Tuesday, November 18, 2014

आवश्यकता है स्वदेशी बने- .दयानन्द जडि़या ‘‘अबोध’’


वर्ष 1905 ई॰ में बंगाल विभाजन के विरोध में बंग भंग आन्दोलन के दौरान तत्कालीन नेताओं ‘‘लाल, बाल, पाल’ व रवीन्द्र नाथ टैगोर ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के साथ स्वदेशी आन्दोलन आरम्भ किया था। वर्ष 1911 ई॰ में बंगाल विभाजन की प्रस्तावित योजना वापिस लिए जाने के साथ ही यद्यपि स्वदेशी आन्दोलन उस समय समाप्ति की ओर दिखा, किन्तु राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चले स्वाधीनता आन्दोलन में पुनः सक्रिय हुआ और स्थान-स्थान पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। परिणामस्वरूप हमारा देश भारतवर्ष 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हो गया।
 स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् स्वाधीन भारत में राष्ट्र के कर्णधारों ने न जाने क्या सोच कर विदेशी वस्तुओं के आयात को इतनी अधिक छूट दे दी कि आज भारत के बाजार विदेशी वस्तुओं से पटे पड़े हैं। छोटे-छोटे बच्चों के खिलौनों से लेकर, मोबाईल, इलेक्ट्रानिक वस्तुयें यहाँ तक पालीथीन की थैलियाँ जो कचड़ा बढ़ाने और पर्यावरण प्रदूषण बढ़ाने का एक मात्र मूलाधार है के साथ अनेकानेक खाद्य पदार्थ, फर्नीचर सभी विदेशी हैं।
 विदेशी शब्द आते ही एक बात याद आयेगी,  कि विदेशी सामान सबसे अधिक भारत में भेजने वाला देश चीन है। यह वही चीन है जिसने सन् 1963 ई॰ में भारत पर आक्रमण कर उत्तरी सीमा स्थित एक बड़े भू भाग को अपने अधिकार में ले लिया था जिसे उसने आज तक भारत को वापिस नहीं किया और इस युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में भारतीय जवान हताहत हुए थे। भारतीय शासकों ने उसे कैसे भारत में व्यापार करने की छूट दी मैं तो आज तक समझ न सका। पर इतना अवश्य जानता हूँ कि इन व्यापारियों के कारण भारतीय लघु उद्योगों व घरेलू उद्योग धन्धों को बहुत बड़ी हानि पहुँची है।
अभी कुछ वर्ष पूर्व तक भारतीय मेलों व हाटों में यहाँ के निर्धन कुम्हार बच्चों के लिए मिट्टी के खिलौने बेचने हेतु दुकानें सजाये दिखाई पड़ते थे, पर अब उनकी जगह चाइनीज खिलौने बिकते दिखाई पड़ते हंै। इससे कितनी हानि हुई भारतीय उद्योग धन्धों की। अब विदेशी  वस्त्रों के सामने भारतीय खादी को कौन पूछता है। यहाँ के हथकरघे बेकार हो गये हैं। सरकार घरों में बिजली के मीटर भी चाइना के बने हुए लगा रही है अपने देश में इनका उत्पादन व निर्माण नहीं कराती।
हमारे पर्वांे त्योहारों के अवसर पर पूजी जाने वाली देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी विदेशों से बनकर आ रही हैं। और तो और आज हमारे देश में प्रचलित शिक्षा प्रणालियाँ भी विदेशी हैं। अब गुरूकुल पद्धती के विद्यालयों की कौन कहे यहाँ तो गली-गली में ‘‘कान्वेन्ट स्कूल’’ व कालेज खुल हुये हैं, स्वाधीनता आन्दोलन के दिनों में गाँधी जी ने बेसिक शिक्षा की आधार शिला रखी थी। तत्कालीन विदेशी ब्रिटिश सरकार ने गाँव-गाँव में बेसिक स्कूल खोले और पाठ्य पुस्तकों में बेसिक रीडर चालू की, पर आज ‘‘मेरिया मान्टेसरी’’ द्वारा संचालित ‘‘मान्टेसरी पद्धति’’ के और ‘‘किंडर गार्डेन’’ स्कूल चल रहे हैं। बेसिक स्कूल तो खोजने पर शायद कहीं अपनी गुण्वŸाा में मिल जायें।
 हमारी भाषा भी अब हिन्दी के स्थान पर हिंगलिश हो गयी है। अखबारों में आधे के कुछ ही कम इंगलिश शब्द प्रयुक्त होते मिलेंगे अब तो ‘हाई वे’, ‘ कौंसिलिंग’, रेप, पोस्टमार्टम, टैक्स, ए॰टी॰एम॰, बैकिंग, एफ॰आई॰आर॰, रिजर्वेशन, एयर बस, सिस्टम जैसे कितने शब्द हैं, कहाँ तक कहा जाये। और तो और प्रधानमंत्री को पी॰एम॰ और मुख्यमंत्री को सी॰एम॰ कहने में ही गर्व का अनुभव होता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि आज हम कहने को गाँधी जी के देश के निवासी हैं पर अब तो हम अपनी वेश भूषा भी भूल कर पैन्ट शर्ट में सजे घूम रहे हैं। गाँधी जी तो 2 अक्टूबर व 30 जनवरी को याद कर लिये जाते हैं। किन्तु यदि हमें वास्तविक भारत का निर्माण करना है, तो पूर्ण रूप से स्वदेशी वस्तुओं को और अपने पुराने संस्कारों को पुनः अपनाना होगा। चाहें वह नित्य प्रयोग में आने वाली वस्तुयें हों या पहनने के वस्त्र अथवा शिक्षा प्रणाली, भाषा, वेश भूषा सभी को स्वदेशी रूप में अपनाना होगा, तभी देश का हित और हमारा भविष्य सुरक्षित होगा। ु
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