रसर नहीं किया जा सकता है। आजादी के 67 साल पूरे होने के अवसर पर पूरे भारत को बच्चों की दयनीय स्थिति में सुधार का संकल्प लेने की जरूरत है। जन-जन की सामाजिक भागीदारी के बिना यह लक्ष्य नहीं पाया जा सकता, पर सरकार की इसमें अहम् भूमिका है। समय रहते बच्चों की वर्तमान स्थिति को बदलना ही होगा, क्योंकि बच्चों के उज्ज्वल भविष्य से ही देश का भविष्य उज्ज्वल होगा। 
- वरिष्ठ प्रवक्ता, हिन्दी विभाग,
ए॰पी॰ सेन मेमोरियल गल्र्स कालेज, चारबाग, लखनऊ।