Tuesday, November 18, 2014

मैं गंगा हूँ - डाॅ॰ नवलता


गंगा के तट पर खड़ी हुई थी देख रही मन्थर प्रवाह।
लहरों से तभी सुनाई दी अव्यक्त दबी सी मन्द आह।।
मैंने सोचा, है यहाँ कौन, रो रहा मौन इस निर्जन में।
कितने ही उठने लगे प्रश्न अनजाने ही मेरे मन में।।

तब तक मैंने देखा, कोई कृषकाय मलिनवेशा नारी।
संकुचित, उदास, विकल, विह्वल जाने किस विपदा की मारी।।
थी देख रही कुछ दूर खड़ी, फिर मेरे निकट चली आई।
मैंने पूछा, क्या कष्ट तुम्हें, हो कौन, कहाँ से हो आई?

बोली वह मन्द शिथिल स्वर में, ‘‘हा’’! तुमने मुझे न पहचाना!
मैं पतितपावनी गंगा हूँ, तुमने जिसको माता माना।।
मैं स्वर्गलोक में पली-बढ़ी, बन देवसरित् भू पर आई।
पाताल चली, त्रैलोक्यगामिनी अतः त्रिपथगा कहलाई।।

मैं ज्येष्ठ सुता हूँ हिमगिरि की शिखरों के अंचल में खेली।
शंकर की जूट-जटाओं में नानाविध करती अठखेली।।
कर के तप घोर भगीरथ ने मेरे हित पथ-निर्माण किया।
दिव्यौषधियों का यौतक ले, सागरपत्नी मैं बनी प्रिया।।

पथ पर निर्मलता, शीतलता, नाना दिव्यौषधियाॅं अमोल।
बाँटती चली तुम मनुजों को, निज वक्षोरस में घोल-घोल।।
पी-पी कर जिसको पुष्ट हुये, आरोग्यभरा पाया जीवन।
पाया मेरा निर्मल प्रसाद, कर मेरे जल में अवगाहन।।

थीं छिपी हुई मेरे उर में जाने कितनी निधियाँ अपार।
धर्मार्थकामरत तुम मनुजों ने जाना मुझको मोक्षद्वार।।
मेरे आश्रय में जाने कितने जीव-जन्तु पाते जीवन।
मेरा जल पीकर बड़े हुये हैं जाने कितने वन-उपवन।।
मेरी ममता की छाया में ऋषियों ने तप निर्बाध किया।
आरोग्य मिला उसको, जिसने जीवन भर मेरा क्षीर पिया।।
पाकर आशीष सदा जिसका, मानव जीवन में सुख पाता।
जीवन देती आई तुमको, निम्नगा नहीं, मैं हूँ माता।।

पर हाय! आज मदमत्त हुये, मन आज तुम्हारे हुए विकृत।
समझा उसको बस केवल जल, जो था आप्यायक शुद्ध अमृत।।
मेरी धारा को रोक-रोक, पग बाँध दिये मेरे गतिमय।
कर छेड़-छाड़ उच्छिन्न किये, मेरे गीतों के स्वर, यति, लय।।

अपनी उच्छिष्ट मलिनता से कलुशित कर दिये सभी अवयव।
यौवन में वृद्धा सी दिखती हा! कहाँ गया वह पूर्व विभव?
मेरे अपने ही पुत्रों ने मेरी छाती को चीर दिया!
जिसका ऋण चुकता नहीं कभी, वह आज कलङ्कित क्षीर किया!!

मंै मनस्ताप से सूख गई, दिखता विषाद का अन्त नहीं।
तुम सबके कलुषित कर्मों से छिप गया पवन वासन्त कहीं।।
जिस माता का पोषण करना सत्पुत्रों का है कर्म पुण्य।
वे आज भूल कर धर्ममर्म, बन मूक-वधिर से अकर्मण्य।।

ऐसा न कहीं हो, ग्लानि और लज्जा से हृदय फटे मेरा!
हो जाऊँ लुप्त न धरती से, अब महाविपद् ने आ घेरा।।
क्या होगा हाल कपूतों का, मेरी चिन्ता का विषय बना।’’
यह सुन सहसा मेरे आगे छा गया अँधेरा घोर-घना।।

मैं लगी सोचने, अब भी यदि हम मनुजों के खुल जायें नयन।
तो सम्भव है, हम बचा सकें माँ के संग अपना भी जीवन।।
अब भी है समय नहीं बीता, आओ सब मिल कर जुट जायें।
निर्मल रक्खें गंगा माँ को पीढि़याँ युगों तक सुख पायें।। ु
- के-680, आशियाना काॅलोनी,
 कानपुर रोड, लखनऊ।