Tuesday, November 18, 2014

आदर्श गाँव की पहल.संकलन - भास्कर अस्थाना

जहांँ समाज जाग्रत होता है, वहाँ कोई भी किया गया काम स्थायी व प्रभावी होता है। अपने गाँव को सक्षम बनाने और वर्तमान चुनौतियों के अनुरूप उसे विकसित करने की दिशा में गाँव के जागरूक नागरिकों ने भी पहल की है, जिसमें से गुजरात के ‘पुंसरी’ और उत्तर प्रदेश में बरेली जिले के ‘ग्रेम’ गाँव का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है।
1. पुंसरी गाँव - गुजरात की राजधानी ‘गाँधी नगर’ से 35 किमी॰ दूर सावरकांठा जिले में स्थित पुंसरी गाँव के युवा सरपंच हिमांशु पटेल की कुछ करने की जिद ने आज गाँव की सूरत व सीरत दोनो बदल दी है। केन्द्र व राज्य सरकार की योजनाओं से हर ग्राम पंचायत को तीन से पाँच करोड़ रूपये मिलते हैं, लेकिन कुछ गाँव ही उस पैसे का उपयोग कर पाते हैं। सरपंच हिमांशु भाई ने पद संभालते ही सबसे पहले सेनीटेशन सुविधा पर जोर दिया तथा सुरक्षा व मानीटरिंग के लिए सी॰सी॰ टीवी लगाये। बिजली की तकनीकी खराबी व उसकी तत्काल मरम्मत की सुविधा के लिए खम्भों पर नम्बर डाल दिये, गाँव के 1200 घरों में से 250 घरों को इको फ्रैन्डली बिजली की उपलब्धता के लिए बायो इलेक्ट्रिीसिटी प्लांट पर काम प्रारम्भ किया। 6 हजार आबादी वाले गाँव में कम लागत में प्रकाश उपलब्धता हेतु 22 लाख रू॰ खर्च करके 450 एलईडी लाइट का प्रावधान किया, जिससे बिजली के बिल में 50 प्रतिशत तक की कमी की उम्मीद है। गाँव में सी॰सी॰ रोड है, स्वच्छता व्यवस्था उत्तम है, गाँव का अपना आर॰ओ॰ वाटर प्लांट है जिससे गाँववासियों को 4 रू॰ में 20 लीटर मिनरल वाटर की उपलब्धता होती है। बच्चों को स्कूल भेजने व दूध बेचने वाले पशुपालकों के लिए गाँव की अपनी बस सेवा तथा आधुनिकता में शहरों को भी पीछे छोड़ते हुए वाईफाई व कम्युनिटी रेडियों की उपलब्धता की ओर कदम बढ़ाता पंुसरी गाँव आज देश के सात लाख गावों के लिए एक पे्ररक ‘दीप’ बन गया है।
पंुसरी गाँव पंचायत के पास पाँच साल पहले 30 लाख 40 हजार रूपये जमा पूँजी थी, अब उसके खाते में 45 लाख रूपये हैं, जो प्रारम्भ किए गये कार्यों को गति देने में सहायक हांेगे।
2. ग्रेम गाँव - उŸार प्रदेश में बरेली जिले के नवाबगंज क्षेत्र में गाँव के विकास की कहानी भी एक संकल्प की कहानी है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, संकल्प के धनी मास्टर लालता प्रसाद जब उच्च प्राथमिक विद्यालय से रिटायर हुए तोे गाँव वालों ने तय कर लिया कि अगले प्रधान वही होंगे। मास्टर साहब ने सशर्त स्वीकृति दी कि वह चुनाव प्रचार पर एक पैसा खर्च नहीं करेंगे, वोट माँगने किसी के घर नहीं जायेंगे तथा जीतने के लिए कोई वायदा नहीं करेंगे। मास्टर साहब ने विचारों के अनुरूप चुनाव लड़ने की स्वीकृति देकर प्रजातन्त्र की नींव मजबूत की। नतीजा आया तो वह प्रधान बन गए। जीत के बाद सबसे पहले बालिका शिक्षा उत्थान के लिए 7.49 लाख रू॰ सरकारी सहयोग और डेढ़ लाख अपने पास से लगाकर उच्च प्राथमिक विद्यालय बनवाया, जो तमाम स्कूलों के लिए रोल माॅडल है। इसके साथ ही गाँव के अन्दर व बाहर पक्की सड़कों का उपयोगी जाल है। खेतों तक जाने वाले पक्के चकरोड, पक्की सड़कें, गंदे पानी निकास को नालियाँ व बहगुल नदी तक नाले की 2 कि॰मी॰ सफाई, साफ पानी को हैण्डपम्प, चैराहे के मोड़ों पर ढ़की हुई नालियाँ, मरकरी लाइट, कब्रिस्तान और शमशान के पास से गंदगी की सफाई, जल संचय को तालाब, शौच को शौचालय, हरियाली हेतु मुख्य मार्ग से विद्यालय और तालाबों के किनारे पेड़ लगवाये तथा खुले में शौच न जाने और सड़कों पर कूड़ा न फेंकने के ग्रामीणों में संस्कार भरे हैं।
इतना सब कुछ करने के बाद भी वह स्वयं दुबारा प्रधान नहीं बनना चाहते। प्रधान बनने से पहले के मास्टर साहब के तन पर कुर्ता-पायजामा, पैर में साधारण चप्पल, चलने को पुराना वेस्पा स्कूटर और रहने को पुराना मकान, प्रधान बनने के बाद मास्टर लालता प्र्रसाद जी का कुछ भी तो नहीं बदला। हांँ, उनके प्रधान बनने से गाँव की तस्वीर और तकदीर जरूर बदल गई।
मास्टर साहब अपने को प्रधान कहलाना पसन्द नहीं करते, क्योंकि, वह कहते हैं- ‘आज प्रधान शब्द की गरिमा ही नहीं बची है।’ वह प्रधानों को सीख देते हैं, ‘उन्हें प्रधान शब्द के प्रति समाज में बनी सोच बदलने के लिए काम करना होगा।’
उनका कहना है, ‘‘प्रधान चाहें तो गाँव स्वर्ग बन सकता है। न संसाधनों का टोटा रास्ता रोकेगा और न पैसे की कमी आड़े आयेगी। लेकिन ताली दोनो हाथों से बजती है, जैसा कि ‘ग्रेम’ गाँव में हुआ।’’ ु