सारे जग की पावन नदियांँ, माता के समान हैं।
गंगा, यमुना, सरस्वती से संगम की पहचान है।।
झर-झर बहता निर्मल पानी, लगता बड़ा सुहाना।
जो बैठे नदियों के तीरे, गायें गीत तराना।।
तीर्थों के राजा प्रयागराज, ऐसा बना विधान है।
सारे जग की पावन नदियांँ, माता के समान हैं।।
नदियों का जल दूषित करना, माता का अपमान है।
माता को जो समझ न पाये, यह उसका बचकान है।।
नदियों, पेड़ों की रक्षा में, जुट जाओ जग के वासी।
रक्षा का संकल्प भरो, चाहे मथुरा रहो या काशी।।
पेड़ों-नदियांें से धरती सजती, प्रकृती का वरदान है।
सारे जग की पावन नदियांँ, माता के समान हैं।।
नदियों-पेड़ों से पर्यावरण, गाते सब वेद पुराण हैं।
प्रकृति धरोहर से ही सबको मिलता जीवन दान है।।
पेड़ लगाकर हरियाली से पर्यावरण बचाना है।
नदियों का जल स्वच्छ रहे, कुछ करके दिखलाना है।।
‘कृष्णानन्द’ नदियों-पेड़ों से सब जीवों का कल्याण है।
सारे जग की पावन नदियांँ, माता के समान हैं।।
- प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड, लखनऊ।





